शक्तिसिंह (Shaktisingh) ने विचार किया कि मेरे, अकबर के पास आने से, सब लोग यही समझेंगे कि मैं ही अकबर (Akbar) को मेवाड़ पर चढ़ा लाया हूँ। इससे मेरी बड़ी बदनामी होगी। चित्तौड़ (Chittor) पर संकट देखकर शक्तिसिंह उसी रात बिना कोई सूचना दिए अकबर के शिविर से निकल गया और चित्तौड़ पहुंच गया।
अकबर चाहता था कि जिस प्रकार अन्य हिन्दू राजाओं ने अकबर की अधीनस्थ मित्रता स्वीकार कर ली है, उसी प्रकार चित्तौड़ का महाराणा उदयसिंह (Maharana Udaisingh) भी अकबर की सेवा में उपस्थित होकर अधीनता प्रकट करे तथा मुगलों के राज्य-विस्तार के लिए मुगलों के शत्रुओं से युद्ध करे किंतु महाराणा उदयसिंह चित्तौड़ पर संकट आया जानकर भी अकबर की अधीनता स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हुआ।
जब ई.1543 में 18 साल के महाराणा उदयसिंह को चित्तौड़ पर संकट देखकर चित्तौड़ दुर्ग की चाबियां शेरशाह सूरी को सौंपनी पड़ीं थीं, महाराणा उदयसिंह उसी समय समझ गया था कि चित्तौड़ को शक्तिशाली बनाने के लिए अरावली के घने पहाड़ों में नई राजधानियां बनानी होंगी। इसी उद्देदश्य से उसने उदयपुर नामक एक नवीन नगर की स्थापना की। यह नगर अरावली की विकट पहाड़ियों से घिरा हुआ था।
अरावली की पहाड़ियों में हजारों साल से, दूर-दूर तक भीलों की बस्तियां बसी हुई थीं। ये लोग पहाड़ियों की टेकरियों पर झौंपड़ियाँ तथा पड़वे बनाकर रहते थे और छोटे-छोटे तीर-कमान से बड़े-बड़े वन्य पशुओं का शिकार करते थे।
अपने शिकार के पीछे भागते हुए वे एक पहाड़ी से उतर कर, दूसरी पहाड़ी पर तेजी से दौड़ते हुए चढ़ जाते थे। भीलों में सैनिक संगठन जैसी व्यवस्था नहीं थी किंतु संकट के समय ये लोग मिलकर लड़ते थे। भील-योद्धा स्वाभाविक रूप से पहाड़ियों के दुर्गम मार्गों से परिचित होते थे।
इस कारण बड़ी से बड़ी शक्ति के लिये पहाड़ों में आकर भीलों से युद्ध करना, बहुत बड़े संकट को आमंत्रण देने जैसा था। इन भीलों से गुहिल शासकों के सम्बन्ध आरम्भ से ही अच्छे थे। महाराणा कुम्भा ने भीलों से अपनी मित्रता को और अधिक सुदृढ़ बनाया था। तब से भील, मेवाड़ राज्य के विश्वसनीय साथी बने हुए थे।
जब उदयसिंह महाराणा बना तो उसने शेरशाह सूरी तथा अपने राज्य की सीमाओं के दोनों तरफ मालवा तथा गुजरात जैसे प्रबल शत्रु-राज्यों की उपस्थिति के कारण भीलों के महत्त्व को और अधिक अच्छी तरह से समझा।
महाराणा उदयसिंह जानता था कि खानुआ के मैदान में अपनी तोपों के बल पर सांगा को पछाड़ने वाले मुगल, अथवा सुमेल के मैदान में मालदेव को पटकनी देने वाले अफगान, किसी भी दिन चित्तौड़ तक आ धमकेंगे और तब चित्तौड़ की कमजोर हो चुकी दीवारें मेवाड़ राज्य को सुरक्षा नहीं दे पायेंगी।
वैसे भी वह महाराणा उदयसिंह अपने बड़े भाई विक्रमादित्य के समय में चित्तौड़ दुर्ग की दुर्दशा अपनी आँखों से देख चुका था। इसलिये उसने अपनी राजधानी के लिये प्राकृतिक रूप से ऐसे सुरक्षित स्थान की खोज आरम्भ की जहाँ तक शत्रुओं की तोपें न पहुँच सकें।
महाराणा उदयसिंह की दृष्टि मेवाड़ राज्य के दक्षिण-पश्चिमी भाग पर गई। मेवाड़ राज्य का यह क्षेत्र विकट पहाड़ियों से घिरा हुआ था तथा बीच-बीच में उपजाऊ मैदान भी स्थित थे जिनमें खेती तथा पशुपालन बहुत अच्छी तरह से हो सकता था। यह पूरा क्षेत्र भील बस्तियों से भरा हुआ था और इस क्षेत्र में बड़ी-बड़ी झीलें एवं छोटी-छोटी नदियां स्थित थीं।
इन सब बातों को देखते हुए महाराणा उदयसिंह ने इस क्षेत्र में उदयपुर नगर की नींव डाली। उसने गिरवा तथा उसके आसपास के क्षेत्र में किसानों एवं अन्य जनता को लाकर बसाया और नई बस्तियां बनानी आरम्भ कीं।
