जब बदमाशों ने बादशाह अकबर की नाक के नीचे से गुजराती अमीरों की औरतें लूट लीं तो बादशाह की प्रतिष्ठा को बड़ा धक्का लगा। यह मुगल बादशाह के इकबाल के लिए सीधी चुनौती थी।
गुजराती अमीरों का विद्रोह
जब अकबर (AKBAR) ने इब्राहीम हुसैन मिर्जा (IBRAHIM HUSSAIN MIRZA) को परास्त करके सम्भल की तरफ भाग जाने के लिए विवश कर दिया तो बादशाह अहमदाबाद के लिए रवाना हुआ। एक दिन कुछ बदमाशों ने अफवाह फैला दी कि बादशाह ने शाही सेना को आदेश दिए हैं कि गुजरातियों के शिविर लूट लिए जाएं।
गुजराती अमीरों की औरतें
इस पर बहुत से लोग गुजराती अमीरों के शिविर पर चढ़ बैठे और लूटमार मचाने लगे। कुछ शाही सैनिक भी उन लुटेरों के बहकावे में आ गए और वे भी गुजरातियों का माल-असबाब लूटने लगे और उनकी स्त्रियों को ले भागे। यह एक विचित्र बात थी, गुण्डे शहंशाह की नाक के नीचे से गुजराती अमीरों की औरतें ले भागे थे!
जब शहंशाह अकबर को इस बात की जानकारी मिली तो उसने अपने उच्च सेनापतियों को आदेश दिए कि तुरंत इस लूटपाट को बंद किया जाए तथा लुटेरों को पकड़ कर मेरे समक्ष प्रस्तुत किया जाए। अकबर (AKBAR) के सेनापतियों ने थोड़ी ही देर में स्थिति पर नियंत्रण पा लिया।
लुटेरों को दण्ड
बादशाह अपने दरबार में जाकर बैठ गया। लुटेरों को पकड़कर उसके समक्ष प्रस्तुत किया गया। अकबर (AKBAR) ने वहीं पर हाथी बुलवाए और अपने सामने ही उन लोगों को हाथियों के पैरों तले कुचलवा दिया।
उस काल में अपराधियों को दण्ड देने में इतनी ही देर लगती थी। क्योंकि तब तक वकीलों की वह फौज अस्तित्व में नहीं आई थी जो अदालतों से तारीख पर तारीख लेकर मुकदमों को जीवन भर चला सके।
अकबर (AKBAR) के शासन काल में न अदालतों को कहीं पर समन भेजने पड़ते थे, न अदालत दर अदालत अपीलों का सिलिसिला चलता था, न साक्ष्य जुटाए जाते थे, न अपराधियों के मानवाधिकारों की चिंता करने वाले आयोग होते थे। न अपराधियों को जेल में बंद करके बिरयानी खिलाने का प्रबंध किया जाता था।
जराती अमीरों की औरतें वापस
शहंशाह के विश्वसनीय लोग, शहंशाह के समक्ष जो कुछ भी कहते थे, उसी को आरोपी, उसी को गवाह, उसी को साक्ष्य तथा उसी को फोरेंसिक जांच मानकर फैसला कर दिया जाता था, वही न्याय था। उसे किसी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती थी। पैतृक अधिकार से प्राप्त, निर्णय एवं न्याय करने की इसी शक्ति में, शासकीय प्रतिभा का सर्वोच्च प्रदर्शन निहित था। अकबर (AKBAR) ने भी पैतृक अधिकार से प्राप्त इस न्यायिक प्रतिभा का आनन-फानन में प्रदर्शन करके अपने शिविर में शांति स्थापित कर ली। यदि अकबर (AKBAR) अपराधियों पर कार्यवाही करने में थोड़ी भी ढिलाई बरतता तो उसके शिविर में शांति स्थापित होनी संभव नहीं थी। अपराधियों के हौंसले बढ़ते रहते और ऐसी घटनाएं बार-बार होती रहतीं। गुजराती अमीरों की औरतें उन्हें वापिस लौटा दी गईं। इस विद्रोह को कुचलने के बाद अकबर ने उन गुजराती अमीरों को इब्राहीम हुसैन मिर्जा से छीने गए इलाकों का अधिकारी बना दिया जिन्हें वह अपने प्रति विश्वस्त समझने लगा था। इससे गुजराती अमीरों के शिविर में शांति का वातावरण बन गया। गुजराती सुल्तान के वजीर इतिमाद खाँ गुजराती को इन सब गुजराती अमीरों के ऊपर नियुक्त किया गया। इन अमीरों ने बादशाह को वचन दिया कि वे गुजरात से बागी मिर्जाओं को मार भगाएंगे तथा भविष्य में कभी भी उनका साथ नहीं देंगे।
अकबर की खंभात यात्रा
इसके बाद अकबर (AKBAR) ने खंभात जाने का विचार किया ताकि वह समुद्र देख सके। उसने आज तक कोई समुद्र नहीं देखा था। जब अकबर (AKBAR) खंभात पहुंचा तो उसने खंभात का बंदरगाह अपने अमीर हसन खाँ खजांची के सुपुर्द कर दिया।
