Tuesday, April 23, 2024
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सरहपा का साहित्य

सरहपा का साहित्य सातवीं-आठवीं शताब्दी ईस्वी के भारत में भाषा, साहित्य एवं दर्शन की महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। उन्हें हिन्दी सहित अनेक भाषाओं के प्रथम कवि के रूप में सम्मान दिया जाता है। उन्होंने लम्बी आयु पाई तथा भारत भ्रमण करते हुए भी विपुल साहित्य की रचना की।

सरहपा को सरहपाद भी कहा जाता है। उनके साहित्य के बारे में जानने से पहले हमें हिन्दी भाषा एवं साहित्य के उद्भव पर किंचित् दृष्टिपात करना चाहिए।

हिन्दी भाषा का जन्म

हिन्दी भाषा का विकास क्रम संस्कृत भाषा से आरम्भ होता है। इस भाषा में उपलब्ध प्रथम ग्रंथ ऋग्वेद है जिसकी रचना ई.पू.4000 के लगभग अर्थात् आज से लगभग 6000 साल पहले हुई। कुछ लोग ऋग्वेद को और भी पुराना मानते हैं।

संस्कृत के उद्भव के कई हजार साल बाद ई.पू. 500 के आसपास मगध क्षेत्र में रहने वाले आर्यों में जनभाषा के रूप में पालि भाषा विकसित हुई। इसके बाद पूरे पांच सौ साल तक शिक्षित वर्ग में संस्कृत भाषा तथा जनसाधारण में पालि भाषा का प्रचलन रहा।

ईसा की प्रथम शताब्दी में जनसाधारण वर्ग में प्राकृत भाषा प्रचलन में आई। इसके बाद अगले लगभग एक हजार साल तक शिक्षित वर्ग में संस्कृत तथा जनसाधारण में पालि एवं प्राकृत भाषाओं का प्रचलन रहा। इस काल में ग्रंथों की रचना संस्कृत, प्राकृत एवं पालि तीनों भाषाओं में हुई। ब्राह्मणों ने संस्कृत को, बौद्धों ने पालि को एवं जैनों ने प्राकृत भाषा को अपनाया।

प्राकृत भाषा को लोक में अधिक ख्याति मिली। प्राकृत से ‘अपभ्रंश’ भाषा विकसित हुई। धीरे-धीरे अपभ्रंश के कई रूप बनने लगे जिनमें से एक रूप को ‘अवहट्ट’ कहा जाता था। ‘अवहट्ट’ को अपभ्रंश की अंतिम अवस्था कहा जाता है। इसी अवहट्ट से हिन्दी भाषा एवं अनेक देशी भाषाओं का विकास हुआ। डॉ. चंद्रधर शर्मा गुलेरी ने अवहट्ट को ‘पुरानी हिन्दी’ कहकर सम्मान दिया है।

ईसा की सातवीं-आठवीं शताब्दियों में प्राकृत की अपभ्रंश अवस्था ‘अवहट्ट’ एवं संस्कृत भाषा के मिश्रण से हिन्दी भाषा एवं साहित्य का विकास हुआ। डॉ. रामकुमार वर्मा ने हिन्दी साहित्य के इस काल को ‘संधि काल’ कहा है।

इस काल में संस्कृत एवं प्राकृत भाषाओं में लिखे गए साहित्य और लोक में प्रचलित ‘अवहट्ट’ का मिश्रण हुआ। इस काल में सिद्धों ने अपभ्रंश की रूढ़ साहित्यि शैली में जनभाषा ‘अवहट्ट’ का मिश्रण करके काव्य रचना की।

सिद्ध कवियों का उद्भव

सिद्ध कवियों का उद्भव बौद्ध-धर्म की एक नवीन शाखा के रूप में सातवीं-आठवीं शताब्दी ईस्वी में हुआ। सिद्धों की कुल संख्या चौरासी है। राहुल सांकृत्यायन ने इनमें से दस सिद्धों को सर्वाधिक प्रभावशाली एवं महत्वपूर्ण माना है जिनमें सरहपाद सर्वप्रथम हैं।

सिद्ध साहित्य का काल

सिद्ध साहित्य का काल वि.सं. 750 (ई.693) से आरम्भ होना माना जाता है। सिद्धों की कुल संख्या चौरासी है। इनमें से अनेक सिद्ध काव्य-रचना करने में समर्थ हुए। सिद्धों के आविर्भाव के समय बौद्ध धर्म में तंत्र-मंत्र आदि कुरीतियों का बोलबाला था।

