Monday, September 20, 2021

अध्याय – 23 (अ) : मुगलों का राज्य विस्तार

जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर

बाबर का वंश परिचय

 बाबर का पिता उमर शेख मिर्जा, तैमूर लंग का वंशज था। शेख मिर्जा फरगना के एक छोटे से राज्य का शासक था जो उसे अपने पूर्वजों से मिला था। बाबर की माता का नाम कूललूक निगार खानम था जो मंगोल सरदार यूनस खाँ की पुत्री थी। यूनस खाँ, चंगेज खाँ का वंशज था। इस प्रकार बाबर, तैमूर लंग का पांचवा वंशज था तथा मातृपक्ष में चंगेज खाँ की चौदहवीं पीढ़ी में था। इस प्रकार बाबर की धमनियों में तुर्कों तथा मंगोलों का मिश्रित रक्त प्रवाहित हो रहा था। उसका परिवार चगताई शाखा में था किंतु आम तौर पर उन्हें मंगोल माना जाता था। भारत में वे मुगल कहलाये।

बाबर का प्रारम्भिक जीवन

बाबर का वास्तविक नाम जहीरूद्दीन मुहम्मद था। उसका जन्म 14 फरवरी 1483 को फरगना में हुआ। वह अत्यंत निर्भीक बालक था, इसलिये सब उसे बाबर कहने लगे। तुर्की भाषा में बाबर बाघ को कहते हैं। बाबर के आठ भाई-बहिन थे जिनमें बाबर सबसे बड़ा था। उसने बचपन में ही फारसी भाषा पर पूरा अधिकार कर लिया था। वह एक प्रतिभा सम्पन्न बालक था। डॉ. ए. एल. श्रीवास्तव ने लिखा है कि बाबर अकाल प्रौढ़ बालक था। उसकी मानसिक शक्तियों का ऐसा सुन्दर विकास हुआ था कि वह राजनीतिक घटनाओं के महत्व को आसानी से समझ लेता था और मानव चरित्र को सरलता से परख लेता था। बाबर जब ग्यारह वर्ष का हुआ तब उसके पिता उमर शेख मिर्जा की मृत्यु हो गई।

फरगना के तख्त की प्राप्ति तथा आरंभिक कठिनाइयाँ

 उमर शेख मिर्जा की मृत्यु के बाद बाबर को फरगना का शासक बना दिया गया किंतु उसी समय उसके चाचा अहमद मिर्जा ने फरगना पर आक्रमण कर दिया। अहमद मिर्जा समरकंद का शासक था। उसने बाबर के कुछ नगरों को दबा लिया। बाबर के मामा महमूदखां ने भी बाबर के राज्य के कुछ परगने दबा लिये। काशनगर के सुल्तान ने भी फरगना का कुछ हिस्सा दबा लिया। एक साथ आई इन मुसीबतों से भी बाबर नहीं घबराया। भाग्य से अहमद मिर्जा की सेना में रोग फैल गया और वह बाबर से संधि करके उसके क्षेत्रों को खाली करके चला गया। इसके बाद बाबर ने अपने मामा महमूद खाँ को अक्षी के कड़े युद्ध में परास्त किया। दो शत्रुओं से निबटने के बाद बाबर ने काशनगर की सेना पर आक्रमण किया तथा उसे बुरी तरह परास्त किया। इस प्रकार बाबर को तीनों शत्रुओं से छुटकारा मिल गया तथा उसकी आरम्भिक कठिनाइयां दूर हो गईं।

फरगना और समरकंद की आवाजाही

कुछ समय बाद समरकंद के शासक और बाबर के चाचा अहमद मिर्जा की मृत्यु हो गई तथा उसका अयोग्य पुत्र अहमद मिर्जा समरकंद का शासक बना। समरकंद तुर्की सभ्यता का केन्द्र था तथा बाबर के पूर्वजों की राजधानी था। इसलिये बाबर ने समरकंद पर सैनिक अभियान करने का निर्णय लिया। इतिहासकारों का मानना है कि अत्यंत महत्वाकांक्षी बाबर के लिये फरगना का छोटा सा राज्य पर्याप्त नहीं था। बाबर अपने पूर्वजों की तरह मध्य-एशिया के विशाल साम्राज्य का शासक बनना चाहता था। 1496 ई. में बाबर ने अपने पूर्वज तैमूर लंग की राजधानी समरकन्द पर आक्रमण किया किंतु असफल होकर लौट आया। 1497 ई. में उसने पुनः समरकंद पर आक्रमण किया। इस बार बाबर समरकंद पर अधिकार करने में सफल रहा। वह समरकंद में रहकर शासन करने लगा। इसी बीच बाबर बीमार पड़ा। इस पर कुछ अमीरों ने उसकी मृत्यु की अफवाह उड़ा दी। इसे सुनकर बाबर के छोटे भाई जहाँगीर ने फरगना पर अधिकार कर लिया। यह सुनकर बाबर सेना सहित फरगना के लिये रवाना हुआ किंतु वह जहाँगीर से फरगना प्राप्त नहीं कर सका। निराश होकर वह समरकंद लौटा किंतु तब तक समरकंद भी उसके हाथ से निकल गया। कुछ दिनों तक इधर-उधर ठोकरें खाने के बाद बाबर ने पुनः फरगना पर आक्रमण किया तथा उसने फरगना पर अधिकार कर लिया किंतु 1500 ई. में फरगना पुनः उसके हाथ से निकल गया। बाबर ने पुनः समरकंद पर आक्रमण करके उस पर अधिकार कर लिया। 1502 ई. में शैबानी ने बाबर पर आक्रमण किया। सराय-पुल नामक स्थान पर दोनों सेनाओं में घमासान हुआ जिसमें बाबर परास्त हो गया। समरकंद पर शैबानी का अधिकार हो गया। बाबर को अपनी बहिन का विवाह शैबानी के साथ कर देना पड़ा। इस प्रकार तीसरी बार समरकंद बाबर के हाथ से निकल गया।

