Sunday, January 25, 2026
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चित्तौड़ दुर्ग में जौहर की लाल लपटें आकाश का कलेजा जलाने लगीं  (83)

अकबर के सैनिकों के हाथों में पड़कर दुर्गति से बचने के लिए हिन्दू वीरांगनाओं ने चित्तौड़ दुर्ग में जौहर का आयोजन किया। जब से इस्लाम ने भारत में प्रवेश किया था, हिन्दू औरतें म्लेच्छ शत्रु के हाथों में पड़ने से बचने के लिए जीवित ही अग्नि में प्रवेश करती थीं।

अकबर (AKBAR) की सेनाओं ने लगभग चार महीने तक चित्तौड़ दुर्ग पर भयानक गोलाबारी की तथा दुर्ग की नींवों में बारूद भरकर दुर्ग की दीवारों को बुरी तरह से क्षतिग्रस्त कर दिया। जब दुर्ग में रसद की कमी होने लगी तो दुर्गपति जयमल ने अन्य सरदारों से परामर्श करके साका करने का निर्णय लिया।

इसलिए दुर्ग के भीतर की स्त्रियों ने जौहर का आयोजन किया। हिन्दू औरतें म्लेच्छ शत्रु के हाथों में पड़ने से बचने के लिए जीवित ही अग्नि में प्रवेश करती थीं। कई बार शत्रु अचानक दुर्ग में प्रवेश करता था। ऐसी स्थितियों में अग्नि प्रज्जवलित करने का समय नहीं होता था और प्राणोत्सर्ग के अन्य उपाय किए जाते थे।

दुर्ग की औरतें शत्रुओं के गंदे हाथों से अपने पवित्र शरीर को बचाने के लिए कुएं, बावड़ी, तालाब, नहर आदि में कूद कर जौहर करती थीं। अल्लाउद्दीन खिलजी के सैनिकों ने रणथंभौर के दुर्ग में अचानक ही छल से प्रवेश किया था।

इस कारण दुर्ग में अग्नि प्रज्जवलित नहीं की जा सकी। राणा हम्मीर की पटरानी एवं राजकुमारी के नेतृत्व में सैंकड़ों स्त्रियों ने दुर्ग में स्थित सरोवरों में जल-जौहर किया था। चंदेरी तथा जैसलमेर के किलों में अग्नि एवं जल की बजाय हथियारों का उपयोग करके जौहर किए गए थे।

इसका कारण यह था कि शत्रु-सेनाएं चोरी-चुपके से अचानक ही किलों में घुस आई थीं। दुर्ग की स्त्रियों के पास इतना समय नहीं था कि अग्नि का प्रबंध किया जा सके अथवा भाग कर तालाबों तक पहुंचा जा सके।

चंदेरी में हुए साके का वर्णन करते हुए बाबर (BABUR) ने अपनी पुस्तक तुजुके बाबरी में लिखा है कि जब मेरे सैनिक राजा मेदिनीराय के घर में घुसे तो उन्होंने देखा कि मेदिनीराय के आदमी मेदिनीराय के घर के सदस्यों की हत्या कर रहे थे।

एक आदमी हाथ में तलवार लेकर खड़ा होता था और घर के सदस्य उस तलवार के नीचे गर्दन रखकर गर्दन कटवाते थे। अकबर (AKBAR) के चित्तौड़ आक्रमण से कुछ वर्ष पहले ही इसी प्रकार की एक घटना जैसलमेर दुर्ग में हुई थी। महारावल लूणकर्ण को कान्धार के पठान अमीर अली ने पगड़ी बदल भाई बनाया था।

वह महारावल का विश्वास जीतकर धोखे से अपनी सेना दुर्ग में भेजने में सफल हो गया। जैसे ही महारावल को इस छल के बारे में ज्ञात हुआ, महारावल के आदेश से साके की घोषणा की गई। जौहर के लिये अग्नि जलाने का समय नहीं था। इसलिये रानिवास की समस्त कुल-वधुओं और हिन्दू-ललनाओं ने अपने सिर आगे कर दिये।

महारावल ने अपनी तलवार से उनके सिर विच्छेद किये। इस साके में स्वयं महारावल, महारावल के चार भाई, तीन पुत्र तथा चार सौ योद्धा काम आये। थार मरुस्थल में यह घटना आधे साके के नाम से जानी जाती है। यह जैसलमेर का तीसरा और भाटियों का छठा साका था।

ई.1699 के आसपास औरंगजेब ने एक बड़ी सेना लेकर आगरा के आसपास जाटों को घेरा। उस समय वीर गोकुला जाट, जाटों का नेतृत्व कर रहा था। औरंगजेब के सैनिकों की बर्बरता से बचने के लए उस समय जाट-स्त्रियों ने जौहर किया था।

ऐसा नहीं है कि शत्रु से बचने के लिए केवल स्त्रियां ही अग्नि में प्रवेश करती थीं। कई बार राजा एवं सेनापति भी अपनी सेना के नष्ट हो जाने पर जीवित ही अग्नि में प्रवेश करते थे ताकि वे शत्रु के हाथों में पड़कर अपमानित न हों किंतु उसे जौहर नहीं कहा जाता था।

 हिन्दूशाही राज्य के राजा जयपाल ने पराजय की ग्लानि से व्यथित होकर जीवित ही अग्नि में प्रवेश किया था। हम्मीर महाकाव्य के अनुसार अपनी पराजय निश्चित जानकर राजा हरिराज और उसका सेनापति जैत्रसिंह, अपने स्त्री समूह सहित, जीवित ही अग्नि में प्रवेश कर गये थे। भारत के इतिहास में इस तरह के और भी उदाहरण मिलते हैं।

