बाकी काकशाल नामक एक अमीर ने मिर्जा हकीम से कहा कि यह हरम बेगम का कपट जाल है, इसलिए वहाँ जाना ठीक नहीं है किंतु मिर्जा हकीम, हरम बेगम के कपट-जाल में फंस गया और उसने काबुल से 12 कोस दूर कराबाग में हरम बेगम से भेंट करने का निश्चय किया।
मुगल शहजादों ने अकबर के राज्य पर हमला कर दिया!
ई.1567 में अकबर (Badshah Akbar) के पुराने विश्वसनीय सेनापति आसफ खाँ (Asaf Khan) तथा उज्बेकों की बगावतें समाप्त होने के साथ ही अब अकबर के लिए समय आ गया था जब वह पूरी शक्ति के साथ चित्तौड़ एवं रणथंभौर पर कार्यवाही कर सके किंतु अभी आसफ खाँ तथा उज्बेकों का विद्रोह समाप्त भी नहीं हुआ था कि अकबर के खानदान के बहुत से शहजादों ने अकबर के विरुद्ध बगावत कर दी।
इसलिए अकबर के चित्तौड़ अभियान से पहले हमें अकबर के खानदान के शहजादों एवं मिर्जाओं द्वारा अचानक ही अकबर के राज्य पर हमला करने की घटनाओं की चर्चा करनी होगी जिनके कारण अकबर का चित्तौड़ अभियान कुछ दिन के लिए टल गया था।
पाठकों को स्मरण होगा कि कुछ समय पहले ही अकबर ने अपने सौतेले भाई मिर्जा हकीम मुहम्मद खाँ की सहायता के लिए कुछ सेनाएं भेजी थीं जिनके कारण अकबर के चचेरे चाचा मिर्जा सुलेमान को काबुल का घेरा उठाकर बदख्शां की तरफ भाग जाना पड़ा था और अकबर के वृद्ध मंत्री कुतुबुद्दीन खाँ को मिर्जा हकीम मुहम्मद खाँ का सलाहकार बनाया गया था।
मिर्जा हकीम खाँ बहुत ही अस्थिर मस्तिष्क का शहजादा था। उसकी परवरिश अपनी माता चूचक बेगम के हाथों में हुई थी जो स्वयं भी राज्य की लालची और अस्थिर बुद्धि की औरत थी। इसलिए मिर्जा हकीम खाँ ने अकबर द्वारा समय पर भेजी गई सहायता का मूल्य नहीं समझा तथा अकबर से कोई सम्बन्ध नहीं रखे।
बदख्शां (Badakshan) का शासक मिर्जा सुलेमान भी अस्थिर बुद्धि का व्यक्ति था। वह बार-बार काबुल से मार खाकर आता था, कुछ समय के लिए शांत होकर बैठता था किंतु थोड़े समय बाद फिर से सेना सजाकर काबुल पर अधिकार करने चल देता था। इस बार भी कुछ दिनों तक बदख्शां में बैठे रहने के बाद मिर्जा सुलेमान एक बार फिर से काबुल की ओर चल पड़ा। उसे ज्ञात हो चुका था कि बादशाह अकबर की सेनाएं वापस पंजाब जा चुकी हैं।
इस बार भी मिर्जा सुलेमान (Mirza Suleman) ने हरम बेगम को अपने साथ लिया जो प्रायः युद्धों में जाया करती थी। जब मिर्जा हकीम मुहम्मद खाँ को ज्ञात हुआ कि उसके सास-ससुर सेना लेकर आ रहे हैं तो मिर्जा सुलेमान ने मासूम नामक एक सेनापति को काबुल की रक्षा का भार सौंपा तथा स्वयं अपने प्रधानमंत्री ख्वाजा हसन नक्शबंदी के साथ घोरबंद चला गया।
कुछ ही दिनों में मिर्जा सुलेमान ने काबुल को घेर लिया। इस बीच मिर्जा सुलेमान ने हरम बेगम को घोरबंद भेजा ताकि वह मिर्जा हकीम खाँ से बात करके उसे समर्पण के लिए राजी कर सके।
हरम बेगम ने अपने संदेशवाहकों को अपने जंवाई मिर्जा हकीम मुहम्मद खाँ के पास भेजकर कहलवाया कि मैं तुम्हें अपने पुत्र से भी अधिक प्रेम करती हूँ क्योंकि तुम मेरे जंवाई हो। मेरे आने का उद्देश्य यह है कि मेरा और तुम्हारा सम्बन्ध और भी दृढ़ हो जाए। मिर्जा हकीम खाँ ने अपने कुछ संदेशवाहक अपनी सास हरम बेगम के पास भेजे ताकि वे हरम बेगम के व्यवहार तथा उसके उद्देश्य का पता लगा सकें।
हरम बेगम ने मिर्जा हकीम के दूतों का स्वागत किया तथा उनके समक्ष सौगंध खाई कि छल की कोई बात नहीं है और जैसा कहा गया है, ठीक वही होगा। जब मिर्जा के आदमियों ने बेगम की शपथ सुनी तो उन्होंने वचन दिया कि वे मिर्जा से मुलाकात करने की व्यवस्था कर देंगे।
