Tuesday, April 23, 2024
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जाट कौन हैं – कहाँ से आए हैं!

जाट कौन हैं – कहाँ से आए हैं! इस प्रश्न का उत्तर ढूंढना आसान नहीं है। यह एक प्राचीन भारतीय जाति है। भारत की अन्य बहुत सी जातियों की तरह इस जाति का इतिहास भी उलझा हुआ है।

आज सम्पूर्ण उत्तर भारत में जाट जाति बड़ी संख्या में निवास करती है। उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान में जाट जाति का सघन अधिवास दृष्टिगोचर होता है।

जाटों की देहयष्टि उत्तर भारत में निवास करने वाली कतिपय आर्य जातियों यथा ब्राह्मणों, राजपूतों, महेश्वरियों, अग्रवालों, मालियों, मीणों, गूजरों आदि से कुछ निश्चित भिन्नताएं लिये हुए है।

देहयष्टि के आधार पर कतिपय इतिहासकारों ने जाटों को विदेशी मूल के आर्य तो कुछ इतिहासकारों ने भारतीय आर्य ठहराने की चेष्टा की है।

अनके विदेशी इतिहासकारों ने गुर्जरों और अनेक क्षत्रिय कुलों की भांति जाटों को विदेशी मूल का माना है। उन्होंने गुर्जरों को खिजरों की, राजपूतों को हूणों की तथा जाटों को सीथियनों की संतान माना है।

निःसंदेह जाट कृषक और पशुपालक जाति है किंतु निरी कृषक और पशुपालक जाति नहीं है। आवश्यकता होने पर जाट जाति ने हथियार उठाने में संकोच नहीं किया।

सत्रहवीं शताब्दी में मुगल बादशाह औरंगजेब के जीवनकाल का अधिकांश समय उत्तर भारत में जाट शक्ति का दमन करने में और दक्षिण भारत में मराठा शक्ति का दमन करने में लगा।

जब अठारहवीं शताब्दी में मुगल बादशाह कमजोर हो गये और मराठों ने उत्तर भारत की राजपूत रियासतों को रौंदकर रख दिया तब भरतपुर के जाट हथियार उठाकर मराठों का सामना करने के लिये आगे आये।

जब ई.1757 में अहमदशाह अब्दाली के भय से मुगल बादशाह आलमगीर (द्वितीय) लाल किले में बंद होकर बैठ गया और मराठे नर्बदा को पार करके दक्खिन को भाग गये तब भरतपुर के जाट मथुरा की रक्षा के लिये 10 हजार जाट सैनिकों के सिर कटवाने को तत्पर हुए।

अंग्रेजों के शासन काल में भी और वर्तमान प्रजातान्त्रिक सरकारों के काल में भी जाट जाति के युवक प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में सेना में भरती होते हैं तथा भारतीय सेना में गोरखा, राजपूत एवं मराठा रेजीमेंट की तरह जाट रेजीमेंट भी अस्तित्व में है।

केन्द्र सरकार एवं अनेक राज्य सरकारों के शिक्षा विभाग, पुलिस विभाग एवं राजस्व आदि विभागों में भी जाट जाति के व्यक्ति बहुत बड़ी संख्या में नौकरी करते हैं।

भारत में जाटों के अतिरिक्त ऐसी कोई अन्य जाति नहीं है जो कृषि, पशुपालन, व्यापार तथा युद्ध आदि अलग-अलग प्रवृत्तियों के कार्यों में समान रूप से प्रतिभा सम्पन्न हो।

जाट एक ऐसी जाति है जिसमें काले रंग का व्यक्ति शायद ही कभी देखने को मिलता है। इक्का-दुक्का अपवादों को छोड़ दिया जाये तो जाट गोरे, पतले, लम्बे और परिश्रमी देहयष्टि वाले ही हैं।

इसलिये इतिहास की दृष्टि से यह जानना रोचक तथा महत्त्वपूर्ण होगा कि जाट कौन हैं – कहाँ से आए हैं! ये भारतीय मूल के हैं अथवा विदेशों से आकर भारत में बसे हैं।

