अपराजितपृच्छा में महिषासुरमर्दिनी और सप्तमातृकाओं का स्वरूप भारतीय संस्कृति में शक्ति पूजा की दार्शनिक पृष्ठभूमि को स्पष्ट करता है।
भारतीय संस्कृति में शक्ति पूजा की अवधारणा पुराणों के उन आख्यानों से आई हैै जिनमें देवताओं की माता अदिति के विविध स्वरूपों का वर्णन किया गया है। हालांकि अदिति का सर्वप्रथम उल्लेख वेदों में हुआ है किंतु अदिति का मानवीकरण पुराणों में आकर संभव हो सका। अपराजितपृच्छा में अदिति का यह रूप महिषासुरमर्दिनी और सप्तमातृकाओं के रूप में स्पष्ट हुआ है तथा उन्हें दार्शनिक आधार भी प्रदान करता है।
अपराजितपृच्छा के अनुसार देवी-प्रतिमा बनाना केवल कला नहीं, अपितु एक आध्यात्मिक साधना है। इस ग्रंथ में महिषासुरमर्दिनी और सप्तमातृकाओं के स्वरूप का जो वर्णन मिलता है, वह अद्भुत है।
अपराजितपृच्छा में महिषासुरमर्दिनी और सप्तमातृकाओं का स्वरूप
1. महिषासुरमर्दिनी: शक्ति का पराक्रमी स्वरूप
अपराजितपृच्छा में महिषासुरमर्दिनी के अष्टादशभुजा (18 हाथ) और विंशतिभुजा (20 हाथ) रूपों को विशेष महत्व दिया गया है। ग्रंथ के अनुसार इनके मुख्य लक्षण निम्नलिखित हैं:
- मुद्रा: देवी का दाहिना पैर सिंह पर और बायां पैर महिषासुर (भैंसे) की पीठ पर स्थित होना चाहिए। इसे प्रत्यालीढ़ मुद्रा कहा जाता है, जो युद्ध में विजय का प्रतीक है।
- शस्त्र विधान: उनके हाथों में त्रिशूल, खड्ग (तलवार), चक्र, बाण, शक्ति, वज्र, और परशु जैसे मारक अस्त्र होते हैं। वहीं दूसरे हाथों में शंख, पाश, अंकुश और ढाल जैसे रक्षात्मक और प्रतीकात्मक आयुध होते हैं।
- महिष का स्वरूप: महिष के कटे हुए गले से मनुष्य रूपी असुर बाहर निकलता हुआ दिखाया जाता है, जिसे देवी का त्रिशूल भेद रहा होता है।
- भाव: उनके चेहरे पर उग्रता के स्थान पर एक दिव्य शांति और मंद मुस्कान होनी चाहिए, जो यह दर्शाती है कि बुराई का विनाश उनके लिए एक सहज खेल है।
2. सप्तमातृका: सात दिव्य माताएं
सप्तमातृकाओं का वर्णन करते समय अपराजितपृच्छा उनके वाहन, आयुध और ध्वज पर विशेष ध्यान देता है। ये सात शक्तियां अपने संबंधित देवताओं की स्त्री ऊर्जा (Consorts) मानी जाती हैं:
| माता का नाम | वाहन/आसन | मुख्य आयुध एवं विशेषता |
| ब्रह्माणी | हंस | अक्षमाला (माला) और कमंडलु धारण करती हैं। इनके चार मुख होते हैं। |
| माहेश्वरी | वृषभ (बैल) | त्रिशूल और कपाल धारण करती हैं। जटाजूट में चंद्रमा सुशोभित होता है। |
| कौमारी | मयूर (मोर) | हाथ में शक्ति (भाला) धारण करती हैं। यह कार्तिकेय की शक्ति हैं। |
| वैष्णवी | गरुड़ | शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करती हैं। वनमाला से अलंकृत होती हैं। |
| वाराही | वराह (सूअर) | इनका मुख वराह का होता है। ये दंड या हल धारण करती हैं। |
| इंद्राणी | ऐरावत हाथी | हाथ में वज्र और अंकुश होता है। इनके शरीर पर सहस्त्र नेत्र (हजार आँखें) होते हैं। |
| चामुंडा | प्रेत या शव | ये कृशकाय (दुबली) और विकराल रूप वाली होती हैं। मुंडमाला धारण करती हैं। |
अपराजितपृच्छा में शिल्प विधान की मुख्य बातें
अपराजितपृच्छा स्पष्ट निर्देश देता है कि:
