राजा टोडरमल (Raja Todarmal), अकबर (Badshah Akbar) का पहला हिन्दू मंत्री था जिसने हिंदुओं की वेशभूषा त्यागकर मुगल अमीरों जैसे कपड़े पहनने आरम्भ किए थे। बादशाह अकबर उसकी प्रतिभा एवं निष्ठा से इतना प्रभावित हुआ कि अकबर ने उसे ऐसे-ऐसे श्रेष्ठ पद दिए और ऐसे-ऐसे महत्वपूर्ण कार्य सौंपे जो अकबर किसी मुगल शहजादे अथवा चगताई अमीर को भी नहीं दे सकता था।
जौनपुर, चित्तौड़, रणथंभौर, सूरत एवं हल्दीघाटी के अभियानों में टोडरमल की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी।
ई.1567 में अकबर ने चित्तौड़ दुर्ग (Chittor Fort) के बाहर लगाए गए चार मोर्चों में से उसे एक मोर्चे का स्वतंत्र प्रभारी बनाया था। ई.1572 में अकबर ने उसे गुजरात के माल-बंदोबस्त का दफ्तर ठीक करने के लिए भेजा। वहाँ इतनी अव्यवस्था मची हुई थी कि कई वर्षों से बादशाह को मिलने वाली मालगुजारी का सही हिसाब किसी को पता नहीं था। टोडरमल ने यह दफ्तर ठीक करके मालगुजारी का सही हिसाब मिला लिया।
ई.1573 में टोडरमल को बिहारी पठानों से लड़ने के लिए भेजी गई सेना की व्यवस्था करने भेजा गया। इस मोर्चे पर पहले से ही खानखाना मुनीम खाँ की अध्यक्षता में एक विशाल सेना बिहारी पठानों से लड़ रही थी जिसमें बाबर (BABUR) एवं हुमायूँ (HUMAYUN) के समय के अनुभवी अमीर भी मौजूद थे किंतु यह सेना बिहारी पठानों से जीत नहीं पा रही थी।
जब टोडरमल मुनीम खाँ (Munim Khan) के पास पहुंचा तो Raja Todarmal ने नए सिरे से सेना की व्यूह रचना की।
उसके द्वारा की गई व्यवस्था से कुछ ही दिनों में मुगलों को जीत प्राप्त हो गई। इसके कुछ दिन बाद मुगल सेना बंगाल की राजधानी गौड़ के अभियान पर भेजी गई। इसे बाद में मालदा के नाम से जाना गया। अफगान लोग गौड़ से भागकर टौंडा चले गए। मुनीम खाँ और टोडरमल को भी टौंडा जाकर मोर्चा संभालना पड़ा। टौंडा में बादशाही सेना की प्रबल विजय हुई।
इस पर बंगाल और बिहार के शासक दाऊद खाँ (Daud Khan of Bengal) ने अपने परिवार को रोहतास के किले (Rohtas ka Kila) में छोड़ दिया तथा स्वयं एक विशाल सेना लेकर मुगल सेना पर टूट पड़ा। खानखाना मुनीम खाँ को मुगल सेना के केन्द्र में तथा Todarmal को मुगल सेना के दाएं पक्ष में रखा गया।
इस बार दाऊद की सेना मुगलों पर भारी पड़ी तथा मुगल सेना का हरावल तितर-बितर हो गया। दाऊद की सेना मुगल सेना के केन्द्र तक पहुंच गई।
कुछ ही समय में मुगल सेना में यह अफवाह फैल गई कि खानखाना मुनीम खाँ मारा गया। जब यह बात टोडरमल को बताई गई तो उसने कहा- ‘क्या हुआ जो खानखाना मारा गया है, मैं तो हूँ। अपने स्थान पर डटे रहो और लड़ते रहो। हम बादशाह के लिए लड़ रहे हैं न कि खानखाना के लिए।’
टोडरमल की इस बात से मुगल सेनापतियों में जोश छा गया और वे फिर से लड़ने लगे। थोड़ी ही देर में अफगानों का सेनापति गूजर खाँ मारा गया। पठान और अफगान भाग खड़े हुए तथा विजयश्री ने मुगलों का वरण कर लिया। बाद में ज्ञात हुआ कि खानखाना नहीं अपितु खानआलम मारा गया था। खानखाना तो युद्ध का मैदान छोड़कर भाग गया था।
बंगाल और बिहार के शासक दाऊद ने यह रणनीति अपना रखी थी कि जब वह हारने लगता था तो मैदान छोड़कर भाग जाता था और कुछ ही दिनों में फिर से सेना एकत्रित करके मुगलों पर टूट पड़ता था। इस कारण मुगलों की सेना कई सालों से बिहार एवं बंगाल के मोर्चे पर फंसी हुई थी।
