इस पुस्तक में भारत के अत्यंत प्राचीन एवं चंद्रवंष नाम से विख्यात कुल में उत्पन्न चंद्रवंशी राजाओं की कथाएँ लिखी गई हैं। साथ ही उनके पौराणिक एवं वैज्ञानिक संदर्भों का भी उल्लेख किया गया है।
अरब रेगिस्तान में भी पूजे जाते थे भारतीय देवी-देवता
जिस प्रकार हिमालय से लेकर समुद्र तक वैदिक देवी-देवताओं की पूजा होती थी, उसी प्रकार अरब रेगिस्तान (Arabian Desert) में भी पूजे जाते थे भारतीय देवी-देवता! उस काल में रोम एवं यूनान में भी वैदिक देवी-देवताओं की पूजा होती थी।
एशिया महाद्वीप के निम्न-मध्य-पूर्व भाग में स्थित एक प्रायद्वीप ‘अरब’ कहलाता है। इसके दक्षिण में अदन की खाड़ी, पश्चिम में लालसागर और पूर्व में फारस की खाड़ी स्थित है। इस कारण इस क्षेत्र के निवासी प्राचीन काल से कुशल नाविक रहे हैं और उनकी विदेशों से व्यापार करने में रुचि रही है।
अरब की मुख्य भूमि एक विशाल रेगिस्तान के रूप में स्थित है परन्तु उसके बीच-बीच में उपजाऊ भूमि भी है जहाँ पानी मिल जाता है। इन्हीं उपजाऊ स्थानों में इस देश के लोग निवास करते थे। ये लोग परम्परागत रूप से कबीले बनाकर रहते थे। प्रत्येक कबीले का एक सरदार होता था।
इन लोगों की अपने कबीले के प्रति बड़ी भक्ति होती थी और ये उसके लिए अपना सर्वस्व निछावर करने के लिए तैयार रहते थे। ये लोग तम्बुओं में निवास करते थे और खानाबदोशों का जीवन व्यतीत करते थे। ये लोग एक स्थान से दूसरे स्थान में घूमा करते थे और लूट-खसोट करके पेट भरते थे। ऊँट उनकी मुख्य सवारी थी और खजूर उनका मुख्य भोजन था। ये लोग बड़े लड़ाके होते थे।
अरब रेगिस्तान (Arabian Desert) में इस्लाम का उदय होने से पहले, अरबवासियों के भी धार्मिक विचार प्राचीन काल के हिन्दुओं के समान थे। वे भी हिन्दुओं की भाँति मूर्ति-पूजक थे और उनका अनेक देवी-देवताओं में विश्वास था। जिस प्रकार हिन्दू लोग कुल-देवता, ग्राम-देवता आदि में विश्वास करते थे, उसी प्रकार अरबवासियों के प्रत्येक कबीले का एक देवता होता था, जो उनकी रक्षा करता था।
उस काल में अरब रेगिस्तान (Arabian Desert) में रहने वाले जनजातीय कबीलों में देवी-देवताओं को जनजातियों के संरक्षक के रूप में देखा जाता था। अरबवासियों का मानना था कि देवी-देवताओं की आत्मा पवित्र पेड़ों, पत्थरों, झरनों और कुओं से जुड़ी हुई थी।
ठीक उसी प्रकार आज भी हिन्दू मानते हैं कि वृक्षों, नदियों, पहाड़ों और बावलियों में देवी-देवता निवास करते हैं। अरबवासी आज के हिन्दुओं की तरह भूत-प्रेतों में भी विश्वास करते थे। उनकी धारणा थी कि भूत-प्रेत वृक्षों तथा पत्थरों में निवास करते हैं और मनुष्य को विभिन्न प्रकार के कष्ट देने की शक्ति रखते हैं।
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अरब रेगिस्तान (Arabian Desert) में मक्का (Mecca) नामक एक प्राचीन कस्बा था जहाँ हजारों साल पुराना एक मंदिर हुआ करता था। इसे काबा (Kaaba) का मंदिर कहा जाता था। इस मंदिर में जनजातीय संरक्षक देवी-देवताओं की 360 मूर्तियां थीं। इनमें से तीन देवियां अल्लाह के साथ उनकी बेटियों के रूप में जुड़ी हुई थीं। उन्हें अल्लात (Al-Lat), मनात (Manat) और अल-उज्जा (Al-Uzza) कहा जाता था। अरब के रेगिस्तान में रहने वाले लोग इन 360 मूर्तियों की पूजा करने के लिए साल में कम से कम एक बार अवश्य ही मक्का आया करते थे।
काबा में अत्यंत प्राचीन काल से एक काला पत्थर मौजूद है। अरबवासियों का विश्वास था कि इस पत्थर को अल्लाह ने आसमान से गिरा दिया था। इसलिए वे इस पत्थर को बड़ा पवित्र मानते थे और इसके दर्शन तथा पूजन के लिए काबा जाया करते थे। बहुत से वैज्ञानिकों की धारणा है कि यह पत्थर उल्कापिण्ड के रूप में धरती पर गिरा था। काबा के इस काले पत्थर को आज भी इस्लाम के अनुयाइयों में आदर की दृष्टि से देखा जाता है।
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काबा की रक्षा का भार कुरेश नामक कबीले (Quraysh Tribe) के ऊपर था। इसी कुरेश कबीले में ई.570 में मुहम्मद (Muhammad) नामक एक बालक का जन्म हुआ जिसने आगे चलकर अरब की प्राचीन धार्मिक व्यवस्था के विरुद्ध बहुत बड़ी क्रान्ति की और एक नए मत को जन्म दिया, जो इस्लाम के नाम से जाना गया। जब हजरत मुहम्मद 40 साल के हुए तो उन्होंने एक गुफा में फरिश्ता जिबराइल (Gabriel) से भेंट की तथा उन्हें अल्लाह से पहला इल्हाम प्राप्त हुआ। यह संदेश इस प्रकार से था- ‘अल्लाह का नाम लो, जिसने सब वस्तुओं की रचना की है।’ मान्यता है कि पैगम्बर मुहम्मद को प्रत्यक्ष रूप में अल्लाह के दर्शन हुए और यह संदेश मिला- ‘अल्लाह के अतिरिक्त कोई दूसरा ईश्वर नहीं है और मुहम्मद उसका पैगम्बर है।’ हजरत मुहम्मद (Muhammad) को जिब्राइल के माध्यम से कुरान प्राप्त हुई जो अल्लाह की तरफ से दी गई थी। हजरत मुहम्मद ने अरब के लोगों को उस इल्हाम के रहस्य बताने आरम्भ किए जो उन्हें अल्लाह की तरफ से प्राप्त हुआ था। इस प्रकार संसार में एक नया मजहब स्थापित हुआ जिसे इस्लाम कहते थे। ई.622 में जब मक्का (Mecca) के प्रभावशाली लोगों को लगा कि आम जनता हजरत मुहम्मद की बातों को पसंद करती है तो उन प्रभावशाली लोगों ने हजरत मुहम्मद को मक्का से बाहर निकाल दिया।
इस पर हजरत मुहम्मद अरब रेगिस्तान (Arabian Desert) में स्थित मदीना नामक कस्बे में चले गए। वहाँ उन्होंने एक सेना संगठित करके मक्का पर आक्रमण किया। इसी के साथ इस्लाम को सैन्य स्वरूप भी प्राप्त हो गया।
इस घटना के बाद हजरत मुहम्मद (Muhammad) न केवल इस्लाम के प्रधान स्वीकार कर लिए गए वरन् वे राजनीति के भी प्रधान बन गए और उनके निर्णय सर्वमान्य हो गए। इस प्रकार हजरत मुहम्मद के जीवन काल में इस्लाम तथा राज्य के अध्यक्ष का पद एक ही व्यक्ति में संयुक्त हो गया।
अरब में इस्लाम का प्रचार हो जाने के बाद अरब रेगिस्तान (Arabian Desert) में स्थित सैंकड़ों मंदिरों को तोड़ दिया गया तथा देव-मूर्तियों को कुफ्र मानकर हटा दिया गया। मस्जिदों का निर्माण करके उनमें अजान दी जाने लगी तथा नमाज पढ़ी जाने लगी। बहुत से लोग मानते हैं कि इस्लाम का उदय केवल धार्मिक आंदोलन नहीं था अपितु वह एक सैनिक एवं राजनीतिक आंदोलन भी था। हज़रत मुहम्मद (Muhammad) के जीवनकाल में अरब प्रायद्वीप के अधिकांश भू-भाग पर इस्लाम का वर्चस्व हो गया। 8 जून 632 को हजरत मुहम्मद का देहांत हो गया।
जेहाद और इस्लाम का नाता बहुत गहरा है। ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू प्रतीत होते हैं! जेहाद (Jihad) ने इस्लाम (Islam) को धरती के कौने-कौने तक पहुंचा दिया
ईस्वी 632 में हजरत मुहम्मद (Hazrat Muhammad) का निधन होने तक लगभग सम्पूर्ण अरब प्रायद्वीप पर इस्लाम का प्रचार हो गया था। हजरत मुहम्मद की मृत्यु के बाद उनके ससुर अबूबक्र अथवा अबूबकर को हजरत मुहम्मद का उत्तराधिकारी चुना गया। इन उत्तराधिकारियों को खलीफा कहा गया। इस प्रकार अबूबक्र मुसलमानों के पहले खलीफा हुए।
