पिंगलाचार्य द्वारा रचित प्रमुख ग्रंथ छन्दःसूत्रम् (Chhandsutram) है, जिसे छन्दःशास्त्र (Chhand Shastra) या पिंगलशास्त्र (Pingal Shastra) भी कहा जाता है। यह सूत्र (Formula) रूप में लिखा गया है और इसमें लघु-गुरु मात्राओं पर आधारित छंदों का वर्णन है।
छन्दःसूत्रम् या छन्दःशास्त्र
कुछ स्रोतों में इसे छन्दसूत्र या छन्दःशास्त्र दोनों नामों से जाना जाता है, किंतु पिंगल की अपनी रचना यही एक है। प्राकृत या अपभ्रंश भाषाओं में इससे प्रेरित ग्रंथ जैसे प्राकृत पिंगलमिमांसा हैं, पर वे अलग हैं।
छन्दःसूत्रम् पिंगलाचार्य द्वारा रचित प्राचीन भारतीय ग्रंथ है, जो छन्दशास्त्र का मूल आधार है। यह सूत्र रूप में लिखा गया है और वैदिक छंदों के गणितीय वर्गीकरण पर केंद्रित है।
रचना काल और लेखक
पिंगलाचार्य (Pingalacharya) का काल 400 ई.पू. से 200 ई.पू. माना जाता है, और जनश्रुति के अनुसार वे पाणिनि (Panini) के अनुज थे। ग्रंथ में छंद रचना के नियम, लघु-गुरु मात्राओं (ह्रस्व-दीर्घ स्वरों) पर आधारित त्रिक (गण) जैसे यमाताराजभानसलगा, और चरणों के भेद (सम-विषम) का वर्णन है।
पिंगल के छन्दशास्त्र में 8 अध्याय हैं। यह सूत्र-शैली में लिखा गया है। 8वें अध्याय में 35 सूत्र हैं। जिनमें से अन्तिम 16 सूत्र (8.20 से 8.35 तक) संयोजिकी से सम्बन्धित हैं। केदारभट्ट द्वारा रचित वृत्तरत्नाकर में 6 अध्याय हैं जिसका 6ठा अध्याय पूरी तरह से संयोजिकी के कलनविधियों को समर्पित है।
छन्दःसूत्रम् की गणितीय विशेषताएँ
यह ग्रंथ द्विआधारी संख्या पद्धति (binary system) और मेरु-प्रस्तार (पास्कल त्रिभुज) का प्रारंभिक वर्णन करता है, जो छंदों की संख्यात्मक गणना के लिए उपयोगी है। उदाहरणस्वरूप, विभिन्न छंदों जैसे जगती (8 अक्षर, तीन चरण) या उष्णिक (11 अक्षर, चार चरण) का वर्गीकरण बाइनरी कोड पर आधारित है।
छन्दःसूत्रम् का महत्व और टीकाएँ
छन्दःसूत्रम् को पिंगलशास्त्र भी कहा जाता है, और इसके परवर्ती आचार्यों जैसे कालिदास (श्रुतबोध) ने इस पर टीकाएँ लिखीं। यह पद्य रचना, स्मरण और भाव संप्रेषण में सहायक है, तथा यति (विराम स्थान) नियमों से यतिभंग दोष से बचाता है।



