भारतीय संस्कृति में शक्ति-पूजा की परंपरा अत्यंत प्राचीन और गहन है। देवी-पूजन केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। इस परंपरा को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करने वाला अद्भुत ग्रंथ है – अपराजित पृच्छा
अपराजित पृच्छा का परिचय
यह भारतीय शिल्पशास्त्र और आगम परंपरा का ऐसा देदीप्यमान ग्रंथ है जो न केवल शक्ति-पूजा की विधियों और तत्त्वों का विवेचन करता है, बल्कि तंत्र-साधना के रहस्यों को भी उजागर करता है। यह ग्रंथ भारतीय कला, स्थापत्य और धर्मशास्त्र की अमूल्य धरोहर है।
अपराजित पृच्छा एक संस्कृत ग्रंथ है, जिसे 12वीं-13वीं शताब्दी के आसपास लिखा गया माना जाता है। गुजरात के चालुक्य राजाओं के संरक्षण में रचित यह ग्रंथ, विश्वकर्मा के मानस पुत्र अपराजित द्वारा पूछे गए प्रश्नों और उनके पिता द्वारा दिए गए उत्तरों के रूप में संकलित है।
यह ग्रंथ मुख्यतः वास्तुशास्त्र, मूर्तिशास्त्र और पूजा-विधान पर केंद्रित है। इसमें देवी-देवताओं की मूर्तियों के निर्माण, मंदिरों की संरचना और पूजा-पद्धति का विस्तृत वर्णन मिलता है। शक्ति-पूजा की परंपरा को इसमें विशेष स्थान दिया गया है, जिससे यह ग्रंथ भारतीय धार्मिक जीवन का दर्पण बन जाता है।
शक्ति-पूजा परंपरा में अपराजितपृच्छा का महत्व
1. शक्ति-पूजा की परंपरा
भारतीय दर्शन में शक्ति को सृष्टि की मूल ऊर्जा माना गया है। देवी को आदिशक्ति, जगतजननी और धर्मरक्षक के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। ‘अपराजित पृच्छा’ में शक्ति-पूजा की विधियों का उल्लेख इस दृष्टि से अद्भुत है कि यह केवल अनुष्ठानिक क्रियाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि देवी-पूजन को जीवन की समग्र साधना से जोड़ता है।
- देवी की मूर्तियों के निर्माण में सौंदर्य और शास्त्रीयता का संतुलन
- पूजा में मंत्र, यंत्र और तंत्र का प्रयोग
- शक्ति को मातृभाव से लेकर रक्षक और संहारक तक विभिन्न रूपों में स्वीकार करना
- साधक के जीवन में शक्ति की उपस्थिति को आत्मबल और सामाजिक कल्याण से जोड़ना
2. शक्ति का दार्शनिक स्वरूप
अपराजितपृच्छा में शक्ति को केवल एक देवी के रूप में नहीं, अपितु ब्रह्मांड की मूल ऊर्जा के रूप में स्वीकार किया गया है। ग्रंथ के अनुसार, शिव और शक्ति का संबंध अविभाज्य है। जहाँ शिव ज्ञान हैं, वहीं शक्ति क्रिया और इच्छा का स्वरूप हैं। शक्ति-पूजा के इस ग्रंथ में देवी को आद्या कहा गया है, जो सृष्टि के सृजन, पालन और संहार की अधिष्ठात्री हैं।
3. प्रतिमा विज्ञान और शक्ति के विविध रूप
शक्ति-पूजा परंपरा में मूर्तिकला का बड़ा महत्व है, और अपराजितपृच्छा इस विषय पर विस्तृत प्रकाश डालती है। इसमें देवी के विभिन्न रूपों के आयुध (हथियार), वाहन, मुद्रा और उनके स्वरूप का सूक्ष्म विवरण मिलता है:
- महिषासुरमर्दिनी: देवी के इस पराक्रमी रूप के दस, अठारह या बीस हाथों के आयुधों का वर्णन इसमें विस्तार से है।
