मात्रामेरु (Matrameru) छंदःशास्त्र का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और अद्भुत गणितीय उपकरण है। सरल शब्दों में, यह छंदों के विभेदों (Combinations) को जानने की एक सारणी है। मात्रामेरु का उपयोग संगीत के तालों और स्थापत्य कला (Architecture) में भी किया जाता रहा है।
ऐतिहासिक तथ्य
यद्यपि विश्व आधुनिक गणित में मात्रामेरु को 17वीं शताब्दी के फ्रांसीसी गणितज्ञ ब्लेज़ पास्कल के नाम से पास्कल ट्रायंगल (Pascal’s Triangle) के रूप में जानता है, परंतु भारत में महर्षि पिंगल (लगभग 200 ईसा पूर्व) और बाद में केदार भट्ट एवं हलायुध (10वीं शताब्दी) ने छंदों के गणित को सुलझाने के लिए ‘मेरु प्रस्तार’ के रूप में इसका सविस्तार वर्णन किया था।
मात्रामेरु की संरचना
मात्रामेरु में संख्याओं को एक पिरामिड या ‘मेरु’ (पर्वत) के आकार में व्यवस्थित किया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना है कि किसी निश्चित मात्रा वाले छंद में कितने गुरु (S) और कितने लघु (I) अक्षरों के संयोग बन सकते हैं।
मात्रामेरु बनाने की विधि
- सबसे ऊपर एक कोष्ठक में 1 लिखें।
- उसके नीचे की पंक्ति में दो कोष्ठक बनाकर दोनों में 1 लिखें।
- तीसरी पंक्ति से, किनारे वाले कोष्ठकों में हमेशा 1 रहेगा, और बीच के कोष्ठकों में ऊपर वाले दो कोष्ठकों का योग (Sum) लिखा जाएगा।
मात्रामेरु का गणितीय महत्व
मात्रामेरु के माध्यम से हम बिना विस्तार किए यह जान सकते हैं कि-
- कुल कितने प्रकार के छंद बनेंगे।
- कितने छंदों में सभी अक्षर ‘गुरु’ होंगे।
- कितने छंदों में केवल एक ‘लघु’ होगा, इत्यादि।
चार (4) मात्राओं के लिए उदाहरण
यदि हम मेरु की चौथी पंक्ति देखें (1, 3, 3, 1):
- 1: केवल एक रूप जिसमें सब समान हैं।
- 3: तीन ऐसे रूप जिनमें गुरु-लघु का एक विशेष क्रम है।
- यह क्रम द्विपद प्रमेय (Binomial Theorem) के गुणांकों (nCr) को दर्शाता है।
चार (4) मात्राओं वाले छंदों के संयोग
4 मात्राओं के लिए मात्रामेरु की पांचवीं पंक्ति (0 से गणना शुरू करने पर) के अंक हमें संयोग बताते हैं। इसके कुल 8 भेद होते हैं-
| संयोग का प्रकार | संख्या (मात्रामेरु से) | उदाहरण क्रम (S=2, I=1) |
| शून्य गुरु (सब लघु) | 1 | IIII |
| एक गुरु (दो लघु) | 3 | SII, ISI, IIS |
| दो गुरु (शून्य लघु) | 1 | SS |
| कुल योग | 5 (प्रकार) / 8 (संयोग) | — |
छः (6) मात्राओं वाले छंदों के संयोग
छः मात्राओं के लिए मात्रामेरु की सातवीं पंक्ति का उपयोग होता है। इसके कुल 13 भेद होते हैं-
| संयोग का प्रकार | संख्या (मात्रामेरु से) | उदाहरण स्वरूप |
| शून्य गुरु (6 लघु) | 1 | IIIIII |
| एक गुरु (4 लघु) | 4 | SIIII, ISIII, IISII, IIISI |
| दो गुरु (2 लघु) | 3 | SSII, SISI, SIIS \dots |
| तीन गुरु (0 लघु) | 1 | SSS |
चौपाई
चौपाई एक मात्रिक सम छंद है जिसके प्रत्येक चरण में 16 मात्राएँ होती हैं। मात्रामेरु की सहायता से हम यह देख सकते हैं कि इन 16 मात्राओं को भरने के कितने गणितीय तरीके हो सकते हैं।
चौपाई में मात्रा गणना का उदाहरण
हम प्रसिद्ध पंक्ति लेते हैं- “जय हनुमान ज्ञान गुन सागर”
इसकी मात्रा गणना (S=2, I=1) इस प्रकार है:
- जय: I + I (2)
- हनुमान: I + I + S + I (5)
- ज्ञान: S + I (3)
- गुन: I + I (2)
- सागर: S + I + I (4)
- कुल योग: 2 + 5 + 3 + 2 + 4 = 16