काबुल, गजनी तथा कान्धार पर अधिकार

1505 ई. में बाबर ने काबुल तथा गजनी पर आक्रमण किये। ये दोनों शहर बड़ी सरलता से बाबर के अधिकार में आ गये। 1507 ई. में बाबर ने अपने पूर्वजों की उपाधि मिर्जा का त्याग करके बादशाह की उपाधि धारण कर ली। इसी वर्ष उसने गान्धार पर अधिकार कर लिया। 1513 ई. में शैबानी के मर जाने पर बाबर ने एक बार पुनः समरकंद पर आक्रमण करके उस पर अधिकार कर लिया। इस बार उजबेगों ने बाबर को समरकंद से मार भगाया। कांधार भी बाबर के हाथ से निकल गया।

युद्धों का विशद अनुभव

बाबर का अब तक का जीवन युद्धों में बीता था जिनमें से कई युद्ध उसने हारे तथा कई युद्ध जीते किंतु इन युद्धों ने उसे एक जबर्दस्त योद्धा बना दिया। उजबेगों से युद्ध करने के दौरान बाबर ने तुलगमा पद्धति सीखी। मंगोलों एवं अफगानों से युद्ध करते समय उसने अपनी सेना को शत्रु की आँखों से छिपा कर रखना सीखा। ईरानियों से उसने बंदूक का प्रयोग करना तथा सजातीय तुर्कों से उसने गतिशील अश्वारोहिणी का संचालन करना सीखा। अपने शत्रुओं से ही उसने युद्ध क्षेत्र में योजनाबद्ध व्यूह रचना करना सीखा। इस प्रकार वह एक जबर्दस्त योद्धा एवं सेनापति बन गया। ई.1514 में बाबर को उस्ताद अली नामक एक तुर्क तोपची की सेवाएँ प्राप्त हुईं। इस तोपची की सहायता से बाबर ने एक शक्तिशाली तोपखाना तैयार किया।

भारत पर आक्रमण

समरकंद तथा फरगना हाथ से निकल जाने के कारण वह मध्य एशिया से निराश हो चुका था। कंदहार भी उसके हाथ से निकल चुका था। काबुल तथा गजनी के अनुपजाऊ प्रदेश बाबर की महत्वाकांक्षाओं को पूरा नहीं कर सकते थे इसलिये उसने भारत पर अपनी दृष्टि गड़ाई।

बाबर के आक्रमण के समय भारत की दशा

जिस समय बाबर ने आक्रमण करने का निर्णय लिया, उस समय भारत की राजनीतिक दशा हमेशा की तरह अत्यंत शोचनीय थी तथा अनेक परिस्थितियाँ बाबर के अनुकूल थीं। इन परिस्थितियों का वर्णन इस प्रकार से है-

(1.) दिल्ली सल्तनत का विघटन: तैमूर के आक्रमण के पश्चात् उत्तरी भारत फिर कभी नहीं संभल सका था। दिल्ली की कमजोरी का लाभ उठाकर अनेक तुर्क तथा अफगान अमीरों ने छोटे-छोटे स्वतन्त्र राज्य स्थापित कर लिये थे। इस कारण दिल्ली सल्तनत की सीमाएं सिकुड़कर एक छोटे से प्रांत के रूप में रह गई थीं।

(2.) इब्राहीम लोदी के विरुद्ध अमीरों का षड़यंत्र: इन दिनों दिल्ली में इब्राहीम लोदी शासन कर रहा था। उसके अमीर उससे असंतुष्ट थे और उसके विरुद्ध विभिन्न प्रकार के षड्यन्त्र रच रहे थे।

(3.) जौनपुर तथा दिल्ली की प्रतिद्वंद्विता: जौनपुर में शर्की सुल्तानों ने स्वतन्त्र राज्य स्थापित कर लिया था और दिल्ली सल्तनत के प्रतिद्वन्द्वी बन गये थे। उनकी दृष्टि सदैव दिल्ली के तख्त पर लगी रहती थी और वे उसे हड़पने के लिए अनुकूल परिस्थितियों की प्रतीक्षा कर रहे थे।

(4.) बिहार में स्वतंत्र राज्य की स्थापना: बिहार में लोहानी अथवा नुहानी अफगानों ने अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया था।

