Wednesday, January 28, 2026
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जयमल राठौड़ का क्रोधित चेहरा देख लिया आखिर मुगलों ने  (81)

अबुल फजल ने लिखा है कि जब दुर्ग में जौहर की ज्वालाएं (Flames of Jouhar) दिखाई दीं तो पता लग गया कि अकबर की गोली से दुर्गपति जयमल राठौड़ मारा गया था। हालांकि अबुल फजल (Abul Fazal) ने यह सूचना गलत दी है कि अकबर की गोली से जयमल की मृत्यु हो गई थी। अकबर की बंदूक से चली गोली दुर्गपति जयमल राठौड़ के पैर में लगी थी जिससे जयमल लंगड़ा हो गया था।

जब अकबर (AKBAR) के सैनिकों द्वारा बनाई गई दो सुरंगों में भरे हुए बारूद को पलीता दिखाया गया तो एक सुरंग तो समय पर फटी किंतु दूसरी सुरंग कुछ देर से फटी जिसकी चपेट में आकर न केवल दुर्ग की दीवार पर खड़े चित्तौड़ी सैनिक अपितु दुर्ग के बाहर खड़े अकबर के सैनिक भी मारे गए।

 कुछ सैनिक मिट्टी एवं पत्थरों के नीचे दबकर मर गए। यहाँ तक कि स्वयं अकबर भी मरते-मरते बचा। इस दौरान चित्तौड़ दुर्ग के भीतर से भारी गोलीबारी की जा रही थी। अकबर भी वहाँ खड़े रहकर समस्त कार्यवाही का संचालन कर रहा था।

इस दौरान एक गोली अकबर के ठीक पास खड़े एक आदमी को आकर लगी जिससे उस आदमी की तुरंत मृत्यु हो गई किंतु अकबर बाल-बाल बच गया। गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने लिखा है कि इस युद्ध में अकबर कई बार मरते-मरते बचा।

अबुल फजल (ABUL FAZAL) लिखता है कि इन सुरंगों के फटने से अकबर के पक्ष को हुई क्षति के कारण दुर्गरक्षकों में तो हर्ष और जोश था किंतु अकबर शांत और गंभीर था। उसने सोचा कि यह काम बिना योजना के किया गया है और जोशीले लोगों ने जल्दबाजी की है।

सुरंगों के फटने से गिरी चित्तौड़ दुर्ग (Chittor Fort) की दीवार को राजपूतों द्वारा वापस बना लिए जाने से अकबर की सेना दुर्ग में प्रवेश नहीं कर सकी और अकबर की यह योजना विफल हो गई।

इस पर अकबर साबात बनवाने में व्यस्त हो गया। वह समझता था कि दुर्ग को छीन लेने का यही सर्वोत्तम उपाय है। वह साबात के निर्माण कार्य को देखता और दुर्ग के समीप जाकर दुर्गरक्षकों पर गोलियां चलाया करता था।

अबुल फजल ने लिखा है कि राजा टोडरमल और कासिम खाँ मीर की देख-रेख में एक साबात बनकर तैयार हो गया। अबुल फजल ने लिखा है कि साबात के ऊपर भी कोठड़ियां बनाई गईं।

स्वयं अकबर भी दो रात और एक दिन एक कोठड़ी में रहा था। दुर्ग में घिरे हुए लोग भी वीरतापूर्वक लड़े। अकबर साबात पर बैठा वीरों के काम देख रहा था। जब यह साबात बन गया तब इस साबात के नीचे से होकर अकबर की सेनाएं चित्तौड़ दुर्ग की दीवार तक पहुंच गईं।

दो रात और एक दिन तक दोनों सेनाएं लड़ाई में इस तरह लगी रहीं कि खाना-पीना भी भूल गईं। इन दो रातों और एक दिन में वीर लोगों ने न भोजन किया न नींद ली, इससे दोनों पक्ष थक गए।

शाही फौज ने कई जगह से किले की दीवार तोड़ डाली परन्तु राजपूतों ने उन स्थानों पर तेल, रुई, कपड़ा, बारूद आदि जलाकर शत्रु को भीतर आने से रोका।

एक दिन अकबर लाखोटा बारी वाले तोप-मंच पर आया। उसने देखा कि उसके योद्धा, दुर्ग के घेरे पर तैनात हैं तथा दुर्ग की प्राचीर पर खड़े हुए दुर्ग-रक्षकों पर गोलियां चला रहे हैं।

अकबर ने भी रन्ध्रों की आड़ में से दुर्ग-रक्षकों पर गोलियां चलाईं। जहाँ से अकबर गोलियां चला रहा था, उससे थोड़ी दूर पर अकबर का सेनापति जलाल खाँ खड़ा हुआ दुर्ग-रक्षकों पर निशाने लगा रहा था। अचानक दुर्ग में से किसी बंदूकची ने गोली चलाई जो अकबर के सेनापति जलाल खाँ को आकर लगी।

जलाल खाँ घायल हो गया किंतु मरा नहीं। जलाल खाँ को गोली लगने से अकबर बुरी तरह से बौखला गया। उसने कहा कि मैं अवश्य ही इस बंदूकची को मारकर जलाल खाँ का बदला लूंगा। इसके बाद अकबर ने एक रंध्र की आड़ में से गोली चलाई जिससे दुर्ग की प्राचीर पर खड़ा हुआ निशानची उसी समय मारा गया।

