Wednesday, January 28, 2026
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चित्तौड़ दुर्ग की घेराबंदी: सुरंग विस्फोट और राजपूतों का शौर्य (80)

चित्तौड़ दुर्ग की घेराबंदी के दौरान पचास कोस दूर तक सुनाई दिया चित्तौड़ दुर्ग की दीवार उड़ने का धमाका!

चित्तौड़ दुर्ग की घेराबंदी (Siege of Chittorgarh Fort) के दौरान जब अकबर (Akbar) के सेनापति खानेआलम तथा आदिल खाँ चित्तौड़ दुर्ग की दीवारों तक पहुंचने में विफल रहे तब अकबर ने दुर्ग की दीवारों तक कुछ सुरंगों एवं साबातों का निर्माण करवाने का विचार किया जिनमें से होकर अकबर के सैनिक दुर्ग की दीवारों तक पहुंच सकते थे।

अकबर ने लाखोटा बारी से उस पहाड़ी तक एक सुरंग खुदवानी आरम्भ की जिस पहाड़ी पर चित्तौड़ का किला खड़ा था। शीघ्र ही राजपूत सैनिकों को अकबर की इस चालाकी का पता चल गया और वे सुरंग खोदने वालों पर किले से पत्थर और तीर फैंकने लगे। इस पर कुछ और सुरंगें खुदवानी आरम्भ की गईं ताकि कुछ सुरंगें दुर्ग के सैनिकों की चपेट में आने से बच सकें।

चित्तौड़ दुर्ग की घेराबंदी का यह दृश्य तब और भीषण हो गया जब जिस मोर्चे पर राजा टोडरमल नियुक्त था, उस मोर्चे से लेकर दुर्ग की पहाड़ी तक एक साबात बनवानी आरम्भ की गई। साबात उस कृत्रिम छत अथवा कृत्रिम गुफा को कहते थे जिसके नीचे से होकर सेना अपने शत्रुओं के तीरों एवं हथियारों से बचती हुई निर्धारित बिंदु तक पहुंच जाती थी। साबात बनने के समय भी राजपूत सैनिक अवसर पाकर मुगल सैनिकों एवं कारीगरों पर हमले करते रहे।

तारीखे अल्फी (Tarikh-i-Alfi) के अनुसार जब साबात बन रहे थे, तब राणा के सात-आठ हजार सवार और कई गोलंदाजों ने उन पर हमला किया। कारीगरों के बचाव के लिए गाय-भैंस के मोटे चमड़े की छावन थी। तो भी वे इतनी संख्या में मरे कि ईंट-पत्थर की तरह लाशें चुनी गईं। राजपूताना की रियासतों का इतिहास लिखने वाले सुप्रसिद्ध इतिहासकार गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने लिखा है कि चित्तौड़ के किले (Chittor Fort) में कई चतुर तोपची थे जो सुरंग खोदने वालों और साबात बनाने वाले मुस्लिम सैनिकों को पत्थर एवं गोले फैंककर मार देते थे।

अबुल फजल लिखता है कि साबात की रक्षा करने वाले लगभग 200 सैनिक प्रतिदिन मारे जाते थे। फिर भी दिन-दिन साबात आगे बढ़ाए जाते तथा सुरंगें खोदी जाती थीं। मेवाड़ी सैनिक साबातों को तोड़ डालते थे। इसलिये जगह-जगह मोर्चे रखकर तोपखाने से साबात की रक्षा की गई। अकबर की सेना ने साबात बनाने वाले कारीगरों के बचाव के लिये गाय-भैंस के मोटे चमड़े की छावन लगाई।

बदायूंनी (Mulla Badayuni) ने लिखा है कि मारे गए सैनिकों एवं मजदूरों के शरीर ईंटों एवं पत्थरों की जगह काम में लिए गए। बदायूंनी लिखता है कि साबात की चौड़ाई इतनी अधिक थी कि इसके नीचे दस घुड़सवार एक साथ चल सकते थे और ऊंचाई इतनी थी कि हाथी पर हाथ में भाला लिए बैठा आदमी आसानी से गुजर सकता था। बादशाह ने सुरंग और साबात बनाने वालों को जी खोलकर रुपया दिया। अबुल फजल ने लिखा है कि मजदूरों को चांदी और सोना मिट्टी की भांति दिया जाता था।

चित्तौड़ दुर्ग की घेराबंदी के इस दौर में अकबर के सैनिकों ने साबात के दोनों ओर मिट्टी की इतनी चौड़ी दीवार बना दी थी कि तोप के गोले उसमें प्रवेश नहीं कर सकते थे। किसी तरह से दो सुरंगें किले की तलहटी तक पहुंच गईं। एक सुरंग में 120 मन और दूसरी सुरंग में 80 मन बारूद भरी गई। 17 दिसम्बर 1567 को लाखोटा बारी की तरफ एक सुरंग उड़ाई गई जिससे 50 राजपूत सैनिकों सहित किले की एक बुर्ज उड़ गई।