(5.) ब¦ाल में स्वतंत्र राज्य की स्थापना: हुसैनशाह तथा नसरत शाह ने ब¦ाल में स्वतन्त्र राज्य स्थापित कर लिये थे तथा दक्षिण बिहार पर अधिकार करने के लिये लालायित थे।

(6.) नसरत शाह द्वारा तिरहुत पर अधिकार: नसरत शाह ने 1521 ई. में तिरहुत पर अधिकार करके अपने राज्य की सीमा को मुंगेर तथा हाजीपुर तक बढ़ा लिया। यदि लोहानी अमीर उसका विरोध न करते तो जौनपुर तथा चुनार दोनों ही खतरे में पड़ जाते। इसके विपरीत यदि लोहानी अमीर नसरत शाह से संधि कर लेते तो दिल्ली सल्तनत का सम्पूर्ण पूर्वी भाग खतरे में पड़ जाता।

(7.) उड़ीसा में स्वतन्त्र राज्य की स्थापना: उड़ीसा में भी एक स्वतन्त्र राज्य की स्थापना हो गई थी। इसके शासकों की रुचि उत्तरी भारत की राजनीति में उतनी नहीं थी जितनी दक्षिण भारत की राजनीति में थी।

(8.) मेवाड़ के शासक राणा सांगा का उदय: दिल्ली सल्तनत के दक्षिण तथा दक्षिण-पश्चिम में राजपूताना स्थित था जिसमें राजपूतों के छोटे-छोटे राज्य थे। इन राजपूतों ने राणा सांगा के नेतृत्व में बाबर के विरुद्ध प्रबल संघ बना लिया था। राणा सांगा वीर योद्धा था और अनेक युद्धों में सफलता प्राप्त कर चुका था। 1519 ई. में राणा सांगा ने मालवा के शासक महमूद (द्वितीय) को कैद कर लिया। 1520 ई. में सांगा ने अहमदनगर के शासक मुबारिजुल को परास्त करके अहमदनगर पर अधिकार कर लिया था। अब सांगा के लिये दिल्ली की ओर बढ़ने से पहले केवल गुजरात से निबटना ही शेष रह गया था।

(9.) गुजरात के शासक मुजफ्फरशाह का भय: मालवा तथा अहमदनगर की विजयों के फलस्वरूप राणा सांगा, गुजरात के शासक मुजफ्फर शाह से सीधा संघर्ष करने की स्थिति में आ गया था। दिल्ली सल्तनत के लिए यह स्थिति बड़ी भयावह थी। यदि राणा सांगा को मुजफ्फरशाह के विरुद्ध सफलता प्राप्त हो जाती तो उसकी विजयी सेना निश्चित रूप से राजपूताने के पूर्व में स्थित दिल्ली की ओर बढ़ती और दिल्ली सल्तनत के लिए भयानक संकट उत्पन्न कर देती और यदि राणा की पराजय हो जाती तो मुजफ्फर शाह के लिए दिल्ली तक का मार्ग साफ हो जाता।

(10.) पंजाब में दौलत खाँ लोदी का स्वतंत्र राज्य: दिल्ली सल्तनत की पश्चिमी सीमा पर स्थित पंजाब में लोदी अमीर बड़े शक्तिशाली हो गये थे। वे दौलत खाँ के नेतृत्व में संगठित थे। दौलत खाँ लोदी, तातार खाँ का पुत्र था जो दिल्ली के सुल्तान सिकन्दर लोदी का घोर विरोधी था। दौलत खाँ लगभग बीस वर्षों से पंजाब में स्वतंत्र शासक की तरह शासन कर रहा था। वह इब्राहीम लोदी को किसी भी प्रकार की सहायता देने के लिए तैयार नहीं था। वास्तव में वह बाबर तथा इब्राहीम लोदी दोनों को ही अपना शत्रु समझता था। वह जानता था कि चक्की के इन दो पाटों के बीच में पड़कर वह कभी भी पिस सकता है।

(11.) आलम खाँ का षड़यंत्र: दौलत खाँ लोदी के साथ सुल्तान इब्राहीम लोदी का चाचा आलम खाँ लोदी भी इन दिनों पंजाब में विद्यमान था। वह बहुत दिनों से आगरा पर दृष्टि लगाये हुए था और इब्राहीम लोदी के विरुद्ध षड्यन्त्र रचा करता था।

(12.) सिंध का राज्य: मुहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु के बाद से ही सिंध स्वतंत्र राज्य के रूप में स्थित था। बाबर के आक्रमण के समय सिंध पर अरब वालों का अधिकार था।

(13.) काश्मीर का राज्य: बाबर के आक्रमण के समय काश्मीर का राज्य महत्वपूर्ण था। उस समय कश्मीर के प्रधान वजीर ने सुल्तान मुहम्मदशाह को अपदस्थ करके स्वयं सत्ता हथिया ली थी।

(14.) खानदेश: खानदेश ताप्ती नदी के किनारे स्थित एक छोटा सा किंतु समृद्ध राज्य था। बाबर के आक्रमण के समय यहाँ महमूद प्रथम का शासन था।