चूंकि इन कुरीतियों और दार्शनिक अन्तर्द्वन्द्व की पृठभूमि में सिद्धों का पदार्पण हुआ था इसलिए सिद्धों ने ब्राह्मण धर्म, बौद्ध धर्म एवं पाशुपत धर्म में प्रचलित आडम्बरों एवं कुरीतियों का विरोध करके भारत के लोगों को सहज जीवन जीने का उपदेश दिया। सिद्धों के दर्शन ने कई शताब्दियों तक मागधी (मगही) वाङ्मय एवं हिन्दी वाङ्मय को प्रभावित किया।

सिद्ध साहित्य का विलोपन

बारहवीं शताब्दी से लेकर बीसवीं शताब्दी ईस्वी के मध्य तक भारत पर विदेशियों का शासन रहा। इस कारण भारत के प्राचीन ग्रंथ विलुप्त हो गए। इसी काल में सिद्धों की परम्परा भी विलुप्त हो गई और लोग उनके तथा उनकी रचनाओं के बारे में बिल्कुल भूल गए।

सरहपा का साहित्य भी भुला दिया गया। भारत में भले ही वे भुला दिए गए किंतु नेपाल, भूटान और तिब्बत में वे महात्मा बुद्ध की ही तरह श्रद्धा से याद रखे गए।

सिद्ध साहित्य की खोज

सिद्धों के साहित्य को सर्वप्रथम उजागर करने का श्रेय महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री को है। ई.1907 में उन्हें नेपाल दरबार पुस्तकालय से सिद्धों के पचास पदों का एक संग्रह मिला जिसे उन्होंने बंगीय साहित्य परिषद् कलकत्ता द्वारा ‘बोध गान ओ दोहा’ शीर्षक से प्रकाशित कराया।

इनके बाद प्रबोधचन्द बागची ने कलकत्ता संस्कृत सीरीज के ‘दोहा- कोश’ में कुछ सिद्धों की रचनाएँ प्रकाशित कराईं। शशिभूषण दासगुप्ता ने ‘ऑब्सक्योर रिलीजियस कल्ट्स’ में सिद्धों का परिचय दिया।

सिद्धों को पूर्ण प्रकाश में लाने का कार्य राहुल सांकृत्यायन ने किया। वे भूटान और तिब्बत से सिद्ध साहित्य के ग्रंथ खच्चरों पर लादकर भारत लाये। इन्हीं ग्रंथों से धर्मवीर भारती ने ‘सिद्ध साहित्य’ और मंगलबिहारी शरण सिन्हा ने ‘सिद्धों की सांध्य भाषा’ पुस्तक लिखी। रामचन्द्र शुक्ल और डॉ. रामकुमार वर्मा ने भी सिद्धों की रचनाओं पर प्रकाश डाला।

सरहपाद (सरहपा)

मगही साहित्य के लेखक भारतेन्दु डॉ. रामप्रसाद सिंह ने अपने मगही भाषा के खण्ड काव्य ‘सरहपाद’ में सरहपा के जीवनवृत्त का सविस्तार वर्णन किया। तभी सरहपा का साहित्य प्रकाश में आ सका तथा यह ज्ञात हो सका कि सिद्ध कवियों में सबसे महत्वपूर्ण और प्रथम नाम सरहपा अथवा सरहपाद का है जिन्होंने अर्द्धमागधी अपभ्रंश भाषा में जन-रुचियों के आलोक में काव्य रचनाएँ लिखीं।

सरहपाद का जीवन काल

डॉ. विनयतोष भट्टाचार्य ने सरहपा का समय संवत् 690 (ई.633) निर्धारित किया है। राहुल सांकृत्यायन ने उनका जन्म सं. 750 (ई.693) में होना माना है। इस आधार पर डॉ. रामप्रसाद सिंह ने सरहपा का निधन ई.780 के आसपा होना माना है। कुछ विद्वान सरहपा की आयु सौ साल मानकर उनका जन्म ई.680 में और मृत्यु 780 में अनुमानित करते हैं। यही समय सरहपा के समकालीन मगधराज धर्मपाल का भी है।

सरहपा मूलतः वैदिक धर्म का पालन करने वाले विद्वान ब्राह्मण परिवार में उत्पन्न हुए थे। इस कारण उन्होंने वेदों, उपनिषदों सहित उस काल में विख्यात अनेक संस्कृत ग्रंथों का अध्ययन किया था किंतु बाद में वे अपना परिवार एवं ब्राह्मण धर्म दोनों का त्याग करके बौद्ध हो गए तथा उन्होंने नालंदा विश्वविद्यालय में प्रवेश लेकर बौद्ध ग्रंथों का अध्ययन किया।

इसलिए स्वाभाविक ही था कि उनके साहित्य पर ब्राह्मण धर्म एवं बौद्ध धर्म के दर्शन का प्रभाव होता। चूंकि सरहपा न तो ब्राह्मण धर्म से संतुष्ट थे और न बौद्ध धर्म के दर्शन से, इसलिए उन्होंने एक नवीन दर्शन का प्रतिपादन किया जिसे सहज दर्शन अथवा सहजयान कहा जाता है।