इस बार टोडरमल ने मोर्चा संभाला। दाऊद जहाँ भी गया, टोडरमल ने उसका पीछा किया तथा उसे चैन से नहीं बैठने दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि ई.1576 में दाऊद ने सुलह की प्रार्थना की।
जब दाऊद के अमीर खानखाना मुनीम खाँ के डेरे में संधि की बात करने पहुंचे तो मुनीम खाँ संधि करने के लिए तैयार हो गया किंतु टोडरमल ने संधि करने से मना कर दिया।
टोडरमल ने दाऊद के मंत्रियों के सामने ही मुनीम खाँ से कहा- ‘अपने आराम और दाऊद के मंत्रियों की प्रार्थना पर ध्यान मत दो। सुलह मत करो। बिना कोई विराम दिए लड़ते जाओ, दाऊद हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।’
मुनीम खाँ में टोडरमल जितना साहस, श्रम एवं उत्साह नहीं था। वह बंगाल से बाहर निकलना चाहता था। इसलिए वह संधि करने के लिए उतना ही उत्सुक था जितना कि दाऊद। टोडरमल जानता था कि दाऊद संधि नहीं करना चाहता है, वह तो अपनी शक्ति को पुनर्गठित करने तक के लिए समय लेना चाहता है। उसके विरोध के बावजूद मुनीम खाँ ने दाऊद से संधि कर ली। जब मुनीम खाँ ने संधि के कागज टोडरमल की तरफ बढ़ाए तो टोडरमल ने उन पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया। मुनीम खाँ ने अपनी जीत की खुशी में जलसे का आयोजन किया किंतु टोडरमल उसमें भी सम्मिलित नहीं हुआ।
जब बादशाह (Badshah Akbar) ने टोडरमल को बंगाल से आगरा बुलवाया तो टोडरमल बंगाल से 54 श्रेष्ठ हाथी लेकर बादशाह की सेवा में उपस्थित हुआ। बादशाह हाथियों की इस भेंट को पाकर बड़ा प्रसन्न हुआ। टोडरमल के खाते में और भी ढेरों उपलब्धियाँ हैं।
जब अकबर ने टोडरमल को अनेक महत्वपूर्ण पद दे दिए तो कुछ मुगल अमीरों ने अकबर से कहा कि आपने एक हिंदू को मुसमानों के ऊपर इतना बड़ा अधिकार दे दिया है, यह उचित नहीं है। इस पर अकबर ने कहा-
हर कुदाम शुमा दर सरकारे खुद हिंदुए दारद्।
अगर माहम हिंदुए दाश्तऽवाशीम्
चिरा अज ओ बद बायद बूद्।
अर्थात्- आप में से हरेक अपने कारोबार में हिन्दू मुंशी रखते हैं। यदि मैंने भी हिंदू रखा तो उससे क्या बुरा होगा?
टोडरमल जीवन के अंतिम दिनों में शाही नौकरी छोड़कर हरिद्वार जाना चाहता था किंतु अकबर ने उससे कहा कि तीर्थयात्रा करने से बेहतर है सक्रिय रहकर कार्य करना। इसलिए टोडरमल को अपने जीवन की अंतिम सांस तक अकबर के लिए काम करना पड़ा। अपनी मृत्यु के समय टोडरमल लाहौर के मोर्चे पर था। 8 नवंबर 1589 को लाहौर में ही टोडरमल की मृत्यु हुई। इस अवसर पर आम्बेर नरेश भगवानदास भी उपस्थित था।
टोडरमल के दो पुत्र थे जिनमें से एक का नाम धारी था। वह सिंध-क्षेत्र में अकबर के लिए लड़ता हुआ मारा गया। टोडरमल के दूसरे पुत्र कल्याणदास ने हिमालय क्षेत्र में कुमाऊँ को परास्त किया था।
उज्बेक नेता अली कुली खाँ शैबानी अर्थात् खानजमां का विद्रोह दबाने में टोडरमल की बहुत बड़ी भूमिका थी। राहुल सांकृत्यायन ने उसका मूल्यांकन करते हुए लिखा है कि- ‘अबुल फजल (Abul Fazal) राजनीति और शासन में अद्वितीय था, राजा मानसिंह (Raja Mansingh) महान! सैनिक था किंतु राजा टोडरमल (Raja Todarmal) में ये दोनों गुण मौजूद थे।’
✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।