खलीफाओं के समय में भी इस्लाम तथा राजनीति में अटूट सम्बन्ध बना रहा क्योंकि खलीफा भी इस्लाम तथा राज्य दोनों के प्रधान होते थे। उनके राज्य का शासन कुरान के अनुसार होता था। इससे राज्य में मुल्ला-मौलवियों का प्रभाव बढ़ा। ये मुल्ला-मौलवी लोगों को कुरान के सिद्धांतों के बारे में बताते थे किंतु धार्मिक नेता के रूप में भी खलीफा का आदेश उसी तरह सर्वोच्च होता था, जिस तरह उसका आदेश सैनिक एवं राजनीतिक मामलों में सर्वोच्च होता था।
हजरत मुहम्मद (Hazrat Muhammad) के उत्तराधिकारियों को खलीफा (Khalifa) कहा गया। हजरत मुहम्मद के ससुर अबूबक्र (Abu Bakar) को पहला खलीफा बनाया गया जो कुटम्ब में सर्वाधिक बूढ़े थे। अबूबक्र के प्रयासों से मेसोपोटमिया तथा सीरिया में इस्लाम धर्म का प्रचार हुआ। अबूबक्र की मृत्यु होने पर ईस्वी 634 में उमर (Khalifa Umar) को खलीफा चुना गया।
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उमर ने इस्लाम के प्रचार में जितनी सफलता प्राप्त की उतनी सम्भवतः अन्य किसी खलीफा (Khalifa) ने नहीं की। उस्मान इब्न अफ्फान को तीसरा और अली इब्नू अबू तालिब को चौथा खलीफा बनाया गया। पहले चार खलीफा, हजरत मुहम्मद के साथी रहे थे। इसलिए उन्हें खलीफाओं की परम्परा में विशिष्ट माना जाता है। खलीफाओं की परम्परा हजरत मुहम्मद के साथियों के बाद भी चलती रही।
खलीफाओं के नेतृत्व में अरबवासियों ने इस्लाम के प्रसार के साथ-साथ राजनीतिक विजय का अभियान शुरू किया। खलीफाओं ने धार्मिक असहिष्णुता की नीति का अनुसरण किया जिसके फलस्वरूप अन्य धर्म वालों को इस्लामिक राज्य का नागरिक नहीं समझा गया।
खलीफा उमर (Khalifa Umar) ने अपने शासनकाल में इस्लाम के अनुयाइयों को प्रबल सैनिक संगठन में परिवर्तित कर दिया। जहाँ कहीं खलीफा की सेनाएं गईं, वहाँ पर इस्लाम का प्रचार किया गया। यह प्रचार उपदेशकों द्वारा नहीं वरन् सुल्तानों और सैनिकों द्वारा तलवार के बल पर किया गया जिसे ‘जेहाद’ कहा गया। जिहादी सेनाएँ जहाँ कहीं भी गईं, वहाँ की धरा रक्त-रंजित हो गई।
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ईस्वी 680 में हजरत मुहम्मद (Hazrat Muhammad) के अनुयाइयों में परस्पर संघर्ष हुआ जिसे करबला का युद्ध (Battle of Karbala) कहा जाता है। इसके बाद हजरत मुहम्मद के अनुयाई ‘शिया’ और ‘सुन्नी’ नामक दो सम्प्रदायों में बंट गए किंतु जेहाद के माध्यम से इस्लाम के प्रचार का काम बिना किसी बड़ी बाधा के चलता रहा। खलीफा के सेनापति अपने शत्रु पर युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए ‘जेहाद’ (Jihad) का नारा लगाते थे। जेहादियों का मानना है कि इस्लाम (Islam) का एक निर्देश इस्लाम की खातिर जिहाद से सम्बन्ध रखता है जिसका आशय पवित्र युद्ध एवं धर्मयुद्ध से है। इसका व्यावहारिक अर्थ बुत-परस्ती करने वालों एवं इस्लाम को न मानने वालों को इस्लाम का अनुयाई बनाने से है। यद्यपि कुरान ‘किताबवालों’ अर्थात् यहूदियों और ईसाईयों के प्रति थोड़ी उदार है। फिर भी कुरान में उन ‘किताबवालों’ के साथ लड़ने का आदेश है जो अल्लाह को नहीं मानते और इस्लाम के आगे नहीं झुकते। चूंकि बहुत से लोग इस्लाम को स्वीकार करने से मना कर देते थे इसलिए जेहाद (Jihad) प्रायः भयंकर रूप धारण कर लेता था जिससे दानवता ताण्डव करने लगती थी और मजहब के नाम पर घनघोर अमानवीय कार्य किए जाते थे। इस कारण जेहादी सेनाएं जिस भी देश में गईं, उस देश के समक्ष नई चुनौतियां खड़ी हो गईं।
फिर भी जेहाद (Jihad) जीतता रहा और आगे बढ़ता रहा। देखते ही देखते भूमध्यसागरीय देशों- सीरिया, फिलीस्तीन, दमिश्क, साइप्रस, क्रीट, मिस्र (Syria, Palestine, Damascus, Cyprus, Crete, Egypt) आदि देशों पर अधिकार कर लिया गया। इसके बाद फारस को इस्लाम की अधीनता में लाया गया जिसे अब ईरान कहा जाता है।
फारस के बाद उत्तरी अफ्रीका के नव-मुस्लिमों और अरबों ने स्पेन में प्रवेश किया। स्पेन तथा पुर्तगाल जीतने के बाद खलीफा (Khalifa) की सेनाओं ने फ्रांस में प्रवेश किया परन्तु ई.732 में फ्रांसिसियों ने चार्ल्स मार्टेल के नेतृत्व में ‘तुर्स के युद्ध’ में खलीफा की सेना को परास्त कर उसे पुनः स्पेन में धकेल दिया जहाँ ई.1492 तक उनका शासन रहा।
इसके बाद उन्हें स्पेन से भी हटाना पड़ा। अरबों ने पूर्वी रोमन साम्राज्य की राजधानी कुस्तुन्तुनिया पर भीषण आक्रमण किए। 15वीं सदी में ओटोमन तुर्कों ने कुस्तुन्तुनिया को जीतकर इस कार्य को पूरा किया। उधर फारस को जीतने के बाद अरबों ने बुखारा और समरकन्द पर अधिकार कर लिया। मध्यएशिया पर उन्होंने पूर्ण प्रभुत्व स्थापित किया।
यद्यपि लगभग पूरे संसार में इस्लाम का प्रवेश जेहादी सेनाओं के माध्यम से हुआ तथापि भारत में इस्लाम का पहला प्रवेश जेहादी सेनाओं (Jihadi Army) के माध्यम से नहीं होकर व्यापारियों के माध्यम से हुआ। अरब क्षेत्र में रहने वाले व्यापारी अपने बड़े-बड़े काफिलों के साथ सदियों से भारत में आकर व्यापार किया करते थे।
वे अरब देश में पैदा होने वाले खजूर, ऊंट, जैतून आदि लेकर भारत आते थे और भारत से मसाले, कपास तथा अनाज लेकर जाते थे। जब अरब में इस्लाम का प्रसार हुआ तो इन्हीं अरब व्यापारियों के साथ सातवीं शताब्दी में इस्लाम ने भारत में प्रवेश किया।
अरब के ये व्यापारी प्रायः भारत के दक्षिण-पश्चिमी समुद्र तटीय क्षेत्र में आया करते थे। इन्हीं में से कुछ अरब व्यापारी दक्षिण भारत के मलाबार तथा अन्य स्थानों पर स्थायी रूप से बस गए। इन अरब व्यापारियों ने दक्षिण भारत में व्यापार करने के साथ-साथ बहुत सीमित मात्रा में इस्लाम का प्रचार भी किया। इस कारण दक्षिण भारत के कुछ लोगों ने इस्लाम स्वीकार कर लिया किंतु भारत में इस्लाम (Islam) का यह प्रभाव बहुत ही सीमित था।
ई.750 में खलीफाओं ने बगदाद को अपनी राजधानी बनाया। इस समय तक अरबवासियों का खलीफा राज्य (Khalifa Ki sultanate) स्पेन से उत्तरी अफ्रीका होते हुए भारत में सिन्ध और चीन की सीमा तक स्थापित हो चुका था।
अरब के रेगिस्तान में स्थित समारा में अल-मुतव्वकिल नामक एक मस्जिद स्थित है। यह वर्तमान समय में इस्लामिक संसार की प्राचीनतम मस्जिद मानी जाती है। इसका निर्माण ई.850 में खलीफा अब्बासी की दूसरी राजधानी समारा में किया गया था। मेसोपाटामिया शैली (Mesopotamian Style) में ईंटों से निर्मित यह मस्जिद 50 मीटर ऊंची है। कई शताब्दियों तक यह विश्व की सबसे बड़ी मस्जिद भी थी किंतु अब दुनिया में इससे बड़ी सैंकड़ों मस्जिदें स्थित हैं।
मुहम्मद बिन कासिम ने भारत का जेहाद से प्रथम परिचय करवाया
मुहम्मद बिन कासिम (Muhammad bin Qasim, 695–715 CE)भारत पर आक्रमण करने वाला पहला इस्लामिक आक्रांता था। उसने जेहाद और इस्लाम के नाम पर भारत पर आक्रमण किया तथा भारतवासियों का जेहाद (Jihad) से प्रथम परिचय करवाया!