- सप्तमातृका: ब्रह्माणी, वैष्णवी, माहेश्वरी, कौमारी, इंद्राणी, वाराही और चामुंडा के शास्त्रीय स्वरूप का वर्णन शक्ति उपासना के सामाजिक और आध्यात्मिक पक्ष को दर्शाता है।
- महाविद्या और योगिनी: ग्रंथ में 64 योगिनियों और उनके मंदिर विधान का भी उल्लेख है, जो मध्यकालीन भारत के तांत्रिक प्रभाव को रेखांकित करता है।
4. शक्तिपीठ और वास्तु विधान
इस ग्रंथ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह शक्ति-पूजा को वास्तु (Architecture) के साथ जोड़ता है। अपराजितपृच्छा में बताया गया है कि शक्ति के मंदिर किस दिशा में होने चाहिए और उनके गर्भगृह की योजना कैसी होनी चाहिए।
- पीठ विधान: इसमें विभिन्न प्रकार के पीठों (Altars) का वर्णन है, जो तंत्र साधना के लिए आवश्यक होते हैं।
- मंडप संरचना: देवी मंदिरों के मंडप और शिखर की ऊँचाई के नियमों को शक्ति के दिव्य तेज के अनुरूप निर्धारित किया गया है।
5. तंत्र और उपासना पद्धति
अपराजितपृच्छा केवल एक शिल्प-ग्रंथ नहीं है, अपितु यह आगम परंपरा का संवाहक भी है। इसमें बीज मंत्रों, यंत्रों की रचना और साधना के मुहूर्त पर बल दिया गया है। ग्रंथ स्पष्ट करता है कि मूर्ति केवल पत्थर नहीं है; जब उसमें प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है और शक्ति का आह्वान होता है, तब वह साक्षात चैतन्य हो उठती है।
इसमें शक्ति की सौम्य (जैसे लक्ष्मी, सरस्वती) और रौद्र (जैसे काली, भैरवी) दोनों प्रकृतियों की उपासना का समन्वय मिलता है। यह ग्रंथ बताता है कि साधक की मनोकामना के अनुसार देवी के किस रूप की आराधना की जानी चाहिए।
6. कला और स्थापत्य में योगदान
‘अपराजित पृच्छा’ का महत्व केवल धार्मिक दृष्टि से नहीं, बल्कि कला और स्थापत्य के क्षेत्र में भी है। इसमें मंदिर-निर्माण की सूक्ष्म विधियाँ दी गई हैं। देवी-पूजन के लिए विशेष प्रकार के मंदिरों, गर्भगृहों और वेदियों का उल्लेख मिलता है।
- मंदिर की दिशा, आकार और अनुपात का निर्धारण
- मूर्तियों की मुद्रा, आयाम और भावाभिव्यक्ति
- पूजा के लिए आवश्यक उपकरण और वेदियाँ
- शक्ति-पूजा हेतु विशेष रूप से निर्मित यंत्रों का विवरण
इस प्रकार यह ग्रंथ भारतीय स्थापत्य कला का भी अद्भुत मार्गदर्शक है।
7. दार्शनिक दृष्टि
‘अपराजित पृच्छा’ में शक्ति-पूजा को केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं माना गया, बल्कि इसे दार्शनिक साधना का रूप दिया गया है। शक्ति को ब्रह्म की अभिन्न अभिव्यक्ति मानते हुए साधक को आत्मज्ञान की ओर प्रेरित किया गया है।
- शक्ति को सृष्टि, स्थिति और संहार की त्रिगुणात्मक शक्ति के रूप में देखा गया है।
- पूजा का उद्देश्य केवल भौतिक लाभ नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नति है।
साधक को शक्ति के माध्यम से आत्मबल, विवेक और करुणा प्राप्त करने की प्रेरणा दी जाती है।
8. सामाजिक महत्व
शक्ति-पूजा भारतीय समाज में स्त्री-शक्ति के सम्मान का प्रतीक रही है। ‘अपराजित पृच्छा’ इस परंपरा को और अधिक सुदृढ़ करता है। देवी को मातृभाव से लेकर योद्धा रूप तक स्वीकार करना समाज में स्त्री की बहुआयामी भूमिका को मान्यता देता है।
