Monday, March 16, 2026
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मुगल शहजादियाँ (2)

मुगल शहजादियाँ लाल किले (Lal Qila) की दीवारों से बाहर अफवाहें फैलाती रहती थीं, इन अफवाहों का मुख्य कारण उस युग की स्वार्थ भरी राजनीति तो थी ही, साथ ही अपने वर्चस्व को बनाए रखने की होड़ भी थी।

अकबर (Akbar) के समय से ही मुगल दरबार (Mughal Darbar) एवं हरम (Mughal Harem) की गुटबंदी मुगल सल्तनत (Mughal Empire) की राजनीति में दखल करती आई थी। जहाँगीर (Jahangir) के समय में यह गुटबंदी और बढ़ गई थी। जब अय्याश शाहजहां (Shahjahan) अपने हरम को लाल किले में ले आया तो लाल किले (Lal Qila) की रंगीनियों ने हरम की औरतों को और भी उन्मुक्त कर दिया।

चूंकि हुमायूं (Humayun) के समय में ही मुगल शहजादियाँ के विवाह करने की परम्परा समाप्त कर दी गई थी, इसलिए मुगल शहजादियां लाल किले की मजबूत दीवारों के बीच बने हरम में छिपकर रहती थीं तथा अपने-अपने ढंग से लाल किले की राजनीतिक बिसातें बिछाकर अपने आप को व्यस्त रखती थीं।

इस कारण शाहजहां (Shahjahan) के काल में मुगल दरबार एवं हरम, गुटबन्दियों एवं षड्यन्त्रों का बड़ा अखाड़ा बन गया। सत्ता और शक्ति की लूट खसोट के कारण बादशाह के अतिरिक्त और किसी को सल्तनत की दुर्दशा की चिंता नहीं थी। अधिकांश लोग स्वार्थ-सिद्धि में लगे रहते थे।

मुगल शहजादियाँ, अमीर, शहजादे एवं बेगमें अपने-अपने गुट को शक्तिशाली बनाने के लिये एक दूसरे के विरुद्ध षड्यंत्र करते थे तथा एक दूसरे के विरुद्ध बादशाह के कान भरते थे। यहाँ तक कि विरोधी गुट पर सशस्त्र आक्रमण कर देते थे। इस अव्यवस्था ने शाही-परिवार की शक्ति को छिन्न-भिन्न कर दिया था जिसका परिणाम यह हुआ कि सल्तनत की शक्ति का असली आधार खिसकने लगा।

लाल किले (Red Fort or Lal Qila) का निर्माता शाहजहाँ (Shahjahan) सितम्बर 1657 में बीमार पड़ा। अब वह 65 वर्ष का हो चुका था। काम वासना की दलदल में अत्यधिक डूबे रहने के कारण उसे कई प्रकार के रोगों ने घेर लिया था और आए दिन उसकी मृत्यु की अफवाहें उड़ा करती थीं। अधिकतर अफवाहें हरम की बेगमें, मुगल शहजादियाँ, नौकर तथा हिंजड़े उड़ाया करते थे।

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जब बढ़ती हुई बीमारी के कारण शाहजहाँ के लिए दरबार में जाकर बैठना कठिन हो गया तो वह झरोखा दर्शन देकर जनता को विश्वास दिलाने लगा कि वह अब भी जिंदा है।

यूं तो शाहजहाँ (Shahjahan) की नौ बेगमें थीं जिनसे उसे ढेरों औलादें हुई थीं, अकेली मुमताज (Mumtaz Mahal) के पेट से चौदह औलादें जन्मी थीं किंतु इनमें से अधिकांश औलादें शाहजहां के जीवन काल में ही मर गई थीं। जब शाहजहां ईस्वी 1657 में बीमार पड़ा तब उसकी केवल आठ संतानें जीवित थीं।