खलीफाओं को भारत आने वाले अरबी व्यापारियों के माध्यम से भारत की अपार सम्पत्ति की जानकारी थी। उन्हें यह भी ज्ञात था कि भारत के लोग ‘बुत-परस्त’ अर्थात् मूर्ति-पूजक हैं। इसलिए खलीफाओं ने भारत की सम्पत्ति लूटने तथा मूर्ति-पूजकों के देश पर आक्रमण करके इस्लाम का प्रचार करने का निश्चय किया।
अरब वालों के भारत पर आक्रमण करने के चार प्रमुख लक्ष्य प्रतीत हेाते हैं। उनका पहला लक्ष्य भारत की अपार सम्पत्ति को लूटना था। उनका दूसरा लक्ष्य भारत के स्त्री-पुरुषों एवं बच्चों को पकड़कर उन्हें गुलाम बनाने एवं मध्यएशिया में ले जाकर बेचने का था। अरब वालों का तीसरा लक्ष्य भारत में इस्लाम का प्रचार करना तथा मूर्तियों और मन्दिरों को तोड़कर कुफ्र मिटाना था। उनका चौथा लक्ष्य भारत में अपना साम्राज्य स्थापित करना था।
आठवीं शताब्दी ईस्वी के प्रारम्भ में अरब व्यापारियों के एक जहाज को सिन्ध के लुटेरों ने लूट लिया। इस पर ईरान के गवर्नर हज्जाज को, जो खलीफा (Khalifa) के प्रतिनिधि के रूप में ईरान पर शासन करता था, सिंध पर आक्रमण करने का बहाना मिल गया। उसने खलीफा अव वालिद (प्रथम) से आज्ञा लेकर अपने भतीजे मुहम्मद बिन कासिम (Muhammad bin Qasim) की अध्यक्षता में एक सेना सिन्ध पर आक्रमण करने के लिए भेजी। हज्जाज (Hazzaz) का यह भतीजा, हज्जाद का दामाद भी था।
इन दिनों सिंध में दाहिरसेन (Dahirsen) नामक हिन्दू राजा शासन कर रहा था। मुहम्मद बिन कासिम (Muhammad bin Qasim) ने ई.711 में विशाल सेना लेकर देबुल नगर (Debul Nagar) पर आक्रमण किया। इस नगर में हिन्दू धर्म को मानने वाले लोग रहते थे। ये लोग शांति के पुजारी थे तथा युद्ध कला से अपरिचित थे। कासिम की सेनाओं द्वारा किए गए आक्रमण से देबुलवासी अत्यन्त भयभीत हो गए और वे मुस्लिम सेना का किंचित् भी प्रतिरोध नहीं कर सके। इस कारण देबुल पर बड़ी आसानी से मुसलमानों का अधिकार हो गया।
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मुहम्मद बिन कासिम (Muhammad bin Qasim) ने देबुलवासियों को आज्ञा दी कि वे मुसलमान बन जाएं। चूंकि भारत में राजाओं द्वारा अपनी प्रजा को इस तरह के आदेश दिए जाने की परम्परा नहीं थी, इसलिए सिंध के शांतिप्रिय लोगों ने मुहम्मद बिन कासिम का यह आदेश मानने से मना कर दिया। इस पर मुहम्मद बिन कासिम ने अपनी सेनाओं को आदेश दिया कि वे उन देबुलवासियों की हत्या कर दें जो मुसलमान बनने से मना कर रहे हैं।
ईरानी गर्वनर हज्जाज के भतीेज और दामाद मुहम्मद बिन कासिम (Muhammad bin Qasim) के आदेश पर ईरानी सेनाओं ने देबुल नगर में रहने वाले सत्रह वर्ष से ऊपर की आयु के समस्त पुरुषों को तलवार के घाट उतार दिया। देबुल की स्त्रियों तथा बच्चों को गुलाम बना लिया गया, नगर को लूटा गया और लूट का सामान मुस्लिम सैनिकों में बाँट दिया गया।
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देबुल पर अधिकार कर लेने के बाद मुहम्मद बिन कासिम (Muhammad bin Qasim) की विजयी सेना आगे बढ़ी। नीरून, सेहयान आदि नगरों पर प्रभुत्व स्थापित कर लेने के उपरान्त वह सिंध के शासक दाहिरसेन की राजधानी ब्राह्मणाबाद पहुँची। यहाँ पर राजा दाहिरसेन उसका सामना करने के लिए पहले से ही तैयार था। उसने बड़ी वीरता तथा साहस के साथ शत्रु का सामना किया परन्तु दाहिरसेन परास्त हो गया और उसने रणक्षेत्र में ही वीरगति प्राप्त की। उसकी रानी ने अन्य स्त्रियों के साथ चिता में बैठकर अपने सतीत्व की रक्षा की। ब्राह्मणाबाद पर प्रभुत्व स्थापित कर लेने के बाद मुहम्मद बिन कासिम ने ‘मूलस्थान’ की ओर प्रस्थान किया जिसे अब ‘मुल्तान’ कहा जाता है। मूलस्थान के शासक ने बड़ी वीरता तथा साहस के साथ शत्रु का सामना किया परन्तु लम्बी घेराबंदी के कारण मूलस्थान के दुर्ग में जल का अभाव हो जाने के कारण मूलस्थान के शासक को आत्म-समर्पण करना पड़ा। यहाँ भी मुहम्मद बिन कासिम ने भारतीय सैनिकों की हत्या करवाई और उनकी स्त्रियों तथा बच्चों को गुलाम बना लिया।
मूलस्थान के जिन लोगों ने मुहम्मद बिन कासिम को जजिया देना स्वीकार कर लिया, उन्हें मुसलमान नहीं बनाया गया। यहाँ पर हिन्दुओं के मन्दिरों को भी नहीं तोड़ा गया परन्तु उनकी सम्पत्ति लूट ली गई। मूलस्थान पर विजय के बाद मुहम्मद बिन कासिम (Muhammad bin Qasim) को अत्यधिक धन की प्राप्ति हुई जिससे उसके मन में बेईमानी आ गई। उसने भारत से लूटा गया समस्त धन, स्त्रियाँ तथा गुलाम अपने पास रख लिए। इस कारण खलीफा अव वालिद (Caliph al-Walid), मुहम्मद बिन कासिम से अप्रसन्न हो गया। खलीफा (Khalifa) ने उसे सम्मानित करने के बहाने से बगदाद बुलवाया तथा उसकी हत्या करवा दी।
सिन्ध पर अधिकार कर लेने के उपरान्त अरबी आक्रमणकारियों को सिन्ध क्षेत्र के शासन की व्यवस्था करनी पड़ी। चूंकि मुसलमान विजेता थे, इसलिए कृषि करना उनकी शान के विरुद्ध था। फलतः कृषिकार्य हिन्दुओं के पास रहा। हिन्दू किसान, मुस्लिम विजेताओं को भूमि-कर देने लगे। यदि किसी क्षेत्र के किसान सिंचाई के लिए राजकीय नहरों का प्रयोग करते थे तो उन्हें अपनी उपज का 40 प्रतिशत और यदि राजकीय नहरों का प्रयोग नहीं करते थे तो उपज का 25 प्रतिशत भूराजस्व देना पड़ता था।
जिन हिन्दुओं ने इस्लाम को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था, उन्हें भूमि-कर के साथ-साथ जजिया भी देना पड़ता था। इससे हिन्दुओं की आर्थिक स्थिति बिगड़ने लगी। हिन्दू प्रजा को अनेक प्रकार की असुविधाओं का सामना करना पड़ा। वे अच्छे वस्त्र नहीं पहन सकते थे। घोड़े की सवारी नहीं कर सकते थे। न्याय का कार्य काजियों के हाथों में चला गया जो कुरान के नियमों के अनुसार फैसले करते थे। इसलिए हिन्दुओं के साथ प्रायः अत्याचार होता था। अरब वाले बहुत दिनों तक सिन्ध में अपनी प्रभुता स्थापित नहीं रख सके और उनका शासन अस्थाई सिद्ध हुआ।
इस्लाम के संस्थापक हजरत मुहम्मद के उत्तराधिकारी खलीफा (Khalifa) कहलाते थे। वे भारत में इस्लाम का राज्य (Rule of Islam) स्थापित करने के लिए आठवीं शताब्दी ईस्वी से सेनाएं भेजने लगे। खलीफाओं की सेनाएं (Armies of Khalifas) हिन्दू राजाओं ने नष्ट कर दीं!
बगदाद के खलीफा अव वालिद (Caliph al-Walid) ने सिंध क्षेत्र पर अधिकार करने वाले ईरानी सेनापति मुहम्मद बिन कासिम (Muhammad bin Qasim) को बगदाद में बुलवाकर मरवाया क्योंकि खलीफा (Khalifa) के अनुसार जेहाद (Jihad) के दौरान लूटे गए धन, गुलामों एवं औरतों पर खलीफा का अधिकार था जबकि कासिम ने भारत से प्राप्त ये सब वस्तुएं स्वयं ही रख ली थीं। मुहम्मद बिन कासिम की हत्या हो जाने के कुछ समय बाद भारतीयों ने फिर से स्वयं को स्वतंत्र कर लिया। इस कारण सिंध पर ईरानी गवर्नर का अधिकार शीघ्र ही समाप्त हो गया।
आठवीं एवं नौवीं शताब्दी ईस्वी में हिन्दू राजा पूरी शक्ति से खलीफाओं की सेनाएं (Armies of Khalifas) नष्ट करते रहे और उन्हें भारत में अपनी जड़ें जमाने से रोकते रहे। फिर भी इस काल में सिंध एवं मुल्तान में मुसलमानों के कुछ छोटे राज्य स्थापित हो गए। इन मुस्लिम राज्यों की दृष्टि भारत के हिन्दू राज्यों पर गिद्ध की भांति पर गड़ी हुई रहती थी जो हर समय झपट्टा मारने के लिए तैयार रहते थे।
ई.739 का चौलुक्य राजा पुलकेशी का दानपत्र कहता है कि अरब के खलीफा हशाम (Khalifa Hisham, ई.724-43) के भारतीय प्रदेशों के शासक जुनैद (Junaid) की सेना ने मारवाड़, भीनमाल, अजमेर तथा गुजरात आदि पर चढ़ाई की। इस युद्ध का क्या परिणाम हुआ, उसका कोई उल्लेख इस दानपत्र में नहीं है किंतु यह दानपत्र एक महत्त्वपूर्ण सूचना देता है कि ई.739 में कुछ भारतीय क्षेत्र खलीफा (Khalifa) द्वारा नियुक्त गवर्नरों के अधीन थे किंतु यह स्थिति थोड़े ही समय रही होगी तथा उनके अधीन क्षेत्र सिंध प्रदेश (Sindh Reason) में रहे होंगे।
