जिस अकबर को पश्चिमी इतिहासकार तथा भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू “भारत का महान् राजा” और अकबर दी ग्रेट बताते नहीं थकते हैं, उसी अकबर ने चित्तौड़ दुर्ग (CHITTOR FORT) में कत्लेआम करवाकर तीस हजार निरपराध हिन्दुओं को मौत के घाट उतार दिया।
महान् कहे जाने वाले मुगल बादशाह अकबर (AKBAR THE GREAT) के समकालीन एवं पश्चवर्ती हिन्दू तथा मुसलमान लेखकों ने अकबर के चित्तौड़ घेरे (Siege of Chittor) के समय हुए युद्ध का वर्णन अपने-अपने दृष्टिकोण से किया है।
अकबर (AKBAR) का दरबारी लेखक अबुल फजल (ABUL FAZAL) लिखता है- ‘ऐसी जंग आज से पहले ना किसी ने देखी और ना सुनी। इन चार महीनों में हजारों वाक्य लिखने लायक थे पर मैं सब-कुछ बयान नहीं कर सकता।’
अबुल फजल ने दुर्गरक्षकों द्वारा केसरिया किए जाने का उल्लेख नहीं किया है। उसने सारा विवरण इस प्रकार लिखा है जिससे ऐसा लगे कि राजपूतों की ओर से कोई प्रतिरोध नहीं किया गया और बादशाह की सेना ने उन्हें बड़ी आसानी से मार दिया। चित्तौड़ दुर्ग में कत्लेआम का यह विवरण अबुल फजल की रचना में स्पष्ट झलकता है।
अबुल फजल लिखता है कि जयमल के मारे जाने पर सब राजपूतों का उत्साह भंग हो गया था और टूटी हुई प्राचीर के पास कोई राजपूत सैनिक दिखाई नहीं देता था। तो भी गाजियों अर्थात् शाही सैनिकों को सब ओर से एकत्र करके सावधानी बरती गई और उन्हें आदेश दिया गया कि प्रातःकाल दुर्ग में प्रवेश किया जाए।
बादशाह के आदेशानुसार प्रातःकाल होने पर योद्धाओं ने दुर्ग में प्रवेश करके पराजित लोगों को मारना और बांधना आरम्भ कर दिया। राजपूतों ने प्राण-प्रण से युद्ध किया और वीरगति को प्राप्त हो गए। अकबर (AKBAR) ने आदेश दिया कि साबात के सामने से मजबूत हाथी दुर्ग में लाए जाएं। इस पर मधुकर, जंगिया, सब्दालिया और कादिरा नामक कई हाथी मंगवाए गए।
अबुल फजल (ABUL FAZAL) लिखता है कि महान् मुगल बादशाह अकबर (AKBAR) स्वयं भी एक विशाल हाथी पर सवार हुआ। उसके साथ कई हजार प्यादे थे। ईसरदार चौहान ने मधुकर नामक हाथी की सूंड पर खंडार मारा और एक हाथ से उसका दांत पकड़कर कहा मेरे इस कार्य की खबर अकबर को दे देना।
एक राजपूत ने जंगिया नामक हाथी की सूंड अपनी तलवार से काट डाली। फिर भी मरने से पहले वह हाथी खूब लड़ा। उसने 30 आदमियों को पहले ही आहत कर दिया था, अब 15 आदमियों को और मार डाला। कादिर नामक एक हाथी इस शोर को सुनकर दुर्ग में घुस गया और एक तंग मार्ग पर उसने कितने ही लोगों को कुचल डाला।
उस समय प्राचीर पर खड़ा हुआ बादशाह इस दृश्य को देख रहा था। जब सब्दालिया नामक हाथी दुर्ग में घुसा तो एक राजपूत ने झपटकर उसकी सूण्ड पर घाव कर दिया परंतु हाथी ने उसको अपनी सूंड में पकड़कर मार डाला। यह भी अकबर ने अपनी आंखों से देखा।
आरंभ में केवल 50 हाथी ही दुर्ग में घुसाए गए थे। फिर इनकी संख्या 300 कर दी गई। इन्होंने सब राजपूतों को कुचल डाला। चित्तौड़ दुर्ग में कत्लेआम का यह दृश्य अत्यंत भयावह था।
अबुल फजल लिखता है कि दुर्ग में लड़ने वाले राजपूतों की संख्या 8 हजार थी परंतु चालीस हजार किसान इनकी सेवा करने आ पहुंचे थे। महान् मुगल बादशाह ने इन लोगों से निबटने के लिए दुर्ग में प्रवेश किया। इस पर बहुत से दुर्ग-रक्षक तथा किसान मंदिरों में घुस गए। उन्होंने समझा कि मूर्तियां उनके प्राण बचा लेंगी।
अबुल फजल ने जिन्हें किसान लिखा है, वस्तुतः उनमें दुर्ग के आसपास रहने वाले भील एवं विभिन्न जातियों के लोग सम्मिलित रहे होंगे। चित्तौड़ दुर्ग में कत्लेआम में इनकी भी भागीदारी दर्ज हुई।
अबुल फजल लिखता है कि कुछ लोग अपने घर में ही अपने अंत की प्रतीक्षा करते रहे। फिर कुछ लोग अपनी तलवारें लेकर मुसलमान सैनिकों का सामना करने के लिए आए और मारे गए। मंदिरों में से भी आदमी निकले और गाजियों ने उनको भी मार डाला।
