कामिकागम ग्रंथ शैवसिद्धान्त परंपरा का एक प्रमुख संस्कृत ग्रंथ है, जिसमें मंदिर निर्माण, पूजा-विधि और तांत्रिक अनुष्ठानों का विस्तृत वर्णन मिलता है।
शैव दर्शन और मंदिर वास्तुकला का आधार स्तंभ कामिकागम
कामिकागम शैव आगम साहित्य के 28 मुख्य ग्रंथों (किरण, कारण, कामिक आदि) में सबसे महत्वपूर्ण और प्रतिष्ठित माना जाता है। यह ‘शैव सिद्धांत’ परंपरा का मूल ग्रंथ है, जो न केवल आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करता है, बल्कि दक्षिण भारतीय मंदिरों की वास्तुकला, अनुष्ठानों और मूर्तिशिल्प का संविधान भी है।
परिचय
भारतीय धार्मिक साहित्य में आगम ग्रंथों का विशेष स्थान है। इनमें से कामिकागम ग्रंथ (Kamikagama Granth) शैवसिद्धान्त परंपरा का एक महत्वपूर्ण संस्कृत ग्रंथ है। इसे कामिकातन्त्र भी कहा जाता है। विद्वानों के अनुसार यह ग्रंथ लगभग 12वीं शताब्दी में लिखा गया। इसमें मंदिर निर्माण, पूजा-पद्धति, अनुष्ठान और तांत्रिक विधियों का विस्तृत वर्णन मिलता है।
कामिकागम की संरचना और वर्गीकरण
इस ग्रंथ में कुल 75 अध्याय हैं। पूर्वभाग में मंदिर निर्माण, मूर्ति-स्थापना, स्नान, अर्चन, नैवेद्य, अग्निकार्य, वास्तु-नियम आदि का वर्णन है। उत्तरभाग में तांत्रिक साधनाओं और गूढ़ विधियों का विवरण मिलता है।
कामिकागम को मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित किया गया है:
- पूर्व भाग (Purva Pada): इसमें मंदिर निर्माण, भूमि चयन, वास्तु शास्त्र और लिंग स्थापना जैसे विषयों का विस्तार से वर्णन है।
- उत्तर भाग (Uttara Pada): इसमें दैनिक पूजा (नित्य नैमित्तिक), उत्सव, प्रायश्चित विधान और विसर्जन की प्रक्रियाओं का उल्लेख है।
इस ग्रंथ को ‘चर्या’ (आचरण) और ‘क्रिया’ (कर्मकांड) के दृष्टिकोण से अत्यंत समृद्ध माना जाता है।
कामिकागम की विषय-वस्तु
यद्यपि कामिकागम ग्रंथ का मुख्य उद्देश्य शिवभक्ति को व्यवस्थित रूप देना है तथापि यह केवल एक धार्मिक पुस्तक नहीं है, अपितु धर्म, विज्ञान और कला का संगम है। इस ग्रंथ में निम्नलिखित विषयों को समाहित किया गया है-
- मंदिर निर्माण के नियम: भूमि परीक्षण, वास्तु-निर्धारण, शिल्प और स्थापत्य की विधियाँ।
- पूजा-विधि: स्नान, अर्चन, नैवेद्य, दीपदान और यज्ञ की प्रक्रिया।
- अनुष्ठान: अग्निकार्य, बलि, ग्राम-पूजन और देवताओं की स्थापना।
- तांत्रिक साधना: मंत्रोच्चारण, ध्यान और योग की विधियाँ।
1. मंदिर वास्तुकला और शिल्पशास्त्र (Vastu & Architecture)
कामिकागम में मंदिर निर्माण के लिए भूमि के परीक्षण से लेकर ‘शिखर’ निर्माण तक के सूक्ष्म नियम दिए गए हैं। इसमें गर्भगृह की माप, स्तंभों की संख्या और द्वारों की दिशा का वैज्ञानिक विवरण मिलता है। आज भी दक्षिण भारत के अधिकांश मंदिरों (जैसे चिदंबरम और मदुरै) में इसी आगम के नियमों का पालन किया जाता है।