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आठवीं शताब्दी ईस्वी में अजमेर का चौहान राजा दुर्लभराज (प्रथम) अथवा दूलाराय प्रतिहारों का सेनापति था। उसके समय में खलीफाओं की सेनाएं अजमेर आईं और अजमेर पर मुसलमानों का पहला आक्रमण हुआ। खलीफा वली अब्दुल मलिक की सेना व्यापारियों के वेष में सिंध के मार्ग से अजमेर तक चढ़ आई। यह आक्रमण अत्यंत भयानक था। इस युद्ध में प्रमुख चौहानों ने दुर्लभराज का साथ नहीं दिया। इस कारण दुर्लभराज के परिवार के प्रत्येक पुरुष ने हाथ में तलवार लेकर शत्रु का सामना किया तथा चौहान रानियों एवं राजकुमारियों ने जौहर का आयोजन किया। राजा दुर्लभराज का युद्ध-क्षेत्र में ही वध कर दिया गया।
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इस युद्ध में राजा दुर्लभराज (Durlabh Raj Chouhan) का सात वर्षीय पुत्र लोत एक तीर लगने से मर गया। वह शस्त्र लेकर युद्धभूमि में लड़ रहा था। तारागढ़ पर मुसलमानों का अधिकार हो गया। दूल्हराय का छोटा भाई माणक राय (Manik Rai) सांभर भाग गया। जिस दिन राजकुमार लोत मारा गया, उस दिन को पवित्र दिन माना गया तथा राजकुमार लोत की प्रतिमा देवताओं की तरह पूजी गई। कर्नल टॉड ने लिखा है कि सिन्ध से किसी शत्रु ने अजमेर पर आक्रमण करके राजा माणिकपाल (राय) का वध किया। कुछ समय बाद हर्षराय चौहान ने नासिरुद्दीन से अजमेर छीन लिया। इस प्रकार अजमेर कुछ समय तक मुसलमानों के अधिकार में रहा। उस समय दुर्लभराज का भाई माणिकपाल जिसने कि संभवतः दुर्लभराज का साथ नहीं दिया था, अजमेर के पतन के बाद सांभर में जाकर रहा। इस युद्ध के बाद के किसी काल में दुर्लभराज (प्रथम) के पुत्र गूवक (प्रथम) ने अजमेर के तारागढ़ दुर्ग पर आक्रमण करके उसे अपने अधिकार में किया। कर्नल टॉड ने मुलसमानों से अजमेर लेने वाले राजा का नाम हर्षराय लिखा है। गूवक ने अनंत क्षेत्र में हर्ष का मंदिर बनवाया था। अतः उसे हर्षराय कहा जाता था।
नौवीं शताब्दी ईस्वी में जिस समय बगदाद के खलीफा अलमामूं (Khalifa al-Ma’mun) ने चित्तौड़ पर चढ़ाई की, उस समय चित्तौड़ पर खुंमाण (द्वितीय) (Khuman Second) नामक राजा का शासन था। अब्बासिया खानदान का अलमामूं (Khalifa al-Ma’mun) ई.813 से 833 तक बगदाद का खलीफा रहा। खुमांण (द्वितीय) ई.812 से 836 के बीच चित्तौड़ का शासक रहा। खुंमाण रासो के अनुसार खुंमाण की सहायता के लिए काश्मीर से सेतुबंध तक के अनेक राजा चित्तौड़ आए।
आठवीं से दसवीं शताब्दी तक भारत भूमि पर प्रतिहारों की तुलना में कोई अन्य प्रतापी हिन्दू वंश नहीं रहा। इस राजवंश ने राजस्थान से लेकर बंगाल तक शासन किया। सिंध क्षेत्र के निकट होने के कारण जालोर के प्रतिहारों को खलीफाओं की सेनाएं कई बार घेर कर मारनी पड़ीं और अरब-आक्रांताओं से कई युद्ध लड़ने पड़े।
ई.851 में सुलेमान नामक एक अरब यात्री (Arab traveller Suleman) ने प्रतिहार शासक मिहिर भोज (Pratihar Mihir Bhoj) की बड़ी प्रशंसा की है। वह लिखता है-‘जुज्र (गुर्जर) नरेश भोज के पास एक विशाल अश्वसेना थी। ऐसी विशाल सेना भारत के किसी अन्य नरेश के पास नहीं थी। वह इस्लाम का शत्रु था। उसके राज्य में सोने-चांदी की बहुत सी खानें थीं तथा उसका राज्य चोरी-डकैती के भय से मुक्त था।’
प्रतिहारों द्वारा दी गई सेवाओं को भारतीय इतिहास कभी भुला नहीं सकता। जब खलीफओं की सेनाएं (Armies of Khalifas) दक्षिणी यूरोप से लेकर उत्तरी अमरीका तथा दक्षिण एशिया को रौंद रहीं थीं तथा तथा दक्षिणी यूरोप एवं उत्तरी अमरीका कुछ ही वर्षों में अपनी स्वतंत्रता खो बैठे थे, तब प्रतिहारों ने अरबों को भारत भूमि से लगभग बाहर ही रखा। त्रस्त जनता का उद्धार करने तथा शत्रु से समाज की रक्षा करने के कारण ग्वालियर प्रशस्ति में नागभट्ट प्रथम (Nagbhatt First) को नारायण कहा गया है।
ई.950 में सिंहराज (Singhraj Chouhan) नामक महान् चौहान राजा अजमेर का स्वामी हुआ। वह लगातार मुसलमानों से लड़ता रहा। उसने मुसलमानों के सेनापति हातिम (Hatim) का वध किया तथा उसके हाथियों को पकड़ लिया। एक अन्य अवसर पर सिंहराज ने उस विशाल मुस्लिम सेना को खदेड़ दिया जो सुल्तान हाजीउद्दीन के नेतृत्व में अजमेर से 25 किलोमीटर दूर जेठाना तक आ पहुँची थी।
इस्लाम का जन्म (Birth of Islam) अरब में हुआ था। अरब के मुसलमानों ने इस्लाम को पूरी दुनिया में फैलाने का बीड़ा उठाया किंतु वे जल्दी ही थक गए। इस पर तुर्की गुलाम (Turkish slave) इस्लाम को भारत ले आए!
आठवीं सदी के आरम्भ में अरबों ने थल मार्ग से आकर सिन्ध प्रदेश (Sindh Region) को जीता था। लगभग दो सौ साल तक अरब के लोग इस्लाम को दूर-दूर तक फैलाने में लगे रहे किंतु उसके बाद अरबों का धार्मिक उत्साह शिथिल पड़ने लगा। इस अवधि में वे काफी समृद्ध हो गए थे तथा युद्धभूमि में लड़ने-मरने की बजाय अपने महलों में रहना अधिक पसंद करने लगे थे।
इस कारण इस्लाम के प्रसार-कार्य (Extension of Islam) का नेतृत्व, पहले ईरानियों के पास और उसके बाद तुर्कों के पास चला गया। सिंध में अरबों के प्रथम आक्रमण के लगभग 285 वर्ष बाद उत्तर-पश्चिमी दिशा से भारत भूमि पर तुर्कों के आक्रमण आरंभ हुए। तुर्कों के भारत में प्रवेश का इतिहास जानने से पहले हमें तुर्कों के प्रारम्भिक इतिहास के बारे में कुछ जानना चाहिए।
तुर्कों के पूर्वज हूण (Hun) थे तथा वे चीन की पश्मिोत्तर सीमा से लेकर यूराल एवं अल्ताई पर्वतों के बीच के विस्तृत क्षेत्र में रहते थे। उस काल में तुर्कों का सांस्कृतिक स्तर अत्यंत निम्न श्रेणी का था। कृषि एवं शिल्प से अल्प-परिचित होने के कारण वे अंत्यत खूंखार और लड़ाकू थे। लूट-खसोट ही उनके जीवन यापन का मुख्य साधन था।
इस कारण युद्ध से उन्हें स्वाभाविक प्रेम था। जब यूराल पर्वत से लेकर अल्ताई पर्वत तक के क्षेत्र का जलवायु इंसानों के रहने योग्य नहीं रहा तो ये तुर्क उस क्षेत्र को छोड़कर अन्य क्षेत्रों में जाने लगे। जब उन्होंने अपने पश्चिम में रहने वाले शकों के क्षेत्र में प्रवेश किया तो तुर्कों के रक्त में शकों के रक्त का भी मिश्रण हो गया।
कुछ तुर्की कबीले (Turkish Tribes) ईरान एवं अफगानिस्तान के उत्तर में जा बसे जहाँ अब तुर्कमेनिस्तान (Turkmenistan) नामक अगल देश बसा हुआ है। जब अरब वालों ने तुर्कों को इस्लाम के अंतर्गत लाना चाहा तो तुर्की लोग अरबों एवं इस्लाम दोनों के शत्रु हो गए। इस पर अरबों ने हजारों तुर्कों को पकड़ कर गुलाम बना लिया तथा उन्हें इस्लाम स्वीकार करने के लिए बाध्य किया।
जो तुर्की-गुलाम (Turkish slave) मुसलमान बन जाते थे तथा खलीफा के प्रति निष्ठा का प्रदर्शन करते थे, उन्हें खलीफा एवं अरबी सेनापतियों का अंगरक्षक नियुक्त किया जाने लगा क्योंकि ये लोग शरीर से ताकतवर एवं स्वभाव से लड़ाका थे। धीरे-धीरे तुर्की अंगरक्षकों की हैसियत बढ़ने लगी। अरब एवं ईरान के मुसलमानों ने उन तुुर्की गुलामों को उन्नति करने के अच्छे अवसर उपलब्ध करवाए जिन्होंने अपने अरबी एवं ईरानी स्वामियों की निष्ठापूर्वक सेवा की तथा इस्लाम (Islam) को पूरी तरह अपना लिया।
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प्रारम्भ में कुछ तुर्की गुलाम(Turkish slave), खलीफाओं एवं ईरानी जनरलों की छोटी सैनिक टुकड़ियों के मुखिया भी नियुक्त किये जाने लगे तथा उनके विवाह अरबी एवं ईरानी लड़कियों के साथ किए जाने लगे। इस प्रकार तुर्की लड़ाकों में अरब तथा ईरानियों के रक्त का भी मिश्रण हो गया। धीरे-धीरे तुर्की गुलाम (Turkish slave) खलीफा की सेना में उच्च पदों पर नियुक्त होने लगे। जब खलीफा निर्बल पड़ गए तो तुर्कों ने खलीफाओं से वास्तविक सत्ता छीन ली और खलीफा (Khalifa) नाम मात्र के शासक रह गए।
