Sunday, June 23, 2024
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179. शहजादे सलीम ने अबुल फजल का कत्ल कर दिया!

अकबर के तीन पुत्रों में से दो पुत्र मुराद एवं दानियाल अत्यधिक शराब पीने से मर गए तथा अकबर का सबसे बड़ा एवं इकलौता जीवित पुत्र सलीम अपने पिता को मारकर उसके राज्य पर कब्जा करने में लग गया। सलीम के विद्रोह के समाचार सुनकर अकबर असीरगढ़ का मोर्चा छोड़कर आगरा आया।

जब सलीम को ज्ञात हुआ कि अकबर आगरा आ गया है तो सलीम ने प्रचारित किया कि वह भी अपने पिता की अभ्यर्थना करने के लिये आगरा जायेगा। वास्तव में तो उसका निश्चय अकबर को कैद करके स्वयं बादशाह बनने का था। 

सलीम अपने तीस हजार सिपाही लेकर चारों तरफ लूटमार करता हुआ आगरा की ओर बढ़ा। अकबर सलीम के इरादों को भांप गया। उसने अपने आदमियों के माध्यम से उसे कहलवाया कि यदि वह अपनी सेना को भंग करके प्रयाग लौट जाये तो उसे क्षमा कर दिया जायेगा।

पिता की यह उदारता देखकर सलीम ने अपनी सेना प्रयाग की तरफ लौटा दी और अकबर से कहलवाया कि मैं आपकी सेवा में प्रस्तुत होना चाहता हूँ। अकबर ने सलीम को अपनी सेवा में उपस्थित होने की अनुमति दे दी। आगरा आकर सलीम बादशाह के पैरों में गिर पड़ा और फूट-फूट कर रोया।

उसका यह भाव देखकर अकबर ने उसे क्षमा कर दिया तथा उसे बंगाल और उड़ीसा का सूबेदार बनाकर बंगाल जाने के आदेश दिये तथा अपना खास तातार गुलाम उसकी सेवा में नियुक्त कर दिया।

इलाहाबाद लौटकर सलीम पुनः मक्कार आदमियों से घिर गया और उसने बंगाल जाने से मना कर दिया। वह प्रयाग में नित्य दरबार आयोजित करके लोगों को मनसब और जागीरें बांटने लगा।

इस समस्या का अंत न आता देखकर अकबर ने खानखाना को दक्षिण से बुलाने का विचार किया किंतु दक्षिण में खानखाना की सफलताओं को देखते हुए उसे वहाँ से हटाया जाना उचित नहीं था इसलिये बहुत सोच-विचार के उपरांत अकबर ने अबुल फजल को आगरा बुलवाया।

जब सलीम को ज्ञात हुआ कि अबुल फजल आ रहा है तो उसने ओरछा के राजा वीरसिंह बुंदेला को आदेश दिया कि वह अबुल फजल को मार डाले। अबुल फजल अकबर का मित्र था किंतु शहजादे को अकबर का एक भी मित्र पसंद नहीं था।

वीरसिंह बुंदेला ने अबुल फजल का कत्ल कर दिया। इस पर वह तातार गुलाम जो हर समय सलीम के पास रहने के लिए अकबर द्वारा नियुक्त किया गया था, भागकर फतहपुर सीकरी आ गया और उसने अकबर को सूचना दी कि शहजादे सलीम ने अबुल फजल की हत्या करवा दी है।

अबुल फजल की हत्या हो जाने का समाचार सुनकर अकबर चीख मारकर बेहोश हो गया। सलीम इस हद तक आगे बढ़ जायेगा, अकबर ने इसकी तो कल्पना भी नहीं की थी। अबुल फजल अकबर का अनन्य मित्र था। वह शहंशाह का खास आदमी माना जाता था। उसकी ख्याति पूरी सल्तनत में सबसे बुद्धिमान आदमी के रूप में थी।

अकबर ने उससे अपनी समस्याओं का समाधान जानने के लिये उसे दक्षिण के मोर्चे से बुलवाया था किंतु सलीम ने उसकी हत्या करवाकर समस्याओं को खतरनाक मुकाम तक पहुँचा दिया था।

इतिहास गवाह है कि अकबर के जीवन काल में वीर राजाओं की नामावली में महाराणा प्रताप के बाद ओरछा के राजा वीरसिंह बुंदेला का ही नाम आता है। यह जानकर अकबर की निराशा का पार नहीं था कि वीरसिंह बुंदेला अकबर को छोड़कर सलीम से जा मिला है!

