महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनाव – जनता की जीत, ठगों की हार
👉 16 जनवरी 2026 को महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनाव परिणामों ने भारतीय लोकतंत्र की दिशा और दशा को लेकर एक महत्वपूर्ण संकेत दिया है। इन चुनावों से यह स्पष्ट हो गया है कि महाराष्ट्र के मतदाताओं ने राजनीतिक ठगों को धता बताकर अपनी राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक अस्मिता को अक्षुण्ण रखने का संकल्प लिया है। यह केवल एक चुनावी परिणाम नहीं है, बल्कि जनता की चेतना का उद्घोष है कि अब वे जातीय, भाषाई और सांप्रदायिक छलावे में नहीं आने वाले।
राजनीतिक ठगों की रणनीतियाँ
इन चुनावों में कुछ राजनीतिक पार्टियाँ ‘मराठा मानुष’ के नाम पर मतदाताओं के बीच उतरीं। उन्होंने यह भ्रम फैलाने की कोशिश की कि मराठा पहचान ही महाराष्ट्र की असली पहचान है और उसी के नाम पर वोट माँगना उनका अधिकार है।
दूसरी ओर, कुछ राजनीतिक ठगों ने मराठी भाषा को चुनावी हथियार बनाया। उन्होंने यह प्रचार किया कि मराठी भाषा की रक्षा केवल उनके हाथों में है। मराठियों से बाहर के लोग चाहे वे महाराष्ट्र की जनता को सुखी बनाने के लिए किसी भी क्षेत्र में काम क्यों न कर रहे हों, उन्हें मारा-पीटा जाएगा और अपना राजनीतिक उल्लू सीधा किया जाएगा।
कुछ छुटभैये नेता जातीय समीकरणों के बल पर मतदाताओं को ठगना चाहते थे। उनका मानना था कि यदि वे जातीय आधार पर वोटों का ध्रुवीकरण कर लें, तो सत्ता तक पहुँच आसान हो जाएगी। वहीं, कुछ षड्यंत्रकारी राजनीतिक ठग हमेशा की तरह साम्प्रदायिक एकता का नारा देकर विशेषकर मुस्लिम मतदाताओं के वोटों का ध्रुवीकरण करना चाहते थे।
कुछ राजनीतिक ठग विगत कई सालों से जातीय जनगणना करवाने के नाम पर जनता को भ्रमित करके उनसे वोट पाने की आस लगाए बैठे थे।
मतदाताओं की परिपक्वता
✨ महाराष्ट्र के मतदाताओं ने इन सभी चालों को न केवल समझा, बल्कि उन्हें पूरी तरह नकार दिया। जनता ने यह दिखा दिया कि उनकी प्राथमिकता केवल विकास, सुशासन और राष्ट्रीय-सांस्कृतिक अस्मिता है।
महाराष्ट्र के मतदाताओं ने यह साबित कर दिया कि वे अब जातीय, क्षेत्रीय, भाषाई एवं क्षुद्र राजीतिक चालों में फंसने वाले नहीं हैं। वे जान चुके हैं कि जातीय समीकरण, साम्प्रदायिक धु्रवीकरण या भाषाई पहचान से न तो उनके नगरों का विकास होगा और न ही उनकी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित होगा। उन्होंने राजनीतिक ठगों को स्पष्ट संदेश दिया है कि देशवासियों की राष्ट्रीय पहचान और सांस्कृतिक शक्ति ही मतदाताओं के वर्तमान एवं भविष्य को सुरक्षित बना सकती है।
महाराष्ट्र के मतदाताओं ने इन राजनीतिक ठगों को एक बार फिर बता दिया है कि आपने हमें बहुत ठग लिया, अब नहीं। लोकतंत्र में असली ताकत जनता के पास है और यदि जनता ठान ले तो किसी भी प्रकार के राजनीतिक छलावे को समाप्त कर सकती है।
हरियाणा, बिहार और उड़ीसा के उदाहरण
महाराष्ट्र से पहले हरियाणा, बिहार और उड़ीसा के मतदाता भी यही कार्य कर चुके हैं। हरियाणा में जातीय राजनीति लंबे समय से चुनावों पर हावी रही लेकिन पिछले विधान सभी चुनवों में वहाँ के मतदाताओं ने जातीय समीकरणों को दरकिनार करके विकास और सुशासन को प्राथमिकता दी। राष्ट्रीय अस्मिता और भारत की सांस्कृतिक पहचान को प्रमुखता दी।
इसी प्रकार बिहार में भी लंबे समय तक जातीय और साम्प्रदायिक राजनीति का बोलबाला रहा। परंतु वहाँ के मतदाताओं ने भी विगत विधानसभा चुनावों में यह दिखा दिया कि वे अब केवल जातीय पहचान के आधार पर वोट नहीं देंगे।
उड़ीसा के विगत विधान सभा चुनावों में राजनीतिक ठगों को सत्ता के सिंहासनों से दूर कर दिया गया। राजनीतिक धूर्त उड़ीसा के चुनावों में जातीय जनगणना का नारा वोटों में नहीं बदल सके।
इन तीनों राज्यों के उदाहरण से यह स्पष्ट होता है कि भारतीय मतदाता अब परिपक्व हो चुके हैं। वे जानते हैं कि लोकतंत्र का असली उद्देश्य जनता की भलाई है, न कि कुछ नेताओं की सत्ता की भूख मिटाना।
👉 हरियाणा ने तोड़ाक – ठगों को डोला! 👉 बिहार ने फाड़ाक – ठगों का झोला!
