वीर कल्लाजी राठौड़ और राजा जयमल राठौड़ दो-दो हाथों से तलवार चलाते हुए बढ़े! इसे चित्तौड़ के इतिहास में कल्लाजी राठौड़ चतुर्भुज रूप में अवतरित हुए कहा गया। वे दोनों महावीर, शत्रुओं को मारते हुए अकबर (AKBAR) की सेना के लिए काल बन गए।
राजा जयमल के आदेश के बाद चित्तौड़ दुर्ग में जौहर की ज्वाला धधक उठी। जब दुर्ग के भीतर से गगनचुम्बी लपटें उठने लगीं तो वे अकबर (AKBAR) के शिविर तक दिखाई देने लगीं।
अबुल फजल (ABUL FAZAL) लिखता है कि एक जौहर फत्ता सिसोदिया के मकान में किया गया था और एक राणा के मुख्य सेवकों ने किया था। एक राठौड़ों ने किया था। इनमें कोठरिया का रावत साहिबखान मुख्य था। एक बहुत बड़ा जौहर चौहानों की हवेली में हुआ था जहाँ का मुख्य सरदार ईसरदास चौहान था।
अबुल फजल (ABUL FAZAL) लखता है कि लगभग 300 स्त्रियाँ इसमें जल मरी थीं। अबुल फजल (ABUL FAZAL) का यह विवरण अधूरा है। किले में जौहर की ज्वाला कई जगह धधकी थी तथा ठीक से कहा नहीं जा सकता कि इसमें भाग लेने वाली स्त्रियों, लड़कियों एवं बच्चों की संख्या कितनी थी!
रात के समय आकाश में ऊँची उठती अग्नि की लपटों को देखकर अकबर (AKBAR) बहुत विस्मित हुआ, उसने अपने मंत्रियों से इस अग्नि का कारण पूछा।
इस पर आम्बेर के राजा भगवानदास ने कहा कि जब हिन्दू वीर, युद्ध-क्षेत्र में मरने का निश्चय कर लेते हैं तो अपनी स्त्रियों और बच्चों को जौहर की अग्नि में जलाकर शत्रुओं पर टूट पड़ते हैं, इसलिये सावधान हो जाना चाहिये, कल सूर्योदय होते ही किले के दरवाजे खुलेंगे।
राजा भगवानदास की यह बात सुनकर मुगल सेना को तैयार रहने के लिए कहा गया। 25 फरवरी 1568 को प्रातः होते ही किले के भीतर युद्ध के नगाड़े बजने लगे। मुगल सेना ने हैरान होकर देखा कि चित्तौड़ी वीर किले का दरवाजा खोलकर बाहर आ रहे हैं।
उन्होंने केसरिया पाग बांधी हुई है तथा देह पर केसरिया बाना धारण किया हुआ है। उनके माथे वीरत्व के दर्प से दमदमा रहे हैं। जिस प्रकार आज का बाल-सूर्य प्राची में उषा द्वारा सजाए गए लाल पथ पर प्रकट हुआ है, उसी प्रकार मेवाड़ी आन-बान और शान की रक्षा के लिए दुर्ग से बाहर निकले मेवाड़ी वीर रक्त के लाल पथ पर अग्रसर हो रहे थे।
मुगल सेना केवल इतना ही देख सकी किंतु वास्तविकता यह भी थी कि प्रत्येक हिन्दू वीर के माथे पर कुछ देर पहले ही उनकी पत्नियों, माताओं एवं बहिनों द्वारा अग्नि की लाल लपटों में प्रवेश करने से पहले अपने हाथों से कुमकुम और रोली के टीके सजाए गए थे।
प्रत्येक वीर की पगड़ी में भगवान श्रीकृष्ण का चित्र था और उनके मुख में पहले से ही तुलसी दल रखा हुआ था। वे गंगाजल पीकर तथा गले में तुलसी की कण्ठी डालकर दुर्ग से बाहर निकले थे।
उत्तर भारत के हिन्दुओं में विगत हजारों सालों से यह परम्परा रही है कि जब किसी शव को शमशान भूमि में ले जाया जाता है तो उसके मुँह में तुलसी दल और गंगाजल रखे जाते हैं तथा गले में तुलसी की कण्ठी धारण करवाई जाती है। इन चित्तौड़ी वीरों ने युद्ध-क्षेत्र में शत्रुओं को मारते हुए प्राणोत्सर्ग करने का निश्चय किया था, इसलिए वे पहले से ही ये सब तैयारियां करके आए थे।
चित्तौड़ी वीरों को दुर्ग के दरवाजे से बाहर निकलते देखकर मुगल सेना ने भी उन पर आक्रमण किया। राजा जयमल मेड़तिया ने अश्व पर चढ़ने का प्रयास किया किंतु टूटी हुई टांग के कारण अश्व पर सवार नहीं हो सका।
इस पर राजा जयमल ने अपने साथी सरदारों से कहा कि मैं पैर टूट जाने के कारण घोड़े पर नहीं चढ़ सकता परन्तु लड़ने की इच्छा तो रह गई है। इस पर जयमल के 23 वर्षीय भतीजे कल्ला राठौड़ ने अपने 60 वर्षीय काका जयमल को अपने कंधे पर बिठा लिया और बोला- अब लड़ने की आकांक्षा पूरी कर लीजिये!