शीघ्र ही इस क्षेत्र में बड़े भू-भाग पर खेती-बाड़ी एवं पशु-पालन आदि गतिविधियां होने लगीं। बढ़ई तथा लुहार आदि दस्तकार और छोटे-मोटे व्यापारी एवं व्यवसायी भी आकर बस गये।
महाराणा उदयसिंह के इस कार्य ने राजा और प्रजा के सम्बन्धों को भी नया आकार दिया जिससे परस्पर सहयोग, मैत्री एवं विश्वास का वातावरण बना और प्रजा अपने राजा को पहले से भी अधिक चाहने लगी।
इधर तो महाराणा उदयसिंह अकबर से लड़ने के लिए ये सब तैयारियां कर रहा था और उधर राजपूताने के अन्य हिन्दू राजाओं द्वारा मुगलों की अधीनता स्वीकार कर लेने से गुहिलों की शक्ति को भारी नुक्सान पहुंच रहा था।
जब भी मेवाड़ के महाराणा, खलीफा की सेनाओं से लड़ने के लिए रण में जाया करते थे तब उत्तर भारत के बहुत से हिन्दू राजा, महाराणा की सहायता के लिए अपनी सेनाएं लेकर आया करते थे।
यह परम्परा ई.1527 में हुए खानवा के (War of Khanwa) युद्ध तक बनी रही किंतु जब ई.1562 में आम्बेर के कच्छवाहों ने अपने घरेलू क्लेश से छुटकारा पाने के लिये, अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली तो उन्होंने मेवाड़ के गुहिलों की सेवा त्याग दी।
कच्छवाहों के अनुकरण में जोधपुर एवं बीकानेर के राजाओं ने भी, गुहिलों की मित्रता छोड़कर, अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली तथा अपने-अपने राज्यों को सुरक्षित बनाने का प्रयास किया। हिन्दू राजाओं की इस कार्यवाही से गुहिल, राजपूताने में अलग-थलग पड़ गये तथा उनकी शक्ति को बहुत नुक्सान हुआ।
अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने अकबरनामा (AKBARNAMA) में तथा विंसेंट स्म्थि ने अकबर दी ग्रेट मुगल में लिखा है कि ई.1567 में मालवा का सुल्तान बाजबहादुर अर्थात् बायजीद, अकबर के सेनापति अब्दुलाह खाँ के भय से, मालवा छोड़कर, महाराणा उदयसिंह की शरण में आया। उदयसिंह ने उसे अपने पास रख लिया। इस पर अकबर बहुत क्रुद्ध हुआ और स्वयं सेना लेकर चित्तौड़ की ओर बढ़ा।
गौरी शंकर हीराचंद ओझा ने लिखा है कि राणा उदयसिंह का पुत्र शक्तिसिंह अपने पिता से नाराज होकर अकबर की सेवा में उपस्थित हुआ। अकबर उस समय धौलपुर में शिविर लगाए पड़ा था।
अकबर ने कुंवर शक्तिसिंह से कहा- ‘बड़े-बड़े जमींदार मेरे अधीन हो चुके हैं, केवल राणा उदयसिंह अभी तक नहीं हुआ। अतः मैं उस पर चढ़ाई करने वाला हूँ। क्या तुम इस कार्य में मेरी सहायता करोगे?’
इस पर शक्तिसिंह ने विचार किया कि मेरे, अकबर के पास आने से, सब लोग यही समझेंगे कि मैं ही अकबर को मेवाड़ पर चढ़ा लाया हूँ। इससे मेरी बड़ी बदनामी होगी। इसलिए शक्तिसिंह उसी रात बिना कोई सूचना दिए अकबर के शिविर से निकल गया और चित्तौड़ पहुंच गया।
यह समाचार पाकर अकबर बड़ा क्रुद्ध हुआ और उसने चित्तौड़ पर तत्काल आक्रमण करने का निश्चय किया।
सितम्बर 1567 में अकबर चित्तौड़ की ओर रवाना हुआ और सिवीसपुर अर्थात् शिवपुर और कोटा के किलों पर अधिकार करता हुआ गागरौन पहुंचा। अकबर ने आसफ खाँ तथा वजीर खाँ को माण्डलगढ़ पर हमला करने के लिए भेजा जो कि महाराणा के मजबूत किलों में से एक था।
उन दिनों बल्लू सोलंकी माण्डलगढ़ का किलेदार था। आसफ खाँ और वजीर खाँ ने उसे हराकर माण्डलगढ़ पर अधिकार कर लिया। अकबर ने मालवा के लिए भी एक सेना रवाना की तथा स्वयं चित्तौड़ की तरफ बढ़ने लगा। इस पर महाराणा उदयसिंह ने अपने सरदारों को चित्तौड़ की रक्षा के लिये बुलाया।
चित्तौड़ पर संकट देखकर मेड़ता का निर्वासित शासक जयमल वीरमदेवोत, रावत सांईदास चूंडावत, ईसरदास चौहान, राव बल्लू सोलंकी, डोडिया सांडा, राव संग्रामसिंह, रावत साहिबखान, रावत पत्ता, रावत नेतसी आदि कई सरदार अपनी सेनाएं लेकर चित्तौड़ आ गये।
✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।