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नौंवी शताब्दी ईस्वी के आते-आते इस्लाम के प्रचार के लिए, तुर्क कई शाखाओं में बँट गए। समानी वंश के तुर्कों ने ई.874 से 943 के बीच पूर्व में स्थित खुरासान, आक्सस नदी पार के देशों तथा अफगानिस्तान के विशाल भू-भागों पर अधिकार कर लिया। तुर्कों की एक शाखा ईरान को पार करके ईरान के पश्चिमोत्तर में स्थित एशिया माइनर में जा बसी जिसे एशिया कोचक, एशिया माइनर (Asia Minor or Anatolia) एवं तुर्की (Turkey) भी कहा जाता था। इन तुर्कों ने पूर्वी रोमन साम्राज्य (Roman Empire) की राजधानी कुस्तुंतुनिया (Kustuntuniya) पर अधिकार कर लिया तथा उसका नाम बदलकर इस्ताम्बूल कर दिया। जब अरब के खलीफाओं की विलासिता के कारण इस्लाम के प्रसार का काम मंदा पड़ गया तब मध्यएशिया के तुर्क ही इस्लाम (Islam) को दुनिया भर में फैलाने के लिए आगे आए। उन्होंने 10वीं शताब्दी के आरम्भ में बगदाद एवं बुखारा में अपने स्वामियों अर्थात् खलीफाओं के तख्ते पलट दिए और ई.943 में अर्थात् दसवीं शताब्दी ईस्वी के मध्य में, मध्यएशिया के विशाल भूभागों के साथ-साथ दक्षिण एशिया में स्थित अफगानिस्तान में भी अपने स्वतंत्र राज्य की स्थापना की। तुर्की कबीलों में कुछ परम्पराएं बड़ी विचित्र थीं। तुर्की सरदार अपने दरबार तथा अपने निजी महलों में तुर्की गुलामों को नियुक्त करते थे।
इन गुलामों को अपनी प्रतिभा के अनुसार उन्नति करने के अवसर मिलते थे। यदि कोई तुर्की गुलाम (Turkish slave) अत्यधिक प्रतिभाशाली होता था तो तुर्की सरदार उसके साथ अपनी शहजादियों के विवाह भी कर देते थे। कई बार ऐसा भी होता था कि ये तुर्की गुलाम अन्य तुर्की शहजादों के बराबर ही उत्तराधिकार का हक रखते थे।
दसवीं शताब्दी ईस्वी में अफगानिस्तान में गजनी (Ghazni) नामक एक छोटा सा प्राचीन दुर्ग था जिसका निर्माण किसी समय भारत के यदुवंशी भाटियों के राजा गजसिंह ने किया था। इस दुर्ग में ई.943 में तुर्की गुलाम अलप्तगीन ने अपने स्वतंत्र राज्य की स्थापना की। अलप्तगीन अफगानिस्तान के समानी वंश के तुर्क शासक ‘अहमद’ का तुर्की गुलाम था। अलप्तगीन का वंश ‘गजनवी वंश’ कहलाया।
गजनी का राज्य स्थापित करने के बाद तुर्क, भारत की ओर आकर्षित हुए। ई.977 में अलप्तगीन (Alp Tegin) के तुर्की गुलाम (Turkish slave) एवं दामाद सुबुक्तगीन (Sabuktigin) ने भारत पर आक्रमण करने का निर्णय लिया। उस समय भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा पर हिन्दूशाही वंश (Hindu Shahi Dynasty) का राजा जयपाल शासन कर रहा था। उसका राज्य पंजाब से लेकर हिन्दूकुश पर्वत तक विस्तृत था। गजनी के सुल्तान सुबुक्तगीन (Sabuktigin) ने एक विशाल सेना लेकर पंजाब प्रांत पर आक्रमण किया। राजा जयपाल को उससे संधि करनी पड़ी।
जयपाल ने सुबुक्तगीन (Sabuktigin) को 50 हाथी देने का वचन दिया किंतु बाद में जयपाल ने संधि की शर्तों का पालन नहीं किया। इस पर सुबुक्तगीन ने भारत पर दुबारा आक्रमण करके लमगान तक के प्रदेश को लूट लिया। सुबुक्तगीन का वंश गजनी वंश कहलाता था। ई.997 में सुबुक्तगीन की मृत्यु हो गई।
इस प्रकार तुर्की गुलामों (Turkish slave) ने भारत में इस्लाम (Islam) के प्रवेश का रास्ता फिर से खोल दिया तथा जो काम अरबों ने अधूरा छोड़ दिया था, उसे तुर्कों ने आगे बढ़ाया।
खलीफा मुझे सुल्तान माने तो मैं हर साल भारत पर हमला करूंगा
महमूद गजनवी ने खलीफा (Khlifa) को लिखा कि यदि खलीफा मुझे सुल्तान माने तो जब तक मैं जीवित रहूंगा, तब तक हर साल भारत पर आक्रमण करके कुफ्र समाप्त करूंगा तथा इस्लाम का प्रसार (Extension of Islam) करूंगा। मुझे भारत से जो सम्पदा मिलेगी उसे मैं खलीफा के पास भिजवा दूंगा।
ई.997 में गजनी के तुर्की सरदार सुबुक्तगीन (Sabuktigin) की मृत्यु हो गई। यद्यपि महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni), सुबुक्तगीन का बड़ा पुत्र था तथा उसे युद्धों में सेनाओं का नेतृत्व करने का अच्छा अनुभव था किंतु सुबुक्तुगीन ने महमूद की बजाय, अपनी चहेती बेगम के पुत्र इस्माइली को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। महमूद बहुत महत्त्वाकांक्षी था। इसलिए उसने अपने पिता के मरते ही विद्रोह कर दिया तथा एक खूनी संघर्ष में अपने भाई इस्माईली को मारकर ई.998 अथवा ई.999 में गजनी पर अधिकार कर लिया। उस समय महमूद गजनवी की आयु 27 वर्ष थी।
महमूद का पिता सुबुक्तगीन (Sabuktigin) गजनी का स्वतंत्र शासक नहीं था, वह एक तुर्की सरदार अलप्तगीन का तुर्की गुलाम था। अलप्तगीन (Alptegin) ने अपनी खूबसूरत बेटी का विवाह सुबुक्तगीन से किया था जिसकी कोख से सुबुक्तगीन के छोटे बेटे इस्माइली का जन्म हुआ था। सुबुक्तगीन का स्वामी अलप्तगीन भी स्वतंत्र शासक नहीं था, वह अफगानिस्तान के समानी वंश के तुर्की शासक ‘अहमद’ का जेरखरीद तुर्की गुलाम था।
इस प्रकार सुबुक्तगीन (Sabuktigin) गुलामों का भी गुलाम था किंतु सुबुक्तगीन के पुत्र महमूद ने अफगानिस्तान के समानी शासक से बिल्कुल नाता तोड़कर गजनी में अपने स्वंतत्र राज्य की स्थापना की तथा खलीफा के पास अपने संदेशवाहक भिजवाकर उससे अनुरोध किया कि वह महमूद गजनवी को सुल्तान घोषित करे। महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) ने खलीफा को लिखा कि यदि खलीफा मुझे सुल्तान माने तो जब तक मैं जीवित रहूंगा, तब तक हर साल भारत पर आक्रमण करके कुफ्र समाप्त करूंगा तथा इस्लाम का प्रसार करूंगा। मुझे भारत से जो सम्पदा मिलेगी उसे मैं खलीफा के पास भिजवा दूंगा।
खलीफा को अपने तुर्की गुलाम महमूद की सारी बातें इतनी अच्छी लगीं कि उसने इस शर्त पर महमूद को सुल्तान की उपाधि दे दी कि खुतबे में खलीफा का नाम पढ़ा जाएगा। इस पर महमूद ने सुल्तान की पदवी धारण की। ऐसा करने वाला वह गजनी का पहला मुस्लिम शासक था। महमूद के दरबार में नियुक्त अरबी लेखक उत्बी के अनुसार महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) ने ऑटोमन शासकों की भांति ‘पृथ्वी पर ईश्वर की प्रतिच्छाया’ की उपाधि धारण की।
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मध्यएशिया के इतिहास में सामान्यतः महमूद का वंश ‘गजनवी वंश’ कहलाता है किंतु कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि बगदाद के खलीफा अल-कादिर-बिल्लाह ने महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) को सुल्तान के रूप में मान्यता दी एवं यामीन-उद्-दौला अर्थात् साम्राज्य का दाहिना हाथ और अमीन-उल-मिल्लत अर्थात् मुसलमानों का संरक्षक की उपाधियां भी प्रदान कीं। इस कारण महमूद गजनवी के वंश को यामीनी वंश भी कहते हैं।
जब खलीफा अल-कादिर-बिल्लाह ने महमूद को सुल्तान के रूप में मान्यता दे दी तो महमूद ने खलीफा को दिए गए वचन के अनुसार ई.1000-1027 तक भारत पर 17 आक्रमण किए। डॉ. आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव ने लिखा है- ‘महमूद ने भारत पर इतने अधिक आक्रमण किए थे कि उनकी वास्तविक संख्या बताना कठिन है।’
गजनवी के दरबारी लेखक उतबी के अनुसार महमूद गजनवी के भारत-आक्रमण वस्तुतः जिहाद के अंतर्गत किए गए थे जो मूर्ति-पूजा के विनाश एवं इस्लाम के प्रसार के लिए किए जाते थे। आधुनिक काल के भारतीय इतिहासकारों डॉ. निजामी एवं डॉ. हबीब का मत है कि महमूद के भारत आक्रमण का उद्देश्य धार्मिक उन्माद नहीं था अपितु भारत के मंदिरों की अपार सम्पदा को लूटना था क्योंकि गजनवी ने मध्यएशिया के मुस्लिम शासकों पर भी आक्रमण किये थे।
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कुछ वामपंथी भारतीय इतिहासकारों ने लिखा है कि महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) भारत के हिन्दू धर्म पर आक्रमण नहीं करना चाहता था अपितु वह तो पंजाब के शासक जयपाल तथा आनंदपाल को दबाना चाहता था क्योंकि वे गजनी राज्य की सीमाओं को खतरा उत्पन्न करते रहते थे। डॉ. ए. बी. पाण्डे के अनुसार गजनवी का लक्ष्य भारत से हाथी प्राप्त करना था जिनका उपयोग वह मध्यएशिया के शत्रु राज्यों के विरुद्ध करना चाहता था। दक्षिणपंथी इतिहासकारों के अनुसार महमूद के आक्रमण धार्मिक एवं आर्थिक उद्देश्यों से तो प्रेरित थे ही, साथ ही उसके आक्रमणों में राजनीतिक उद्देश्य भी निहित थे। वह अपने राज्य का विस्तार करना चाहता था। यही कारण था कि उसने अपने पिता के छोटे से गजनी राज्य को कुछ ही दिनों में विशाल साम्राज्य में बदल दिया। विभिन्न इतिहासकार भले ही कुछ भी तर्क दें किंतु सच्चाई यह है कि महमूद के भारत आक्रमणों तथा उसके परिणामों से स्पष्ट होता है कि उसके दो बड़े उद्देश्य थे, पहला यह कि वह भारत की अपार सम्पदा लूट ले और दूसरा यह कि वह भारत से मूर्ति-पूजा समाप्त करके इस्लाम का प्रसार करे। अपने समस्त 17 भारत-आक्रमणों में महमूद ने यही दो कार्य किए।
