हयशीर्ष पांचरात्र (Hayashirsha Pancharatra) वैष्णव आगम साहित्य का एक महत्वपूर्ण एक प्रमुख ‘तुलनात्मक आगम’ ग्रंथ है, जिसमें भगवान विष्णु के हयग्रीव रूप की उपासना, मंदिर विधि, पूजा-पद्धति और दार्शनिक सिद्धांतों का विस्तृत वर्णन मिलता है। यदि हयशीर्ष पांचरात्र को भारतीय मंदिर वास्तुकला और मूर्ति विज्ञान का प्राचीन विश्वकोश कहा जाए तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।
हयशीर्ष पांचरात्र ग्रंथ का संक्षिप्त परिचय
भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं में ‘आगम’ ग्रंथों का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। जहाँ वेद ज्ञान का आधार हैं, वहीं आगम ग्रंथ उपासना, मंदिर निर्माण और अनुष्ठान की विधि समझाते हैं।
वैष्णव परंपरा के अंतर्गत आने वाला हयशीर्ष पांचरात्र (Hayashirsha Pancharatra) एक ऐसा ही अनमोल ग्रंथ है, जिसे ‘पाञ्चरात्र आगम’ का सबसे प्राचीन और प्रामाणिक आधार माना जाता है। इसमें भगवान विष्णु की उपासना और मंदिर-पूजा की विधियों का विस्तार से वर्णन मिलता है।
हयशीर्ष पांचरात्र एक प्रमुख वैष्णव संहिता है, जो भगवान विष्णु के हयग्रीव (घोड़े के मुख वाले) स्वरूप की उपासना पर केंद्रित है। मान्यता है कि भगवान हयग्रीव ने स्वयं ब्रह्मा जी को पांचरात्र का ज्ञान दिया था।
पांचरात्र परंपरा का संक्षिप्त परिचय
- “पांचरात्र” शब्द का अर्थ है पाँच रातों का यज्ञ।
- महाभारत के शान्तिपर्व में पांचरात्र सिद्धांत का उल्लेख मिलता है।
- वैष्णव आगम साहित्य में लगभग 200 से अधिक संहिताएँ हैं, जिनमें हयशीर्ष संहिता भी सम्मिलित है।
- यह परंपरा श्रीवैष्णव सम्प्रदाय में विशेष रूप से प्रतिष्ठित है।
हयशीर्ष पांचरात्र ग्रंथ की मुख्य विषय-वस्तु
हयशीर्ष पांचरात्र केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं है, अपितु यह स्थापत्य शास्त्र (Architecture) और शिल्प शास्त्र (Iconography) का एक विस्तृत मैन्युअल है। इसकी विषय-वस्तु को हम निम्नलिखित बिंदुओं में समझ सकते हैं:
1. हयग्रीव स्वरूप और उपासना
- भगवान विष्णु का हयशीर्ष (हयग्रीव) रूप ज्ञान और विद्या का प्रतीक है।
- ग्रंथ में इस स्वरूप की ध्यान विधि, मंत्र और पूजा-पद्धति का वर्णन है।
- उपासक को हयग्रीव की उपासना से विद्या, स्मृति और आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होती है।
2. मूर्ति विज्ञान (Iconography/Pratima Lakshana)
ग्रंथ का एक बड़ा हिस्सा मूर्तियों के निर्माण पर केंद्रित है। इसमें बताया गया है कि भगवान विष्णु के विभिन्न स्वरूपों (केशव, नारायण आदि) और उनके 24 अवतारों की मूर्तियां कैसी होनी चाहिए।
- ताल मान: मूर्ति के अंगों का सटीक अनुपात (जैसे दशताल विधि)।
- आयुध: भगवान के हाथों में स्थित शंख, चक्र, गदा और पद्म का स्थान और महत्व।
- मुद्राएं: अभय मुद्रा, वरद मुद्रा आदि का अर्थ।
3. मंदिर वास्तुकला (Temple Architecture)
इस ग्रंथ में मंदिर निर्माण के लिए भूमि चयन से लेकर कलश स्थापना तक की प्रक्रिया दी गई है।
- ग्रंथ में मंदिर की योजना, मूर्ति-स्थापना और अनुष्ठान का विस्तार से उल्लेख है।
- भू-परीक्षा: मंदिर के लिए मिट्टी की गुणवत्ता और रंग की जांच कैसे करें।
- वास्तु पुरुष मंडल: मंदिर के विन्यास में देवताओं का स्थान निर्धारण।