(15.) बहमनी राज्य:  बाबर के आक्रमण के समय बहमनी राज्य अपना वैभव खोकर पांच राज्यों- बीजापुर, बरार, बीदर, अहमदनगर और गोलकुण्डा में विभक्त हो चुका था। ये राज्य आपस में लड़ते रहते थे। इस प्रकार बाबर के आक्रमण के समय दक्षिण भारत में मुस्लिम शक्ति अपनी अंतिम सांसें गिन रही थी।

(16.) विजयनगर राज्य: बाबर के आक्रमण के समय विजयनगर राज्य पर राजा कृष्णदेवराय का शासन था। वह अशोक, चंद्रगुप्त विक्रमादित्य, हर्ष और भोज के समान ख्याति प्राप्त श्रेष्ठ सम्राट था। उसका राज्य अपने वैभव के शिखर पर था। बाबर ने लिखा है कि सैनिक दृष्टि से काफिर राजकुमारों में विजयनगर का राजा सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।

(17.) पुर्तगाली राज्य: बाबर के आक्रमण के समय पुर्तगालियों की शक्ति अधिक नहीं थी फिर भी उन्होंने गोआ पर अधिकार कर लिया था। उनके कारण भारत के पश्चिमी समुद्र तट के राजनीतिक एवं व्यापारिक जीवन में अस्थिरता व्याप्त थी।

निष्कर्ष

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि सोलहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में भारत अनेक छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्यों का झुण्ड था जो एक ओर तो परस्पर शत्रु थे तथा दूसरी ओर किसी भी तरह दिल्ली सल्तनत को समाप्त कर देना चाहते थे। इस कारण भारत में किसी भी प्रबल आक्रमणकारी का सामना करने का बल नहीं था। इन परिस्थितियों में बाबर जैसे महत्वाकांक्षी आक्रांता का भारत पर आक्रमण करने के लिए आकृष्ट हो जाना स्वाभाविक ही था।

बाबर के भारत पर आक्रमण करने के कारण

(1.) साम्राज्य विस्तार की महत्वाकांक्षा: बाबर अत्यंत महत्त्वाकांक्षी शासक था। वह अपने पूर्वज तैमूर लंग की भाँति एक विशाल साम्राज्य खड़ा करना चाहता था। उसने पहला प्रयास मध्य-एशिया में किया। वहाँ असफल रहने के बाद उसने काबुल तथा गजनी में अपना राज्य स्थापित किया किंतु वह काबुल तथा गजनी से संतुष्ट नहीं हुआ। इसलिये वह अपना साम्राज्य भारत में फैलाना चाहता था।

(2.) भारत पर जीत का गौरव हासिल करने की आकांक्षा: उन दिनों इस्लामी जगत में काफिरों के देश भारत पर विजय प्राप्त करना किसी भी मुस्लिम शासक के लिये गौरव की बात माना जाता था। इसलिये बाबर भारतवर्ष अथवा उसके एक बहुत बड़े भाग को जीतकर भारत विजय का गौरव प्राप्त करना चाहता था।

(3.) भारत पर वंशानुगत राज्य होने का दावा: बाबर, तैमूर लंग का वंशज होने के कारण तैमूर द्वारा विजित भारतीय क्षेत्रों को अपने वंशानुगत राज्य में होने का दावा करता था। जब तैमूर ने भारत पर आक्रमण किया था तब उसने पंजाब के पश्चिमी भाग को अपने राज्य में मिला लिया था परन्तु बाद में अफगानों ने उस पर अपना अधिकार जमा लिया था। इसलिये बाबर पंजाब पर अपना वंशानुगत अधिकार समझता था और उसे फिर से पाना चाहता था।

(4.) काबुल तथा गजनी पर अधिकार: समरकंद तथा फरगना के हाथ से निकल जाने के बाद बाबर काबुल तथा गजनी पर अधिकार जमाने में सफल रहा था इस कारण उसके राज्य की सीमा भारत के काफी निकट आ गई थी।

(5.) भारत की अपार सम्पत्ति प्राप्त करने की लालसा: बाबर भारत पर आक्रमण करके अपने पूर्वजों की भांति अपार सम्पत्ति प्राप्त करना चाहता था।

(6.) काफिरों को नष्ट कर इस्लाम फैलाने की लालसा: बाबर की धमनियों में तैमूरलंग तथा चंगेज खाँ का रक्त विद्यमान था। इसलिये बाबर भी उनकी तरह भारत के काफिरों को मारकर इस्लाम फैलाने को लालायित था।

(7.) भारत की परिस्थितियाँ: भारत की तत्कालीन राजनीतिक परिस्थ्तिियों ने भी बाबर को भारत पर आक्रमण करने के लिये उत्साहित किया। वह जानता था कि भारत का कोई भी प्रांतीय शासक तथा राणा सांगा, इब्राहीम लोदी का साथ नहीं देगा।

(8.) लाहौर के अफगान अमीरों का निमंत्रण: लाहौर के अफगान अमीरों ने बाबर को दिल्ली पर आक्रमण करने के लिए आमन्त्रित करने का निश्चय किया। आलम खाँ तथा दौलत खाँ के पुत्र दिलावर खाँ को बाबर के पास भेजकर आग्रह किया गया कि बाबर इब्राहीम लोदी को दिल्ली के तख्त से हटाकर, आलम खाँ को सुल्तान बनाने में सहायता करे क्योंकि इब्राहीम लोदी बड़ा ही क्रूर तथा निर्दयी शासक है। इससे बाबर ने भारत पर आक्रमण करने की तैयारियाँ आरम्भ कर दीं।