2. प्रतिमा लक्षण (Iconography)
भगवान शिव के विभिन्न स्वरूपों, जैसे नटराज, दक्षिणामूर्ति और सोमस्कंद की मूर्तियों को बनाने के सटीक नियम और अनुपात (ताल मान) कामिकागम में वर्णित हैं। यह मूर्तिकारों के लिए एक अनिवार्य मार्गदर्शिका है।
3. आध्यात्मिक दर्शन (Shaiva Siddhanta Philosophy)
यद्यपि यह क्रिया प्रधान है, लेकिन इसमें ‘पति-पशु-पाश’ का दर्शन अंतर्निहित है।
- पति: परमेश्वर शिव।
- पशु: जीवात्मा।
- पाश: बंधन (माया, कर्म और आणव मल)।
कामिकागम के अनुसार, अनुष्ठानों और भक्ति के माध्यम से इन बंधनों को काटकर शिवत्व प्राप्त किया जा सकता है।
4. अनुष्ठान और उत्सव (Rituals and Festivals)
अभिषेक, षोडशोपचार पूजा और वार्षिक ब्रह्मोत्सव का जैसा वर्णन कामिकागम में है, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। इसमें मंत्रों के शुद्ध उच्चारण और मुद्रा (हाथों के संकेत) के महत्व पर बल दिया गया है।
कामिकागम का धार्मिक महत्व
कामिकागम ग्रंथ शैवसिद्धान्त सम्प्रदाय का आधारभूत ग्रंथ माना जाता है। यह न केवल धार्मिक अनुष्ठानों का मार्गदर्शन करता है, बल्कि मंदिर संस्कृति को भी व्यवस्थित करता है। दक्षिण भारत के कई मंदिरों में आज भी पूजा-पद्धति इसी ग्रंथ के अनुसार होती है।
सांस्कृतिक योगदान
- शिल्पकला और वास्तुशास्त्र: मंदिर निर्माण की शैलियाँ आज भी वास्तुशास्त्र के अध्ययन में उपयोगी हैं।
- संगीत और नृत्य: पूजा-विधियों में संगीत और नृत्य का उल्लेख मिलता है, जो भारतीय कला परंपरा को समृद्ध करता है।
- समाज और धर्म: यह ग्रंथ समाज में धार्मिक अनुशासन और सांस्कृतिक एकता स्थापित करने में सहायक रहा।
| कामिकागम | विवरण |
| मूल भाषा | संस्कृत |
| शाखा | शैव सिद्धांत |
| प्रकार | २८ मूल आगमों में प्रथम |
| मुख्य देवता | भगवान शिव |
कामिकागम की प्रासंगिकता
डिजिटल युग में, भारतीय विरासत और शैव आगम के प्रति जिज्ञासा बढ़ी है। कामिकागम न केवल शोधकर्ताओं के लिए बल्कि वास्तुकला के छात्रों के लिए भी एक अमूल्य संसाधन है। यह ग्रंथ यह सिद्ध करता है कि प्राचीन भारत में धर्म और विज्ञान (Engineering & Aesthetics) एक दूसरे के पूरक थे।
निष्कर्ष
कामिकागम भारतीय संस्कृति की अनमोल धरोहर है जिसने सदियों से मंदिरों को जीवंत बनाए रखा है। इसमें मंदिर निर्माण से लेकर पूजा-विधि और तांत्रिक साधना तक का विस्तृत विवरण मिलता है। यह ग्रंथ न केवल शैवसिद्धान्त सम्प्रदाय का मार्गदर्शक है, बल्कि भारतीय संस्कृति और कला का भी महत्वपूर्ण स्तंभ है। यह हमें सिखाता है कि बाह्य अनुष्ठान और आंतरिक शुद्धि दोनों ही मोक्ष के मार्ग हैं। दक्षिण भारतीय मंदिरों की दिव्यता को समझने के लिए कामिकागम का अध्ययन अनिवार्य है। आज के समय में जब हम भारतीय परंपराओं को पुनः समझने का प्रयास कर रहे हैं, कामिकागम ग्रंथ हमें हमारी जड़ों से जोड़ने का कार्य करता है।