काव्य रचना

सरहपा का साहित्य मुख्यतः कविता के रूप में उपलब्ध है। माना जाता है कि जब सरहपा नालंदा में अध्यापन कर रहे थे, उसी काल में उन्होंने कविताएं लिखना आरम्भ किया। उन्होंने संस्कृत भाषा के साथ-साथ अपभ्रंश एवं मागधी (मगही) में भी कविताएं लिखीं।

उन्होंने अपने सिद्धांतों का प्रचार करने के लिए मागधी भाषा को चुना। शिवसिंह सेंगर, राहुल सांकृत्यायन, गणपतिचंद्र गुप्त एवं नंददुलारे वाजपेयी आदि विद्वानों ने सरहपा को हिन्दी भाषा का प्रथम कवि माना है।

सरहपा का साहित्य

डॉ. रामकुमार वर्मा ने सरहपाद को हिन्दी का प्रथम कवि माना है। सरहपा का साहित्य देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि उनका उद्देश्य कविता लिखना नहीं था, कविता तो केवल एक माध्यम भर था जिसमें वे प्रभावी ढंग से अपनी बात कह सकें।

फिर भी उनकी कविता इतनी प्रभावशाली थी कि उनकी रचनाओं का प्रभाव न केवल उस काल के हिन्दी साहित्य पर पड़ा, अपितु सरहपा के लगभग 700 साल बाद हुए कबीर की कविता पर भी उसका प्रभाव देखा जा कता है।

राहुल सांकृत्यायन ने 32 ग्रंथों की चर्चा की है जो सरहपाद के नाम से मिलते हैं। सरहपा ने अपने ग्रंथों की रचना संस्कृत, अपभ्रंश एवं मागधी भाषाओं में की थी। उनके कुछ ग्रंथ मूल हिन्दी, संस्कृत अथवा मागधी भाषाओं में नहीं मिल सके हैं अपितु तिब्बती भाषा में उपलब्ध हुए हैं। सरहपा का साहित्य कोश बहुत समृद्ध है।

सरहपा के नाम से मिलने वाले कुछ ग्रंथों के नाम इस प्रकार हैं-

1. कखस्यदोहानाम, 2. कखदोहाटिप्पण, 3. कायकोशामृतबज्रगीति, 4. कायवाकचित्तामनसिकारनाम, 5. चित्तकोषाजबज्रगीति 6. तत्त्वोपदेशशिखरदोहागीति, 7. दोहाकोशगीति, 8. दोहाकोशनामचर्यागीति, 9. दोहाकोशोपदेशगीतिनाम, 10. दोहाकोशनाममहामुद्रोपदेश, 11. द्बादशोपदेशगाथा, 12. भावनादृष्टिचर्याफलदोहागीति, 13. बसन्ततिलकदोहा्कोषगीतिकानाम 14. भावनादृष्टिचर्याफलदोहागीतिकानाम, 15. महामुद्रोपदेशवज्रगुह्यगीति, 16. वाक्कोसारुचिरस्वरबज्रगीति, 17. श्रीबुद्धकपालतन्त्रपंजिका, 18. श्रीबुद्धकपालमण्डलबिद्धिक्रम प्रद्योत्ननामा, 19. श्रीबुद्धकपालसाधनानाम, 20. स्वाधिष्ठानाक्रम, 21. सर्वभूतबलिबिद्धि, 22. त्रैलोकवशंकरलोकेश्वरसादन।

संत परम्परा का प्रथम ग्रंथ दोहागीतिकोष

सरहपा द्वारा रचित दोहागीतिकोष को हिन्दी सन्त साहित्य परम्परा का ‘आदि ग्रन्थ’ माना जा सकता है। इस ग्रंथ के कुछ दोहे इस प्रकार हैं-

जिवँ लोणु विलिज्जइ पाणियहिं तिवँ जइ चित्तु विलाइ।

अप्पा दीसइ परहिं सवुँ तत्थ समाहिए काइँ।।

अर्थात्- जिस प्रकार नमक पानी में विलीन होता है, वैसे चित्त आत्मा में विलीन हो जाता है। तब आत्मा, परमात्मा समान दिखती है, फिर समाधि क्यों करें?