इसके बाद दोनों वीरों ने अपने दोनों हाथों में तलवारें पकड़ीं और शत्रु दल पर टूट पड़े। भारत का इतिहास वीरता की घटनाओं से भरा पड़ा है किंतु इस तरह की घटना इतिहास में कहीं और नहीं हुई।
वीर कल्लाजी राठौड़ और राजा जयमल राठौड़ दो-दो हाथों से तलवार चलाते हुए बढ़े! इसे चित्तौड़ के इतिहास में कल्लाजी राठौड़ चतुर्भुज रूप में अवतरित हुए कहा गया। वे दोनों महावीर, शत्रुओं को मारते हुए अकबर (AKBAR) की सेना के लिए काल बन गए।
जयमल और कल्ला चार हाथों से शत्रुओं का संहार करते हुए आगे बढ़ रहे थे। जिसके कारण उनके सामने पड़ने वाले मुगलों के पैर टिक नहीं पा रहे थे। इन दोनों वीरों ने अद्भुत वीरता का प्रदर्शन करते हुए हनुमान पोल दरवाजे से मुगलों को बाहर खदेड़ दिया।
हनुमान पोल पार करने के कुछ ही समय बाद, भैरव पोल से पहले, राजा जयमल को बंदूक की गोलियां लगीं जिससे वह वीरगति को प्राप्त हुआ। शत्रु को मारते हुए मरने की उसकी साध पूरी हुई। वीरों का वसंत संभवतः इसी को कहते हैं। सुभद्रा कुमारी चौहान ने इन्हीं क्षणों की वंदना करने के लिए वीरों का कैसा हो वसंत कविता लिखी थी-
कह दे अतीत अब मौन त्याग, लंके तुझमें क्यों लगी आग
ऐ कुरुक्षेत्र अब जाग जाग;
बतला अपने अनुभव अनंत वीरों का कैसा हो वसंत।
यह बताना समीचीन होगा कि राजा जयमल महाराणा सांगा का भांजा था। वह अपने ननिहाल के ममत्व का कर्ज चुकाकर इस नश्वर संसार से गया। अकबर (AKBAR) ने फतहनामा-ए-चित्तौड़ में जयमल राठौड़ की तुलना 1000 घुड़सवारों से की थी।
राजा जयमल द्वारा युद्धक्षेत्र में अपने जीवन का वसंत मनाकर वीरगति प्राप्त करने के बाद उसका भतीजा कल्ला राठौड़ और अधिक उग्र हो गया। उसने अकेले ही मुगलों को पीछे खदेड़ना आरम्भ किया। बहुत से मुगल सैनिक उसके पीछे लगे हुए थे।
भैरव पोल दरवाजे तक पहुंचने से कुछ ही पहले एक मुगल सैनिक ने वीर कल्ला राठौड़ का सिर काट दिया। चित्तौड़ अंचल में मान्यता है कि सिर कटने के बाद कल्ला राठौड़ का धड़ दोनों हाथों से तलवार चलाते हुए रनेला नामक स्थान पर पहुंचा, जहाँ पर उनकी पत्नी कृष्णकांता उनकी प्रतीक्षा कर रही थी।
अपने पति के सिर विहीन धड़ को प्रचण्ड रूप धारण करके आया देखकर रानी कृष्णकांता ने वहीं पर चिता जलाई तथा अपने पति के साथ चिता में बैठ गई।
कल्लाजी राठौड़ को मेवाड़ अंचल में लोकदेवता माना गया। संकटग्रस्त लोग आज भी उनकी मनौती मानते हैं। रनेला में जिस स्थान पर कल्लाजी का धड़ भूशायी हुआ था, लोकदेवता कल्लाजी का मुख्य मंदिर है।
चित्तौड़ दुर्ग में राजा जयमल राठौड़ एवं कल्ला राठौड़ की छतरियां बनी हुई हैं। कल्ला राठौड़ की छतरी 4 खंभों की है और जयमल राठौड़ की छतरी छः खंभों की है। किसी कवि ने लिखा है-
‘जठै झड्या जयमल कला छतरी छतरां मोड़।
कमधज कट बणिया कमंद गढ़ थारै चित्तौड़।’
राजस्थान, गुजरात एवं मध्यप्रदेश में कल्ला राठौड़ के लगभग 500 मंदिर हैं। इनमें से 175 मंदिर अकेले बांसवाड़ा जिले में हैं। इन मंदिरों में शनिवार एवं रविवार को बड़ी संख्या में श्रद्धालु एकत्रित होते हैं। मान्यता है कि जो बीमारी कल्लाजी के मंदिर में ठीक नहीं होती वह बीमारी आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी को जयमलजी के मंदिर में ठीक होती है। इनमें से कई मंदिरों में कल्लाजी राठौड़ चतुर्भुज रूप में पूजे जाते हैं।
✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।