मात्रामेरु (Pascal’s Triangle) और 16 मात्राएँ
यदि मात्रामेरु की 17वीं पंक्ति (16 मात्राओं के लिए) को देखें, तो वह हमें बताती है कि 16 मात्राएँ बनाने के कुल 987 तरीके (प्रस्तार) हो सकते हैं। इनमें से कुछ प्रमुख संयोग ये हैं-
| गुरु (S) की संख्या | लघु (I) की संख्या | कुल तरीके (संयोग) |
| 8 | 0 | 1 (सभी गुरु: SSSSSSSS) |
| 7 | 2 | 28 (7 गुरु और 2 लघु के अलग-अलग स्थान) |
| 0 | 16 | 1 (सभी लघु: IIIIIIIIIIIIIIII) |
छंद शास्त्र में मात्रामेरु के लाभ
- लय की विविधता: यह कवि को बताता है कि वह गुरु-लघु को कहाँ बदलकर कविता के प्रवाह को संगीतमय बना सकता है।
- नियम पालन: चौपाई के अंत में ‘लघु-गुरु’ (IS) नहीं होना चाहिए, बल्कि ‘गुरु-गुरु’ (SS) या ‘लघु-लघु’ (II) होना चाहिए। मात्रामेरु की गणना इन सीमाओं के भीतर नए शब्द संयोजन खोजने में मदद करती है।
फिबोनाची श्रेणी का अनुसरण
मात्रामेरु में जो संख्याएँ निकलती हैं, वे फिबोनाची श्रेणी (Fibonacci series) का अनुसरण करती हैं।
- 1 मात्रा के लिए: 1 तरीका
- 2 मात्रा के लिए: 2 तरीके
- 3 मात्रा के लिए: 3 तरीके
- 4 मात्रा के लिए: 5 तरीके
- 5 मात्रा के लिए: 8 तरीके…
दोहा छंद की गणना
दोहा छंद की गणना समझना और भी दिलचस्प है क्योंकि यह एक अर्ध-सम मात्रिक छंद है। इसमें प्रथम और तृतीय चरण (विषम चरण) में 13 मात्राएँ और द्वितीय एवं चतुर्थ चरण (सम चरण) में 11 मात्राएँ होती हैं।
मात्रामेरु (फिबोनाची क्रम) के अनुसार, 13 और 11 मात्राओं के लिए संभावित संयोगों की संख्या बहुत अधिक होती है:
- 13 मात्राओं के लिए: 233 संभावित तरीके (प्रस्तार)
- 11 मात्राओं के लिए: 89 संभावित तरीके
दोहा का उदाहरण और मात्रा विभाजन
उदाहरण पूर्वक समझने के लिए प्रसिद्ध दोहा लेते हैं- “श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।”
1. विषम चरण (13 मात्राएँ): “श्रीगुरु चरन सरोज रज”
यहाँ मात्रामेरु के अनुसार वर्णों का क्रम देखिए:
- श्रीगुरु: S (श्री) + I (गु) + I (रु) = 4
- चरन: I + I + I = 3
- सरोज: I + S + I = 4
- रज: I + I = 2
- कुल: 4 + 3 + 4 + 2 = 13 मात्राएँ।
2. सम चरण (11 मात्राएँ): “निज मनु मुकुरु सुधारि”
- निज: I + I = 2
- मनु: I + I = 2
- मुकुरु: I + I + I = 3
- सुधारि: I + S + I = 4
- कुल: 2 + 2 + 3 + 4 = 11 मात्राएँ।
दोहा के लिए मात्रामेरु के विशेष नियम (गणित और शास्त्र का मेल)
मात्रामेरु हमें हज़ारों विकल्प देता है, किंतु दोहा शास्त्र कुछ प्रतिबंध (Constraints) लगाता है:
- विषम चरण की शुरुआत: दोहा के 13 मात्रा वाले चरण की शुरुआत अक्सर ‘जगण’ (ISI) से नहीं होनी चाहिए।
- अंत का नियम: 11 मात्रा वाले चरण का अंत हमेशा ‘गुरु-लघु’ (SI) से होना चाहिए (जैसे: सु-धा-रि में ‘धा’ S और ‘रि’ I है)।
- कल (मात्रा समूह): दोहा में 13 मात्राओं को 6 + 4 + 3 के समूह में बांटना लय के लिए सबसे अच्छा माना जाता है।
गणना तालिका-
| चरण | कुल मात्रा | मात्रामेरु भेद (Total Permutations) | अंत का अनिवार्य नियम |
| विषम (1, 3) | 13 | 233 | अंत में I (लघु) अनिवार्य नहीं पर शुभ |
| सम (2, 4) | 11 | 89 | अंत में SI (गुरु-लघु) अनिवार्य |
मात्रामेरु का यह गणित कवियों को यह समझने में सहायता करता है कि शब्दों को कविता या गीत में कैसे पिरोया जाए कि लय भी न टूटे और व्याकरण भी सही रहे।



