शेर खाँ फुलादी (Sher Khan Fuladi) अकबर (AKBAR) से डर कर भाग गया! अकबर के कर्मचारी मीर खाँ ने गुजराती शहजादे मुजफ्फर खाँ को पकड़ लिया जो कि एक खेत में छिपा हुआ था। बादशाह ने मुजफ्फर खाँ को करम अली के सुपुर्द कर दिया।
शेर खाँ फुलादी के बेटों का ईडर की तरफ पलायन
जब ईस्वी 1570 में बादशाह गुजरात में उत्पात मचा रहे मिर्जा लोगों के विरुद्ध कार्यवाही करने जा रहा था तब मार्ग में उसे सूचना मिली कि अहमदाबाद पर घेरा डालकर बैठे हुए अफगान नेता शेर खाँ फुलादी के बेटे अपने परिवारों को लेकर ईडर की तरफ गए हैं।
अकबर (AKBAR) ने तातार खाँ की अध्यक्षता में एक सेना उनकी तरफ भेजी जिसे सिरोही के सैनिकों ने मार डाला। मुल्ला कादिर बदायूंनी लिखता है कि अकबर ने आम्बेर के राजा भगवानदास के बेटे मानसिंह को एक प्रशिक्षित फौज के साथ ईडर की तरफ भेजा ताकि वह शेर खाँ फुलादी (Sher Khan Fuladi) के बेटों का पीछा कर सके जो बादशाह के डर से अपने परिवारों को अहमदाबाद से ईडर ले जा रहे थे।
इस प्रकार अकबर अपने शत्रुओं के विरुद्ध कार्यवाही करता हुआ और अहमदाबाद की तरफ बढ़ता रहा।
रायसिंह राठौड़ द्वारा महाराणा प्रताप की खोज
बीकानेर के राजकुमार रायसिंह राठौड़ को AKBAR ने महाराणा प्रताप के विरुद्ध भेजा था। वह अपनी सेना लेकर मेवाड़ की पहाड़ियों में घुसा तथा कुंभलगढ़ होता हुआ गोगूंदा की तरफ गया किंतु महाराणा प्रताप के सैनिकों को नहीं ढूंढ सका। इस प्रकार वह मेवाड़ के पहाड़ों में भटकता रहा।
मानसिंह कछवाहा की कार्यवाही
उधर मानसिंह कछवाहा ने बड़ी तेजी से अफगान सेनापति शेर खाँ फुलादी के पुत्रों का पीछा किया। उसने अफगानों की सेना को तितर-बितर करके अफगानों का बहुत सा सामान लूट लिया और फिर से अकबर (AKBAR) की सेना से आ मिला।
अब्दुल रहीम को पट्टन की सूबेदारी
अब शहंशाह और आगे बढ़ा तथा पट्टन तक पहुंच गया। पट्टन गुजरात का एक अत्यंत प्राचीन शहर था जिसका पूरा नाम महमूद गजनवी के आक्रमण के समय अन्हिलपट्टन हुआ करता था किंतु अकबर के समय में घिसकर पट्टन रह गया था।
पाठकों को स्मरण होगा कि यह वही स्थान था जहाँ अफगानियों ने अकबर के संरक्षक बैराम खाँ की हत्या की थी। उस समय बैराम खाँ के पुत्र रहीम खाँ की आयु 5 वर्ष थी। अब वह 16 वर्ष का हो चुका था। अकबर (AKBAR) ने उसे मिर्जा खाँ की उपाधि दी थी। उस काल की पुस्तकों में रहीम का नाम मिर्जा खाँ ही मिलता है।
बैराम खाँ की मृत्यु के बाद से ही अब्दुल रहीम तथा उसकी माँ खानजादा बेगम बादशाह अकबर के हरम में रहते थे। बादशाह ने पट्टन पहुंचने पर बैराम खाँ को याद किया तथा उसके पुत्र अब्दुल रहीम अर्थात् मिर्जा खाँ को अपने पास बुलाया। अकबर ने अब्दुल रहीम को पट्टन का सूबेदार बना दिया तथा सैयद अहमद खाँ को रहीम की सहायता के लिए नियुक्त कर दिया।
शेर खाँ फुलादी का अहमदाबाद से पलायन
इस समय शेर खाँ फुलादी (Sher Khan Fuladi) अहमदाबाद का घेरा डाले हुए था। वह एक अफगान योद्धा था और गुजरात के सुल्तान महमूद गुजराती का अमीर था। उसी की तरफ से शेर खाँ ने अहमदाबाद घेर रखा था जो कि विगत काफी समय से अकबर (AKBAR) के अधीन था।
जब शेर खाँ को ज्ञात हुआ कि बादशाह पट्टन तक आ पहुंचा तो शेर खाँ फुलादी अपने सैनिकों के साथ अहमदाबाद का घेरा छोड़कर भाग खड़ा हुआ।
गुजराती शहजादे की गिरफ्तारी
गुजरात के सुल्तान महमूद गुजराती का वजीर इतिमाद खाँ अब भी अहमदाबाद के मोर्चे पर डटा हुआ था। इतिमाद खाँ ने गुजरात के सुल्तान महमूद गुजराती के पुत्र मुजफ्फर को बंदी बना रखा था ताकि गुजरात का सुल्तान इतिमाद खाँ की मुट्ठी में रह सके।