बाबर की भारत में उपलब्धियाँ

भारत में बाबर की उपलब्धियाँ तीन प्रकार की हैं- (1.) सामरिक उपलब्धियाँ, (2.) राजनीतिक उपलब्धियाँ तथा (3.) सांस्कृतिक उपलब्धियाँ। इन तीनों उपलब्धियों का आधार सामरिक उपलब्धियाँ ही हैं। अतः सबसे पहले उसकी सामरिक उपलब्धियों का अध्ययन करना उचित होगा।

भारत पर बाबर के प्रारंभिक आक्रमण

पहला आक्रमण: 1519 ई. में बाबर ने भारत पर पहला आक्रमण किया। उसने बाजोर के दुर्ग को घेर लिया। दुर्ग में नियुक्त सैनिक बाबर की बंदूकों के समक्ष नहीं टिक सके। अलीकुली ने तोपों का प्रयोग किया। कुछ ही घण्टों में तीन हजार सैनिक मारे गये। बाबर ने बाजोर में रहने वाली हिन्दू जनता के साथ बड़ा कठोर व्यवहार किया। समस्त पुरुषों को मौत के घाट उतार दिया गया तथा स्त्रियों एवं बच्चों को गुलाम बना लिया गया। इसके बाद उसने झेलम के तट पर स्थित भीरा को अपने अधिकार में ले लिया। भीरा के लोगों ने बिना लड़े ही भीरा बाबर को समर्पित कर दिया।

दूसरा आक्रमण: 1519 ई. में बाबर ने भारत पर दूसरा आक्रमण किया। वह युसूफ जई अफगानों को अपने अधीन करके पेशावर पर अधिकार जमाना चाहता था किंतु उसी समय बदख्शां में उपद्रव हो गया और बाबर इस आक्रमण को अधूरा छोड़कर लौट गया।

तीसरा आक्रमण: 1520 ई. में बाबर बाजोर, भीरा होता हुआ स्यालकोट तक आ पहुँचा। बाबर स्यालकोट से आगे बढ़ता इससे पहले उसे समचार मिला कि कांधार के शासक शाह बेग अर्जुन ने बगावत कर दी है। अतः बाबर स्यालकोट से वापस लौट गया। 1522 ई. में उसने कांधार पर अधिकार कर लिया तथा अपने दूसरे पुत्र कामरान को वहाँ का सूबेदार नियुक्त किया।

चौथा आक्रमण: पंजाब के सूबेदार दौलत खाँ ने दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी से स्वतंत्र होने के लिये बाबर को दिल्ली सल्तनत पर आक्रमण करने का निमंत्रण भिजवाया। 1524 ई. में बाबर सेना लेकर चौथी बार भारत आया। इब्राहीम लोदी पंजाब की गतिविधियों से अनजान नहीं था। उसने एक सेना पंजाब पर आक्रमण करने भेजी जिसने बड़ी सरलता से लाहौर पर अधिकार कर लिया। इसी बीच बाबर की सेना ने लाहौर पर आक्रमण कर दिया। दिल्ली की सेना परास्त हो गई तथा बाबर ने लाहौर पर अधिकार जमा लिया। अब बाबर की सेना लाहौर से आगे बढ़ी और उसने दिपालपुर पर अधिकार कर लिया। चूँकि बाबर के साथी आगे बढ़ने के लिए तैयार नहीं थे और उसे अपने राज्य में उजबेगों का विद्रोह होने की भी सूचना मिली इसलिये बाबर दिपालपुर से काबुल लौट गया।

पाँचवां आक्रमण: बाबर के काबुल लौट जाने पर दौलत खाँ तथा दौलत खाँ के चाचा आलम खाँ ने दिल्ली पर आक्रमण किया परन्तु इब्राहीम लोदी की सेना ने उन्हें मार भगाया। इस पर आलम खाँ तथा दौलत खाँ का पुत्र दिलावर खाँ, बाबर की शरण में पहुँचे। उनके निमंत्रण पर बाबर ने पुनः दिसम्बर 1525 में विशाल सैन्य के साथ भारत के लिए प्रस्थान किया। जब वह मार्ग में ही था तब उसे सूचना मिली कि दौलत खाँ अपनी सेना लेकर लाहौर की ओर बढ़ रहा है। इसलिये बाबर ने अपनी चाल तेज कर दी और दौलत खाँ के लाहौर पहुँचने से पहले लाहौर पर अधिकार कर लिया। इस पर दौलत खाँ के साथी घबरा उठे और वे दौलत खाँ का साथ छोड़कर बाबर से जा मिले। दौलत खाँ ने भी विवश होकर बाबर के समक्ष समर्पण कर दिया। बाबर ने दौलत खाँ को बंदी बनाकर भेरा भेज दिया किंतु भेरा पहुँचने से पहले ही दौलत खाँ की मृत्यु हो गई। इस प्रकार पंजाब पर बाबर का अधिकार हो गया।