अबुल फजल की मौत और बेटे की बेवफाई से अकबर शोक के गहन सागर में डूब गया। उसने अपने महल की सारी शमाएं बुझा दीं और पूरे तीन दिनों तक महल के दरवाजे बंद करके पड़ा रहा। 

जब प्रजा को मालूम हुआ कि बादशाह शमाएं बुझाकर तथा मुँह पर कपड़ा लपेट कर अपने महल में बंद हो गया है तो आगरा एवं फतहपुर सीकरी में हड़कम्प मच गया। कोई न जान सका कि आखिर ऐसा क्या हो गया है जो बादशाह इतना गमगीन है! लोग अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार अनुमान लगाने लगे।

तीन दिन बाद जब अकबर अपने महलों से बाहर निकला तो उसने दो फरमान एक साथ जारी किये। पहला ये कि शहजादे सलीम को आगरा में तलब किया जाये। सलीम ने आगरा आने से मना कर दिया। दूसरा ये कि ओरछा के राजा वीरसिंह बुंदेला को जहाँ भी पाया जाये, मार डाला जाये।

उस काल में किसी मुस्लिम गवर्नर, शहजादे या सेनापति में इतनी शक्ति नहीं थी कि वह राजा वीरसिंह बुंदेला पर हमला कर सके। इसलिए अकबर ने राय रायान, राजा राजसिंह, रामचंद्र बुंदेला तथा बुंदेलखण्ड के अन्य हिन्दू सरदारों को आदेश दिया कि वीरसिंह बुंदेला का सिर काटकर अकबर के सामने प्रस्तुत करें।

इन लोगों ने राजा वीरसिंह बुंदेला को पकड़ने या मारने के लिए कई सालों तक परिश्रम किया किंतु वे लोग वीरसिंह बुंदेला की छाया तक भी नहीं पहुंच सके। अकबर तो ई.1605 में मर गया था किंतु राजा वीरसिंह बुंदेला ई.1627 तक अपने राज्य पर शासन करता रहा।

अकबर के क्रोध का पार नहीं था। वह सलीम के विरुद्ध कोई कठोर कार्यवाही करने पर विचार करने लगा। अकबर की यह हालत देखकर एक बार फिर सलीमा बेगम ने पिता-पुत्र के मध्य सुलह करवाने का विचार किया। वह अकबर से अनुमति लेकर इलाहाबाद गयी और सलीम को समझा-बुझा कर आगरा ले आयी।

जब सलीम अकबर के समक्ष उपस्थित हुआ तो उसने देखा कि अकबर शोकग्रस्त एवं रोगग्रस्त है। उसका शरीर बहुत कमजोर हो गया है जिसके कारण वह ढंग से बोल भी नहीं पा रहा।

शहजादा सलीम अपने बाप की यह दुर्दशा देखकर उसके पैरों पर गिर पड़ा और अपने अपराधों के लिये पश्चाताप करने लगा। शहजादे की आंखों में पश्चाताप के आंसू देखकर अकबर ने अबुल फजल का गम भुला दिया और सलीम को उठाकर छाती से लगा लिया। सलीम ने अपने सात सौ सत्तर हाथी और बारह हजार स्वर्ण मुद्रायें बादशाह को भेंट कीं।

इस बार अकबर ने सलीम से कहा कि वह यदि बंगाल नहीं जाना चाहता है, न जाए किंतु मेवाड़ पर अभियान करके अपने पूर्वजों की भांति यश लाभ करे। सलीम ने अकबर की बात मान ली और मेवाड़ के लिये रवाना हो गया।

अभी वह आगरा से निकल कर फतहपुर सीकरी तक ही गया था कि उसका मन फिर से बदल गया। उसने अकबर को कहलवाया कि मैं महाराणा के विरुद्ध अभियान करने में स्वयं को असक्षम मानता हूँ, अतः मुझे प्रयाग जाने दिया जाये। अकबर ने सलीम को नितांत निकम्मा जानकर उसकी यह प्रार्थना भी स्वीकार कर ली। प्रयाग पहुँच कर सलीम ने फिर से अपने को स्वतंत्र बादशाह घोषित कर दिया और दरबार लगाने लगा।

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