बाद में ज्ञात हुआ कि उस निशानची का नाम इस्माइल था। वह मेवाड़ की तरफ से लड़ रहे अफगान बंदूकचियों का अफसर था।

अबुल फजल लिखता है कि बादशाह के हाथ से इस प्रकार जाने कितने ही सैनिक मारे गए। यह बताना समीचीन होगा कि सूरी सल्तनत के पतन के बाद अफगान सेनाओं के बहुत से तोपची एवं बंदूकची उन हिन्दू राज्यों में चले आए थे जिनका मुगलों से संघर्ष चल रहा था। इस्माइल भी उन्हीं में से एक था।

अकबर (AKBAR) के दरबारी लेखक अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि एक दिन अकबर चित्तौड़ी बुर्ज के पास वाले मंच पर आया। वह धीरे-धीरे एक स्थान की ओर जा रहा था जहाँ पर गोलियों और गोलों की वर्षा हो रही थी। उसके मन में किसी प्रकार का भय नहीं था। एकाएक तोप का एक बड़ा गोला उसके पास आकर गिरा जिससे अकबर के बीस सैनिक मारे गए।

 दूसरे दिन खानेआलम को एक गोली लगी। वह अकबर (AKBAR) के पास ही खड़ा हुआ था। गोली खाने आलम के कवच में चली गई परंतु अंदर जाते-जाते ठण्डी हो गई। एक दिन मुजफ्फर खाँ को भी गोली लगी परंतु उसकी कोई क्षति नहीं हुई।

एक रात को मुगल सेना द्वारा दुर्ग पर सब ओर से आक्रमण किया गया और प्राचीर को स्थान-स्थान पर तोड़ दिया गया। यह प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा था कि दुर्ग नष्ट होने वाला है। साबात के पास विजयी सेना आगे बढ़ रही थी। आधी रात को दुर्गरक्षक टूटी हुई प्राचीर के पास आए।

उस समय हुए संघर्ष में कुछ लोग तो मारे गए और दूसरे लोगों ने टूटी हुई प्राचीर में मखमल, रुई, लकड़ियां और तेल भर दिया। जब मुगल आक्रमण करते तो राजपूत इस सामग्री में आग लगा देते जिससे मुगल सैनिक दुर्ग में प्रवेश नहीं कर पा रहे थे।

उसी समय अकबर ने देखा कि एक राजपूत सरदार दीवार की मरम्मत कराने के लिये हाथ में मशाल लेकर इधर-उधर घूम रहा है। अबुल फजल लिखता है कि उसके कवच में हजार मेखें थीं जो उसके उच्च अधिकारी होने का संकेत दे रही थीं परंतु अकबर नहीं जानता था कि वह कौन है। अकबर ने अपनी संग्राम नामक बंदूक से उस पर गोली चलाई।

अबुल फजल ने लिखा है कि पहले शुजात खाँ ने और बाद में राजा भगवंतदास (Raja Bhagwant Das) ने आकर अकबर (AKBAR) से कहा कि ऐसा मालूम होता है कि उस आदमी को गोली लग गई है।

 खानेजहाँ (Khane Jahanने कहा कि यह व्यक्ति रात भर वहीं था और प्राचीर की मरम्मत करवा रहा था। अब वह दुबारा नहीं आए तो मान लेना चाहिए कि वह मारा गया। थोड़ी ही देर में जब्बार अली दीवाना ने आकर बादशाह को सूचना दी कि शत्रु दिखाई नहीं देते।

अबुल फजल ने लिखा है कि जब दुर्ग में जौहर की ज्वालाएं (Flames of Jouhar) दिखाई दीं तो पता लग गया कि अकबर की गोली से दुर्गपति जयमल मारा गया था। हालांकि अबुल फजल (Abul Fazal) ने यह सूचना गलत दी है कि अकबर की गोली से जयमल राठौड़ की मृत्यु हो गई थी। अकबर की बंदूक से चली गोली दुर्गपति जयमल राठौड़ के पैर में लगी थी जिससे जयमल लंगड़ा हो गया था।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी (Mulla Abdul Qadir Badayuni ) ने लिखा है कि छः महीना या उससे अधिक समय बीतने पर अंततः एक रात शाही फौज ने चारों ओर से आक्रमण करते हुए किले (Chittor Fort) की दीवार को तोड़ दिया और तूफान की तरह दुर्ग में घुस गई।

बंदूकों व तोपों के छोड़ने की रौशनी में जयमल राठौड़ का क्रोधित चेहरा दिखाई देने लगा जो कि इस्लाम के सिपाहियों की ओर मुखातिब था। यही वह चेहरा था जिसने पिछले छः महीनों से अकबर की रातों की नींद और खाना-पीना हराम कर रखा था।

भले ही किसी भी इतिहासकार ने नहीं लिखा है किंतु यदि मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी के विवरण में थोड़ी-बहुत भी सच्चाई है तो उसे पढ़कर यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि राजा जयमल राठौड़ के क्रोधित चेहरे को देखकर कितने ही मुगल सेनापतियों के प्राण सूखकर कण्ठ में आ गए होंगे! कितने ही मुगल सेनापतियों ने जयमल राठौड़ (Jaimal Rathore) के इस क्रोधित चेहरे को देखकर अपने जीवन को धिक्कारा होगा। मोर्चे पर मौजूद राजा भगवंतदास, राजा टोडरमल (Raja Todarmal) एवं राय पत्तर दास भी उन्हीं में से रहे होंगे!

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

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