पानीपत का प्रथम युद्ध

बाबर की सेना: अप्रेल 1526 में बाबर अपनी सेना के साथ पानीपत के मैदान में आ डटा। वह अपने साथ 12 हजार सैनिक लाया था किंतु मार्ग में बहुत से भारतीय सैनिक भी उसके साथ हो लिये। इस प्रकार जब बाबर पानीपत के मैदान में पहुँचा तो उसके सैनिकों की संख्या 25 हजार हो चुकी थी।

बाबर की तैयारी: बाबर कुशल तथा अनुभवी सेनानायक था। वह मंगोलों, उजबेगों तथा पारसीकों की रणपद्धतियों से परिचित था। चूँकि बाबर की सेना इब्राहीम लोदी की सेना की अपेक्षा संख्या में केवल एक-चौथाई थी इसलिये बाबर ने इब्राहीम लोदी के विरुद्ध अश्वारोहियों तथा तोपखाने के संयुक्त प्रयोग का निश्चय किया। उसने सबसे पहले अपनी सेना की चारों ओर से सुरक्षा की व्यवस्था की ताकि शत्रु अचानक उसकी सेना में न आ घुसे। बाबर ने अपनी सेना के एक पक्ष की सुरक्षा के लिये पानीपत नगर को ढाल के रूप में प्रयुक्त किया। अपनी सेना के दूसरे पक्ष की सुरक्षा के लिये खाइयां खुदवाकर उनके दोनों तरफ कटे हुए पेड़ तथा कँटीली झाड़ियां डलवा दीं। बाबर ने सेना के सामने 700 गाड़ियाँ खड़ी करके उन्हें कच्चे चमड़े की रस्सियों द्वारा एक-दूसरे से बँधवा दिया। इन गाड़ियों के पीछे उसने अपनी सेना को सजाया।

लोदी की सेना: इब्राहीम लोदी अपनी विशाल सेना के साथ पानीपत के मैदान में आ डटा। उसके पास लगभग दो हजार हाथी थे। इन हाथियों को तोपखाने का सामना करने की शिक्षा नहीं दी गई थी। इसलिये यह सम्भावना अधिक थी कि तोपेखाने की आग तथा गोलों की आवाज से बिगड़कर हाथी उलटे लौट पड़ेंगे तथा अपने ही सैनिकों को रौंद डालेंगे किंतु इब्राहीम लोदी को, हाथियों को प्रयुक्त करने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं सूझा।

लोदी की तैयारी: इब्राहीम लोदी अदूरदर्शी सुल्तान था। उसने बाबर के आक्रमण की कोई गंभीर तैयारी नहीं की। उसे अपनी सेना की विशालता पर पूरा विश्वास था। इसलिये जब बाबर ने पंजाब पर अधिकार कर लिया तब इब्राहीम लोदी अपनी विशाल सेना लेकर दिल्ली से पंजाब की ओर चल पड़ा तथा पानीपत के मैदान में आ डटा।

बाबर की विजय: 12 अप्रेल 1526 को दोनों सेनाएं एक दूसरे के समक्ष आ खड़ी हुईं। नौ दिन तक दोनों सेनाएँ एक दूसरे के समक्ष डटी रहीं। अन्त में 21 अप्रेल को इब्राहीम लोदी ने अपनी सेना को आक्रमण करने की आज्ञा दी। इब्राहीम की सेना इतनी विशाल थी कि उसका सुचारू रीति से संचालन नहीं हो सका। बाबर की सेना ने इब्राहीम लोदी की सेना को चारों ओर से घेरकर उस पर तोपेखाने तथा बाणों की वर्षा आरम्भ कर दी। यह युद्ध प्रातः 9 से 10 बजे के बीच आरम्भ हुआ तथा दोपहर बाद तक भयंकर रूप से होता रहा। अंत में इब्राहीम की सेना परास्त हो गई। उसके 15 हजार सैनिक मारे गये और शेष सेना लड़ाई के मैदान से भाग खड़ी हुई। इब्राहीम लोदी स्वयं लड़ता हुआ मारा गया। इस प्रकार बाबर को पानीपत के प्रथम युद्ध में विजय प्राप्त हो गई।

पानीपत के युद्ध में बाबर की विजय के कारण

यद्यपि इब्राहीम लोदी की सेना बाबर की सेना की तुलना में अधिक विशाल थी परन्तु बाबर ने छोटी सेना की सहायता से ही उस पर विजय प्राप्त कर ली। इस विजय के निम्नलिखित कारण थे-

(1.) बाबर का कुशल सेनापतित्त्व: बाबर कुशल तथा अनुभवी सेनापति था। उसे युद्ध लड़ने का व्यापक अनुभव था। वह मंगोलों, उजबेगों तथा पारसीकों की रणपद्धतियों से परिचित था। वह अनेक युद्धों में सेना का संचालन करके युद्ध कला की व्यवहारिक बारीकियों का ज्ञान प्राप्त कर चुका था। इसके विपरीत इब्राहीम लोदी युद्ध के अनुभव से शून्य था। उसने इससे पहले एक भी बड़े युद्ध में भाग नहीं लिया था। न ही वह विदेशी रणपद्धतियों से परिचित था। ऐसी स्थिति में वह बाबर की सेना का सामना करने की क्षमता नहीं रखता था।