इनमें से चार पुत्र थे- दारा शिकोह, शाह शुजा, औरंग़ज़ेब और मुराद बख्श। शाहजहाँ की चार शहजादियां भी थीं- पुर-हुनार बेगम, जहांआरा बेगम (Jahanara Begum), रोशनारा बेगम (Roshanara Begum) और गौहरा बेगम। ये चारों उस काल की राजनीति में भाग लेने वाली मुगल शहजादियाँ थीं किंतु शाहजहाँ के पूर्ववर्ती बादशाहों की बहिनें एवं विधवाएं भी उस काल की राजनीति में भाग लेती थीं। इन सभी की आंखों में शाहजहां का तख्ते ताउस, कोहिनूर हीरा (Kohinoor Heera) तथा दिल्ली का लाल किला दिन-रात किसी परी-स्वप्न की भांति घूमा करते थे।

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प्रत्येक शहजादा चाहता था कि जिस प्रकार उसके पिता शाहजहाँ (Shahjahan) ने अपने 18 चाचाओं और भाइयों का कत्ल करके मुगलों का राज्य हथियाया था, उसी प्रकार वह भी अपने शेष भाइयों को मारकर तख्ते ताउस, कोहिनूर हीरा तथा लाल किले को हथिया ले। इस कार्य में चारों शहजादियां भी शामिल हो गई थीं। प्रत्येक शहजादी ने अपना एक भाई चुन लिया था जिसे वह शाहजहां के बाद बादशाह बनाना चाहती थी ताकि लाल किले के हरम पर उसी शहजादी का हुक्म चले तथा महल की समस्त बेगमें उसकी लौण्डियाएं बनकर रहें। इन षड़यंत्रों से घबराकर ही शाहजहां अपने तीन पुत्रों को सदैव अपनी राजधानी से दूर रखा करता था। केवल सबसे बड़ा शहजादा दारा शिकोह अपने पिता की सेवा में दिल्ली में रहा करता था। वह शाहजहां की ओर से साम्राज्य की रीति-नीति तय करता, मुस्लिम अमीरों और हिन्दू राजाओं पर नियंत्रण रखता तथा उन्हें लड़ने के लिए विभिन्न मोर्चों पर भेजता। मुगलों द्वारा इकट्ठे किए गए हीरे-पन्ने, माणक-मोती, पुखराज, गोमेद, याकूत, लाल तथा सोने-चांदी के भारी-भरकम जेवरातों सहित सारे खजाने का मालिक भी वही था।

लाल किले (Lal Qila) में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति के पास इस अपार धन-सम्पदा की कोई न कोई सूची अवश्य थी किंतु इस विशाल खजाने की वास्तविक सूची के बारे में स्वयं शाहजहां भी पूरी तरह परिचित नहीं था।

लाल किले में बैठी मुगल शहजादियाँ किसी चतुर राजनीतिज्ञ से कम नहीं थीं। वे लाल किले की दीवारों के भीतर चल रही छोटी-से छोटी गतिविधि की जानकारी अपने गुप्तचरों के माध्यम से अपने पक्ष के शहजादे को लिख भेजती थीं। इनमें अधिकांश सूचनाएं बहुत बढ़ा-चढ़ाकर लिखी जाती थीं। इस कारण प्रत्येक शहजादा राजधानी से सैंकड़ों कोस दूर किसी मोर्चे पर होने पर भी वह शाही दरबार और शाही हरम की प्रत्येक गतिविधि से वाकिफ था किंतु अफवाहों के चलते सही-गलत का फैसला करने में असक्षम था।

जब शाहजहाँ (Shahjahan) के लिए झरोखा दर्शन देना भी कठिन हो गया तो उसने दारा शिकोह को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया तथा अपने अमीरों, सूबेदारों और हिन्दू राजाओं से कहा कि वे केवल दाराशिकोह का आदेश मानें।

जैसे ही शाहजहाँ ने दारा शिकोह को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। लाल किले (Lal Qila) में उसके शेष तीनों शहजादे और उनके पक्ष की शहजादियां दारा शिकोह के खून के प्यासे हो गए।

