Sunday, January 25, 2026
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मानसार: भारतीय शिल्पशास्त्र का अद्वितीय ग्रंथ

मानसार भारतीय शिल्पशास्त्र का एक अद्वितीय ग्रंथ है जिसमें वास्तुकला, मूर्तिकला और नगर नियोजन के विस्तृत सिद्धांत दिए गए हैं। इसे हिंदू वास्तुकला की परंपरा का एक मानक सूत्र‑ग्रंथ माना जाता है, जो आज भी वास्तु, पुरातत्त्व और इंडियन आर्किटेक्चर के शोध में व्यापक रूप से उद्धृत होता है।

परिचय

भारतीय संस्कृति में वास्तुशास्त्र और शिल्पकला का विशेष स्थान रहा है। मंदिर निर्माण, नगर नियोजन भवन और मूर्तिकला की परंपरा को समझने के लिए प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन आवश्यक है। मानसार ग्रंथ इन्हीं में से एक प्रमुख शिल्पशास्त्रीय ग्रंथ है, जिसे मानसार ऋषि  द्वारा रचित माना जाता है। यह ग्रंथ वास्तुशास्त्र, मूर्तिकला और नगर नियोजन के सिद्धांतों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है।

मानसार ग्रंथ क्या है?

मानसार (या मानसार शिल्पशास्त्र) संस्कृत में रचित एक प्राचीन वास्तु व शिल्पशास्त्र ग्रंथ है, जिसमें लगभग 70 अध्याय और करीब 10,000 श्लोक बताए जाते हैं। विद्वानों के अनुसार यह संभवतः पहली सहस्राब्दी ईस्वी के आसपास रचा गया और उत्तर भारत की वास्तु परंपरा का प्रामाणिक पाठ बन गया। ग्रंथ का नाम “मानसार” का अर्थ ही “माप‑मानों का सार” या “मापन‑शास्त्र का निचोड़” माना जाता है, जो इसके तकनीकी स्वरूप को दर्शाता है।[motilalbanarsidass]

संरचना और विषय‑वस्तु

मानसार ग्रंथ में लगभग 70 अध्याय हैं। इसकी शुरुआत ब्रह्मा की स्तुति से होती है और समापन शिव के तीसरे नेत्र के खुलने पर होता है।

  • प्रथम आठ अध्याय: शिल्प और वास्तु की मूलभूत परिभाषाएँ।
  • अध्याय 19 से 30: एक मंजिला से लेकर बारह मंजिला भवनों का वर्णन।
  • अध्याय 31 से 50: वास्तुशिल्प और नगर नियोजन की चर्चा।
  • अध्याय 51 से 70: मूर्तिकला और प्रतिमा निर्माण के नियम।

इस ग्रंथ में गर्भन्यास, भूमि परीक्षण, शङ्कु स्थापना, ग्राम और नगर की योजना, गोपुर और मण्डप निर्माण जैसे विषयों का विस्तार से उल्लेख मिलता है।

इस प्रकार मानसार के प्रारंभिक 8 अध्याय भूमिका और सिद्धांतात्मक चर्चा से जुड़े हैं, जिनमें वास्तुशास्त्र की उत्पत्ति, देवताओं से परंपरा का अवतरण और भूमि‑चयन जैसे विषय आते हैं। इसके बाद के 42 अध्याय में आवासीय भवन, बहुमंजिला इमारतें, महल, दुर्ग, बाजार, उद्यान, कुएँ‑तालाब और नगर‑योजना तक का विस्तृत वर्णन है। अंतिम लगभग 20 अध्याय मूर्तिकला, देवप्रतिमा, मानव‑प्रतिमा, पशु‑पक्षी की आकृतियों और अलंकरण‑विधान पर केंद्रित हैं।[samacharjustclick]​

वास्तुशास्त्र और नगर‑योजना में योगदान

मानसार के अनुसार किसी भी बस्ती के लिए ऐसी भूमि उपयुक्त मानी गई है जो ठोस मिट्टी की हो, हल्की ढलान के साथ पूर्व दिशा की ओर खुलती हो ताकि निवासी सूर्योदय का आनंद ले सकें। ग्रंथ में छोटे आवासीय परिसर से लेकर विशाल नगर तक के लिए माप, अनुपात और दिशा‑निर्देश दिए गए हैं; उदाहरण के लिए, नगरों को समुद्र, नदी या पर्वतों के समीप बसाने तथा मुख्य मार्गों को उत्तर‑दक्षिण या पूर्व‑पश्चिम दिशा में रखने की सलाह दी गई है। मानसार नगरों को आठ प्रकारों में विभाजित करता है, जिनमें राजधानियाँ, व्यापारिक नगर, तीर्थ‑नगर और दुर्ग‑नगर जैसे रूप शामिल हैं, जो प्राचीन भारत की उन्नत शहरी‑योजना परंपरा का संकेत देते हैं।[hi.wikipedia]​

