हयशीर्ष पांचरात्र के अनुसार मूर्ति-निर्माण के लिए शिला परीक्षण (पत्थरों का चयन) मंदिर निर्माण और मूर्ति विज्ञान का सबसे महत्वपूर्ण प्रारंभिक चरण है। शास्त्रों का मानना है कि यदि पत्थर दोषपूर्ण हो, तो उसमें देवता का वास नहीं होता और वह उपासक के लिए शुभ फलदायी नहीं रहता।
यहाँ हयशीर्ष पांचरात्र में मूर्ति-निर्माण के लिए शिला परीक्षण के प्रमुख वैज्ञानिक और आध्यात्मिक मापदंड दिए गए हैं-
शिला-परीक्षा: दिव्य प्रतिमा के लिए पत्थर का चयन
हयशीर्ष पांचरात्र के अनुसार, एक शिल्पकार को पत्थर चुनने से पहले उसकी आयु, लिंग, रंग, ध्वनि और दोषों का सूक्ष्म परीक्षण करना चाहिए।
1. पत्थरों का वर्गीकरण (Classification by Gender)
प्राचीन ग्रंथों ने पत्थरों को उनकी कठोरता और ध्वनि के आधार पर तीन श्रेणियों में बांटा है:
- पुल्लिंग शिला (Male Stone): जिस पत्थर पर चोट करने से कांस्य या लोहे की घंटी जैसी मधुर और गूंजने वाली ध्वनि (Tinkle) निकले। यह मुख्य देवता की मूर्ति बनाने के लिए सर्वश्रेष्ठ है।
- स्त्रीलिंग शिला (Female Stone): जिस पत्थर से अपेक्षाकृत कम गूंज वाली या झांझ जैसी ध्वनि निकले। इसका उपयोग देवी की प्रतिमाओं या पीठिका (Base) के लिए किया जाता है।
- नपुंसक शिला (Neuter Stone): जिसकी ध्वनि मिट्टी के बर्तन जैसी खनक रहित हो। ऐसी शिला का उपयोग केवल नींव या मंदिर के बाहरी हिस्सों के लिए किया जाता है, मुख्य विग्रह के लिए नहीं।
2. वर्ण परीक्षा (Classification by Color)
हयशीर्ष पांचरात्र के अनुसार, वर्ण (रंग) के आधार पर पत्थरों का चयन उस देवता की प्रकृति पर निर्भर करता है:
- श्वेत (सफेद): शांति और ज्ञान के प्रतीक देवताओं के लिए।
- रक्त (लाल): शक्ति और तेज वाले स्वरूपों के लिए।
- पीत (पीला): वैभव और संपन्नता के लिए।
- कृष्ण (काला/गहरा नीला): भगवान विष्णु (नारायण) के लिए कृष्ण शिला को महाशिला कहा गया है और यह सर्वोत्तम मानी जाती है।
3. शिला के दोष (Flaws to Avoid)
ग्रंथ में उन पत्थरों को वर्जित माना गया है जिनमें निम्नलिखित दोष हों:
- शर्करा (Granular): जो पत्थर रेत की तरह झड़ने लगें।
- बिन्दु (Spots): जिन पर चेचक के दाग जैसे निशान हों।
- रेखा (Veins): पत्थर के बीच से गुजरने वाली दरारें या अलग रंग की धारियाँ।
- गर्भाशय दोष (Inclusions): यह सबसे महत्वपूर्ण परीक्षण है। यदि पत्थर के भीतर कोई जीवित प्राणी (जैसे मेंढक या छिपकली) या खोखलापन पाया जाए, तो उसे सगर्भ शिला कहते हैं। ऐसी शिला का उपयोग अत्यंत अशुभ माना जाता है।
4. पत्थर की आयु (Age of the Stone)
हयशीर्ष पांचरात्र कहता है कि पत्थर न तो बहुत बाल (कच्चा/नया) होना चाहिए और न ही बहुत वृद्ध (जर्जर)। मध्य आयु का पत्थर, जो वर्षों से धूप, बारिश और हवा झेलकर भी स्थिर रहा हो, वही मूर्ति के लिए उपयुक्त है।
मूर्ति-निर्माण के लिए शिला परीक्षण की आध्यात्मिक प्रक्रिया
पत्थर चुनने से पहले शिल्पकार को एक विशेष अनुष्ठान करना पड़ता है-
- अधिवास: चुने हुए पत्थर को जल या अनाज में डुबोकर रखा जाता है ताकि उसकी आंतरिक दरारें (यदि हों) स्पष्ट हो जाएं।
- क्षमा प्रार्थना: शिल्पकार वृक्ष और पत्थर से प्रार्थना करता है कि वह लोक कल्याण के लिए उन्हें कष्ट दे रहा है।
निष्कर्ष
हयशीर्ष पांचरात्र में वर्णित मूर्ति-निर्माण के लिए शिला परीक्षण की विधि आज के Geology (भूविज्ञान) और Material Science का एक प्राचीन स्वरूप है। यह सुनिश्चित करता है कि निर्मित मूर्ति हज़ारों वर्षों तक क्षरण मुक्त रहे और अपनी दिव्यता बनाए रखे।