मिर्जा हकीम के संदेशवाहकों ने हरम बेगम (Harem Begum) के पास से लौटकर मिर्जा हकीम खाँ को विश्वास दिलाया कि हरम बेगम किसी तरह का विश्वासघात नहीं करेगी। अतः बेगम से मिलने में कोई कठिनाई नहीं है।
बाकी काकशाल नामक एक अमीर ने मिर्जा हकीम से कहा कि हरम बेगम कपट-जाल बिछा रही है, इसलिए वहाँ जाना ठीक नहीं है किंतु मिर्जा हकीम, हरम बेगम के कपट-जाल में फंस गया और उसने काबुल से 12 कोस दूर कराबाग में हरम बेगम से भेंट करने का निश्चय किया।
जब बेगम ने देखा कि षड़यंत्र सफल होता दिख रहा है तो उसने अपने आदमी भेजकर मिर्जा सुलेमान (Mirza Suleman) से कहलवाया कि मैंने मिर्जा हकीम खाँ को कराबाग में मिलने के लिए सहमत कर लिया है। अतः आप समय पर पहुंच कर मिर्जा हकीम खाँ को बंदी बना लें।
इस पर मिर्जा सुलेमान ने काबुल का घेरा मुहम्मद कुली सिंघाली को सौंपा और स्वयं रात में ही कूच करके कराबाग के निकट पहुंचकर एक पहाड़ी के नीचे घात लगाकर बैठ गया।
जब बाकी काकशाल, मिर्जा हकीम खाँ के आगे-आगे कराबाग जा रहा था तो उसे मार्ग में एक काबुली मिला। उसने बाकी काकशाल को बताया कि मिर्जा सुलेमान एक पहाड़ी के नीचे घात लगाकर बैठा है। इस पर बाकी काकशाल मिर्जा हकीम खाँ को लेकर घोरबंद की तरफ भाग लिया।
जब मिर्जा सुलेमान को पता लगा कि मिर्जा हकीम पीछे मुड़कर भाग रहा है तो वह भी पहाड़ी से निकल आया और मिर्जा हकीम तथा उसके अमीरों का पीछा करने लगा। इस पर मिर्जा हकीम तथा उसके अमीर एक घाटी में जाकर छिप गए। मिर्जा सुलेमान निराश होकर काबुल चला गया।
ख्वाजा हसन तथा कुछ अन्य अमीरों ने मिर्जा हकीम खाँ को सलाह दी कि उसे बल्ख के शासक पीर मुहम्मद खाँ के पास जाकर सहायता मांगनी चाहिए। बाकी काकशाल ने कहा कि मिर्जा हकीम खाँ को बादशाह अकबर के पास जाकर उससे सहायता मांगनी चाहिए।
इस पर ख्वाजा हसन तथा उसके पक्ष के अमीर बल्ख चले गए और बाकी काकशाल मिर्जा हकीम मुहम्मद खाँ को लेकर भारत के लिए रवाना हो गया। ये लोग घोरबंद से ईसा, बहरा, जलालाबाद और पेशावर होते हुए सिंधु नदी के तट पर पहुंचे। यहाँ उनकी भेंट फरीदून से हुई जो मिर्जा हकीम का मामा था।
उसने मिर्जा हकीम खाँ को सलाह दी कि उसे अकबर की शरण में जाने की बजाय पंजाब पर आक्रमण करना चाहिए तथा अपने लिए नया राज्य बनाना चाहिए क्योंकि इस समय अकबर उज्बेकों के भयानक विद्रोह से घिरा हुआ है। अकबर के सेनापति आसफ खाँ ने भी बगावत का झण्डा बुलंद कर रखा है। इसलिए अकबर पंजाब की रक्षा नहीं कर सकेगा।
फरीदून खाँ मिर्जा हकीम मुहम्मद खाँ का मामा था और उसे अकबर ने ही मिर्जा हकीम का मार्गदर्शन करने के लिए आगरा से भेजा था। उसने मिर्जा हकीम खाँ को अकबर के प्रति निष्ठावान रहने की सलाह देने की बजाय, उसे अकबर के राज्य पर हमला करने का परामर्श दिया।
यह परामर्श मिर्जा हकीम खाँ को विनाश के मार्ग पर ले जाने वाला था किंतु मिर्जा हकीम को अपने मामा की यह सलाह पसंद आई और वह अपनी सेना इकट्ठी करके भारत की तरफ चल दिया।
जब संभल के शासक मुहम्मद सुल्तान मिर्जा तथा उसके पुत्र उलूग मिर्जा को ज्ञात हुआ कि मिर्जा हकीम खाँ पंजाब पर आक्रमण करने आ रहा है तो उन दोनों ने भी बगावत का झण्डा बुलंद कर दिया और संभल से दिल्ली आकर लूटपाट करने लगे।
इस प्रकार अकबर चारों ओर से संकट में घिर गया। मिर्जा लोग अकबर के परिवार के ही शहजादे थे किंतु संकट काल में अकबर के राज्य की रक्षा करने की बजाय अकबर के राज्य पर अधिकार करने का सपना देख रहे थे।
✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।