लाखोटाबारी (Lakhotabari) का दरवाजा नींव से उखड़ गया। इस दरार से होकर शाही फौज किले में घुसने लगी। इतने में अचानक दूसरी सुरंग भी उड़ गई जिससे शाही फौज के 200 सिपाही मारे गये। लगभग चालीस सिपाही पास की खाई में छिपे हुए थे वे भी मिट्टी एवं ईंटों में दब कर मर गए।

अबुल फजल तथा मुल्ला बदायूंनी दोनों ने लिखा है कि दो सुरंगें पास-पास खोदी गईं थीं तथा इनमें बारूद भर दिया गया था। सेना की एक टुकड़ी पूरी तरह हथियार बंद एवं साजो-सामान सहित, सुरंगों की ओर चली गई और सुरंग के फटने की प्रतीक्षा करने लगी ताकि दुर्ग की दीवार गिरते ही वे दुर्ग में घुस जाएं।

अबुल फजल (Abul Fazal) लिखता है कि दोनों सुरंगों में आग लगाने के लिए एक ही बत्ती बनाई गई थी किंतु मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी लिखता है कि दोनों सुरंगों की बत्तियों में एक ही समय में आग लगाई गई थी किंतु एक की बत्ती जो दूसरी से छोटी थी, पहले फट गई और उसने जमीन को उछाल दिया। दुर्घटना यह हुई कि लम्बी बत्ती से दूसरी सुरंग देर से विस्फोटित हुई। पहली सुरंग के फटने पर, टूटी दीवार में बने रास्ते से बेसब्री से प्रतीक्षा कर रही एक टुकड़ी आगे बढ़ गई। उसने इस बात की परवाह नहीं की कि अभी दूसरी सुरंग फटी नहीं है और फटने वाली है।

मुल्ला लिखता है- ‘जब पहली सुरंग के फटने पर आमने-सामने की लड़ाई शुरु हो गई तब अचानक ही दूसरी सुरंग सुलगी और फट पड़ी जो कि पूरी तरह बारूद से भरी हुई थी। दोस्त और दुश्मन दोनों ही हवा में उछाल दिए गए। इस्लाम के फौजी (अकबर के सैनिक) सौ मन और दो सौ मन भारी पत्थरों के तले दब गए। पत्थर-दिल काफिर (महाराणा के सैनिक) भी उसी प्रकार उछल गए जैसे आग के दरिया में पतंगे। विस्फोट के पत्थर तीन-चार कोस की दूरी तक उछल गए और एक जोर की चीख ईस्लाम के सैनिकों तथा काफिरों दोनों ओर से हुई।

रक्त की एक धारा जन्नत से जहन्नुम की ओर बही। हालांकि ग्रेबे का और इस्लाम के विश्वासियों का खून एक ही जगह बहा। कौवों और गिद्धों के लिए खुशी का दिन था। अल्लाह की रहमत कि कौओं और गिद्धों को खाना मिला। अचानक फटने वाली सुरंग के धमाके में शहंशाह के व्यक्तिगत परिचय वाले करीब पांच सौ योद्धा काट दिए गए। उन्होंने शहादत का जाम पिया और काफिरों के कितने सैनिक काटे गए, कौन कह सकता है!

चित्तौड़ दुर्ग की घेराबंदी को विफल करने हेतु चित्तौड़ के सैनिकों ने रात भर उस टूटी दीवार को बनाने का काम किया जो उन सुरंगों के फटने से टूट चुकी थी। चित्तौड़ दुर्ग की दीवार के साथ-साथ दुर्ग की एक बुर्ज भी इस धमाके की चपेट में आने से गिर गई।’

गौरीशंकर हीराचंद ओझा (Gouri Shankar Hira Chand Ojha) ने लिखा है कि सुरंग के इस विस्फोट का धड़ाका 50 कोस दूर तक सुनाई दिया। निश्चित रूप से यह हिन्दू सैनिकों के लिए परीक्षा की घड़ी थी किंतु किले के भीतर के वीरों ने बिना कोई समय गंवाए दुर्ग की दीवार एवं बुर्ज, फिर से बना ली। उसी दिन आसफ खाँ ने बीका खोह और मोर मगरी की तरफ तीसरी सुरंग उड़ाई, जिससे अकबर की तरफ के 30 आदमी और मारे गए। अबुल फजल के अनुसार ये 30 आदमी दुर्ग की रक्षा करने वालों में से थे। कतिपय समकालीन इतिहासकारों ने लिखा है कि अकबर भी इस धड़ाके की चपेट में आ गया किंतु वह बाल-बाल बच गया।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

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