भारतीय धर्म और दर्शन के विशाल सागर में ‘आगम ग्रंथ’ (Agama Shastra) वे अनमोल रत्न हैं, जो न केवल अध्यात्म की गहराई बताते हैं, बल्कि ईश्वर की उपासना, मंदिर निर्माण और जीवन जीने की कला का व्यावहारिक मार्ग भी प्रशस्त करते हैं। जहाँ वेदों को ‘निगम’ कहा जाता है, वहीं तंत्र और उपासना प्रधान ग्रंथों को ‘आगम’ की संज्ञा दी गई है।
👉 आगम ग्रंथ : परम्परा से आया हुआ ज्ञान
भारतीय धर्म और दर्शन की परंपरा में आगम ग्रंथों का विशेष स्थान है। ये ग्रंथ न केवल धार्मिक आचार-विचार का आधार हैं, बल्कि आध्यात्मिक साधना, मंदिर निर्माण और पूजा-पद्धति के लिए भी मार्गदर्शक हैं। “आगम” शब्द संस्कृत धातु “गम्” से बना है, जिसका अर्थ है “आना” या “प्राप्त होना”। आगम को परंपरा से आया हुआ ज्ञान भी कहा जाता है। अतः आगम वे ग्रंथ हैं जो ऋषियों और तीर्थंकरों के दिव्य उपदेशों के रूप में प्राप्त हुए। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में आगम ग्रंथों का स्थान वेदों के समान ही अत्यंत श्रद्धापूर्ण और प्रमाणिक माना जाता है।
👉 आगम का अर्थ और परिभाषा
‘आगम’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘आ’ (समंततः), ‘ग’ (गमतु) और ‘म’ (बोधक) से मानी जाती है। इसका अर्थ है वह शास्त्र जो मोक्ष का उपाय बताता है और जिसके माध्यम से ज्ञान प्राप्त होता है। एक प्रसिद्ध श्लोक के अनुसार-
आगतं शिववक्त्रेभ्यः गतं च गिरिजामुखे।
मतं च वासुदेवेन तस्मादागममुच्यते॥
अर्थात्, जो शिव के मुख से निकला, पार्वती के कान में गया और जिसे वासुदेव (विष्णु) ने भी स्वीकार किया, वही ‘आगम’ है। सरल शब्दों में, आगम वे शास्त्र हैं जो ईश्वर और जीव के संबंध तथा मोक्ष प्राप्ति की विधियों का वर्णन करते हैं।
👉 आगम ग्रंथों की भाषा
- आगम ग्रंथों की भाषा प्रारंभ में अर्द्धमागधी और प्राकृत रही, बाद में संस्कृत और क्षेत्रीय भाषाओं में भी इनका विस्तार हुआ।
👉 आगम ग्रंथों का वर्गीकरण (Classification of Agamas)
1. हिन्दू धर्म में आगम ग्रंथ
हिन्दू धर्म में आगम ग्रंथ शैव, वैष्णव और शाक्त संप्रदायों में विभक्त किए जा सकते हैं। ये पूजन-विधि, मंदिर निर्माण, ध्यान और योग से संबंधित ग्रंथ हैं। हिन्दू धर्म में आगम ग्रंथों का महत्व विशेष रूप से मंदिर और पूजा-पद्धति में है। इन ग्रंथों में ध्यान, योग, मंत्र, यंत्र और पूजा-विधि का विस्तृत वर्णन मिलता है।
अ. शैव आगम (Shaiva Agamas)
भगवान शिव की उपासना पर केंद्रित इन ग्रंथों की संख्या 28 मानी जाती है (मुख्य आगम)। इन्हें दो भागों में बांटा गया है-
- कामिक आगम: यह सबसे प्राचीन और महत्वपूर्ण माना जाता है।
- कारण आगम: इसमें मंदिर निर्माण और मूर्तिकला के विशेष नियम हैं।
