पिंगल भाषा का नाम ऋषि पिंगल के नाम पर पड़ा है, जिन्होंने छंदों की रचना की थी। पिंगल भाषा ब्रजभाषा का साहित्यिक रूप है, जिसमें राजस्थानी का पुट भी मिलता है। पिंगल को ब्रजभाषा का पुराना स्वरूप भी कहा जाता है। पिंगल भाषा मुख्यतः ‘छंदशास्त्र’ और ‘वीरगाथा साहित्य’ से जुड़ी रही है।
📚पिंगल भाषा की विशेषताएँ
पिंगल भाषा का मुख्य आधार ही ‘छंद’ है। पिंगल को ‘छंदों की जननी भी कहा जाता है। जहाँ डिंगल में ‘कवित्त’ और ‘दुहा’ की प्रधानता थी, वहीं पिंगल भाषा अपनी कोमलता और गेयता (गाने योग्य) के लिए जानी जाती है।
📖पिंगल भाषा का छंद विधान
पिंगल में प्रयुक्त होने वाले प्रमुख छंद विधानों का विवरण नीचे दिया गया है-
📌 1. मात्रिक छंद (Matrik Chhand)
पिंगल साहित्य में मात्रिक छंदों का सबसे अधिक प्रयोग हुआ है, क्योंकि ये संगीत और लय के अनुकूल होते हैं।
- दोहा: यह पिंगल का प्राण है। इसमें 13 और 11 मात्राओं का विश्राम (यति) होता है।
- सोरठा: यह दोहे का उल्टा होता है (11 और 13 मात्राएँ)। पिंगल के नीति काव्यों में इसका प्रयोग बहुत मिलता है।
- चौपाई: 16 मात्राओं वाला यह छंद भक्तिकालीन पिंगल रचनाओं (जैसे तुलसीदास की ब्रज रचनाओं) में प्रमुख रहा है।
- रोला: यह 24 मात्राओं का छंद है। इसे पिंगल कवि अक्सर ‘कुंडलिया’ बनाने के लिए प्रयोग करते थे।
- छप्पय: यह एक संयुक्त छंद है जो रोला और उल्लाला के मेल से बनता है। पिंगल के वीर और स्तुति काव्यों में इसका बहुत सम्मान था।
📌 2. वर्णिक छंद (Varnik Chhand)
रीतिकाल के पिंगल कवियों ने विद्वत्ता प्रदर्शन के लिए वर्णिक छंदों का सहारा लिया, जिनमें अक्षरों की गणना निश्चित होती है।
- सवैया: पिंगल भाषा का सबसे प्रिय और सुंदर छंद। इसमें 22 से 26 वर्ण होते हैं। रसखान और पद्माकर के सवैये पिंगल शैली के शिखर माने जाते हैं।
- कवित्त (मनहरण): इसमें 31 वर्ण होते हैं। ओज और श्रृंगार दोनों रसों के लिए पिंगल कवियों ने इसका भरपूर प्रयोग किया है।
- मालिनी: 15 वर्णों का यह छंद अपनी कोमल लय के लिए पिंगल के श्रृंगारिक पदों में प्रयुक्त होता था।
📌 विशिष्ट ‘मिश्रित’ छंद
पिंगल ग्रंथों में कुछ ऐसे छंद मिलते हैं जो दो अलग-अलग छंदों को जोड़कर बनाए जाते हैं, जिससे काव्य में रोचकता बढ़ जाती है-
- कुंडलिया: यह दोहा और रोला के संयोग से बनता है। गिरधर कविराय की कुंडलियाँ पिंगल अर्थात् ब्रज साहित्य में अत्यंत लोकप्रिय हैं।
- बरवै: 12 और 7 मात्राओं का यह छंद अत्यंत मधुर माना जाता है (जैसे जैसे तुलसीदास कृत बरवै रामायण और रहीम कृत बरवै नायिका भेद)।
📌 छंद विधान की संरचना
| छंद का नाम | प्रकार | विशेषता |
| सवैया | वर्णिक | पिंगल की सुकुमारता और संगीत के लिए सर्वश्रेष्ठ। |
| छप्पय | मात्रिक (विषम) | वीर रस और दरबारी प्रशंसा के लिए उपयुक्त। |
| दोहा | मात्रिक | गागर में सागर भरने के लिए प्रसिद्ध। |
| कवित्त | वर्णिक | दरबारी काव्य की शान और लयबद्ध पठन। |
📌 पिंगल छंदों का वैशिष्ट्य