पश्चिम बंगाल की ओर संकेत
अब यही कार्य पश्चिम बंगाल में होने जा रहा है। वहाँ भी लंबे समय से राजनीतिक ठगों ने भाषाई, क्षेत्रीय, सांप्रदायिक और जातीय समीकरणों का सहारा लेकर सत्ता पर अधिकार कर रखा है। लेकिन बदलते समय के साथ बंगाल के मतदाता भी जागरूक हो रहे हैं। वे समझ रहे हैं कि यदि वे अपनी राष्ट्रीय और सांस्कृतिक अस्मिता को सुरक्षित रखना चाहते हैं, तो उन्हें राजनीतिक ठगों को सत्ता से बाहर करना होगा। शराब की एक बोतल में लोकतंत्र को गिरवी रखने से उनके बच्चों का भविष्य नष्ट हो जाएगा।
राष्ट्रीय अस्मिता और सांस्कृतिक चेतना
इन चुनावों का सबसे बड़ा संदेश यही है कि भारतीय जनता अपनी राष्ट्रीय और सांस्कृतिक अस्मिता को लेकर सजग है। चाहे वह महाराष्ट्र हो, हरियाणा हो, बिहार हो या पश्चिम बंगालकृहर जगह जनता यह दिखा रही है कि उनकी प्राथमिकता केवल विकास और अस्मिता की रक्षा है।
राष्ट्रीय अस्मिता का अर्थ केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा भी है। जब जनता जातीय और भाषाई ठगों को नकारती है, तो वह यह संदेश देती है कि भारतीय संस्कृति की विविधता ही उसकी असली ताकत है।
लोकतंत्र की मजबूती
महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनावों ने यह भी साबित किया है कि भारतीय लोकतंत्र अब और मजबूत हो रहा है। जब जनता राजनीतिक ठगों को पहचानकर उन्हें सत्ता से बाहर करती है, तो लोकतंत्र की जड़ें और गहरी होती हैं। यह लोकतंत्र की परिपक्वता का प्रमाण है कि जनता अब केवल वादों और नारों से प्रभावित नहीं होती, बल्कि ठोस काम और ईमानदार नेतृत्व को महत्व देती है।
भविष्य की दिशा
यदि यह प्रवृत्ति पूरे देश में फैलती है, तो आने वाले समय में भारतीय राजनीति का स्वरूप पूरी तरह बदल जाएगा। जातीय और सांप्रदायिक राजनीति का अंत होगा और विकास, सुशासन तथा सांस्कृतिक अस्मिता ही चुनावी मुद्दे बनेंगे। इससे न केवल लोकतंत्र मजबूत होगा, बल्कि देश की एकता और अखंडता भी सुदृढ़ होगी।
महाराष्ट्र की जनता ने अपनी राष्ट्रीय एवं सास्कृतिक अस्मिता को पहचान कर अपना जो निर्णय सुनाया है, उससे स्पष्ट है कि महाराष्ट्र की जनता ने पालघर के साधुओं की हत्या का बदला ले लिया है।
महाराष्ट्र के कुछ जगत् प्रसिद्ध राजनीतिक धूर्तों ने पालघर के निर्दोष साधुओं को दिन दहाड़े कैमरे के सामने, पुलिस और गुण्डों के हाथों मरवाया था, वस्तुतः वह भारत की राष्ट्रीय अस्मिता और सांस्कृतिक पहचान को नष्ट करके साधुओं की चिताओं पर राजनीतिक रोटियां सेकने की घिनौनी साजिश थी।
महाराष्ट्र के मतदाताओं के संदेश
न केवल विगत विधान सभा चुनावों में अपितु हाल ही में हुए स्थानीय निकायों के चुनावों में महाराष्ट्र की जनता ने उन हत्यारों के नाम स्पष्ट संदेश छोड़े हैं-
👉 जात-पात का खेल नहीं चलेगा, भाषा का छल नहीं चलेगा, धर्मनिपेक्षता के नाम पर सांप्रदायिक राजनीति नहीं चलेगी!
👉 विकास चाहिए, ठगी नहीं; सांस्कृतिक अस्मिता चाहिए, धर्मनिरपेक्षता का छल नहीं!
👉 महाराष्ट्र के मतदाता जगे हैं और पालघर के हत्यारे भगे हैं।
अब पश्चिम बंगाल की बारी है। वहाँ भी जनता राजनीतिक धूर्तों से निबटने को तैयार हैकृ
👉 बंगाली उठेंगे तो राजनीतिक ठग भगेंगे।
👉 हिन्दू संस्कृति ही भारत का धर्म है, विकास की लेखनी ही राष्ट्रीय कर्म है।
-डॉ. मोहनलाल गुप्ता