शैव आगमों में ‘पाशुपत’, ‘शैव सिद्धांत’ और ‘काश्मीर शैव दर्शन’ प्रमुख हैं।
ब. वैष्णव आगम (Vaishnava Agamas)
भगवान विष्णु और उनके अवतारों की उपासना बताने वाले इन ग्रंथों को दो मुख्य शाखाओं में विभाजित किया गया है-
- पाञ्चरात्र आगम: इसमें भगवान के पांच स्वरूपों और भक्ति मार्ग पर बल दिया गया है। ‘अहिर्बुध्न्य संहिता’ इसका प्रमुख ग्रंथ है।
- वैखानस आगम: यह ऋषियों की परंपरा से आया है और दक्षिण भारत के तिरुपति जैसे मंदिरों में इसकी विधियों का पालन होता है।
स. शाक्त आगम (Shakta Agamas)
शक्ति या देवी की उपासना से संबंधित ग्रंथों को ‘तंत्र’ भी कहा जाता है। इनकी संख्या 64 मानी गई है। इनमें ‘कुलार्णव तंत्र’ और ‘महानिर्वाण तंत्र’ अत्यंत प्रसिद्ध हैं।
2. जैन धर्म के आगम ग्रंथ
भगवान महावीर की वाणी को उनके गणधरों द्वारा संकलित किया गया, जिसे ‘आगम’ कहा जाता है। इसमें 12 अंग, 12 उपांग आदि शामिल हैं। ये प्राकृत (अर्धमागधी) भाषा में हैं। जैन धर्म में जैन धर्म से सम्बन्धित सम्पूर्ण जैन साहित्य को भी आगम कह दिया जाता है। इसमें विभिन्न प्रकार के ग्रंथ सम्मिलित हैं-
- 12 अंग आगम – महावीर स्वामी के उपदेशों का मूल संकलन।
- 12 उपांग आगम – अंग ग्रंथों की व्याख्या और विस्तार।
- 10 प्रकीर्ण आगम – विविध विषयों पर छोटे ग्रंथ।
- 6 छेदसूत्र – अनुशासन और नियमों से संबंधित।
- 4 मूलसूत्र – साधना और तपस्या के लिए आधारभूत ग्रंथ।
- नन्दी सूत्र और अनुयोगद्वार – ज्ञान और तर्कशास्त्र से संबंधित।
इन ग्रंथों का संकलन मुख्यतः श्वेताम्बर परंपरा के आचार्यों द्वारा किया गया।
3. बौद्ध आगम
- महायान बौद्ध परंपरा में प्रारंभिक सूत्रों के संकलन को ‘आगम’ कहा जाता है, जो पालि भाषा के ‘निकायों’ के समतुल्य हैं।
👉 आगम ग्रंथों की चार मुख्य विधाएँ (पादाः)
प्रत्येक आगम ग्रंथ मुख्य रूप से चार भागों में विभाजित होता है, जिन्हें ‘पाद’ कहा जाता है। यह आगमों की सबसे बड़ी विशेषता है:
- ज्ञान पाद (Jnana Pada): इसमें दार्शनिक सिद्धांतों, जीव, जगत और ईश्वर के स्वरूप की व्याख्या की गई है।
- योग पाद (Yoga Pada): इसमें मानसिक एकाग्रता, अष्टांग योग और कुंडलिनी जागृति की विधियां बताई गई हैं।
- क्रिया पाद (Kriya Pada): इसमें मंदिर निर्माण (वास्तु शास्त्र), मूर्ति स्थापना और विग्रह निर्माण के वैज्ञानिक नियम दिए गए हैं।
- चर्या पाद (Charya Pada): इसमें दैनिक पूजा-पाठ, त्यौहार, संस्कार और व्यक्तिगत आचरण के नियमों का वर्णन है।
👉 आगम ग्रंथों की विशेषताएँ
- धार्मिक अनुशासन का आधार – साधु-संतों और भक्तों के लिए आचार संहिता।
- मंदिर निर्माण की विधि – स्थापत्य कला और वास्तुशास्त्र का अद्भुत ज्ञान।