भारत में जौहर का इतिहास बहुत लम्बा है। हमने बहुत ही संक्षेप में इसकी चर्चा की है। चित्तौड़ दुर्ग में इससे पहले भी दो बड़े साके एवं जौहर हो चुके थे। 14वीं शताब्दी ईस्वी में अल्लाउद्दीन खिलजी के हमले के समय महारानी पद्मिनी (पद्मावती) के नेतृत्व में चित्तौड़ दुर्ग में पहला साका एवं पहला जौहर हुआ था।

जब अकबर के पिता हुमायूँ (HUMAYUN) के शासनकाल में गुजरात के शासक बहादुरशाह ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया था, तब भी चित्तौड़ दुर्ग में राजमाता कर्मवती के नेतृत्व में बड़े जौहर का आयोजन किया गया था। अब चित्तौड़ का दुर्ग तीसरे साके एवं तीसरे जौहर की तरफ बढ़ चुका था। राजा जयमल का आदेश होते ही चित्तौड़ दुर्ग में जौहर की भीषण ज्वाला प्रज्जवलित हो गई। स्थान-स्थान पर रानियों, राजकुमारियों एवं अन्य स्त्रियों के लिए चिताएं जलाई गईं। पत्ता सिसोदिया, रावत साहिबखान और ईसरदास चौहान की हवेलियों में जौहर की ज्वाला धधकने लगी। देखते ही देखते दुर्ग के भीतर बने हुए प्रत्येक घर के सामने आग जल उठी।

चित्तौड़ दुर्ग का यह तीसरा जौहर दुर्गपति जयमल मेड़तिया की रानी के नेतृत्व में हो रहा था। हिन्दू ललनाएं अपने पतियों के माथे पर कुमकुम और रोली का तिलक लगाकर और उनकी परिक्रमा करके उनसे विदा ले रही थीं और उनसे वचन ले रही थीं कि वे अपनी धरती की रक्षा करते हुए अमरत्व प्राप्त करेंगे और स्वर्ग में आकर अपनी अर्द्धांगिनी से मिलेंगे। अपने पतियों की आरती उतारते समय उनकी आंखों में पति से बिछड़ने की पीड़ा के आंसू थे। विरह वेदना उन्हें अभी से सालने लगी थी।

जब दुर्ग में प्रज्जवलित अग्नि की लाल लपटें दुर्ग की प्राचीर से ऊंची निकल कर आकाश का कलेजा जलाने लगीं तो दुर्ग के भीतर की स्त्रियां मंगल गीत गाती हुई कोई-कोई एक-एक करके तो कोई-कोई एक दूसरे का हाथ पकड़कर अग्नि में प्रवेश करने लगीं।

जिन कोमल कायाओं को प्रतिदिन गुलाबजल से धोया जाता था और चंदन लेप से सुगंधित किया जाता था, उन सुंदर कोमल कायाओं के जलने से शीघ्र ही पूरा दुर्ग चर्बी की गंध से भर गया। लाल लपटों के बीच रक्त और चर्बी के जलने से बना काला धुंआ भी प्रकट हो गया और आकाश में दैत्याकार आकृतियां बनाने लगा।

अपने हरे भरे संसार को छोड़कर जाती हुई बहुत सी महिलाएं बच्चों को छाती से लगाकर बिलखने लगीं और नियति को दोष देने लगीं। रोती-बिलखती महिलाओं एवं छोटे-छोटे बच्चों की मर्मांतक चीखों को सुनकर धरती माता का कलेजा भी कांप गया।

ऐसी स्थिति में आकाश का कलेजा भी कब तक साबुत रह सकता था! चित्तौड़ दुर्ग के भीतर भगवान शिव का तीसरा नेत्र खुल चुका था। चारों ओर मौत ताण्डव कर रही थी और दुर्ग के भीतर रहने वाले तमाम पुरुष हरहर महादेव का उद्घोष करते हुए अपने शरीरों पर केसरिया बाना कस रहे थे।

चित्तौड़ के ये वीर अमरत्व के अभिलाषी थे। युद्धक्षेत्र में डंका बजाकर प्राण देने के आकांक्षी थे। शत्रु के सिरों के ढेर लगाकर उन्हें धूल में मिटाने के लिए संकल्पित थे। अब इन्हें कोई बाधा, कोई माया, कोई ममता जीवन के प्रति लगाव उत्पन्न करने में असमर्थ थी।

जौहर की यह ज्वाला (Flames of Jouhar) उनके नेत्रों में समा गई थी। उन्हें संसार में केवल आग ही आग दिखाई दे रही थी। विगत छः माह से चित्तौड़ी वीर आग और मौत से ही आंख-मिचौनी खेल रहे थे किंतु अब जौहर की ज्वाला इस खेल को खत्म करने के लिए आ गई थी।

मनुष्य चाहे कितना ही वीर क्यों न हो, उसके लिए अपने घरों की स्त्रियों को जौहर की आग में झौंक देने का निर्णय लेना कोई सरल कार्य नहीं होता किंतु अब चित्तौड़ के वीरों के लिए और कोई पथ बचा भी नहीं था।

उन्हें इस समय केवल एक ही संतोष था कि चित्तौड़ का महाराणा (Maharana of Chittor) दुर्ग से बाहर था और चित्तौड़ दुर्ग को शत्रु से मुक्त रखने की आगे की जिम्मेदारी निभा सकता था।        

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

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