अपने 32 वर्ष के शासन काल में महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) ने गजनी के छोटे से राज्य को विशाल साम्राज्य में बदल दिया। उसकी सल्तनत की पूर्वी सीमा भारत के पंजाब में थी जबकि पश्चिमी सीमा ईरान के रेगिस्तान में स्थित थी। यह सचमुच एक विशाल साम्राज्य था। कुछ इतिहासकारों के अनुसार सुबुक्तगीन तथा उसके उत्तराधिकारी महमूद गजनवी ने गजनी के छोटे से राज्य को विशाल साम्राज्य में बदल दिया जिसकी सीमाएं बगदाद राज्य की सीमाओं से लेकर लाहौर तक तथा समरकंद (Samarkand) राज्य की सीमा से लेकर सिंध (Sindh) की सीमा तक पहुंच गईं।
यद्यपि महमूद ने अपने 17 भारत आक्रमणों में भारत से अपार सम्पदा लूटी किंतु उसने खलीफा को कोई धन नहीं भिजवाया। फिर भी महमूद ने राजनीतिक सूझबूझ से काम लेते हुए सिक्कों पर खलीफा का नाम खुदवाया तथा अपने राज्य की मस्जिदों में पढ़े जाने वाले खुतबे में खलीफा का नाम लिया जाना जारी रखा ताकि कोई अन्य अफगानी सरदार महमूद गजनवी की राजनीतिक हस्ती को चुनौती न दे सके।
डॉ. आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव ने लिखा है कि महमूद (Mahmud of Ghazni) की आकृति राजाओं की सी नहीं थी। उसका कद बीच का और हृष्ट-पुष्ट था किंतु वह देखने में कुरूप था। शूरत्व में भी वह असाधारण कोटि का नहीं था फिर भी वह बुद्धिमान एवं चतुर था तथा आदमियों को पहचानने की क्षमता रखता था।
महाराजा जयपाल महाराजा जयपाल महमूद से अपमानित होकर चिता पर बैठ गया
पंजाब के विशाल भूभाग पर हिन्दूशाही राजवंश के महाराजा जयपाल (Maharaja Jayapala) का शासन था। महाराजा जयपाल का राज्य चिनाब नदी से लेकर हिन्दूकुश पर्वतमाला तक विस्तृत था। जब महमूद गजनवी ने महाराजा को युद्धक्षेत्र में पकड़ कर अपमानित किया तो महाराजा जयपाल जीवित ही चिता में बैठ गया।
ईस्वी 999 में महमूद गजनवी गजनी (Mahmud of Ghazni) का शासक बना। जैसे ही खलीफा ने उसे सुल्तान स्वीकार किया वैसे ही महमूद गजनवी ने भारत पर हमला बोल दिया। उसका पहला आक्रमण ई.1000 में भारत के सीमावर्ती क्षेत्र में हुआ जहाँ कुछ जनजातीय कबीले निवास किया करते थे। इस प्रकार ग्याहरवीं शताब्दी के आरम्भ होते ही महमूद गजनवी ने भारत का पश्चिमी दरवाजा खटखटा दिया।
भारतवासी वैदिक काल से ही राष्ट्र शब्द से परिचित थे। यजुर्वेद की एक ऋचा में ‘राष्ट्र मे देहि’ और अथर्ववेद की एक ऋचा में ‘त्वा राष्ट्र भृत्याय’ जैसे शब्द प्रयुक्त हुए हैं। अथर्ववेद की रचना के काल तक भारतीयों में आसेतु-हिमालय एक राष्ट्र के होने का भाव जागृत हो चुका था। भारत के लोग भारत को आर्यभूमि, आर्यावर्त, उत्तरापथ, दक्षिणापथ, जम्बूद्वीप, भारतखण्ड आदि कहते थे। देवी-देवताओं की पूजाओं में भी इन शब्दों का प्रयोग होता था। ईसा से लगभग सवा तीन सौ साल पहले आचार्य विष्णुगुप्त चाणक्य (Vishnugupta Chanakya) ने भारतवर्ष को एक राष्ट्र में बांधने की परम्परा आरम्भ कर दी थी।
मौर्य एवं गुप्त सम्राटों ने राष्ट्र के एकीकरण की दिशा में बहुत कार्य किया किंतु जब छठी शताब्दी ईस्वी में गुप्त साम्राजय Gupta Epire) बिखर गया तब देश में कोई केन्द्रीय शक्ति नहीं रही। तब विभिन्न कुलों के राजाओं ने अपने-अपने राज्यों को ही अपना राष्ट्र बनाकर उसकी आराधना करनी आरम्भ कर दी। प्रत्येक राजा ने अपने राज्य की सीमा को बढ़ाना ही क्षत्रिय का एकमात्र कर्त्तव्य एवं राष्ट्रबोध समझ लिया और वे परस्पर लड़ने लगे।
महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) के आक्रमण आरम्भ होने के समय भारत छोटे-छोटे राज्यों में बंटा हुआ था। प्रत्येक राज्य के राजा, मंत्री एवं नागरिक अपने राज्य को ही अपनी मातृभूमि तथा अपना राष्ट्र समझते थे। ज्यादातर मामलों में तो राजा ही राष्ट्र का पर्यायवाची था। राजा की रक्षा करना ही राष्ट्र की रक्षा करना समझा जाता था।
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भारतीय राज्यों के शासक परस्पर लड़कर अपनी शक्ति का हा्रस करते थे। इस कारण उनमें बाह्य आक्रमणों का सामना करने की शक्ति नहीं बची थी तथा भारत के लोगों में भारत को एक राष्ट्र मानकर राष्ट्रीय एकता स्थापित करने का विचार तक उपलब्ध नहीं था।
भारतीय राजा अपने जीवन के अधिकांश समय में परस्पर शत्रुता और अपने रनिवास की समस्याओं में डूबे हुए थे। इस कारण वे बाह्य शत्रुओं के प्रति पूरी तरह उदासीन थे तथा अपने घमण्ड के कारण किसी एक राजा का नेतृत्व स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। हर समय चलने वाले युद्धों में भारत के वीर युवक इतनी बड़ी संख्या में मौत के गाल में समा जाते थे कि क्षत्रिय युवक के लिए बारह वर्ष से अधिक जीना धिक्कारपूर्ण कार्य माना जाने लगा था। इस कारण भारत में अच्छे सैनिकों की कमी हो गई थी।
महमूद गजनवी के आक्रमणों (Attacks of Mahmud of Ghazni) के आरम्भ होने के समय उत्तरी भारत में मुलतान तथा सिंध प्रदेशों में दो छोटे स्वतंत्र मुस्लिम राज्य थे जो सुबुक्तगीन (Sabuktigin) के समय से चले आ रहे थे। पंजाब के विशाल भूभाग पर हिन्दूशाही वंश के महाराजा जयपाल हिन्दूशाही का शासन था। महाराजा जयपाल (Maharaja Jayapala) का राज्य चिनाब नदी से लेकर हिन्दूकुश पर्वतमाला तक विस्तृत था। उसके पड़ौस में काश्मीर का स्वतंत्र राज्य था। कन्नौज पर प्रतिहार शासक राज्यपाल का शासन था।
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बंगाल में पाल शासक महीपाल (Raja Mahipal) का शासन था। राजपूताना पर चौहानों का शासन था जिनकी राजनधानी अजमेर थी। गुजरात, मालवा, बुंदेलखण्ड तथा मध्यभारत में भी अनेक स्वतंत्र राज्य स्थित थे। दक्षिण में चालुक्य एवं चोल वंशों का शासन था। पाल, गुर्जर प्रतिहार तथा राष्ट्रकूट राजाओं में विगत ढाई सौ वर्षों से त्रिकोणीय संघर्ष चल रहा था। जो एक दूसरे को नष्ट करके ही शांत होने वाले थे। इस राजनीतिक कमजोरी के उपरांत भी भारत की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी थी क्योंकि युद्धक्षेत्र में लड़ने का काम केवल राजपूत योद्धा करते थे। किसानों, शिल्पियों, व्यापारियों तथा कर्मकारों को इन युद्धों से कोई लेना-देना नहीं था। वे अपने काम में लगे रहते थे। देश में धार्मिक वातावरण था तथा प्रजा अपनी इच्छानुसार वैदिक, पौराणिक, शाक्त, शैव, बौद्ध एवं जैन आदि धर्मों में से अपनी-अपनी पसंद के मतों एवं सम्प्रदायों में विश्वास करती थी। हिन्दू राजाओं द्वारा प्रजा पर बहुत कम ‘कर’ लगाए गए थे जिसके कारण प्रजा की आर्थिक स्थिति अच्छी थी। मंदिरों में इतना चढ़ावा आता था कि वे अपार धन-सम्पदा से भर गए थे। भारत की इस अतुल्य सम्पदा की ओर ललचा कर महमूद गजनवी जैसा कोई भी विदेशी आक्रांता भारत की ओर सरलता से मुँह कर सकता था।
ई.1000 में महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) ने भारत के सीमावर्ती प्रदेश पर आक्रमण करके पर्वतीय प्रदेशों में रहने वाली आदिम जनजातियों के कबीलों को परास्त किया। उसने वहाँ के कुछ दुर्ग तथा नगर जीतकर उन पर अपने अधिकारी नियुक्त कर दिए। ई.1001 में महमूद गजनवी ने पंजाब के हिन्दूशाही शासक (Hindushahi Ruler) जयपाल (Maharaja Jayapala) पर आक्रमण किया। महमूद के दरबारी लेखकों ने जयपाल को ‘अल्लाह का शत्रु’ लिखा है। 27 नवम्बर 1001 को पेशावर के निकट घनघोर संग्राम हुआ। महमूद ने इस युद्ध में चुने हुए 15 हजार घुड़सवारों को उतारा। इस युद्ध में जयपाल ने जबर्दस्त वीरता का प्रदर्शन किया किंतु अंत में वह अपने पुत्र-पौत्रों एवं मंत्रियों सहित बंदी बना लिया गया।