अबुल फजल लिखता है कि प्रातःकाल से मध्यान्ह तक लगभग तीन हजार सैनिक मारे गए। जब ई.1303 में सुल्तान अलाउद्दीन ने छः मास और 7 दिन के घेरे के बाद यह दुर्ग जीता था तब उसने कृषकों को नहीं मारा था। क्योंकि कृषक उस लड़ाई में सम्मिलित नहीं हुए थे परंतु इस अवसर पर कृषकों ने बड़ा जोश और सक्रियता दिखाई। इसलिए महान् मुगल बादशाह ने उन्हें मारने के आदेश दिए।
इस पर कृषकों ने अकबर के पास जाकर इस युद्ध में अपनी सक्रियता के बारे में कई कारण बताए परंतु अकबर ने उनके तर्क स्वीकार नहीं किए तथा उसने अपनी सेना को आदेश दिए कि दुर्ग में मौजूद प्रत्येक कृषक को मार दिया जाए। इस पर शहंशाह की सेना ने लगभग 30 हजार मनुष्यों को मार डाला तथा लगभग इतने ही मनुष्यों को बंदी बना लिया। चित्तौड़ दुर्ग में कत्लेआम की यह घटना महान कहे जाने वाले अकबर (AKBAR THE GREAT) के इतिहास को कलंकित करने वाली है।
अबुल फजल लिखता है कि एक आश्चर्यजनक बात यह हुई कि महान् मुगल बादशाह अकबर ने अफागन बंदूकचियों की दुर्ग में बड़ी तलाश करवाई क्योंकि अकबर (AKBAR) उनसे बड़ा तंग था किंतु बहुत तलाश करने पर भी उन बंदूकचियों का पता नहीं चला।
अंत में ज्ञात हुआ कि वे लोग बादशाह की सेना को भुलावे में डालकर दुर्ग से सुरक्षित निकल गए। जब बादशाह की सेना दुर्ग में लूटमार करने में लगी थी, तब ये अफगान बंदूकची, जिनकी संख्या लगभग 1000 थी, अपनी स्त्रियों एवं बच्चों को अपनी पगड़ियों से बांध कर ले गए। बादशाह के सैनिकों को पता नहीं चल सका कि वे कौन लोग हैं!
क्योंकि महान् मुगल बादशाह के सैनिकों ने समझा कि ये लोग शाही सेना के सैनिक हैं तथा दुर्ग के कैदियों को पकड़कर ले जा रहे हैं। इस प्रकार उन अफगान बंदूकचियों की युक्ति सफल हो गई और वे अकबर की सेना की आंखों में धूल झौंककर दुर्ग से बाहर चले गए।
अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि उस दिन चित्तौड़ दुर्ग में कत्लेआम इतना भयानक था कि ऐसा कोई घर एवं मार्ग नहीं था जहाँ पर मुर्दों के ढेर नहीं लगे हों परंतु तीन स्थानों पर मारे जाने वालों की संख्या बहुत अधिक थी।
दुर्ग में महाराणा उदयसिंह के महल में बहुत से राजपूत इकट्ठे हो गए थे। वह दो-दो, तीन-तीन करके बाहर निकले और उन्होंने अपने प्राणों को रण में न्यौछावर कर दिया। बहुत से राजपूत महादेव के मंदिर में एकत्रित हो गए थे। उन्होंने रामपुर दरवाजे के बाहर अपने शरीर त्याग दिए।
उस दिन शाही सेना में जरा बलीकूची के अतिरिक्त और कोई नहीं मारा गया। महान् मुगल बादशाह (Akbar) ने अल्लाह को धन्यवाद दिया और दोपहर के बाद वह अपने शिविर में चला गया।
राहुल सांकृत्यायन (Rahul Sankrityayan) ने लिखा है कि किले में प्रवेश करते समय आठ हजार राजपूतों ने बड़े महंगे दामों पर अपने प्राणों को बेचा। अकबर को इस वीरता का सम्मान करना चाहिए था किंतु वह चूक गया। उसने चित्तौड़ दुर्ग में कत्लेआम का आदेश दिया। तीस हजार आदमियों ने प्राण गंवाए। कहा जाता है कि मरे हुए लोगों के जनेऊ को तौला गया तो उनका वजन 47 मन हुआ। इस प्रकार फरवरी 1568 में अकबर ने सदा के लिए निर्जन चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया।
मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी (Mulla Abdul Qadir Badayun ) लिखता है कि दोपहर बाद शहंशाह ने थैला भराई बंद करने का आदेश दिया और मुकाम पर लौट गया। थैला भराई से मुल्ला बदायूंनी का आशय किस चीज से है, इसके बारे में ठीक-ठीक नहीं कहा जा सकता किंतु ऐसा लगता है कि जो शव किले में बिखरे पड़े थे उन्हें थैलों में बंद करके वहाँ से हटाया गया था।
अकबर (AKBAR) वहाँ पर वह तीन दिन रहा तथा विजय के पत्र लिखे और अपनी विजय के समाचार सभी दिशाओं में भेज दिए। युद्ध समाप्त होने के बाद तीन अकबर दिनों तक चित्तौड़ दुर्ग के सैनिक शिविर में रहा। उसने चित्तौड़ दुर्ग अब्दुल मजीद आसिफ खाँ के सुपुर्द कर दिया तथा चित्तौड़ नामक नवीन सरकार का गठन करके आसफ खाँ को इस सरकार का सूबेदार बना दिया।
✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।



