जब ईस्वी 1567 में अकबर का चित्तौड़ आक्रमण हुआ तो मेवाड़ी सामंतों ने अकबर को चित्तौड़ से दूर भेजने के लिए चाल चली! इस योजना में महाराणा उदयसिंह की कोई सहमति नहीं ली गई।
अकबर का चित्तौड़ आक्रमण (Akbar’s invasion of Chittorgarh) तब शुरू हुआ जब अकबर ने चित्तौड़ पर आरोप लगाया कि उसने अकबर के शत्रु बाजबहादुर को शरण देकर शाही मंशा के विरुद्ध कार्य किया है और अकबर एक सेना लेकर चित्तौड़ के लिए चल पड़ा। 20 अक्टूबर 1567 को अकबर ने चित्तौड़ से दस मील उत्तर-पूर्व में अपनी छावनी डाली। उस समय चित्तौड़ की राजनीतिक एवं सामरिक शक्ति अत्यंत विपन्नावस्था में थी।
फिर भी महाराणा उदयसिंह (Maharana Udaisingh) ने अकबर का सामना करने का निश्चय किया। गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने लिखा है कि कुंवर शक्ति सिंह ने अकबर के धौलपुर शिविर से लौटकर महाराणा उदयसिंह को सूचित किया कि अकबर चित्तौड़ पर आक्रमण करने आ रहा है। इस पर सब सरदार बुलाए गए। महाराणा की सेवा के लिए आने वाले प्रमुख सरदारों की सूची हम पिछले आलेख में दे चुके हैं।
मेवाड़ी सरदारों ने महाराणा उदयसिंह को सलाह दी कि दिल्ली, आगरा, गुजरात एवं मालवा से लड़ते-लड़ते मेवाड़ कमजोर हो चुका है। इसलिये महाराणा को अपने परिवार सहित घने पहाड़ों में चले जाना चाहिये। इस पर महाराणा उदयसिंह, मेड़ता के शासक जयमल राठौड़ और उसके बहनोई सिसोदिया पत्ता (Sisodia Patta) को चित्तौड़ दुर्ग की सुरक्षा का भार सौंपकर, रावत नेतसी आदि कुछ सरदारों सहित मेवाड़ के पहाड़ों में चला गया।
अकबर का चित्तौड़ आक्रमण रोकने के लिए ओझाजी ने लिखा है कि जयमल (Jaimal Rathore) के नेतृत्व में 8000 हिन्दू सैनिक चित्तौड़ दुर्ग की रक्षा के लिए मरने-मारने को तैयार हो गए। अबुल फजल ने हिन्दू सैनिकों की संख्या 5000 लिखी है। वह लिखता है कि राणा के सिपाहियों ने दुर्ग के आसपास के प्रदेश को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया जिससे खेतों में घास का एक तिनका भी नहीं रहा।
अक्टूबर 1567 में अकबर ने चित्तौड़ दुर्ग के निकट पड़ाव डाला। अकबर ने अपने सेनापति बख्सीस को घेरा डालने का काम सौंपा। चित्तौड़ दुर्ग इतना विशाल था कि मुगल सेना को उसे हर ओर से घेरने में एक महीने का समय लग गया। जब यह घेरा डालने की कार्यवाही चल रही थी, तब अकबर ने आसफ खाँ को रामपुर के किले पर भेजा। यह दुर्ग मेवाड़ राज्य में ही स्थित था।
आसफ खाँ (Asaf Khan) रामपुर के किले (Rampur Fort) को जीतकर अकबर के पास लौट आया। अकबर को ज्ञात हुआ कि महाराणा उदयसिंह चित्तौड़ दुर्ग में नहीं है। वह या तो कुंभलमेर की तरफ गया है या फिर उदयपुर की तरफ गया है। इस पर अकबर ने एक-एक सेना दोनों स्थानों के लिए रवाना की।
हुसैन कुली खाँ (Husain Kuli Khan) को उदयपुर की तरफ भेजा गया था। वह कई महीनों तक महाराणा को उदयपुर एवं उसके आसपास की पहाड़ियों में ढूंढता रहा किंतु वह महाराणा को नहीं ढूंढ सका। हुसैन कुली खाँ को जहाँ भी पहाड़ियों में इक्का-दुक्का आदमी मिलते, वह उनसे महाराणा उदयसिंह के बारे में पूछता किंतु उसे किसी ने नहीं बताया कि महाराणा अपने परिवार के साथ कहाँ निवास कर रहा है।