उतबी (Al-Utbi)) ने लिखा है- ‘उन सबको जिनके चेहरों पर कुफ्र के निशान स्पष्ट दिखाई देते थे, उन्हें रस्सियों में बांधकर पापियों की तरह सुल्तान के सम्मुख प्रस्तुत किया गया। ऐसा लगता था जैसे उन्हें दोजख में भेजा जा रहा है। उनमें से कुछ के हाथ बलपूर्वक पीछे बांध दिए गए थे और कुछ की गर्दन पकड़कर घूंसों द्वारा धकेला गया था। महमूद के सैनिकों ने जयपाल की गर्दन से मणियों की माला उतार ली जिसकी कीमत दो लाख दिरहम थी। उसके साथियों के आभूषण भी छीन लिए गए। विजेताओं को लूट में इतना अधिक धन मिला कि उसका हिसाब लगाना कठिन था।’
राजा जयपाल (Maharaja Jayapala) ने महमूद को विपुल धन अर्पित करके तथा 50 हाथी देने का वचन देकर स्वयं को महमूद (Mahmud of Ghazni) की कैद से मुक्त करवाया। भारतीय राजा जब किसी दूसरे राजा को परास्त करते थे तो उसके साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार करते थे तथा प्रायः पराजित राजा से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करके उसका राज्य उसे लौटा देते थे किंतु राजा जयपाल को एक अपवित्र म्लेच्छ के हाथों अपमानित होना पड़ा, इसे वह सहन नहीं कर सका। आत्मग्लानि के कारण ई.1002 में राजा जयपाल (Maharaja Jayapala) जीवित ही चिता में बैठ गया। उसके बाद जयपाल का पुत्र आनंदपाल (Anandpal) पंजाब का शासक हुआ।
चन्द्रवंश की प्राचीनता नामक इस अध्याय में चंद्रवंशी राजाओं की कथाएँ शीर्षक से लिखी गई पुस्तक की प्रस्तावना लिखी गई है।
चन्द्रवंश की प्राचीनता इस बात से ही प्रकट हो जाती है कि भारत के प्राचीन क्षत्रियों एवं पश्चवर्ती राजपूत कुलों ने अपनी पहचान सूर्यवंशी एवं चंद्रवंशी राजाओं के रूप में स्थापित की। भारत के समस्त आर्य-राजकुल इन्हीं दो राजवंशों में से निकले थे। इनमें से सूर्यवंशी राजा अपनी उत्पत्ति महर्षि कश्यप के पुत्र सूर्य से मानते हैं। सूर्य के पुत्र वैवस्वत-मनु हुए एवं वैवस्वत-मनु के पुत्र इक्ष्वाकु हुए जो परम प्रतापी सूर्यवंश के प्रवर्तक थे।
चंद्रवंशी राजा अपनी उत्पत्ति महर्षि अत्रि के पुत्र ‘सोम‘ से मानते हैं जिनका दूसरा नाम ‘चंद्र’ है। चंद्र के पुत्र बुध हुए जिन्होंने इला नामक स्त्री से विवाह किया। इसी बुध और इला के पुत्र पुरूरवा हुए जिन्हें चंद्रवंश का प्रवर्तक माना जाता है।
मत्स्य पुराण के अनुसार वैवस्वत मनु के दस महाबली पुत्र उत्पन्न हुए जिनमें ‘इल’ ज्येष्ठ थे तथा ‘इक्ष्वाकु’ दूसरे नम्बर के थे। मत्स्य पुराण, महाभारत तथा वाल्मीकि रामायण के अनुसार राजा इल को भगवान शिव के श्राप के कारण अपने जीवन का कुछ हिस्सा स्त्री बनकर तथा कुछ हिस्सा पुरुष बनकर निकालना पड़ा था। इल ने स्त्री रूप पाकर राजा बुध से विवाह किया जिससे पुरूरवा नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। यही पुरूरवा चंद्रवंश का प्रवर्तक हुआ।
श्री हरिवंश पुराण के अनुसार वैवस्वत-मनु की दस संतानों में से पहली संतान ‘इला’ नामक कन्या थी और उसके बाद ‘इक्ष्वाकु’ आदि नौ पुत्र उत्पन्न हुए। इला का विवाह चंद्रमा के पुत्र बुध से हुआ तथा इस दाम्पत्य से पुरूरवा का जन्म हुआ। पुरूरवा से चंद्रवंश चला। मित्रावरुण के वरदान से इला कुछ समय बाद ‘सुद्युम्न’ नामक पुरुष में बदल गई। राजा सुद्युम्नु के तीन पुत्र उत्कल, गय और विनताश्व हुए जिनसे अलग-अलग राजवंश चले।
वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड में आई एक कथा के अनुसार ‘इल’ प्रजापति कर्दम के पुत्र थे तथा बाल्हीक देश के राजा थे। उन्हें भगवान शिव के श्राप के कारण स्त्री बनना पड़ा एवं माता पार्वती द्वारा कृपा किए जाने पर आधा जीवन पुरुष के रूप में तथा आधा जीवन स्त्री के रूप में जीने का अवसर मिला। उन्होंने स्त्री रूप में बुध से विवाह करके पुरूरवा को जन्म दिया जिससे चंद्रवंश चला।
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इस प्रकार सार रूप में कहा जा सकता है कि विभिन्न पुराणों, रामायण एवं महाभारत की कथाओं के अनुसार चंद्रवंश का पूर्वपुरुष चंद्रमा के पुत्र बुध तथा मनु की पुत्री इला से उत्पन्न पुरूरवा नामक राजा था। पुरूरवा को ऐल भी कहा जाता है। राजा इल की राजधानी प्रयाग थी जबकि पुरूरवा की राजधानी प्रतिष्ठान थी, जहाँ आज प्रयाग के निकट झूँसी बसी हुई है। राजा पुरूरवा के कई पुत्र हुए। पुरूरवा के वंश को पुरुवंश भी कहा जाता है। पुरूरवा का पुत्र आयु प्रतिष्ठान का शासक हुआ और अमावसु ने कान्यकुब्ज में एक नए राजवंश की स्थापना की। कान्यकुब्ज के राजाओं में जह्नु प्रसिद्ध हुए जिनके नाम पर गंगाजी का नाम जाह्नवी पड़ा। इस वंश के राजा धीरे-धीरे सम्पूर्ण भारत में फैल गए। इस कारण पुरूवंश में से आगे चलकर कई राजवंश निकले। पुरुरवा के पुत्र राजा अमावसु के वंश में महर्षि विश्वामित्र उत्पन्न हुए। वे कान्यकुब्ज के राजा गाधि के पुत्र थे। पौरववंश, कुरुवंश, यदुवंश तथा हैहयवंश भी इसी चंद्रवंश में से निकले थे। इस प्रकार युधिष्ठिर आदि पाण्डव, दुर्योधन आदि कौरव एवं भगवान श्रीकृष्ण आदि यादव भी मूलतः चंद्रवंशी क्षत्रिय थे।
यदुवंश आगे चलकर अंधक, वृष्णि, कुकुर और भोज नामक अलग-अलग राजवंशों में बंट गया। चंद्रवंशी राजाओं में नहुष, ययाति, उशीनर, शिवि आदि अनेक राजाओं को इतनी प्रसिद्धि मिली कि वे पौराणिक मिथकों एवं जनश्रुतियों के नायक बन गए।
पौरवों ने पांचाल में अपना राज्य स्थापित किया। पांचाल में पौरवों का राजा सुदास अत्यंत प्रसिद्ध हुआ। उसकी बढ़ती हुई शक्ति से आशंकित होकर पश्चिमोत्तर भारत के दस राजाओं ने एक संघ बनाया और परुष्णी (रावी) नदी के किनारे राजा सुदास से उनका युद्ध हुआ, जिसे ‘दाशराज्ञ’ युद्ध कहते हैं और जो ऋग्वेद की प्रमुख कथाओं में से एक है।
इस युद्ध में राजा सुदास की विजय हुई। पौरव वंश के राजा संवरण का पुत्र कुरु हुआ। उसके नाम से कुरुवंश प्रसिद्ध हुआ, उसके वंशज कौरव कहलाए। दिल्ली के पास इंद्रप्रस्थ और मेरठ के पास हस्तिनापुर उनके दो प्रसिद्ध नगर हुए। दुष्यंत एवं शकुंतला के पुत्र ‘भरत’ भी इसी राजवंश में हुए।
माना जाता है कि इन्हीं भरत के नाम से हमारा देश भारत कहलाया। हालांकि इस सम्बन्ध में अधिक महत्वपूर्ण मान्यता यह है कि ऋग्वैदिक आर्यों के विभिन्न जनों में से एक जन का नाम भरत था, उनके वंशज भारत कहलाए तथा उन भारतों द्वारा शासित होने के कारण हमारे देश का नाम भारत हुआ।
महाभारत का विख्यात युद्ध चंद्रवंशी राजकुमारों के बीच में लड़ा गया था जिनमें से एक पक्ष को कौरव और दूसरे पक्ष को पांडव कहा जाता है। मान्यता है कि यह युद्ध आज से लगभग 5300 वर्ष पहले लड़ा गया तथा इस युद्ध में सम्पूर्ण भारतवर्ष के राजाओं ने भाग लिया। इस युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण के सहयोग से पांडवों को विजय श्री प्राप्त हुई।
मगध का राजा जरासंध भी चंद्रवंशी ही था। वह असत्य का पक्षधर, क्रूर एवं अत्याचारी राजा था। उसने भारत के कई राजाओं को पकड़कर जेल में डाल दिया तथा उनकी रानियों को अपने महल में रख लिया। इस कारण भगवान श्रीकृष्ण ने जरासंध को पाण्डवों की सहायता से मरवाकर राजाओं एवं उनकी रानियों को मुक्त करवाया। मान्यता है कि चंदेल राजपूत, इसी जरासंध के वंशज थे।
इस पुस्तक में भगवान अत्रि द्वारा तीन हजार वर्ष तक घनघोर तपस्या करके सोम नामक पुत्र को प्राप्त करने से लेकर महाराज परीक्षित तक के काल में हुए कुछ प्रसिद्ध चंद्रवंशी राजाओं की कथाएं लिखी गई हैं। चंद्रवंशी राजाओं की यह शृंखला सत्युग से लेकर त्रेता, द्वापर एवं कलियुग तक चलती है। जो चन्द्रवंश की प्राचीनता सिद्ध करते हैं।
ये समस्त राजा प्राकृतिक शक्तियों के स्वामी, विभिन्न देवताओं के अवतार, अप्सराओं के पुत्र एवं धरती के मनुष्यों का मिला-जुला रूप प्रतीत होते हैं। इस कारण इनके साथ चमत्कारी कथाएं जुड़ी हुई हैं।
