Sunday, January 25, 2026
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विविध तीर्थ कल्प : अद्वितीय जैन तीर्थ-ग्रंथ

भारतीय संस्कृति में तीर्थों का विशेष महत्व है। तीर्थ केवल आस्था, दर्शन और संस्कृति के जीवंत केंद्र हैं। जैन धर्म में तीर्थों की परंपरा अत्यंत समृद्ध है। जैन तीर्थों का व्यवस्थित एवं विस्तृत वर्णन 14वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में श्वेतांबर जैन विद्वान आचार्य जिनप्रभ सूरि द्वारा रचित ग्रंथ विविध तीर्थ कल्प  में मिलता है।

यह ग्रंथ न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, अपितु ऐतिहासिक, भौगोलिक और सांस्कृतिक अध्ययन के लिए भी अमूल्य है। यह ग्रंथ भारत के प्राचीन तीर्थस्थलों का एक जीवंत दस्तावेज़ है। यह आलेख जैन धर्म, तीर्थ यात्रा, और भारतीय संस्कृति से जुड़े पाठकों के लिए उपयोगी है।

ग्रंथकार आचार्य जिनप्रभ सूरि का परिचय

इस ग्रंथ के रचयिता आचार्य जिनप्रभ सूरि (1261–1333 ईस्वी) आध्यात्मिक गुरु, प्रखर विद्वान और कूटनीतिज्ञ थे। उनका प्रभाव दिल्ली के सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक पर भी था। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, सुल्तान उनका सम्मान करता था, जिसके कारण आचार्य कई जैन तीर्थों को मुस्लिम आक्रमणों के दौरान संरक्षण दिलाने में सफल रहे।

विविध तीर्थ कल्प – परिचय

विविध तीर्थ कल्प की भाषा

‘विविध तीर्थ कल्प’ मुख्य रूप से अर्धमागधी (प्राकृत) और संस्कृत भाषा के मिश्रण में लिखा गया है।

ग्रंथ की संरचना अथवा रूपरेखा

इसमें कुल 63 कल्प (अध्याय) हैं। “कल्प” का अर्थ यहाँ किसी विशिष्ट स्थान या तीर्थ के वर्णन से है। भारतीय संस्कृति में तीर्थ पर जाकर निवास करने को कल्पवास भी कहा जाता है। कल्प का आशय किसी निश्चित अवधि से भी होता है।

विविध तीर्थ कल्प की विषय-वस्तु

जैन धर्म में तीर्थ यात्रा को पुण्य अर्जन का साधन माना गया है। विविध तीर्थ कल्प तीर्थों के आध्यात्मिक लाभ और मोक्षमार्ग की ओर संकेत करता है। यह ग्रंथ तीर्थों को केवल भौगोलिक स्थल नहीं, अपितु ध्यान और साधना के केंद्र के रूप में प्रस्तुत करता है।

विविध तीर्थ कल्प जैन धर्मावलंबियों के लिए तीर्थ-यात्रा मार्गदर्शक की तरह कार्य करता है। इस ग्रंथ में तीर्थों का भौगोलिक, धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व विस्तार से बताया गया है। इस में शत्रुंजय, गिरनार, आबू, सम्मेद शिखर, पावापुरी और मथुरा जैसे प्रसिद्ध तीर्थों के साथ-साथ उन स्थानों का भी वर्णन है जो आज लुप्त हो चुके हैं।

ग्रंथ में विभिन्न मंदिरों की वास्तुकला, मूर्तियों के निर्माण में प्रयुक्त सामग्री (जैसे स्फटिक, पाषाण, धातु) और उनके चमत्कारिक इतिहास का वर्णन है। यह भारतीय मूर्तिकला के विकास को समझने में मदद करता है।

विविध तीर्थ कल्प भारत के प्राचीन भूगोल का दस्तावेज है। इसमें वर्णित तीर्थ आज भी जैन समाज की आस्था के केंद्र हैं। यह ग्रंथ मध्यकालीन भारत की धार्मिक यात्राओं और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का प्रमाण है।

ऐतिहासिक घटनाक्रम

यह ग्रंथ केवल धर्मिक कथाएं नहीं सुनाता, अपितु उन तीर्थों पर हुए आक्रमणों, उनके जीर्णोद्धार और वहां की मूर्तियों की स्थापना का सटीक कालक्रम भी प्रदान करता है।

भौगोलिक विवरण

इस ग्रंथ में मध्यकालीन भारत के शहरों, नदियों और रास्तों का सूक्ष्म वर्णन मिलता है, जो इतिहासकारों के लिए किसी मानचित्र से कम नहीं है।

साहित्यिक शैली

जिनप्रभ सूरि की शैली सरल किंतु प्रभावशाली है। वे घटनाओं का वर्णन करते समय तिथि और संवत (जैसे विक्रम संवत) का स्पष्ट उल्लेख करते हैं, जो इसे एक प्रामाणिक ऐतिहासिक ग्रंथ बनाता है। उनकी वर्णन शैली में भक्ति रस के साथ-साथ ‘वीर रस’ और ‘करुण रस’ का भी पुट मिलता है, विशेषकर जब वे मंदिरों के विनाश का वर्णन करते हैं।