जोवइ चित्तुण-याणइ बम्हहँ अवरु कों विज्जइ पुच्छइ अम्हहँ।

णावँहिं सण्ण-असण्ण-पआरा पुणु परमत्थें एक्काआरा।।

अर्थात्- चित्त ब्रह्म को देखता है पर उसे जानता नहीं है। चित्त हमसे पूछता है कि दूसरा कौन है? नाम देने से संज्ञा एवं जड़ पृथक हो जाते हैं, परंतु परमार्थ से वे एकाकार हैं।

खाअंत-पीअंतें सुरउ रमंतें अरिउल-बहलहो चक्कु फिरंतें ।

एवंहिं सिद्धु जाइ परलोअहो मत्थएं पाउ देवि भू-लोअहो ।।

अर्थात्- खाता-पीता, रति करता, शत्रुओं के बहुसंख्यों के बीच चक्र फिराता। ऐसे ही सिद्ध भूलोक के मस्तक पर पाँव रखकर परलोक जाता है।

सरहपाद अधिकतर नालंदा, राजगृह और विक्रमशिला में रहे। अतः उनके काव्य की भाषा उस काल में इन स्थानों में बोली जाने वाली अर्धमागधी (मगही) अपभ्रंश है जिसे ‘संधा’ भाषा भी कहा गया है।

सिद्धों ने जिस मगही भाषा का प्रयोग किया था, वह किंचित् परिवर्तन से आज भी वर्तमान है। डॉ. सम्पति अर्याणी ने सरहपाद के दोहे को वर्तमान मगही भाषा में रूपांतरित कर उनकी भाषा को मगही के निकट होना सिद्ध किया है-

सरहपाद का मूल दोहा-

नगर बाहिरे डोम्बि तोहोरि कुडिया, छाइ-छई जाड़सो ब्राह्मण नाडिया

अलो डोम्बि तोर संग करिव न संग निधि कान्ह कपालि जोई लांग।

मगही भाषा में इसे इस प्रकार लिखेंगे-

नगर बाहरे डोम्बी तोहार कुटिया छूइ-छूइ जाइ से बाभन लडिया।

अरे डोम्बी तोरे साथ करब न संग, निरधिन कान्ह कपाल जोगी लंग।

हिन्दी भाषा एवं साहित्य पर सरहपा का प्रभाव

सरहपाद ने जनभाषा मागधी में कविता लिखने की जो परम्परा प्रारम्भ की, उसका प्रभाव भक्तिकाल के हिन्दी साहित्य में रहा। नाथपंथियों से लेकर कबीर आदि की कविताओं में सामाजिक रूढ़ियों और आडम्बरों के विरोध में जो अक्खड़नपन मिलता है, वह सरहपाद की देन है।

योग साधना में भी इनका प्रभाव देखा जा सकता है। सामाजिक जीवन का जो चित्र इन्होंने उकेरा है, वह भक्तिकालीन काव्यों का प्रबल आधार बना। कृष्णभक्ति के मूल में जो प्रवृत्ति मार्ग है, उसकी झलक भी सरहपाद के साहित्य में दिखाई पड़ती है।

सरहपाद ने दार्शनिक एवं चिंतक के रूप में देश, धर्म एवं समाज के समक्ष नवीन आदर्श प्रस्तुत किया तथा भाषा एवं साहित्य के क्षेत्र में नई क्रांति को जन्म दिया। उनमें उपनिषदों की करुणा तथा बुद्ध की मध्यम मार्गीय जीवन पद्धति का मिश्रण था। उन्हीं का अनुकरण करके नाथों एवं कबीरपंथियों ने अपना काव्य रचा।

बहुत से विद्वानों ने करुणा एवं अहिंसा के विचार को बुद्ध का आविष्कार मान लिया है परंतु करुणा एवं अहिंसा का मूलमंत्र वेदों एवं उपनिषदों में बहुलता एवं प्रमुखता से उपलब्ध है जो बुद्ध से बहुत पहले के हैं।

उड़ीसा में सरहपाद को उड़िया का कवि माना जाता है। बंगाल में उन्हें बंगला का कवि माना जाता है। मिथिला क्षेत्र के लोग उन्हें मैथिली का कवि मानते हैं। मगध क्षेत्र में उन्हें मागधी का कवि माना जाता है। बहुत से विद्वान उन्हें अपभ्रंश का कवि मानते हैं। हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखक उन्हें पुरानी हिन्दी का कवि मानते हैं।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि सरहपा का साहित्य हिन्दी-साहित्य के संधि-काल का साहित्य है तथा सरहपा हिन्दी के आदिकवि हैं। उनके बाद ही अपभ्रंश अथवा अवहट्ट भाषा आधुनिक उड़िया, बंगला, मैथिली, हिन्दी आदि भाषाओं के वर्तमान स्वरूप में ढलनी आरम्भ हुईं।

सरहपा अपनी रचनाओं में अपभ्रंश की अनेक विशेषताएं समेटे हुए हैं। इन्हीं विशेषताओं के कारण सरहपा की भाषा को पुरानी हिन्दी कहा गया।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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