पिंगल कवियों ने ‘यति’ (विराम) और ‘गति’ (प्रवाह) पर विशेष ध्यान दिया। डिंगल के छंदों में जहाँ ‘झंकार’ होती थी, वहीं पिंगल के छंदों में ‘गुंजन’ और ‘माधुर्य’ होता था। यही कारण है कि पिंगल भाषा छंदशास्त्र (Prosody) की जननी मानी गई।
📌छन्दःशास्त्र (छंदःसूत्रम्) ही पिंगल शास्त्र
पिंगल भाषा अथवा साहित्यिक ब्रजभाषा और छन्दःशास्त्र एक-दूसरे के इतने पूरक हैं कि कई बार छन्दःशास्त्र को ही पिंगल शास्त्र कह दिया जाता है। इसकी उत्पत्ति ऋषि पिंगल के छन्दःसूत्र से मानी जाती है, जिसे बाद में मध्यकालीन कवियों ने ब्रजभाषा (पिंगल) में रूपांतरित और पल्लवित किया।
⚔️ पिंगल (छंद:शास्त्र) के प्रमुख काव्य-शास्त्र ग्रंथ
पिंगल शब्द का प्रयोग मुख्य रूप से ‘छंदशास्त्र’ के लिए होता है, इस विषय के सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ ये हैं:
- प्राकृत पैंगलम (सूत्रधार ग्रंथ): यह 14वीं शताब्दी का ग्रंथ है। इसमें पिंगल (ब्रज) और अपभ्रंश के छंदों का विस्तार से वर्णन है। यह पिंगल साहित्य का आधार स्तंभ माना जाता है तथा पिंगल साहित्य का सबसे प्रामाणिक ग्रंथ है। इसमें अपभ्रंश और पुरानी ब्रज (पिंगल) के छंदों का संग्रह भी दिया गया है।
- पिंगल शिरोमणि (कुशललाभ): 16वीं शताब्दी का यह ग्रंथ छंदों के लक्षणों को पिंगल भाषा में विस्तार से समझाता है। यह राजस्थानी और पिंगल के मिश्रण वाली एक महत्वपूर्ण रचना है जो छंद विधान को समझाती है।
- छंदमाला (केशवदास): रीतिकालीन कवि केशवदास द्वारा रचित इस ग्रंथ में पिंगल के विभिन्न छंदों का शास्त्रीय परिचय दिया है। केशवदास ने विभिन्न छंदों के लक्षण और उदाहरण भी दिए हैं।
- वृत्त विचार (सुखदेव मिश्र): पिंगल भाषा के छंदों के शास्त्रीय विवेचन के लिए यह एक उच्च कोटि का ग्रंथ है।
- छंदोर्णव पिंगल (भिखारीदास): यह पिंगल भाषा और उसके छंद विधान पर लिखा गया महत्वपूर्ण ग्रंथ है।
- छंद प्रकाश (कवि भान): यह ग्रंथ भी पिंगल शास्त्र को समर्पित है।
- काव्य निर्णय (भिखारीदास): ब्रजभाषा (पिंगल) के काव्य गुणों और दोषों पर विस्तृत चर्चा।
- भाषा भूषण (महाराज जसवंत सिंह): अलंकार विवेचन का मुख्य ग्रंथ।
✍️ पिंगल (ब्रजभाषा) के प्रमुख काव्य ग्रंथ
मध्यकाल (रीतिकाल) में पिंगल शब्द ‘ साहित्यिक ब्रजभाषा ‘ का पर्याय बन गया। इस दौरान कई काव्य ग्रंथ लिखे गए-
- सुदामा चरित (नरोत्तमदास): यह पिंगल/ब्रजभाषा की अत्यंत कोमल और प्रसिद्ध रचना है।
- पद्माभरण (पद्माकर): काव्यशास्त्र और पिंगल शैली का उत्कृष्ट उदाहरण।
- कविप्रिया और रसिकप्रिया (केशवदास): यद्यपि य ये अलंकार और रसविवेचन के ग्रंथ हैं तथापि इनकी भाषा शुद्ध साहित्यिक पिंगल/ब्रज है।
- साहित्य लहरी (सूरदास): छंदों के ‘दृष्टकूट’ पदों के कारण इसे पिंगल की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है।
🌍 डिंगल और पिंगल में अंतर
डिंगल’ और पिंगल में सूक्ष्म अंतर है। पिंगल भाषा को डिंगल भाषा (मारवाड़ी मिश्रित) के विपरीत माना जाता है। जहाँ डिंगल कठोर और ओजपूर्ण है, वहीं पिंगल कोमलकांत पदावली और श्रृंगार रस के लिए अधिक उपयुक्त मानी जाती है। मारवाड़ नरेश मानसिंह राठौड़, किशनगढ़ नरेश रूपसिंह राठौड़ तथा मेड़ता की राजकुमारी मीराबाई आदि ने स्वयं डिंगल भाषी होते हुए भी पिंगल अथवा ब्रजभाषा में भक्ति रचनाएं लिखीं क्योंकि भक्ति रचनाओं के लिए डिंगल भाषा के स्थान पर पिंगल का प्रयोग ही उचित था।
