Thursday, January 15, 2026
spot_img

अकबर की रंगीन मिजाजी – मंत्रियों के घर रात गुजारता था अकबर (96)

मुगलों का इतिहास मुगल शहजादों की रंगीन मिजाजी के किस्सों से भरा पड़ा है किंतु अकबर की रंगीन मिजाजी उन सभी शहजादों से बढ़कर थी जिन्हें मुगलों के तख्त पर बैठने का अवसर मिला था।

मिर्जा कोका की मेहमान-नवाजी

ईस्वी 1570 में बादशाह अकबर (AKBAR) द्वारा शेख फरीद शकरगंज की दरगाह के दर्शन करने के लिए पंजाब के पाकपट्टन शहर की यात्रा की गई। पाकपट्टन से बादशाह आगरा के लिए रवाना हुआ।

मार्ग में वह पंजाब के दीपालपुर सूबे में रुका जहाँ का हाकिम अजीम मिर्जा कोका था। उसने बादशाह को अपने घर बुलाकर उसकी शानदार दावत की। बादशाह ने दो तीन रात अजीम मिर्जा के घर में गुजारने के बाद लाहौर का रुख किया।

हुसैन कुली खाँ की मेहमान-नवाजी

लाहौर के हाकिम हुसैन कुली खाँ (HUSAIN KULI KHAN) ने भी बादशाह को अपने घर पर दावत का आनंद लेने के लिए आमंत्रित किया। अकबर (AKBAR) हुसैन कुली खाँ (HUSAIN KULI KHAN) के घर में भी दो-तीन दिन रुका और उसके बाद हिसार की तरफ रवाना हो गया।

शेख सलीम चिश्ती का मेहमान

यहाँ से अकबर आगरा जाने की बजाय फिर से अजमेर के लिए रवाना हो गया। अजमेर में ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर कुछ दिन रुकने के बाद बादशाह अजमेर से सीकरी चला गया जहाँ वह शेख सलीम चिश्ती के मकान में ठहरा।

संसार में ऐसा उदाहरण शायद ही देखने को मिले कि किसी दरवेश के घर में कोई शहंशाह मेहमान बनकर ठहरे! कुछ समय पहले ही आगरा के लाल किले में अकबर ने नए महल बनवाए थे किंतु अब उसने आगरा के लाल किले के स्थान पर शेख सलीम के मकान को अपना निवास बना लिया। इस कारण शेख सलीम के बेटे और बहुएं भी तंग होकर शेख सलीम से अकबर (AKBAR) की शिकायतें करते थे।

सीकरी में शाही महलों का निर्माण

अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि चूंकि शहंशाह के बेटों का जन्म सीकरी में हुआ था इसलिए शहंशाह को सीकरी में रहना अधिक पसंद था। अबुल फजल लिखता है कि बादशाह की इच्छा हुई कि इस स्थान का वैभव बढ़ाया जाए।

इसलिए उसने आदेश दिए कि सीकरी में शाही उपयोग के लिए भवनों का निर्माण किया जाए। शाही भवनों के साथ-साथ अनेक छोटे-बड़े सरकारी अधिकारियों ने भी सीकरी में मकान बनवा लिए। सीकरी के वैभव को बढ़ता हुआ देखकर व्यापारियों एवं धनी-मानी जनता ने भी सीकरी में अच्छे मकान बनवा लिए।

अबुल फजल लिखता है कि इस शहर के चारों ओर पत्थर की चारदीवारी खड़ी कर दी गई। थोड़े समय में एक बड़े नगर का निर्माण हो गया और उसमें सुंदर महल बन गए। खानकाह, स्कूल और स्नानागार जैसी लोकोपयोगी संस्थाओं का भी निर्माण हो गया।

एक बड़ा बाजार बनाया गया जिसके निकट बाग लगाए गए। यह नगर ऐसा बन गया कि संसार इससे ईर्ष्या करने लगा। बादशाह ने इसका नाम फतहाबाद रखा था परंतु लोगों में यह फतेहपुर के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

अकबर के मंत्री मुजफ्फर खाँ ने आगरा में अपने लिए एक सुंदर मकान बनवाया। उसकी इच्छा थी कि बादशाह स्वयं आकर उसके मकान को देखे। इसलिए मुजफ्फर खाँ की प्रार्थना पर बादशाह उसका मकान देखने आगरा गया।

मंत्रियों के घर दावत

अकबर (AKBAR) ने वैसे भी कुछ सालों से यह मुहिम चला रखी थी कि वह अपने मंत्रियों के घर जाकर दावत खाता था और एक-दो रात उसके घर में बिताता था। कई लोग बादशाह के इस काम को शंका की दृष्टि से भी देखते थे।

अकबर की रंगीन मिजाजी

इस समय तक अकबर अपने अधिकांश शत्रुओं से निबट चुका था। इसलिए अपने समय का अधिकांश भाग शराब पीने, शिकार खेलने और सुंदर स्त्रियों के बीच बिताने लगा। यहीं से अकबर की रंगीन मिजाजी परवान चढ़ने लगी।

अकबर के बागी मंत्रियों और सेनापतियों में से अधिकतर या तो ठिकाने लग चुके थे या सुधर कर बादशाह की शरण में आ चुके थे। फिर भी कोई न कोई व्यक्ति उद्दण्डता करके अकबर (AKBAR) के आमोद-प्रमोद में खलल डाल ही देता था।

