समरांगण सूत्रधार (Samrangana Sutradhara) राजा भोज (Raja Bhoj) द्वारा रचित 11वीं शताब्दी का अद्वितीय ग्रंथ है। इसमें भारतीय स्थापत्य कला (Indian architecture) मंदिर निर्माण (Temple construction) , नगर नियोजन (Town planning), मूर्तिकला (Sculpture) और प्राचीन यंत्रविद्या (Ancient engineering) के गहन सिद्धांत मिलते हैं।
राजा भोज द्वारा रचित स्थापत्य ग्रंथ – समरांगण सूत्रधार
समरांगण सूत्रधार का परिचय
समरांगण सूत्रधार (Samarangana Sutradhara) 11वीं शताब्दी (ई.1000–1055) का एक महत्वपूर्ण संस्कृत ग्रंथ है, जिसे परमार वंश के महान राजा भोज ने रचा था। यह ग्रंथ भारतीय वास्तुशास्त्र और स्थापत्य कला का विश्वकोश माना जाता है। इसमें न केवल मंदिर निर्माण के नियम बताए गए हैं, बल्कि मूर्तिकला, नगर नियोजन और यंत्रविद्या तक का विस्तृत वर्णन मिलता है।
समरांगण सूत्रधार को भारतीय स्थापत्य कला का विश्वकोश (Encyclopedia of Indian architecture) कहा जाता है।यह ग्रंथ न सिर्फ प्राचीन भारतीय स्थापत्य की उन्नत समझ को दिखाता है, बल्कि आधुनिक वास्तु-विचार के लिए भी समृद्ध स्रोत है।
समरांगण सूत्रधार की संरचना
समरांगण सूत्रधार ज्ञानकोशीय ग्रंथ है, इसमें कुल 83 अध्याय हैं, जिनमें नगर-योजना, भवन-शिल्प, मंदिर-निर्माण, मूर्तिकला, मुद्राएँ और यंत्र-विधानों का विस्तार से वर्णन मिलता है। यह ग्रंथ दिखाता है कि प्राचीन भारत की वास्तु परंपरा कितनी व्यवस्थित, वैज्ञानिक और अनुभव-समृद्ध थी।
- इसमें लगभग 7,430 श्लोक और 83 अध्याय हैं।
- ग्रंथ का सबसे पूर्ण संस्करण 15वीं शताब्दी में संकलित हुआ।
समरांगण सूत्रधार की विषय-वस्तु
- इस ग्रंथ में वर्णित सिद्धांत वास्तुशास्त्र की शास्त्रीय नींव को मजबूत करते हैं, जैसे भूमि-परीक्षा, माप-प्रणाली (हस्तादि एकक), दिशा-संतुलन और ऊर्जा प्रवाह की अवधारणा। राजा भोज नगर-योजना में जल-स्रोत, जलवायु, संसाधन और सुरक्षा जैसे व्यावहारिक पक्षों पर ज़ोर देते हैं, जो आधुनिक शहरी नियोजन की सोच से भी मेल खाते हैं।
- समरांगण सूत्रधार को भारतीय स्थापत्य परंपरा का एक मार्गदर्शक ग्रंथ माना जाता है शोध संस्थान और वास्तु-विशेषज्ञ आज भी इस ग्रंथ का अध्ययन करते हैं।
- इस ग्रंथ का बड़ा भाग नगरों और भवनों की योजना पर केंद्रित है, जिसमें भूमि-चयन, दिशाओं का महत्व, सड़कों की रूपरेखा, दुर्ग-निर्माण और महलों की संरचना जैसे विषय आते हैं। छोटे आलय (घर) से लेकर महालय (महल) और मंदिर तक, कैसे बनाए जाएँ, उनके अनुपात, माप और सौंदर्य-मानकों को सूक्ष्मता से बताया गया है।
स्थापत्य और वास्तुशास्त्र
समरांगण सूत्रधार में मंदिर निर्माण की विधियाँ, भूमि चयन, दिशा-निर्धारण और मूर्तियों की स्थापना के नियम दिए गए हैं।
- मंदिर वास्तु: गर्भगृह, मंडप, शिखर और तोरण की संरचना का विस्तृत वर्णन।
- नगर नियोजन: सड़कों, चौक, जलस्रोत और आवासीय क्षेत्रों की योजना।
- मूर्तिकला: देव प्रतिमाओं के अनुपात और सौंदर्यशास्त्र।
यंत्रविद्या और तकनीक
समरांगण सूत्रधार में यंत्रों और स्वचालित मशीनों का भी उल्लेख है। भोज ने उड़ने वाले यंत्रों, यांत्रिक दरवाजों और स्वचालित मूर्तियों का वर्णन किया है। यह दर्शाता है कि भारतीय सभ्यता में तकनीकी कल्पनाएँ कितनी उन्नत थीं। यन्त्रविधान अध्याय में विभिन्न यंत्रों और मशीनों का उल्लेख मिलता है, जिससे यह ग्रंथ तकनीकी दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है और भोज की वैज्ञानिक दृष्टि को दर्शाता है।
सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व
- समरांगण सूत्रधार भारतीय वास्तु परंपरा का प्रमाण है।
- यह ग्रंथ दर्शाता है कि भारतीय स्थापत्य केवल धार्मिक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और सामाजिक दृष्टि से भी विकसित था।
- राजा भोज को “भारतीय स्थापत्य पुनर्जागरण का अग्रदूत” कहा जाता है और यह ग्रंथ उनकी बहुआयामी प्रतिभा का साक्ष्य है।
आधुनिक संदर्भ में प्रासंगिकता
आज सम्पूर्ण विश्व में पर्यावरण के खतरों को देखते हुए सतत विकास के साथ-साथ पर्यावरण-संतुलन और सांस्कृतिक वास्तु की चर्चा बढ़ रही है। समरांगण सूत्रधार के सिद्धांत इस दिशा में महत्वपूर्ण दृष्टि प्रदान करते हैं। मिश्रित उपयोग वाली बसाहट, पैदल चलने योग्य नगर और प्रकृति के अनुकूल निर्माण जैसे विचार इस ग्रंथ में प्राचीन रूप से मौजूद हैं। इसी कारण यह ग्रंथ परंपरा और आधुनिकता के बीच एक सेतु की तरह भारतीय ज्ञान-परंपरा की समृद्धि को सामने लाता है।
निष्कर्ष
समरांगण सूत्रधार केवल एक स्थापत्य ग्रंथ नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, विज्ञान और कला का अद्वितीय संगम है। राजा भोज ने इस ग्रंथ के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों को वास्तु और तकनीकी ज्ञान का अमूल्य भंडार दिया। आज भी यह ग्रंथ भारतीय स्थापत्य और वास्तुशास्त्र के अध्ययन में मार्गदर्शक है।



