सुप्रभेदागम (Suprabhedagama) हिन्दू धर्म के शैव संप्रदाय की शैव सिद्धांत (Shaiva Siddhanta) परंपरा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है। सामान्यतः ‘आगम’ शब्द का प्रयोग जैन और शैव (हिंदू) दोनों परंपराओं में किया जाता है, जिससे कभी-कभी भ्रम की स्थिति पैदा हो जाती है।
आगम क्या है? (What is Agama?)
शैव दर्शन में ‘आगम’ वे पवित्र ग्रंथ हैं जिन्हें भगवान शिव के मुख से निःसृत माना जाता है। शैव संप्रदाय में ‘आगम’ ग्रंथों को वेदों के समान ही प्रामाणिक माना जाता है, जो भगवान शिव द्वारा प्रकट किए गए माने जाते हैं।
सुप्रभेदागम क्या है? (What is Suprabhedagama?)
सुप्रभेदागम (Suprabhedagama) शैव संप्रदाय के 28 प्रमुख आगमों में से एक है। इसे ‘शैव सिद्धांत’ के अंतर्गत ‘पूर्व आगमों’ की श्रेणी में रखा गया है। इसका मुख्य उद्देश्य साधक को ज्ञान, योग, क्रिया और चर्या के माध्यम से शिवत्व की प्राप्ति कराना है। यह न केवल आध्यात्मिक मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है, बल्कि दक्षिण भारतीय मंदिर वास्तुकला (द्रविड़ शैली) के लिए एक प्रामाणिक मार्गदर्शिका के रूप में भी जाना जाता है।
सुप्रभेदागम के महत्वपूर्ण तथ्य
1. अट्ठाइस मुख्य शैवागमों में से एक
शैव परंपरा में कुल 28 मूल आगम (Original Agamas) माने जाते हैं। सुप्रभेदागम इन्हीं 28 प्रमुख ग्रंथों में से एक है। इसे भगवान शिव के ‘वामदेव’ मुख से प्रकट हुआ माना जाता है।
2. वेदों का सार
सुप्रभेदागम में कहा गया है कि ‘सिद्धांत’ वेदों का सार है। यह ग्रंथ द्वैत और अद्वैत दोनों प्रकार के दार्शनिक विचारों पर चर्चा करता है।
3. सुप्रभेदागम की संरचना और विभाग
सुप्रभेदागम को मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित किया गया है:
- पूर्व भाग (Purvabhaga): इसमें मुख्य रूप से मंदिर निर्माण, मूर्तिकला और अनुष्ठानों का वर्णन है।
- उत्तर भाग (Uttarabhaga): इसमें व्यक्तिगत साधना, दीक्षा और दार्शनिक सिद्धांतों पर जोर दिया गया है।
अन्य आगमों की तरह, सुप्रभेदागम भी चार प्रमुख भागों (पादों) में विभाजित है:
1. चर्या पाद (Charya Pada)
यह भाग दैनिक आचरण और अनुशासन से संबंधित है। इसमें भक्त के व्यक्तिगत आचरण, दैनिक जीवन, स्वच्छता, और बाहरी पूजा के नियमों का विवरण मिलता है।
2. क्रिया पाद (Kriya Pada)
सुप्रभेदागम का सबसे विस्तृत हिस्सा यही है। इसमें शिल्प शास्त्र (Architectural Science), मंदिर निर्माण, मूर्ति विज्ञान (Iconography) और पूजा विधियों का विस्तृत विवरण मिलता है।
- मंदिर निर्माण: भूमि चयन से लेकर नींव (अधिष्ठान) और शिखर निर्माण तक की तकनीक।
- प्रतिमा लक्षण: शिवलिंग और विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियों के माप और निर्माण की विधि।
3. योग पाद (Yoga Pada)
यह आंतरिक साधना का मार्ग है। इसमें प्राणायाम, ध्यान और चक्रों के भेदन के माध्यम से आत्मा को परमात्मा (शिव) से जोड़ने की प्रक्रिया बताई गई है।
4. ज्ञान पाद (Jnana Pada)
यह भाग दार्शनिक सिद्धांतों और मोक्ष की व्याख्या करता है। इसमें पति (ईश्वर), पशु (जीव) और पाश (बंधन) के त्रैत सिद्धांत की व्याख्या की गई है, जो शैव सिद्धांत का मूल आधार है।
सुप्रभेदागम का महत्व
1. सुप्रभेदागम और अध्यात्म (Spirituality)
सुप्रभेदागम हमें ‘शिवोहम’ (मैं शिव हूँ) का बोध कराता है। यह सिखाता है कि भक्ति केवल कर्मकांड नहीं है, बल्कि एक विज्ञान है। इसके अनुसार:
- दीक्षा: बिना गुरु की दीक्षा के आध्यात्मिक प्रगति संभव नहीं है।
- मुक्ति: संसार के बंधनों (पाश) से मुक्त होकर शिव के समान गुण प्राप्त करना ही जीवन का अंतिम लक्ष्य है।
2. सुप्रभेदागम और मंदिर वास्तुकला (Architecture and Iconography)