- स्त्री को सृजनकर्ता और रक्षक दोनों रूपों में प्रतिष्ठित करना
- समाज में स्त्री-शक्ति के प्रति श्रद्धा और सम्मान का भाव जगाना
- सामूहिक पूजा और उत्सवों के माध्यम से सामाजिक एकता को बढ़ावा देना
9. सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व
ऐतिहासिक दृष्टि से अपराजितपृच्छा का लेखक भुवनदेव को माना जाता है। यह ग्रंथ उस समय लिखा गया जब भारत में शक्ति संप्रदाय (Shaktism) अपने चरमोत्कर्ष पर था। खजुराहो से लेकर उड़ीसा और गुजरात के मोढेरा तक, जो भी भव्य मंदिर बने, उनके पीछे अपराजितपृच्छा जैसे ग्रंथों का शास्त्रीय आधार रहा है।
यह ग्रंथ हमें यह भी बताता है कि मध्यकालीन समाज में नारी शक्ति को ब्रह्मांडीय शक्ति के प्रतीक के रूप में कितनी प्रधानता दी जाती थी। कला, धर्म और दर्शन का ऐसा संगम विरल ही देखने को मिलता है।
मानासर और अपराजितपृच्छा का संबंध
शिल्पशास्त्र की परंपरा में मानसार और अपराजितपृच्छा को अक्सर एक ही श्रेणी में रखा जाता है, हालांकि मानसार मुख्य रूप से दक्षिण भारतीय (द्रविड़) परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है और अपराजितपृच्छा उत्तर भारतीय (नागर/मारू-गुर्जर) परंपरा का।
मानासर की तरह ही अपराजितपृच्छा भी मान (Measurement) और प्रमाण (Proportion) पर अत्यधिक बल देती है। इन ग्रंथों के अनुसार, यदि कोई भवन सही माप और अनुपात में नहीं है, तो वह न केवल सौंदर्यहीन होगा, अपितु निवास करने वालों के लिए अशुभ भी हो सकता है।
निष्कर्ष
अपराजित पृच्छा शक्ति-पूजा परंपरा का अद्भुत ग्रंथ है, जो भारतीय धर्म, दर्शन, कला और समाज का समन्वित चित्र प्रस्तुत करता है। यह ग्रंथ हमें बताता है कि शक्ति-पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन की समग्र साधना है। देवी-पूजन के माध्यम से साधक आत्मबल, विवेक और करुणा प्राप्त करता है, वहीं समाज में स्त्री-शक्ति के प्रति सम्मान और एकता का भाव भी विकसित होता है।
अपराजितपृच्छा शक्ति-पूजा की परंपरा का एक ऐसा अक्षय कोष है, जो साधक, शिल्पी और इतिहासकार—तीनों के लिए समान रूप से उपयोगी है। यह हमें सिखाता है कि शक्ति की उपासना केवल कर्मकांड नहीं, अपितु कला और वास्तु के माध्यम से उस परम चेतना को अपने भीतर उतारने की एक प्रक्रिया है। आज भी जब हम प्राचीन भारतीय मंदिरों की दीवारों पर उत्कीर्ण देवी प्रतिमाओं को देखते हैं, तो उनमें अपराजितपृच्छा के शब्द ही जीवंत होकर मुस्कुराते प्रतीत होते हैं।
इस प्रकार ‘अपराजित पृच्छा’ भारतीय संस्कृति की उस अद्भुत परंपरा का प्रतिनिधि है, जिसमें शक्ति को जगतजननी, रक्षक और संहारक के रूप में स्वीकार कर जीवन के हर आयाम से जोड़ा गया है। यह ग्रंथ आज भी हमें प्रेरित करता है कि शक्ति-पूजा केवल मंदिरों तक सीमित न रहे, बल्कि हमारे जीवन और समाज में भी शक्ति का आदर और सम्मान बना रहे।