एक दिन लश्कर खाँ नामक एक दरबारी शराब के नशे में धुत्त होकर अकबर (AKBAR) के सामने आ गया और दरबार में ही उत्पात मचाने लगा। इस पर बादशाह ने लश्कर खाँ को घोड़े की पूंछ से बांधकर शहर भर में घुमवाया और उसे जेल में डाल दिया।

चौपड़ खेलने का शौक

हरम की औरतों के बीच समय गुजारने के दौरान अकबर को चौपड़ खेलने का शौक लग गया और वह कई-कई घण्टे हरम की औरतों के साथ चौपड़ खेलने लगा। चौपड़ ने अकबर की रंगीन मिजाजी को और भी अधिक गहरा कर दिया। 

एक दिन जफर खाँ नामक एक दरबारी अकबर (AKBAR) के साथ चौपड़ खेलते हुए हार गया। उसने दुबारा खेलने की प्रार्थना की तो बादशाह ने दुबारा खेल शुरु कर दिया। इस बार भी जफर खाँ हार गया। उसने तिबारा खेलने का अनुरोध किया। अकबर (AKBAR) ने उसके साथ तिबारा चौपड़ खेली और इस बार भी जफर खाँ हार गया। जब ऐसा कई बार हुआ तो जफर खाँ का मिजाज बिगड़ गया। वह भूल गया कि बादशाह के समक्ष जिद्द करना ठीक नहीं है और बेअदबी तो बिल्कुल भी नहीं।

हार की खीझ के कारण उसके मुँह से बादशाह की शान के खिलाफ कुछ शब्द निकल गए। बादशाह समझ गया कि अकबर की रंगीन मिजाजी ने ही जफर खाँ को बेअदबी करने का साहस दिया है। बादशाह ने उसी समय खेल बंद कर दिया तथा उसे तुरंत एक सेना लेकर किसी अभियान के लिए रवाना कर दिया।

बगावत के समाचार

इन्हीं दिनों अकबर को समाचार मिले कि गुजरात में मिर्जा लोग भयानक उत्पात कर रहे हैं। इस पर अकबर ने गुजरात जाने का निश्चय किया। अकबर को यह भी समाचार मिल रहे थे कि काबुल का शासक मिर्जा हकीम एक बार फिर से बगावत करने की तैयारी कर रहा है।

नगरकोट की घेराबंदी

इससे बादशाह चिंतित हुआ और उसने पंजाब के शासक खानेजहाँ हुसैन कुली खाँ (HUSAIN KULI KHAN) को आदेश दिया कि वह एक सेना लेकर नगरकोट को घेर ले।

ऐसा करने के पीछे उद्देश्य यह था कि यदि काबुल का शासक हकीम खाँ अकबर के गुजरात अभियान में व्यस्त होने की सूचना पाकर बगावत करने का प्रयास करे तो नगरकोट की सेना को तत्काल काबुल के लिए रवाना किया जा सके। बादशाह अकबर ने मिर्जा यूसुफ खाँ फतू तथा राजा बीरबल के साथ भी एक बड़ी सेना नगरकोट के लिए रवाना कर दी।

गुजरात के लिए कूच

अकबर ने आगरा और फतहपुर सीकरी में भी सुरक्षा के प्रबंध किए और स्वयं गुजरात कूच की तैयारी करने लगा। हर बार की तरह उसने बड़े अभियान पर जाने से पहले अजमेर की यात्रा करना उचित समझा। सेना का अधिकांश हिस्सा गुजरात के लिए रवाना कर दिया गया और बादशाह स्वयं अजमेर के लिए चल पड़ा।

गर्भवती बेगम

अकबर की रंगीन मिजाजी का आलम यह था कि उसका हरम हर समय उसके साथ चलता था जिसमें हजारों बांदियां, बेगमें रक्कासाएं और शहजादियां होती थीं। मार्ग में अकबर ने अपने हरम को आगे भिजवा दिया तथा स्वयं शिकार खेलने के लिए जंगलों में रुक गया। बेगमों को आगे भेजने का कारण यह था कि एक बेगम गर्भवती थी और उसके प्रसव का समय निकट आ गया था। जब अकबर (AKBAR) के सेवक अकबर के हरम लेकर अजमेर पहुंचे तो गर्भवती बेगम की स्थिति काफी नाजुक हो गई।

वह यात्रा का कष्ट सहन करने की स्थिति में नहीं रही। किसी तरह अजमेर पहुंचकर बेगम के प्रसव के लिए एक मकान की व्यवस्था की गई। यह मकान ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के एक खादिम का था। उस मकान को खाली करवाकर बेगम को वहाँ रखा गया और उसका प्रसव कराया गया।

दानियाल का जन्म

9 सितम्बर 1572 को बेगम ने एक लड़के को जन्म दिया। तत्काल ऊंट-सवारों को यह सूचना देकर बादशाह के शिविर की तरफ दौड़ाया गया। उस समय बादशाह का शिविर नागौर सरकार के फलौदी परगने में था।

बादशाह ने अपने तीसरे पुत्र का नाम दानियाल रखा और आदेश दिया कि जब यह लड़का एक महीने का हो जाए तो उसे पालने के लिए आम्बेर के राजा भारमल के पास भेज दिया जाए। वस्तुतः अकबर का आशय भारमल की पुत्री हीराकंवर (मरियम उज्मानी) से रहा होगा जो अकबर (AKBAR) की बेगम थी और इन दिनों आम्बेर में निवास कर रही थी।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Third Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

Related Articles

Stay Connected

21,585FansLike
2,651FollowersFollow
0SubscribersSubscribe
- Advertisement -spot_img

Latest Articles

// disable viewing page source