इनमें से कुछ राजाओं की कथाएं तो विभिन्न प्राकृतिक घटनाओं एवं खगोलीय पिण्डों की उत्पत्ति से सम्बन्धित प्रतीत होती हैं जिनका मानवीकरण करके उन्हें चंद्रवंशी राजाओं के साथ जोड़ दिया गया है। यही कारण है कि इन कथाओं के माध्यम से भारत के प्राचीन इतिहास के साथ-साथ प्राकृतिक एवं खगोलीय घटनाओं को भी समझा जा सकता है।
इस ग्रंथ में आई कुछ कहानियों में अनेक राजाओं एवं ऋषि-मुनियों की आयु कई हजार वर्ष बताई गई है, इस कारण कुछ पाठकों के मन में संदेह उत्पन्न हो सकता है किंतु पाठकों को यह ध्यान में रखना होगा कि पुराणों में मान्यता है कि मनुष्य की आयु सतयुग में 1 लाख वर्ष, त्रेतायुग में 10 हजार वर्ष, द्वापर में 1 हजार वर्ष तथा कलियुग में 100 वर्ष बताई गई है।
इतनी लम्बी कालगणना के बारे में कोई वैज्ञानिक दृष्टिकोण तो ज्ञात नहीं है किंतु इतना अवश्य है कि इन कालगणनाओं से चन्द्रवंश की प्राचीनता प्रकट होती है।
इस ग्रंथ में दी गई कहानियों को यूट्यूब चैनल StoriesFromHinduDharma पर वीडियो-ब्लॉग के रूप में भी उपलब्ध कराया गया है। इच्छुक पाठक इन्हें यूट्यूब पर भी देख सकते हैं तथा विदेशों में रहने वाले अपने मित्रों एवं सम्बन्धियों को उनके बारे में बता सकते हैं। आशा है भारत की युवा पीढ़ी इन कथाओं के माध्यम से भारत के प्राचीन गौरव से परिचित होगी।
नगरकोट से चांदी का महल तोड़कर गजनी ले गया महमूद गजनवी
नगरकोट की लूट (NagarkotKi Loot)दुनिया की सबसे बड़ी लूट मानी जाती है। महमूद गजनवी को जितना धन सोमनाथ के मंदिर से मिला था, अल्लाउद्दीन खिलजी को जितना धन देवगिरि से मिला था और अहमदशाह अब्दाली को जितना धन दिल्ली के लाल किले से मिला था, उन सब से कहीं अधिक धन महमूद गजनवी को नगरकोट से मिला था।
ई.1002 में पंजाब के हिन्दूशाही राजा जयपाल (Raja Jayapal) ने महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) से पराजित होने के बाद जीवित ही अग्नि में प्रवेश किया तथा उसका पुत्र आनंदपाल (Raja Anandpal) पंजाब का राजा बना। राजा जयपाल ने अपने पौत्र सुखपाल को मूलस्थान का प्रांतपति बना रखा था। जब राजा जयपाल अपने पुत्र-पौत्रों सहित युद्ध के मैदान में ही पकड़ लिया गया था तब मूलस्थान का शासक सुखपाल भी उनमें सम्मिलित था। महमूद उसे रस्सियों में बांधकर अपने साथ गजनी ले गया और उसे बलपूर्वक मुसलमान बना लिया। सुखपाल का नाम नौशाशाह रखा गया।
जब सुखपाल मुसलमान बन गया तब महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) ने उसे फिर से मूलस्थान का प्रांतपति नियुक्त कर दिया ताकि भारत में महमूद का शासन बना रह सके। नौशाशाह अर्थात् सुखपाल ने मूलस्थान लौटकर स्वयं को फिर से हिन्दू घोषित कर दिया तथा महमूद के विरुद्ध विद्रोह कर दिया।
महमूद ने इसे अपना अपमान समझा और वह एक बार फिर से अपनी तलवार निकालकर भारत पर झपट पड़ा। महमूद ने सुखपाल (Sukhpal) को फिर से युद्ध में बंदी बना लिया और उसे फिर से गजनी ले गया। इस दौरान महमूद ने झेलम के तट पर स्थित भेरा राज्य पर भी आक्रमण किया। भेरा के हिन्दू शासक (Hinu Ruler Of Bhera) बाजीराव ने सम्मुख युद्ध में पराजित होकर आत्मघात कर लिया। इस प्रकार मूलस्थान तथा भेरा पर महमूद का अधिकार हो गया।
इस बार महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) ने दाउद करमाथी नामक एक अफगान सरदार को मूलस्थान का प्रांतपति नियुक्त किया किंतु ई.1005 में दाउद ने भी बगावत कर दी तथा स्वयं को स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया। इस पर महमूद ने मुल्तान पर पुनः आक्रमण किया। दाऊद ने महमूद का सामना किया किंतु दाउद बुरी तरह पराजित हो गया।
दाउद ने महमूद को अपार धन देकर अपनी जान बचाई। उसने महमूद को वार्षिक कर देना भी स्वीकार किया किंतु महमूद ने दाऊद को हटाकर, पंजाब के राजा आनंदपाल के पुत्र सेवकपाल को मूलस्थान का शासक नियुक्त किया जिसे अब मुल्तान कहा जाने लगा था।
सेवकपाल ने भी महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) को वार्षिक कर देना स्वीकार किया किंतु ई.1007 में सेवकपाल ने भी स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया। अतः महमूद ने सेवकपाल को दण्डित करने के लिए पुनः मुल्तान पर आक्रमण किया। सेवकपाल परास्त होकर बंदी हुआ। उसने महमूद को 4 लाख दिरहम भेंट किए।
महमूद ने उसे मुल्तान से खदेड़ कर दाऊद को पुनः मुल्तान का शासक नियुक्त कर दिया। जब महमूद गजनवी ने पंजाब के हिन्दूशाही राजा आनंदपाल (Raja Anandpal) के पुत्र सेवकपाल से मुल्तान छीन लिया तो आनंदपाल मुल्तान के मुस्लिम प्रांतपति दाउद करमाथी पर हमले करने लगा। इस पर ई.1008 में महमूद ने राजा आनंदपाल पर आक्रमण किया।
इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-
राजा आनंदपाल (Raja Anandpal) ने अफगानिस्तान के दुर्दान्त तुर्कों से लोहा लेने के लिए उत्तर-भारत के राजपूत राजाओं का एक संघ बनाया। उसने उज्जैन, ग्वालियर, कन्नौज, कालिंजर, दिल्ली तथा अजमेर के राजाओं की सहायता से एक विशाल सेना एकत्रित कर ली। राजा आनंदपाल की सहायता के लिए हिन्दू औरतों ने अपने आभूषण गलाकर बेच दिए तथा उससे प्राप्त धन इस संघ की सहायता के लिए भेजा।
मुल्तान के खोखरों ने भी आनंदपाल की सहायता की। झेलम नदी के किनारे उन्द नामक स्थान पर दोनों पक्षों में भयानक युद्ध हुआ। डॉ. आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव ने लिखा है कि ई.1009 में पेशावर के पास वैहन्द के सामने के मैदान में दोनों पक्षों में घमासान युद्ध हुआ।
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इस युद्ध में राजा आनंदपाल (Raja Anandpal) का पलड़ा भारी पड़ा किंतु अचानक आनंदपाल (Raja Anandpal) का हाथी बिगड़ गया जिससे हिन्दू सेना में खलबली मच गई। तभी महमूद ने तीव्र गति से आक्रमण किया जिससे युद्ध की दिशा बदल गई। भारतीय सेना क्षत-विक्षत होकर भाग खड़ी हुई। महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) की सेना ने दूर तक उसे खदेड़ा तथा कांगड़ा के पास स्थित नगरकोट के किले को घेर लिया। नगरकोट के शासक ने तीन दिन तक महमूद की सेना का सामना किया किंतु अंत में कांगड़ा दुर्ग का पतन हो गया। इस विजय के बाद महमूद ने तीन दिन तक नगरकोट के प्रसिद्ध मंदिर को लूटा और उजाड़ा। यह मंदिर कांगड़ा दुर्ग से लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इसे नगरकोट मंदिर तथा ब्रजेश्वरी देवी मंदिर कहते हैं। उत्तर भारत के लाखों लोग विगत हजारों साल से इस मंदिर की यात्रा करते हैं तथा प्रचुर चढ़ावा चढ़ाते हैं। इस कारण यह मंदिर सोने-चांदी, हीरे-मोती एवं अन्य बहुमूल्य सामग्री से भरा हुआ था। महमूद के दरबारी अरबी लेखक उतबी (Al Utbi) ने लिखा है कि नगरकोट की लूट(Nagarkot Ki Loot) में महमूद को इतना अधिक धन मिला कि महमूद को जितने भी ऊंट मिल सके, उन पर उस सोने को लाद दिया गया। केवल सिक्कों का मूल्य ही 70 हजार दिरहम था। 7 लाख दिरहम मूल्य के सोने-चांदी के आभूषण थे जिसका वजन 400 मन था।
इसके अतिरिक्त मोती और सुंदर वस्त्र भी अत्यधिक मात्रा में प्राप्त हुए। ऐसे सुंदर, कोमल एवं जड़ाऊ वस्त्र महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) ने अपने जीवन में कभी नहीं देखे थे। लूट में चांदी का बना हुआ एक सफेद घर भी मिला जिसकी बनावट धनी पुरुषों के घर जैसी थी और जो तीन गज लम्बा और 15 गज चौड़ा था। उसके विभिन्न भागों को अलग करके पुनः जोड़ा जा सकता था। एक रोमी कपड़े का शामियाना था जिसकी लम्बाई 40 गज और चौड़ाई 20 गज थी। वह ढले हुए दो सोने और दो चांदी के खम्भों पर सधा हुआ था। महमूद गजनी ने लूट का माल अपने ऊंटों, खच्चरों, घोड़ों एवं हाथियों पर लदवा लिया।
लेनपूल ने लिखा है- ‘नगरकोट की लूट (Nagarkot Ki Loot) में महमूद को इतना धन मिला कि सारी दुनिया भारत की अपार धनराशि को देखने के लिए चल पड़ी।’
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काशी...
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