विविध तीर्थ कल्प में वर्णित प्रमुख तीर्थस्थल

जैन तीर्थों की क्षेत्रवार सूची

  • उत्तर भारत के तीर्थ: अयोध्या तीर्थ (उत्तर प्रदेश), अहिच्छत्रा (उत्तर प्रदेश), काशी (वाराणसी-उत्तर प्रदेश), मथुरा तीर्थ (उत्तर प्रदेश), कान्यकुब्ज (कन्नौज-उत्तर प्रदेश), श्रावस्ती, हस्तिनापुर (मेरठ-उत्तर प्रदेश) आदि।
  • पश्चिम भारत के तीर्थ: शत्रुंजय (पालिताना-गुजरात), गिरनार तीर्थ (रैवतक-गुजरात), स्तम्भन तीर्थ (खंभात, गुजरात), अर्बुद (आबू तीर्थ (राजस्थान), सत्यपुर (सांचोर, राजस्थान), फलवर्धि (मेड़ता, राजस्थान) आदि।
  • दक्षिण भारत के तीर्थ: श्रवणबेलगोला, मूडबिद्री, प्रतिष्ठानपुर/पैठन (महाराष्ट्र), नासिक्य/नासिक (महाराष्ट्र) आदि।
  • पूर्वी भारत के तीर्थ: पावापुरी (बिहार), राजगृह, सम्मेद शिखर (झारखंड) आदि।

विविध तीर्थ कल्प में वर्णित प्रमुख जैनतीर्थों का महत्व

तीर्थ का नामवर्तमान स्थानमहत्व
शत्रुंजय (पालिताणा)गुजरातजैन धर्म का शाश्वत और सबसे पवित्र तीर्थ, हजारों मंदिर।
गिरनारगुजरातअनेक जैन मंदिर और साधना स्थल।
अर्बुद (आबू)राजस्थानदिलवाड़ा मंदिरों की कलात्मकता के लिए प्रसिद्ध।
मथुरा तीर्थउत्तर प्रदेशप्राचीन कंकाली टीला और स्तूपों का विवरण।
सम्मेद शिखरझारखंड20 तीर्थंकरों का निर्वाण स्थल
कान्यकुब्ज (कन्नौज)उत्तर प्रदेशमध्यकालीन वैभव और वहां के जैन मंदिरों का वर्णन।
श्रवणबेलगोलाकर्नाटकगोमटेश्वर बाहुबली की विशाल प्रतिमा।
पावापुरीबिहारभगवान महावीर का निर्वाण स्थल।

विविध तीर्थ कल्प का ऐतिहासिक महत्व

ऐतिहासिक महत्व

इतिहासकारों के लिए यह ग्रंथ अत्यंत उपयोगी है। 13वीं और 14वीं शताब्दी में भारत एक बड़े राजनीतिक परिवर्तन से गुजर रहा था। उस समय के राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक परिवेश को समझने के लिए यह ग्रंथ अनिवार्य है।

आचार्य जिनप्रभ सूरि ने इस ग्रंथ में सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक के साथ अपनी मुलाकातों का उल्लेख किया है। यह इस बात का प्रमाण है कि मध्यकाल में भी धार्मिक सहिष्णुता के प्रयास किए गए थे। ग्रंथ में उल्लेख है कि कैसे आचार्य ने सुल्तान से प्रभावक पत्र प्राप्त कर तीर्थों की सुरक्षा सुनिश्चित की।

सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व

‘विविध तीर्थ कल्प’ केवल साधुओं के लिए नहीं, अपितु आम जनता के लिए भी लिखा गया था ताकि उन्हें अपने तीर्थों के गौरवशाली इतिहास का पता चल सके।

  • धार्मिक एकता: यह ग्रंथ विभिन्न संप्रदायों के बीच समन्वय की भावना पैदा करता है।
  • भाषा विज्ञान: इसमें प्रयुक्त भाषा मध्यकालीन भारतीय आर्य भाषाओं के संक्रमण काल को समझने में भाषाविदों की मदद करती है।
  • सांस्कृतिक चेतना: विदेशी आक्रमणों के समय जब कई मंदिर तोड़े जा रहे थे, तब इस ग्रंथ ने समाज में अपनी विरासत को सहेजने की प्रेरणा दी।

प्रकाशन

 सिंघी जैन ग्रंथमाला सहित  विभिन्न संस्थानों एवं प्रकाशनों द्वारा प्रकाशित किया जाता रहा है।

निष्कर्ष

विविध तीर्थ कल्प केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, अपितु भारतीय संस्कृति का जीवंत दस्तावेज है। इसमें वर्णित तीर्थ आज भी लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं। जैन धर्म के अनुयायियों के साथ-साथ पुरातत्वविदों और इतिहासकारों के लिए यह ग्रंथ एक अमूल्य निधि है। जैन धर्म के अनुयायियों के लिए यह ग्रंथ तीर्थ-यात्रा का मार्गदर्शक है, वहीं शोधार्थियों के लिए यह भारतीय इतिहास और भूगोल का अमूल्य स्रोत है।

‘विविध तीर्थ कल्प’ भारतीय इतिहास के अंधकारमय युग का वह दीपक है जो हमें हमारे गौरवशाली अतीत की राह दिखाता है। यह ग्रंथ यह सिद्ध करता है कि तीर्थ केवल पत्थर की इमारतें नहीं हैं, अपितु वे हमारी आस्था, संस्कृति और इतिहास के जीवंत केंद्र हैं। आज के समय में, जब हम अपनी विरासत के संरक्षण की बात करते हैं, तो ‘विविध तीर्थ कल्प’ जैसे ग्रंथों का अध्ययन और भी प्रासंगिक हो जाता है।

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