जब शहजादे मुजफ्फर खाँ ने सुना कि शहंशाह अकबर पट्टन तक आ पहुंचा है तो वह भी अवसर पाकर वजीर इतिमाद खाँ की कैद से भाग निकला। अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि बादशाह के कर्मचारी मीर खाँ ने मुजफ्फर खाँ को पकड़ लिया जो कि एक खेत में छिपा हुआ था।
मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने लिखा है कि शहंशाह ने गुजरात के शहजादे मुजफ्फर खाँ को शाह मंसूर नामक अपने एक अमीर के संरक्षण में दे दिया तथा मुजफ्फर खाँ के गुजारे के लिए तीस रुपया मासिक की पेंशन बांध दी।
अहमदाबाद नगर की चाबियाँ
जबकि अबुल फजल ने लिखा है कि बादशाह ने मुजफ्फर खाँ को बंदी बनाकर कर्मअली के सुपुर्द कर दिया। उधर अहमदाबाद पर घेरा डालकर बैठे गुजराती वजीर इतिमाद खाँ को बादशाह का भय सताने लगा और वह बहुत सारे गुजराती अमीरों को अपने साथ लेकर बादशाह को सलाम करने के लिए उसकी सेवा में उपस्थित हुआ। इन अमीरों ने अहमदाबाद नगर की चाबियाँ अकबर (AKBAR) को सौंप दीं।
हब्शियों को मुगलों की गुलामी
कुछ अबीसीनियन अर्थात हब्शी सैनिक भी अहमदाबाद के मोर्चे से भागकर अकबर की शरण में आए। इनमें कुछ अमीर भी थे। बादशाह ने गुजराती वजीर इतिमाद खाँ से कहा कि वह इन हब्शियों की जमानत दे किंतु गुजराती अमीरों ने उनकी जमानत देने से मना कर दिया।
मुल्ला बदायूंनी ने लिखा है कि उन सब हब्शियों को पकड़कर मुगल सेनापतियों के पहरे में रख दिया। जबकि अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि बादशाह ने आदेश दिए कि उन्हें गुलाम बना लिया जाए तथा वे मुगलों की सेवा चाकरी के काम में लगाए जाएं।
अकबर का हरम
जब अकबर अपनी राजधानी फतहपुर सीकरी से बाहर जाता था तो उसके हरम की हजारों लौण्डियाएँ, मुगल बेगमें तथा शहजादियाँ भी मुगल सेना के पहरे में बादशाह के पीछे-पीछे चलती थीं। यहाँ अकबर ने अपना हरम अपने विश्वासपात्र सैयद महमूद बारहा तथा शेख महमूद बुखारी के संरक्षण में छोड़ा और स्वयं तेजी से पट्टन से निकल गया।
साबरमती एवं साम्बे
से रवाना होकर अहमदाबाद के निकट साबरमती के तट पर जा पहुंचा। अकबर के तम्बू साबरमती के तट पर लगाए गए। कुछ दिनों तक साबरमती के तट पर मनोविनोद करने के बाद अकबर साम्बे की ओर रवाना हुआ। इसी बीच सैयद महमूद बारहा तथा शेख महमूद बुखारी बादशाह के हरम को लेकर साबरमती पहुंच गए।
गुजरात के शहरों की घेराबंदी
अहमदाबाद भले ही बादशाह के हाथ में आ गया था किंतु भुज, बड़ौदा एवं सूरत आदि शहरों को इस समय भी गुजरात के अफगान अमीरों तथा इब्राहीम हुसैन मिर्जा (IBRAHIM HUSSAIN MIRZA) और मुहम्मद हुसैन मिर्जा की सेनाओं ने घेर रखा था।
मुल्ला बदायूंनी ने अपनी पुस्तक में भुज को भोज लिखा है। इसलिए प्रतीत होता है कि भुज का वास्तविक नाम भोज रहा होगा। सातवीं-आठवीं शताब्दी से लेकर बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी ईस्वी में हिन्दू राजाओं में यह नाम खूब प्रचलन में था।
अतः भोज किसी हिन्दू राजा ने बसाया होगा। कच्छ के रण में स्थित होने के कारण आजकल इस स्थान को भुज कच्छ कहा जाता है।
अबीसीनियन अमीर फरार
गुजरात के अमीरों में इख्तियार उल मुल्क नामक एक अबीसीनियन अमीर भी था। वह अवसर पाकर अहमदाबाद से भागकर अहमदनगर चला गया। अकबर को आशंका हुई कि गुजरात के सुल्तान का वजीर इतिमाद खाँ भी भाग सकता है।
इसलिए अकबर (AKBAR) ने उसे शहबाज खाँ कंबो के संरक्षण में दे दिया अर्थात् इतिमाद खाँ पर शहबाज कंबो का पहरा लगा दिया। शेर खाँ फुलादी अब भी मुगल सेना की पकड़ से दूर था।
✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Third Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।