🎭 डिंगल और पिंगल का साहित्यिक उपयोग
- पिंगल: ब्रजभाषा की प्रधानता + कोमल शब्दावली (श्रृंगार, भक्ति और छंदशास्त्र के लिए)।
- डिंगल: राजस्थानी शब्दावली की प्रधानता + कठोर वर्ण (युद्धों के लिए)।
📖 डिंगल और पिंगल का मिश्रण
पृथ्वीराज रासो को विद्वान डिंगल और पिंगल का मिश्रण मानते हैं। पृथ्वीराज रासो की तरह विजयपाल रासो, हम्मीर रासो तथा खुमाण रासो भी डिंगल के ग्रंथ माने जाते हैं किंतु इनमें भी पिंगल भाषा का मिश्रण हुआ है-
🔑 वीरगाथा एवं दरबारी साहित्य (पिंगल शैली)
वीरगाथा काल में चारण कवियों ने जब युद्धों का ओजस्वी वर्णन ब्रज मिश्रित भाषा में किया, तो उसे पिंगल कहा गया।
| ग्रंथ का नाम | रचयिता | विवरण |
| पृथ्वीराज रासो | चंद्रबरदाई | इसे हिंदी और पिंगल का प्रथम महाकाव्य माना जाता है। इसमें दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चौहान के जीवन का वर्णन है। |
| विजयपाल रासो | नल सिंह | इसमें विजयपाल के युद्धों का पिंगल मिश्रित ब्रजभाषा में वर्णन है। |
| हम्मीर रासो | जोधराज / शारंगधर | रणथंभौर के शासक हम्मीर देव की वीरता की गाथा। |
| खुमाण रासो | दलपति विजय | मेवाड़ के शासकों का वर्णन करने वाला एक प्रसिद्ध पिंगल ग्रंथ। |
📚 पिंगल छन्दःशास्त्र की मूल संरचना
पिंगल ग्रंथों में छंदों को वैज्ञानिक तरीके से बाँटा गया है। इसके मुख्य अवयव निम्नलिखित हैं:
- वर्ण और मात्रा: पिंगल में लघु (I) और गुरु (S) का विचार सबसे महत्वपूर्ण है।
- गण विधान: वर्णिक छंदों के लिए 8 गणों का समूह (यमाताराजभानसलगा) निर्धारित है।
- यति और गति: छंद पढ़ते समय कहाँ रुकना है (यति) और किस लय में पढ़ना है (गति), इसका सूक्ष्म वर्णन इन ग्रंथों में मिलता है।
- तुक (Rhyme): पिंगल काव्य में तुकबंदी का विशेष महत्व होता है।
⚖️ पिंगल ग्रंथों की शास्त्रीय श्रेणियाँ
इन ग्रंथों में छंदों को तीन मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया गया है, जिनका विवरण इस प्रकार है:
| श्रेणी | विवरण | प्रमुख छंद |
| मात्रिक छंद | जिनमें मात्राओं की गणना निश्चित होती है। | दोहा, चौपाई, रोला, छप्पय |
| वर्णिक छंद | जिनमें अक्षरों (वर्णों) की संख्या और क्रम निश्चित होता है। | सवैया, कवित्त, मालिनी |
| मुक्तक / विषम | जिनमें छंदों के चरण समान नहीं होते या मिश्रित होते हैं। | कुंडलिया, बरवै |
🏰 पिंगल शास्त्र का प्रभाव
पिंगल ग्रंथों ने न केवल कविता लिखने के नियम तय किए, बल्कि उन्होंने:
- संगीत और काव्य का समन्वय किया: क्योंकि पिंगल छंद गेय होते हैं।
- मानकीकरण (Standardization): ब्रजभाषा को एक व्यवस्थित साहित्यिक रूप प्रदान किया।
- कवियों की कसौटी: रीतिकाल में माना जाता था कि जिसे पिंगल शास्त्र का ज्ञान नहीं, वह सफल कवि नहीं हो सकता।
एक प्रसिद्ध कहावत है- छंद ज्ञान के बिना कवि वैसा ही है जैसे पंख के बिना पक्षी।