अभी बादशाह खंभात में ही था कि उसे समाचार मिला कि उसने जिन गुजराती अमीरों पर विश्वास करके उन्हें जागीरें और अधिकार दिए थे, उन्होंने बगावत कर दी है। इख्तियारमुल्क नामक गुजराती अमीर शाही शिविर छोड़कर भाग गया है तथा इतिमाद खाँ ने अबू तुराब और हकीम एनुलमुल्क आदि मुगल अमीरों को बंदी बना लिया है।
इस पर अकबर (AKBAR) ने शाबास खाँ नामक सेनापति को खंभात से अहमदाबाद भेजा ताकि अबू तुराब और हकीम एनुलमुल्क आदि मुगल अमीरों को मुक्त करवाया जा सके और धोखेबाज गुजराती अमीरों को पकड़कर बंदी बनाया जा सके।
अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि जब बादशाह खंभात में था, तब रूम, सीरिया, ईरान और तूरान के रहने वाले लोग उसकी सेवा में उपस्थित हुए। अकबर (AKBAR) ने उनसे भेंट करके उन्हें संतुष्ट किया। खंभात से अकबर बड़ौदा के लिए रवाना हो गया।
बड़ौदा पर अधिकार
यह नगर इब्राहीम हुसैन मिर्जा (IBRAHIM HUSSAIN MIRZA) के अधिकारियों के अधीन था। अकबर (AKBAR) ने बड़ौदा पर अधिकार कर लिया। यहाँ से उसने अमीरों का एक दल चांपानेर के लिए रवाना किया ताकि वहाँ से भी विद्रोही मिर्जाओं के अधिकारियों को खदेड़ा जा सके।
मिर्जा अजीज कोका की नियुक्ति
जब अकबर (AKBAR) बड़ौदा में था, तब उसने मिर्जा अजीज कोका (AZIZ KOKA) को गुजरात का सूबेदार नियुक्त करके उसे अहमदाबाद भेज दिया क्योंकि उन दिनों अहमदाबाद ही गुजरात की राजधानी थी। अभी अकबर (AKBAR) बड़ौदा में ही था कि शाबास खाँ आदि मुगल अमीर धोखेबाज गुजराती अमीरों को पकड़कर ले आए।
उन्हें अकबर (AKBAR) के समक्ष प्रस्तुत किया गया। वे बादशाह के समक्ष की गई प्रतिज्ञा भंग कर चुके थे तथा बादशाह का विश्वास खो चुके थे। इसलिए अकबर ने उन्हें फिर से अपने मंत्रियों एवं सेनापतियों के नियंत्रण में रख दिया।
सूरत दुर्ग पर आक्रमण का विचार
अब अकबर (AKBAR) ने सूरत दुर्ग पर आक्रमण करने का विचार किया। मुल्ला बदायूंनी ने लिखा है कि सूरत का किला ई.1539 में मुगल सेनापति चिंगिज खाँ ने पुर्तगालियों को रोकने के लिए बनाया था।
चिंगिज खाँ की मृत्यु के बाद यह दुर्ग विद्रोही मिर्जाओं का केन्द्र बन गया था किंतु हुमायूँ (HUMAYUN) ने उनका विद्रोह समाप्त करके उनकी जगह हम्जाबान को सूरत का दुर्गपति बनाया था। जब सूरत दुर्ग में यह सूचना पहुंची कि इब्राहीम हुसैन मिर्जा (IBRAHIM HUSSAIN MIRZA) पराजित होकर भाग गया है तथा बादशाह बड़ौदा तक आ पहुंचा है तो सूरत के किले में घबराहट फैल गई।
उस समय अकबर (AKBAR) के मरहूम चाचा मिर्जा कामरान की पुत्री गुलरुख बेगम भी अपने बेटे को लेकर सूरत के दुर्ग में छिपी हुई थी। वह अपने पुत्र को लेकर दक्षिण भारत भाग गई।
हम्जबान की बगावत
इस समय हम्जबान नामक एक तुर्की अमीर मिर्जाओं की तरफ से सूरत के दुर्ग की रक्षा कर रहा था। किसी समय हम्जाबान हुमायूँ (HUMAYUN) का विश्वस्त सेनापति था और उसी ने हम्जाबान को सूरत का किलेदार बनाया था किंतु अब वह अकबर (AKBAR) से बगावत करके बागी मिर्जाओं के साथ हो गया था।
राजा टोडरमल की रिपोर्ट
जब अकबर (AKBAR) बड़ौदा में था तब उसने राजा टोडरमल को सूरत के किले की स्थिति का पता लगाने भेजा। ताकि किले में प्रवेश करने एवं निकलने का मार्ग ढूंढा जा सके। राजा टोडरमल अपने सैनिकों को लेकर सूरत गया तथा उसने वहाँ से लौटकर शहंशाह को सूरत के समाचार दिए। टोडरमल ने कहा कि सूरत के किले को आसानी से जीता जा सकता है।
✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Third Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।