हुसैन कुली खाँ के सैनिक उन लोगों का सामान लूट लेते, उनकी झौंपड़ियों में आग लगा देते और उन्हें मार देते। अंत में हुसैन कुली खाँ निराश होकर अकबर के पास लौट गया। अकबर का चित्तौड़ आक्रमण जारी था और उधर जब अकबर की सेनाएं महाराणा उदयसिंह को अरावली की पहाड़ियों में ढूंढ रही थीं, इधर अकबर भी चैन से नहीं बैठा था। अबुल फजल ने लिखा है कि अकबर ने खाने आलम तथा आदिल खाँ से दुर्ग पर आक्रमण करवाया किंतु वे विफल होकर लौट आए तथा उन्होंने अकबर से कहा कि इसमें जल्दबाजी की गई थी।
जयमल राठौड़ के सैनिक दुर्ग की प्राचीर से अकबर की सेना पर तीर, पत्थर, जलता हुआ तेल और जलते हुए कपड़े फैंकते थे जिसके कारण अकबर के सैनिकों की हिम्मत दुर्ग के निकट जाने की नहीं होती थी। अकबर के साथ कुछ हिन्दू राजाओं की सेनाएं भी थीं। विचित्र दृश्य था, कल तक आम्बेर के कच्छवाहे तथा अन्य हिन्दू राजा चित्तौड़ की रक्षा करने में अपना गर्व समझते थे, आज वे अकबर की चाकरी स्वीकार करके चित्तौड़ का मानभंजन करने को तलवारें निकालकर खड़े थे।
मेड़ता के राठौड़ अब भी गुहिलों के कंधे से कंधा लगाकर चित्तौड़ के रक्षक बने हुए थे। मुट्ठी भर चौहान, सोलंकी, डोडिया और झाला भी चित्तौड़ के लिये मरने-मारने को तैयार थे। भले ही चित्तौड़ के रक्षक थोड़े से थे किंतु इनके सामने अकबर का चित्तौड़ आक्रमण सफल होना या अकबर की दाल गलनी कठिन थी।
अबुल फजल ने लिखा है कि दुर्ग के चारों ओर तोपें लगाई गईं। इन तोपों के लिए तीन बड़े मंच भी बनाए गए। तोपों का एक मंच लाकूटा दरवाजे के सामने था जिसे लाखोटा बारी (Lakhota Bari) भी कहा जाता था। यह मोर्चा स्वयं अकबर के अधीन था। हसन खाँ, चगताई खाँ, राय पत्तर दास, काजी अली बगदादी, इख्तियार खाँ फौजदार और काबिर खाँ को इसी मंच पर तैनात किया गया। उधर किलेदार जयमल राठौड़ (Jaimal Rathore) भी अकबर की समस्त गतिविधियों पर दृष्टि रख रहा था। जब उसे ज्ञात हुआ कि अकबर ने लाखोटा बारी पर मोर्चा जमाया है तो जयमल ने भी किले के भीतर लाखोटा बारी पर मोर्चो जमाया।
दुर्ग के बाहर दूसरा मोर्चा पूर्व की तरफ सूरजपोल के सामने राजा टोडरमल ने जमाया। इस मोर्चे पर शुजात खाँ, मीर बर्रू-बहर तथा कासिम खाँ को तोपखाने के साथ तैनात किया गया। इस मंच को बरसात से बचाने के लिए एक ढका हुआ मार्ग बनाया गया जिसकी लम्बाई एक बाण की मार तक थी। इस मोर्चे के सामने किले के भीतर रावत सांईदास चूंडावत को नियुक्त किया गया।
तीसरे मोर्चे पर जो किले के दक्षिण की तरफ चित्तौड़ी बुर्ज के सामने था, ख्वाजा अब्दुल मजीद असद खाँ आदि कई अमीरों को नियुक्त किया गया। इस मोर्चे के लिए एक भारी तोप ढाली गई जो आधा मन का गोला फैंक सकती थी। इस मोर्चे के सामने किले के भीतर बल्लू सोलंकी को नियुक्त किया गया। एक दिन दुर्ग के सरदारों ने रावत साहिबखान चौहान और डोडिया के ठाकुर सांडा को अकबर के पास भेजकर कहलवाया कि हम वार्षिक कर दिया करेंगे और आपकी अधीनता स्वीकार करते हैं। अनेक मुगल अमीरों ने अकबर से कहा कि वह यह संधि स्वीकार कर ले किंतु अकबर को इसमें मेवाड़ी सरदारों की कोई चाल दिखाई दी।
अकबर समझ गया कि मेवाड़ी सामंतों के इस प्रस्ताव में महाराणा की कोई सहमति नहीं है। यह तो मेवाड़ी सरदारों ने अकबर को चित्तौड़ से दूर भेजने के लिए कोई चाल चली है। इसलिए अकबर का चित्तौड़ आक्रमण और तेज हो गया और अकबर ने कहा कि यदि राणा स्वयं उपस्थित होकर यह बात कहे तो मैं संधि करने को तैयार हूँ। अकबर की इस शर्त के सामने आने के बाद राजपूतों ने संधि की बात बंद कर दी और पूरे उत्साह के साथ युद्ध करने के लिए तैयार हो गए।
✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।