- योग और ध्यान की शिक्षा – आत्मा की शुद्धि और मोक्ष की साधना।
- भाषा और साहित्यिक महत्व – प्राकृत, संस्कृत और क्षेत्रीय भाषाओं में रचित।
👉 आगम और निगम (वेद) में अंतर
प्रायः लोग वेदों और आगमों के बीच भ्रमित रहते हैं। यद्यपि दोनों का लक्ष्य ‘मोक्ष’ है तथापि इनमें कुछ आधारभूत अंतर हैं-
| विशेषता | निगम (वेद) | आगम (तंत्र/शास्त्र) |
| प्रकृति | सैद्धांतिक और सूक्त प्रधान | क्रियात्मक और उपासना प्रधान |
| अधिकार | प्राचीन काल में वर्ण व्यवस्था का प्रभाव | जाति-पाति से परे, सभी के लिए सुलभ |
| पूजा पद्धति | यज्ञ और आहुति मुख्य | मूर्ति पूजा और अर्चना मुख्य |
| भाषा | वैदिक संस्कृत | लौकिक संस्कृत और क्षेत्रीय भाषाएँ |
👉 आगम ग्रंथों का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व
1. मंदिर वास्तुकला का आधार
आज दक्षिण भारत के विशाल और भव्य मंदिर (जैसे मदुरै मीनाक्षी, तंजावुर का बृहदेश्वर) पूरी तरह से आगम शास्त्र के नियमों पर बने हैं। बिना आगम ज्ञान के इन मंदिरों का निर्माण और वहां की ऊर्जा का प्रबंधन संभव नहीं था। मंदिर निर्माण और स्थापत्य कला में योगदान।
2. सामाजिकता का समावेश
आगम ग्रंथों ने भक्ति मार्ग को समाज के हर वर्ग के लिए खोल दिया। आगमों में स्पष्ट कहा गया है कि ईश्वर की भक्ति का अधिकार हर मनुष्य को है, चाहे वह किसी भी जाति या लिंग का हो।
3. मूर्ति पूजा और कर्मकांड
वैदिक काल में यज्ञ प्रधान थे, किंतु पौराणिक काल में जब मूर्ति पूजा का प्रचलन बढ़ा, तो उसके व्यवस्थित नियम आगमों ने ही दिए। पूजा-पद्धति और अनुष्ठानों का संकलन।
4. आध्यात्मिक मार्गदर्शन
साधकों को मोक्ष की ओर ले जाने वाले। तर्कशास्त्र, नैतिकता और आत्मज्ञान की शिक्षा।
👉 निष्कर्ष
आगम ग्रंथ भारतीय धर्म और संस्कृति की आत्मा हैं। इन ग्रंथों ने न केवल धार्मिक जीवन को दिशा दी, अपितु भारतीय कला, स्थापत्य और दर्शन को भी समृद्ध किया।
आगम ग्रंथों ने धर्म को किताबों से निकालकर मंदिरों और व्यक्तिगत जीवन के क्रियाकलापों तक पहुँचाया। ये ग्रंथ विज्ञान, कला, मनोविज्ञान और अध्यात्म का अद्भुत संगम हैं। यदि आप भारतीय संस्कृति की सूक्ष्मताओं को समझना चाहते हैं, तो आगम ग्रंथों का अध्ययन अनिवार्य है।
जैन धर्म में ये महावीर स्वामी के उपदेशों का संकलन हैं, जबकि हिन्दू धर्म में ये मंदिर निर्माण, पूजा और साधना की विधियों का आधार हैं।
आज के आधुनिक युग में भी, जब हम मानसिक शांति और व्यवस्थित जीवन की तलाश करते हैं, आगमों में वर्णित ‘योग’ और ‘चर्या’ के नियम उतने ही प्रासंगिक हैं जितने हजारों वर्ष पहले थे।
– यह आलेख व्यापक शोध और प्राचीन पांडुलिपियों के आधार पर तैयार किया गया है।