- शिखर और मंडप: मंदिर के विभिन्न अंगों का अनुपात और उनकी ऊंचाई का गणितीय विवरण।
- इसमें वास्तु और शिल्पशास्त्र के सिद्धांतों का भी समावेश है।
4. खगोल विज्ञान और गणित (Astronomy and Mathematics)
- मंदिर की दिशा तय करने के लिए यह ग्रंथ खगोलीय गणनाओं का सहारा लेता है। सूर्य की स्थिति और छाया (शंकु यंत्र) के माध्यम से दिशाओं का ज्ञान इसमें विस्तार से समझाया गया है।
5. प्रतिष्ठा और पूजा विधि (Consecration and Rituals)
- बिना प्राण-प्रतिष्ठा के मूर्ति केवल पत्थर है। हयशीर्ष पांचरात्र में ‘अधिवास’ (शुद्धिकरण) और ‘प्राण-प्रतिष्ठा’ की जटिल प्रक्रियाओं का वर्णन है। इसमें मंत्रों के प्रयोग और मंडल निर्माण की विधियों का उल्लेख है।
- पूजा में मंत्रोच्चार, अर्चन, होम और ध्यान की विधियाँ बताई गई हैं।
6. दार्शनिक विवेचन
- पांचरात्र परंपरा के अनुसार सृष्टि के पाँच कारण हैं- पुरुष, प्रकृति, स्वभाव, कर्म और दैव।
- हयशीर्ष संहिता में इन कारणों का दार्शनिक विवेचन मिलता है।
7. भक्त और साधक के लिए मार्गदर्शन
- हयशीर्ष पांचरात्र ग्रंथ में भक्तों के लिए नियम, आचार और साधना पद्धति का उल्लेख है।
- इसमें भक्ति, ध्यान और योग को एकीकृत रूप में प्रस्तुत किया गया है।
- साधक को मोक्ष और परमज्ञान की प्राप्ति का मार्ग बताया गया है।
हयशीर्ष पांचरात्र ग्रंथ की अध्याय योजना
यह ग्रंथ मुख्य रूप से चार कांडों (भागों) में विभाजित है:
- आदिकुमार कांड
- संकर्ष कांड
- सौर कांड
- अध्यात्म कांड
इसमें लगभग 14,000 श्लोक हैं (हालाँकि वर्तमान में कुछ ही उपलब्ध हैं), जो मंदिर निर्माण (देवालय), प्रतिमा विज्ञान (मूर्ति लक्षण) और प्रतिष्ठा विधियों का विस्तार से वर्णन करते हैं।
हयशीर्ष पांचरात्र ग्रंथ की विशेषताएँ
- वैष्णव आगम का हिस्सा: श्रीवैष्णव परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण।
- ज्ञान का प्रतीक: हयग्रीव उपासना से विद्या और स्मृति की प्राप्ति।
- मंदिर विधि: पूजा-पद्धति और स्थापत्य का विस्तृत विवरण।
- दार्शनिक गहराई: सृष्टि के कारणों और भक्ति-योग का विवेचन।
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व
- अग्नि पुराण जैसे महत्वपूर्ण पुराणों ने मंदिर निर्माण के संदर्भ में हयशीर्ष पांचरात्र को अपना मुख्य स्रोत माना है। यह ग्रंथ यह सिद्ध करता है कि प्राचीन भारत में कला और विज्ञान एक-दूसरे से अलग नहीं थे।
निष्कर्ष
- हयशीर्ष पांचरात्र ग्रंथ भारतीय धार्मिक साहित्य का एक अद्वितीय अंग है। इसमें भगवान विष्णु के हयग्रीव स्वरूप की उपासना, मंदिर पूजा-पद्धति और दार्शनिक सिद्धांतों का समन्वित विवेचन मिलता है। यह ग्रंथ आज भी भक्ति, विद्या और आध्यात्मिक साधना के लिए मार्गदर्शक है।
- हयशीर्ष पांचरात्र भारतीय ज्ञान परंपरा का वह स्तंभ है जिसने हमारे देश के भव्य मंदिरों को एक स्वरूप दिया। यह ग्रंथ हमें सिखाता है कि भक्ति और विज्ञान जब मिलते हैं, तो ऐसी रचनाएँ जन्म लेती हैं जो सदियों तक अडिग रहती हैं। यदि आप भारतीय संस्कृति, वास्तुकला या इतिहास के प्रेमी हैं, तो इस ग्रंथ का अध्ययन आपके लिए एक नया द्वार खोल सकता है।
- यह ग्रंथ आज भी भारतीय वास्तुकला और मूर्तिकला के लिए मार्गदर्शक बना हुआ है।
– यह आलेख व्यापक शोध और प्राचीन पांडुलिपियों के आधार पर तैयार किया गया है।