जिस प्रकार दारा शिकोह अपने पिता शाहजहां से थोड़ा-बहुत प्रेम करता था, उसी प्रकार शहजादी जहाँआरा भी अपने पिता शाहजहां से सहानुभूति रखती थी और केवल वही थी जो अपने पिता की मुश्किलों को समझती थी तथा उन्हें सुलझाने में अपने भाई दारा शिकोह की मदद करती थी। अन्य मुगल शहजादियाँ अपने पिता शाहजहाँ की ही तरह बेरहम थीं।

दारा शिकोह (Dara Shikoh) अपने पिता का सबसे बड़ा पुत्र था। वह योग्य, उदार, विनम्र तथा दयालु स्वभाव का स्वामी था। शाहजहाँ उसे सर्वाधिक चाहता था तथा उसे अपने पास ही रखता था। दिल्ली की रियाया भी दाराशिकोह को चाहती थी। हालांकि उस काल में मुगल सल्तनत में 95 प्रतिशत हिन्दू तथा 5 प्रतिशत मुसलमान थे तो भी प्रजा से आशय केवल मुस्लिम प्रजा से होता था।

यह बात मुस्लिम अमीरों को बहुत अखरती थी कि दारा शिकोह, मुस्लिम रियाया के साथ-साथ हिन्दुओं में भी बहुत लोकप्रिय था।

राजधानी में रहने के कारण दारा, सल्तनत की समस्याओं से अच्छी तरह परिचित था। उसे जितना अधिक प्रशासकीय अनुभव था, और किसी शहजादे को नहीं था। दारा की कमजोरी यह थी कि उसे दूसरे शहजादों की भांति युद्ध लड़ने का व्यापक अनुभव नहीं था।

दारा के तीनों छोटे भाई, एक दूसरे के खून के प्यासे होने के बाद भी वे दारा शिकोह (Dara Shikoh) को अपना पहला शत्रु मानते थे तथा वह तीनों शहजादों का सम्मिलत शत्रु था। उनमें से प्रत्येक यह चाहता था कि किसी तरह दारा शिकोह मर जाए, शेष दो भाइयों को तो वह आसानी से निबटा देगा।

शाहजहाँ (Shahjahan) का दूसरा पुत्र शाहशुजा (Shah Shuja) बंगाल का शासक था। वह बुद्धिमान, साहसी तथा कुशल सैनिक था परन्तु विलासी और अयोग्य था। उसमें इतने विशाल मुगल साम्राज्य को सँभालने की योग्यता नहीं थी। इसलिए दारा उससे कम आशंकित रहता था।

शाहजहाँ का तीसरा पुत्र औरंगजेब (Auranzeb), कट्टर सुन्नी मुसलमान (Sunni Musalman) था। वह अत्यंत असहिष्णु तथा संकीर्ण विचारों का स्वामी था इस कारण उसे सल्तनत के कट्टर मुसलमानों का समर्थन प्राप्त था जिनकी संख्या, सहिष्णु मुसलमानों से बहुत अधिक थी।

राजधानी से दूर रहने के कारण तथा हर समय युद्ध में व्यस्त रहने के कारण औरंगजेब (Auranzeb) को प्रान्तीय शासन तथा युद्धों का अच्छा अनुभव था। धूर्त तथा कुटिल होने के कारण वह अपनी पराजय को विजय में बदलना जानता था।

दारा शिकोह अपने तीनों भाइयों तथा उनके पक्ष की शहजादियों के नापाक इरादों को जानते हुए भी औरंगजेब की तरफ से सर्वाधिक भयभीत रहता था। इसलिए वह औरंगजेब को किसी एक स्थान अथवा किसी एक मोर्चे पर टिके नहीं रहने देता था।

