डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित उर्दू बीबी की मौत (Urdu Bibi Ki Maut) एक ऐसी पुस्तक है जो भाषा, साहित्य, समाज और इतिहास के आपसी संबंधों को नई दृष्टि से समझने का अवसर देती है। यह कृति केवल साहित्यिक विमर्श नहीं, बल्कि भाषा–राजनीति, सांस्कृतिक परिवर्तन और सामाजिक वास्तविकताओं के गहरे विश्लेषण का दस्तावेज़ भी है। पुस्तक का शीर्षक ही पाठक का ध्यान तुरंत आकर्षित करता है और उसमें यह उत्सुकता पैदा करता है कि आख़िर “उर्दू बीबी” की मौत का प्रतीकात्मक अर्थ क्या है।
डॉ. गुप्ता ने इस पुस्तक में उर्दू भाषा के जन्म, विकास, उत्कर्ष, पतन और आज की परिस्थितियों पर अत्यंत गंभीर तथा प्रामाणिक चर्चा प्रस्तुत की है। लेखक बताते हैं कि उर्दू केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप (Indian subcontinent) की साझा सांस्कृतिक धरोहर है—जिसमें हिंदवी, फ़ारसी, संस्कृत, राजस्थानी भाषा, और अरबी जैसी परंपराओं की सुगंध है। किन्तु समय के साथ-साथ इस भाषा का जो राजनीतिकरण हुआ, उसने समाज में विभाजन की रेखाओं को और गहरा कर दिया।
पुस्तक में यह स्पष्ट रूप से दर्शाया गया है कि किस प्रकार भाषा को धार्मिक पहचान से जोड़ने की प्रवृत्ति ने उर्दू के स्वाभाविक विकास को बाधित किया। किताब में लेखक ने कई ऐतिहासिक तथ्यों, साहित्यिक उदाहरणों और संदर्भों के माध्यम से यह बताया है कि उर्दू का वास्तविक रूप हमेशा समन्वयकारी था। लेकिन विभाजन के बाद की राजनीति, शैक्षिक नीतियों और सांस्कृतिक बदलावों ने उर्दू को धीरे–धीरे उसके असली घर—भारतीय जनमानस—से दूर कर दिया। यही प्रक्रिया “उर्दू बीबी की मौत” का वास्तविक संदर्भ बनती है, जिसे लेखक ने रूपक रूप में अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। पुस्तक का सबसे प्रभावशाली पक्ष यह है कि लेखक ने तथ्यों, शोध और यथार्थ की धरातल पर अपने विचार रखे हैं। वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि उर्दू की गिरती स्थिति केवल बाहरी कारणों से नहीं, बल्कि आंतरिक कमजोरियों—जैसे सीमित पाठक–वर्ग, बदलती भाषा-दृष्टि और आधुनिक साहित्यिक प्रवृत्तियों—का परिणाम भी है। इसके साथ ही लेखक यह भी सुझाव देते हैं कि उर्दू को पुनः जीवंत बनाने के लिए साहित्य, शिक्षा और सांस्कृतिक मंचों पर सार्थक प्रयास किए जाने चाहिए।
समग्रतः “उर्दू बीबी की मौत” केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि भाषा के इतिहास, समाज और संस्कृति पर लिखा गया एक महत्वपूर्ण और विचारोत्तेजक दस्तावेज़ है। यह ब्लॉग उन सभी पाठकों के लिए उपयोगी है जो भाषा और संस्कृति के गहरे संबंधों को समझना चाहते हैं। पुस्तक पढ़कर यह स्पष्ट हो जाता है कि भाषाएँ न मरती हैं और न जन्म लेती हैं—वे केवल समाज के व्यवहार और दृष्टिकोण से पुनर्जीवित या उपेक्षित होती हैं।
पुस्तक– उर्दू बीबी की मौत
लेखक- डॉ. मोहनलाल गुप्ता
प्रकाशक- शुभदा प्रकाशन, जोधपुर