मंदिर और मूर्ति‑निर्माण के सिद्धांत

यह ग्रंथ हिंदू मंदिर वास्तुकला के लिए भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है; कई विद्वान मानते हैं कि मध्य भारत के बटेश्वर मंदिर समूह जैसे स्थलों पर मानसार और मायामत जैसे शास्त्रों के सिद्धांत अपनाए गए। मंदिर के गर्भगृह, मंडप, शिखर, प्राकार, द्वार, स्तंभ, अलंकरण और प्रतिमा‑स्थापना के लिए इसमें विस्तृत माप‑मान, अनुपात और दिशा‑नियम वर्णित हैं। मूर्ति‑शिल्प संबंधी अध्यायों में विभिन्न देवताओं, बुद्ध, जैन तीर्थंकरों, महापुरुषों और पशु‑पक्षियों की प्रतिमाओं के आयाम, मुद्राएँ और लक्षण विस्तार से दिए गए हैं, जिससे यह संपूर्ण शिल्पशास्त्र का रूप ले लेता है।[transliteral]​

मानसार की विशेषताएँ

  1. वास्तुशास्त्र का वैज्ञानिक दृष्टिकोण – भूमि परीक्षण, दिशा निर्धारण और भवन निर्माण की विधियाँ आज भी प्रासंगिक हैं।
  2. नगर नियोजन – इसमें नगरों के मार्ग, प्राकार, गोपुर और मण्डप की योजना का उल्लेख है।
  3. मूर्तिकला का सौंदर्यशास्त्र – देव प्रतिमाओं के अनुपात, मुद्रा और स्थापत्य के नियम दिए गए हैं।
  4. प्राचीन तकनीकी कल्पनाएँ – 43वें अध्याय में ऐसे रथों का वर्णन है जो वायुवेग से चलते थे, जिससे तत्कालीन वैज्ञानिक सोच का पता चलता है।

ऐतिहासिक महत्व

मानसार ग्रंथ भारतीय वास्तु परंपरा का जीवंत दस्तावेज है। यह न केवल मंदिर निर्माण की विधियों को स्पष्ट करता है, बल्कि नगर नियोजन और सामाजिक संरचना की झलक भी देता है। श्री प्रसन्न कुमार आचार्य ने इस ग्रंथ को पुनः संकलित कर अंग्रेजी में अनुवाद किया और सात भागों में प्रकाशित किया।

आधुनिक सदंर्भों में मानसार

आज जब भारतीय वास्तुशास्त्र, मंदिर‑संरक्षण और हेरिटेज‑टूरिज़्म पर नए शोध हो रहे हैं, मानसार को एक मानक स्रोत के रूप में पढ़ा और उद्धृत किया जाता है। सतत विकास, जल प्रबंधन, प्राकृतिक ढलानों का उपयोग और सूर्य‑उन्मुख निर्माण जैसे सिद्धांत, जो आज “क्लाइमेट‑सेंसिटिव आर्किटेक्चर” में चर्चा का विषय हैं, मानसार में पारंपरिक रूप से व्यवस्थित रूप में मिलते हैं। इसीलिए इसे भारतीय वास्तुकला‑परंपरा का एक आधार‑ग्रंथ माना जाता है, जो प्राचीन ज्ञान और आधुनिक वास्तु‑चिंतन के बीच सेतु का कार्य करता है।[dharmawiki]​

निष्कर्ष

मानसार ग्रंथ भारतीय शिल्पशास्त्र का अद्वितीय ग्रंथ है जो वास्तु, मूर्तिकला और नगर नियोजन की परंपरा को संरक्षित करता है। यह ग्रंथ न केवल प्राचीन भारतीय ज्ञान का प्रतीक है, बल्कि आधुनिक समय में भी वास्तु और कला के क्षेत्र में मार्गदर्शक सिद्ध हो सकता है।

  • आर्किटेक्ट्स और डिज़ाइनर्स के लिए यह ग्रंथ प्रेरणा का स्रोत है।
  • इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के लिए यह भारतीय संस्कृति की गहराई को समझने का माध्यम है।

👉डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक पुस्तकें-

ग्रंथ परिचय

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