वह औरंगजेब को कभी अफगानिस्तान के मोर्चे पर, कभी दक्षिण के मोर्चे पर तो कभी बंगाल के मोर्चे पर उलझाए रखता था। औरंगजेब भी इस बात को बहुत अच्छी तरह से समझता था इसलिए वह दारा शिकोह से बेइंतहा नफरत करता था। इसी नफरत का परिणाम था कि औरंगजेब को दारा का पक्ष लेने वाले अपने बाप शाहजहां से भी गहरी नफरत हो गई थी।

जिस समय शाहजहां बीमार पड़ा, औरंगजेब, राजधानी दिल्ली से लगभग 2000 किलोमीटर दूर स्थित दक्षिण का सूबेदार था।

औरंगजेब की दृष्टि में उसका बड़ा भाई दाराशिकोह एक काफिर था जो इस्लाम के काम को आगे बढ़ाने की बजाय काफिर हिन्दुओं को बढ़ावा देता था तथा हिन्दू ग्रंथों का अरबी एवं फारसी में अनुवाद करवाता था।

शाहजहाँ का चौथा तथा सबसे छोटा पुत्र मुराद (Murad), गुजरात तथा मालवा का शासक था। वह भावुक तथा जल्दबाज युवक था। विलासी प्रवृत्ति का होने से उसमें दूरदृष्टि का अभाव था। वह जिद्दी तथा झगड़ालू प्रवृति का व्यक्ति था। उसमें प्रशासकीय प्रतिभा और सैनिक प्रतिभा की कमी होने पर भी बादशाह बनने की इच्छा अत्यधिक थी। मुगल शहजादियाँ भी उत्तराधिकार के इस युद्ध में भाग लेने लगीं। जहाँआरा, दारा का; रोशनआरा, औरंगजेब का; और गौहरआरा, मुराद का पक्ष ले रही थी।

इस कारण राजधानी की समस्त खबरें गुप्त रूप से इन शहजादों के पास पहुँचती थीं। इनमें से कई खबरें अतिरंजित होती थीं। शाहजहाँ तथा दारा शिकोह ने निराधार खबरों को रोकने का प्रयत्न किया परन्तु इस कार्य में सफलता नहीं मिली। तब शाहजहाँ (Shahjahan) ने अपनी मुहर तथा अपने हस्ताक्षर से शाहजादों के पास पत्र भेजना आरम्भ किया और उन्हें विश्वास दिलाने का प्रयत्न किया कि वह जीवित तथा स्वस्थ है परन्तु कोई भी शाहजादा इन पत्रों पर विश्वास करने के लिये तैयार नहीं था। वे इन पत्रों को दारा शिकोह की चाल समझते थे।

हर शहजादा बादशाह को अपनी आँखों से देखना चाहता था परन्तु कोई भी शाहजादा अकेले अथवा थोड़े से अनुचरों के साथ राजधानी आने को तैयार नहीं था, क्योंकि उन्हें दारा से भय था। किसी भी शहजादे को अपनी समस्त सेना के साथ राजधानी में आने की अनुमति नहीं थी।

इसलिये विभिन्न पक्षों में संदेह और वैमनस्य बढ़ने लगा और उत्तराधिकार के लिये होने वाले युद्ध की भूमिका तैयार हो गई। सद्भावना, विश्वास तथा धैर्य से ही उत्तराधिकार के संभावित युद्ध को रोका जा सकता था परन्तु दुर्भाग्यवश शाहजादों में इन गुणों का नितांत अभाव था। लाल किले (Lal Qila) की दीवारों से हजारों किलोमीटर दूर बैठे शुजा, औरंगजेब तथा मुराद पत्र-व्यवहार द्वारा एक दूसरे के सम्पर्क में थे। उनमें सल्तनत के विभाजन के लिये समझौता हो गया। इन तीनों शाहजादों ने दारा (Dara Shikoh) की शक्ति को छिन्न-भिन्न करने का निश्चय किया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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