- स्थान: सप्तमातृकाओं की प्रतिमाएं हमेशा एक क्रम में होनी चाहिए, जिनके एक छोर पर वीरभद्र और दूसरे छोर पर गणेश का होना अनिवार्य है।
- अलंकरण: सभी देवियां दिव्य आभूषणों और करंड मुकुट से सुसज्जित होनी चाहिए (चामुंडा को छोड़कर)।
- वात्सल्य: चामुंडा के अतिरिक्त अन्य सभी माताओं की गोद में अक्सर एक बालक दिखाया जाता है, जो उनके सृजन और पोषण के पक्ष को दर्शाता है।
ये लक्षण आज भी भारत के मध्यकालीन मंदिरों (जैसे एलोरा की गुफाएं या ओसियां के मंदिर) में प्रत्यक्ष देखे जा सकते हैं।
अपराजितपृच्छा में दार्शनिक रहस्य
अपराजितपृच्छा में प्रतिमाओं के बाह्य स्वरूप के साथ-साथ उनके भीतर छिपे दार्शनिक रहस्यों और यंत्र-विज्ञान पर गहरा प्रकाश डाला गया है। यहाँ शिल्प और दर्शन के उस सूक्ष्म मिलन को समझा जा सकता है:
1. प्रतिमाओं के पीछे का दार्शनिक रहस्य
देवी के आयुध और मुद्राएं केवल सजावट नहीं, अपितु मनुष्य की चेतना के विभिन्न स्तरों के प्रतीक हैं:
- अंकुश और पाश: देवी के हाथों में पाश (रस्सी) हमारी इंद्रियों की आसक्तियों और वासनाओं का प्रतीक है, जबकि अंकुश उन पर नियंत्रण पाने के विवेक का।
- महिषासुर वध का दर्शन: यहाँ महिष (भैंसा) तामसिक प्रवृत्तियों, अज्ञान और आलस्य का प्रतीक है। देवी द्वारा उसका वध करना इस बात का संकेत है कि ज्ञान और शक्ति के उदय से ही हमारे भीतर के अंधकार का नाश संभव है।
- सप्तमातृकाओं का मनोविज्ञान: ये सात माताएं मनुष्य की सात मानसिक वृत्तियों का भी प्रतिनिधित्व करती हैं। उदाहरण के लिए, चामुंडा क्रोध और संहार का रूप हैं, जो हमें सिखाती हैं कि नकारात्मकता को कैसे जड़ से मिटाया जाए।
2. यंत्र-विज्ञान: मंदिर की ऊर्जा देह
अपराजितपृच्छा के अनुसार, मंदिर का निर्माण यंत्र के आधार पर होता है। यंत्र को देवी की सूक्ष्म देह माना जाता है:
- बिंदु और त्रिकोण: इस ग्रंथ में बताया गया है कि देवी मंदिर के गर्भगृह के नीचे श्रीचक्र या विशिष्ट यंत्रों की स्थापना की जानी चाहिए। यंत्र का केंद्रीय बिंदु शिव और शक्ति के मिलन का स्थान है।
- वास्तु-पुरुष मंडल: मंदिर की भूमि को एक जीवित इकाई माना जाता है। शक्ति मंदिरों में त्रिकोण (Triangle) का विशेष महत्व है, जो शक्ति की क्रियाशील ऊर्जा को ऊपर की ओर प्रवाहित करता है।
- बीज मंत्रों का अंकन: शिल्पशास्त्र के अनुसार, प्रतिमा के हृदय या पीठ के पीछे विशिष्ट बीज मंत्रों (जैसे ह्रीं, क्लीं) को उत्कीर्ण करने का विधान है, जिससे पत्थर की मूर्ति जीवंत होकर ऊर्जा विकीर्ण करने लगती है।
3. तांत्रिक पक्ष: परा और अपरा शक्ति
ग्रंथ में शक्ति के दो रूपों की चर्चा है:
- अपरा शक्ति: जो मूर्तियों और प्रतीकों में दिखाई देती है (सगुण रूप)।
- परा शक्ति: जो निराकार है और केवल यंत्र या गहरे ध्यान के माध्यम से अनुभव की जा सकती है।
अपराजितपृच्छा यह सुनिश्चित करता है कि एक साधारण भक्त अपरा (प्रतिमा) की पूजा करके धीरे-धीरे परा (ब्रह्मांडीय ऊर्जा) के रहस्य को समझ सके।
इस ग्रंथ की सबसे बड़ी देन यह है कि इसने कला (Art) को अध्यात्म (Spirituality) एवं दर्शन (Philosophy) से पूरी तरह जोड़ दिया। इस ग्रंथ के अनुसार बिना यंत्र के मूर्ति अधूरी है और बिना दर्शन के शिल्प केवल पत्थर।



