हयशीर्ष पांचरात्र (Hayashirsha Pancharatra) की दशताल विधि (Dashtal) पर एक विशेष तकनीकी लेख। यह लेख मूर्तिकला के उन सूक्ष्म गणितीय नियमों को उजागर करता है, जिनका पालन भारतीय शिल्पकार सदियों से करते आ रहे हैं।
हयशीर्ष पांचरात्र: दशताल विधि और भारतीय मूर्तिकला ( Indian Iconography) का गणितीय आधार
प्राचीन भारतीय मूर्तिकला केवल सौंदर्य का विषय नहीं है, बल्कि यह शुद्ध गणित और ज्यामिति (Geometry) पर आधारित है। हयशीर्ष पांचरात्र में वर्णित दशताल विधि वह पैमाना है, जिसके माध्यम से शिल्पकार पत्थर में जान फूंकते हैं और देवताओं की प्रतिमाओं को एक दिव्य स्वरूप प्रदान करते हैं।
ताल क्या है? (Understanding the Unit Tala)
मूर्तिकला में ताल मापने की एक मौलिक इकाई है। एक ताल का अर्थ है हथेली की लंबाई (कलाई से लेकर मध्यमा उंगली के सिरे तक)।
सामान्यतः, एक ताल को 12 अंगुल के बराबर माना जाता है। दशताल विधि का अर्थ है वह प्रतिमा जिसकी कुल ऊंचाई उसके मुख (चेहरे) की लंबाई का 10 गुना होती है।
दशताल विधि के प्रकार (Types of Dashatala)
हयशीर्ष पांचरात्र और अन्य आगम ग्रंथों में दशताल को तीन श्रेणियों में बांटा गया है, जो मूर्ति के देवत्व और भाव के अनुसार तय होते हैं:
- उत्तम दशताल (124 अंगुल): यह सर्वोच्च श्रेणी है, जिसका उपयोग मुख्य रूप से भगवान विष्णु, शिव और ब्रह्मा जैसे प्रमुख देवताओं की मूर्तियों के लिए किया जाता है।
- मध्यम दशताल (120 अंगुल): यह लक्ष्मी, सरस्वती और अन्य प्रमुख देवियों की मूर्तियों के लिए प्रयुक्त होता है।
- अधम दशताल (116 अंगुल): यह अन्य सहायक देवताओं या यक्षों के लिए उपयोग में लाया जाता है।
उत्तम दशताल का शारीरिक विभाजन (Anatomical Breakdown)
हयशीर्ष पांचरात्र के अनुसार, एक आदर्श उत्तम दशताल प्रतिमा का विभाजन निम्नलिखित माप (अंगुल में) के अनुसार होना चाहिए:
| शरीर का भाग | माप (अंगुल में) |
| मस्तक (उष्णीष से ललाट तक) | 4 अंगुल |
| मुख (चेहरा) | 12 अंगुल (1 ताल) |
| ग्रीवा (गर्दन) | 4 अंगुल |
| हृदय से नाभि तक | 12 अंगुल |
| नाभि से जननेंद्रिय तक | 12 अंगुल |
| ऊरु (जांघ) | 24 अंगुल |
| जानु (घुटना) | 4 अंगुल |
| जंघा (पिंडली) | 24 अंगुल |
| पाद (पैर की ऊंचाई) | 4 अंगुल |
कुल योग: लगभग 120-124 अंगुल।
दशताल विधि से मूर्ति निर्माण के प्रमुख तकनीकी बिंदु
1. मान सूत्र (Measurement Lines)
शिल्पकार मूर्ति बनाने से पहले पत्थर पर ब्रह्मसूत्र (Vertical Axis) खींचता है। यह केंद्रीय रेखा मूर्ति के संतुलन को निर्धारित करती है। दशताल विधि सुनिश्चित करती है कि मूर्ति न तो बहुत लंबी दिखे और न ही बहुत छोटी।
2. अंगों की चौड़ाई का अनुपात
हयशीर्ष पांचरात्र केवल ऊंचाई ही नहीं, बल्कि चौड़ाई का भी सटीक विवरण देता है। उदाहरण के लिए:
- कंधों की चौड़ाई: कुल 32 से 36 अंगुल होनी चाहिए।
- कटि (कमर): मुख की चौड़ाई से थोड़ी अधिक, ताकि मूर्ति में स्थिरता दिखे।
3. दशताल ही क्यों?
भारतीय सौंदर्यशास्त्र के अनुसार, 10 ताल का अनुपात शरीर को महापुरुष का स्वरूप देता है। सामान्य मनुष्यों का अनुपात अक्सर 7 या 8 ताल (अष्टताल) होता है, जबकि देवताओं को अलौकिक दिखाने के लिए दशताल का प्रयोग किया जाता है।
आधुनिक प्रासंगिकता
आज भी दक्षिण भारत के शिल्पी (पारंपरिक मूर्तिकार) जब पंचधातु या पाषाण की मूर्तियाँ बनाते हैं, तो वे हयशीर्ष पांचरात्र की इन्हीं विधियों का पालन करते हैं। कंप्यूटर एडेड डिजाइन (CAD) के इस दौर में भी, इन ग्रंथों में दी गई ताल पद्धति मानवीय शरीर विज्ञान और दृश्य संतुलन का सबसे सटीक उदाहरण मानी जाती है।
निष्कर्ष
हयशीर्ष पांचरात्र की दशताल विधि यह दर्शाती है कि हमारे ऋषियों को मानव शरीर के अनुपात और दृश्य कला का कितना गहरा ज्ञान था। यह विधि केवल एक तकनीकी माप नहीं है, बल्कि पत्थर को साक्षात ईश्वर में बदलने की एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है।