दक्षिण भारतीय वास्तुशास्त्र (Architecture) और शिल्पशास्त्र में सुप्रभेदागम का विशेष महत्व है। दक्षिण भारत के कई प्रसिद्ध मंदिरों का निर्माण और उनमें मूर्तियों की स्थापना सुप्रभेदागम ग्रंथ में दिए गए निर्देशों के आधार पर की गई है।
सुप्रभेदागम का ऐतिहासिक महत्व इसके वास्तुकला संबंधी विवरणों के कारण बढ़ जाता है। चोल और पल्लव काल के कई मंदिरों का निर्माण इसी आगम के सिद्धांतों के अनुसार किया गया है।
- विमान निर्माण: यह ग्रंथ मंदिर के ऊपरी ढांचे (विमान) के विभिन्न प्रकारों का वर्णन करता है।
- अनुष्ठानिक शुद्धता: गर्भगृह की पवित्रता बनाए रखने के लिए विशिष्ट नियमों का उल्लेख है।
- जीर्णोद्धार: यदि कोई मंदिर क्षतिग्रस्त हो जाए, तो उसके पुनरुद्धार के लिए ‘संप्रोक्षण’ की विधि भी इसमें वर्णित है।
निश्चित रूप से, सुप्रभेदागम में वर्णित मंदिर वास्तुकला अत्यंत वैज्ञानिक और विस्तृत है। इस ग्रंथ के अनुसार, मंदिर केवल एक भवन नहीं, बल्कि भगवान का ‘स्थूल शरीर’ है।
3. सुप्रभेदागम के अनुसार मंदिर के विभिन्न अंग (Parts of Temple)
सुप्रभेदागम के अनुसार, मंदिर के अंगों की तुलना मानव शरीर से की जाती है:
- अधिष्ठान (Base): पैर
- पाद/स्तंभ (Pillars): जंघा (Thighs)
- प्रस्तर (Roof level): कंधा (Shoulders)
- शिखर (Top): सिर (Head)
- स्तूपिका (Finial): शिखा (Crown/Tuft)
4. सुप्रभेदागम की अनूठी विशेषता: ‘षड्वर्ग’ सिद्धांत
सुप्रभेदागम मंदिर की ऊंचाई को निर्धारित करने के लिए ‘षड्वर्ग’ (Shadvarga) गणना पर जोर देता है। इसमें छह प्रमुख मापदंड होते हैं:
- आय (Income)
- व्यय (Expenditure)
- योनि (Source/Orientation)
- वार (Weekday)
- नक्षत्र (Star)
- अंश (Quality/Portion)
इन गणनाओं का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मंदिर का निर्माण ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ सामंजस्य बिठा सके और वहां पूजा करने वाले भक्तों को शांति प्राप्त हो।
सुप्रभेदागम में मंदिर निर्माण एवं शिल्प शास्त्र की प्रमुख विधियाँ
नीचे दी गई तालिका सुप्रभेदागम के क्रिया पाद में वर्णित मंदिर निर्माण के प्रमुख चरणों और उनके तकनीकी महत्व को दर्शाती है:
| क्रम संख्या | चरण (Phase) | विवरण और महत्व (Description & Significance) |
| 1 | भू-परीक्षा (Land Testing) | भूमि के रंग, गंध, स्वाद और बनावट के आधार पर उसकी उपयुक्तता की जाँच। |
| 2 | कर्पण (Ploughing) | निर्माण से पहले भूमि की शुद्धि के लिए उसे जोतना और वहां पवित्र बीज बोना। |
| 3 | पद विन्यास (Grid Planning) | मंदिर के नक्शे को वर्गाकार ग्रिड (जैसे 8×8 या 9×9) में विभाजित करना, जिसे ‘वास्तु पुरुष मंडल’ कहते हैं। |
| 4 | अधिष्ठान (Foundation) | मंदिर का आधार या चबूतरा। सुप्रभेदागम में इसके विभिन्न प्रकार जैसे ‘पादबंध’ और ‘प्रतिबंध’ बताए गए हैं। |
| 5 | स्तंभ (Pillars) | खंभों के माप, उनकी आकृति (गोलाकार, वर्गाकार या अष्टकोणीय) और उन पर की जाने वाली नक्काशी के नियम। |
| 6 | प्रस्तर (Entablature) | स्तंभों के ऊपर का हिस्सा जो छत को सहारा देता है, इसमें सजावटी तत्वों का विवरण होता है। |
| 7 | विमान (Vimana) | गर्भगृह के ऊपर का शिखर। ग्रंथ में एक-मंजिला (अल्प) से लेकर बहु-मंजिला शिखरों का वर्णन है। |
| 8 | मूर्तिकला (Iconography) | शिवलिंग की ऊँचाई और चौड़ाई का अनुपात (ताल मान) और मूर्तियों के आयुध (हथियार) एवं मुद्राएँ। |
निष्कर्ष
सुप्रभेदागम भारतीय ज्ञान परंपरा का वह अनमोल रत्न है जो अध्यात्म और विज्ञान (वास्तुकला) के बीच सेतु का कार्य करता है। चाहे आप एक इतिहासकार हों, एक वास्तुकार हों या शिव के अनन्य भक्त, इस ग्रंथ का अध्ययन जीवन और ब्रह्मांड के प्रति एक नई दृष्टि प्रदान करता है। हमें अपनी प्राचीन विरासत को सहेजना चाहिए और उसके महत्व को आधुनिक संदर्भों में भी समझना चाहिए।
👉 डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक पुस्तकें-