(2.) बाबर को योग्य सेनापतियों की सेवाएँ: बाबर यद्यपि स्वयं प्रधान सेनापति था परन्तु अपनी सेना के विभिन्न अंगों का संचालन उसने बड़े ही योग्य तथा कुशल सेनापतियों को सौंप रखा था। उसे दो तुर्की सेनापतियों की सेवाएँ प्राप्त थीं जो नवीन रण-पद्धतियों का उपयोग करने में दक्ष थे। बाबर का पुत्र हुमायूँ भी कुशल योद्धा तथा दक्ष सेनापति था। इब्राहीम लोदी को इस प्रकार के योग्य सेनापतियों की सेवाएँ प्राप्त नहीं थीं। उसे अपने अमीरों तथा प्रांतपतियों का सहयोग प्राप्त नहीं था। दौलत खाँ तथा पंजाब के अन्य अमीर उसके विरुद्ध थे तथा बाबर का साथ दे रहे थे।

(3.) बाबर के सैनिकों में जीत के प्रति उत्साह: बाबर के सैनिक बड़े लड़का तथा रणकुशल थे। उन्हें शत्रु की धरती पर खड़े रहकर युद्ध करने का व्यापक अनुभव था। वे कई तरह की पेंतरेबाजी में कुशल थे और स्वयं को परिस्थितियों के अनुकूल ढालने और उसमें लड़ने की क्षमता रखते थे। अफगानिस्तान जैसे निर्धन देश से होने के कारण वे धन प्राप्ति के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा देते थे। उनमें जीत के प्रति अदम्य उत्साह था जबकि इब्राहीम लोदी के सैनिक उतने रणकुशल नहीं थे, जितने बाबर के। उन्हें न तो युद्धों का उतना अनुभव था और न उनमें उतना उत्साह तथा साहस ही था जितना बाबर के सैनिकों में था।

(4.) बाबर की कुशल व्यूह-रचना: बाबर शत्रु सैन्य के बल के अनुसार सैन्य-व्यूह रचने में दक्ष था। उसने पानीपत के मैदान में पहुंॅचते ही सैन्य-व्यूह की रचना का कार्य आरम्भ कर दिया था। उसने अपनी सेना की चारों ओर से सुरक्षा का प्रबंध किया और फिर केन्द्र में तोपों और दोनों पक्षों में तेजी से आक्रमण करने वाले अश्वारोहियों की व्यवस्था की। ये अश्वारोही, मुख्य सेना की गति भंग हो जाने पर उसे चारों ओर से सहायता पहुँचा सकते थे। यह बड़ी ही वैज्ञानिक व्यूह-रचना थी जिसमें रक्षात्मक तथा आक्रमणात्मक दोनों प्रकार की व्यवस्था थी। इसके विपरीत इब्राहीम लोदी की व्यूह-रचना परिस्थितियों के अनुकूल नहीं थी। उसने अपनी सेना की सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं की। उसने हाथियों को अपनी सेना के हरावल में रखकर अपनी पराजय का प्रबंध स्वयं ही कर लिया था। जब तोपों से गोले बरसने आरम्भ हुए तो हाथी पीलवानों के नियंत्रण से बाहर हो गये और उन्होंने अपने ही सैनिकों को रौंद डाला। इससे उनमें भगदड़ मच गयी।

(5.) बाबर का कुशल सैन्य संचालन: बाबर ने अपनी सेना का संचालन कुशलता से किया था। छोटी होने के कारण उसकी सेना में गति थी। वह तेजी से आक्रमण कर सकती थी और संकट आने पर भाग सकती थी। उसकी सेना के बाईं तथा दाहिनी ओर के सैनिक बड़ी तेजी से शत्रु पर आक्रमण करते थे और उसे चारों ओर से घेर लेने का प्रयत्न करते थे। वह अपने तोपखाने तथा अपने अश्वारोहियों द्वारा ऐसा संयुक्त आक्रमण करता था कि शत्रु को उसके सामने ठहरना कठिन हो जाता था। इसके विपरीत इब्राहीम लोदी में सैन्य संचालन की कुशलता नहीं थी। उसकी सेना इतनी विशाल थी कि उसका सुचारू रीति से संचालन करना कठिन था। उसमें न गति थी और न पैंतरेबाजी। बाबर की तोप गाड़ियों के कारण इब्राहीम की सेना के अग्रिम भाग का आगे बढ़ना रुक गया किंतु पीछे की सेना इस बात को नहीं जान सकी और वह निरंतर आगे बढ़ने का प्रयत्न करती रही इससे सेना में धकापेल आरम्भ हो गई। वह मनुष्यों का एक ढेर बन गई और बाबर की सेना ने भीषण नरसंहार आरम्भ कर दिया।

(6.) बाबर द्वारा तोपखाने का प्रयोग: अभी तक उत्तर-पश्चिम के मार्ग से भारत पर जितने आक्रमण हुए थे उनमें से किसी ने भी तोपेखने का प्रयोग नहीं किया था। इसलिये भारत के सैनिक इस तोपखाने के समक्ष युद्ध करने के अभ्यस्त नहीं थे। परिणाम यह हुआ कि जब तोपों ने गोले और आग बरसाना आरम्भ किया तब उसी समय बाबर के अश्वारोहियों ने भी पार्श्वों से निकलकर इब्राहीम की सेना पर तेजी से आक्रमण किया। इससे इब्राहीम लोदी की सेना में अफरा-तफरी मच गई। तोपखाने के साथ-साथ बाबर के सैनिक इब्राहीम लोदी के सैनिकों से अधिक अच्छे अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित थे। इससे वे अधिक सफलतापूर्वक प्रहार कर सकते थे।

दिल्ली तथा आगरा पर अधिकार

जिस दिन बाबर को पानीपत युद्ध में विजय प्राप्त हुई उसी दिन बाबर ने अपने पुत्र हुमायूँ को आगरा पर और अपने दामाद मेंहदी ख्वाजा को दिल्ली पर अधिकार करने के लिए भेज दिया। इन दोनों ने अपना कार्य सरलता से सम्पन्न कर लिया। इस प्रकर दिल्ली और आगरा पर बाबर का अधिकार हो गया। 27 अप्रैल 1526 को शुक्रवार के दिन दिल्ली की मस्जिद में बाबर के नाम खुतबा पढ़ा गया और गरीबों को दान-दक्षिणा दी गई। इस प्रकार बाबर दिल्ली का बादशाह बन गया।

पानीपत के प्रथम युद्ध के परिणाम

पानीपत का प्रथम युद्ध भारत के निर्णयात्मक युद्धों में से है। इसने भारत की राजनीति से एक युग का अंत करके दूसरे युग का आरम्भ कर दिया। उत्तर भारत की राजनीति में इस युद्ध ने भारी फेर बदल कर दिया।

(1.) लोदी वंश का अंत: इस युद्ध ने लोदी वंश के भाग्य का उसी प्रकार निर्णय कर दिया जिस प्रकार तैमूर के आक्रमण ने तुगलक वंश के भाग्य का निर्णय कर दिया था। लोदी वंश सदा के लिये अस्ताचल में चला गया।

(2.) दिल्ली सल्तनत का अंत: लोदी वंश के पराभव के साथ ही दिल्ली सल्तनत का युग भी समाप्त हो गया। उत्तर भारत में एक नया वंश शासन करने के लिये आ गया।

(3.) भारत में मुगल सम्राज्य की स्थापना: पानीपत की पहली लड़ाई का सबसे बड़ा परिणाम यह हुआ कि भारत में मुगल साम्राज्य की स्थापना हो गई जो अपनी शान-शौकत, सैनिक शक्ति तथा अपनी सभ्यता एवं संस्कृति में मुस्लिम जगत् के राज्यों में सबसे अधिक महान् था और जो रोमन साम्राज्य की बराबरी का दावा कर सकता था।

(4.) राजधानी दिल्ली के स्थान पर आगरा स्थानांतरित: बाबर दिल्ली में कुछ ही दिन रहा। वह दिल्ली से आगरा चला गया और वहीं पर सुल्तान इब्राहीम लोदी के महल में रहने लगा। अब आगरा ही उसकी राजधानी बन गया।

(5.) अफगानों के संगठन पर बुरा प्रभाव: लोदी वंश के उदय के साथ ही दिल्ली सल्तनत तथा उत्तरी पंजाब में अफगान अमीरों का दबदबा स्थापित हो गया था किंतु इस युद्ध ने अफगानों के संगठन को छिन्न-भिन्न कर दिया और उनका नैतिक बल कमजोर हो गया।

(6.) जन साधारण में भय: पानीपत की पराजय के बाद न केवल लोदी सेना के सैनिक वरन् जन साधारण भी आक्रमणकारियों से भयभीत होकर इधर-उधर भाग खड़ा हुआ। किलेबंदी वाले नगरों के फाटक बन्द कर दिये और लोग अपनी सुरक्षा का प्रबंध करने लगे।

(7.) बाबर के गौरव में वृद्धि: पानीपत की विजय से बाबर के गौरव तथा प्रतिष्ठा में बड़ी वृद्धि हुई और उसकी गणना एशिया के महान् विजेताओं में होने लगी।

(8.) बाबर को अपार धन की प्राप्ति: बाबर को दिल्ली तथा आगरा से अपार धन की प्राप्ति हुई। इससे पहले उसकी आर्थिक स्थिति अत्यंत खराब थी। भारत से मिले धन को बाबर ने मुक्त हस्त से अपने सैनिकों में बंटवाया। उसने समरकंद, ईराक, खुरासान व काशनगर में स्थित अपने सम्बन्धियों को भी उपहार भेजे। मक्का एवं मदीना में पवित्र आदमियों को भी उसने भेंट भिजवाई। उसकी इस उदारता के लिये उसे कलंदर नाम दिया गया।

(9.) राजपूतों में निराशा: इस युद्ध से राजपूतों की बड़ी निराशा हुई क्योंकि लोदी साम्राज्य के बाद दिल्ली में राजपूत राज्य स्थापित करने का उनका स्वप्न समाप्त हो गया ।

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