जाटों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में विभिन्न मत

इतिहासकारों द्वारा जाटों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में जितने मत स्थापित किये गये, उतने अधिक मत किसी अन्य जाति की उत्पत्ति के सम्बन्ध में स्थापित नहीं किये गये। इनमें से कुछ प्रमुख मत तथा उनकी व्याख्याएं इस प्रकार से हैं-

मत-1. जाट ईसा की प्रारम्भिक सदी में सीथियनों के भारत आक्रमण के समय उनके साथ बाहर से आये थे। सम्भवतः जाट सीथियनों से ही उत्पन्न हुए थे।

व्याख्या- यह मत हेरोडोटस के मत के आधार पर ईस्वी 1820 के आसपास कर्नल टॉड ने स्थापित किया था।

निष्कर्ष- यह मत सही नहीं माना जा सकता क्योंकि सीथियनों के भारत पर आक्रमण से पूर्व भी जाट सिंध में रहते थे।

मत-2. जाट, जाठर क्षत्रिय हैं तथा ब्राह्मणों से उत्पन्न हुए हैं।

व्याख्या- यह मत ईस्वी 1869 में अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश) के विद्वान अंगद शास्त्री द्वारा प्रतिपादित किया गया था। उन्होंने पुराणों में से यह श्लोक उद्धृत किया-

क्षत्र शून्ये पुरा लोके मार्गवेन यदा लोके।

विलोक्या क्षत्रियां धरणी कन्यास्तेषां सहस्रशः 

ब्राह्मणान् जगृहुस्मिन् पुत्रोत्पादन लिप्सया।

जठरे धारितं गर्भ संरक्ष्य विधिवत् पुरा।।

पुत्रान् सुषुविरे कन्या जाठरान् क्षात्रवंशजान्ं।

अर्थात् जब परशुराम ने भारतखण्ड को क्षत्रियों से रहित कर दिया तो क्षत्रिय कन्याओं ने भारत खण्ड को क्षत्रिय रहित जानकर ब्राह्मणों से गर्भाधान स्वीकार किया और अपने जठर में धारित गर्भ की रक्षा करके जाठर नाम के क्षत्रवंशीय पुत्रांे को उत्पन्न किया जो आगे चलकर जाट कहलाये।

निष्कर्ष- यह मत अपने समर्थन में पर्याप्त प्रमाण प्रस्तुत नहीं करता है। अतः यह अधिक विश्वसनीय नहीं माना जा सकता।

पुराणों के अनुसार परशुराम द्वारा क्षत्रियों का संहार कर देने के बाद समाज की रक्षा करने के लिये महर्षि वसिष्ठ द्वारा आबू पर्वत पर यज्ञोत्सव आयोजित करके समाज के जिन चार वीरों को क्षेत्रिय धर्म अपनाने का आदेश दिया गया था वे प्रतिहार, परमार, चौलुक्य तथा चाहमान नामों से प्रसिद्ध हुए न कि जाठर। जाट मूलतः वैश्य वर्ण के अंतर्गत आने वाला कृषक वर्ग है। जाटों ने मुगलों के भारत में आने के बाद छोटे-छोटे राज्य स्थापित अवश्य किये किंतु इनका कोई प्राचीन साम्राज्य या राजवंश नहीं था।

मत-3. वेदों में जिन्हें ‘ज्येष्ठ कहा गया है, वही आगे चलकर जाट कहलाये।

व्याख्या- यह मत यजुर्वेद के इस मंत्र के आधार पर स्थिर किया गया है- ‘इमम् देवाऽसपत्नं सुवध्वं महते क्षत्राय महते ज्यैष्ठाय महते जान राज्यायेन्द्र स्येन्द्रियाय……।

निष्कर्ष- पर्याप्त प्रमाणों के अभाव में इसे स्वीकार नहीं किया जा सका। ज्येष्ठ से ‘जेठ’ बनता है, न कि जाट।

मत- 4. महाभारत में राजसूय यज्ञ के अवसर पर भगवान कृष्ण को ज्येष्ठ की उपाधि दी गई थी। श्रीकृष्ण के वंशज यदु तथा जाट नाम से प्रसिद्ध हुए।

व्याख्या-इस मत के समर्थन में कहा जाता है कि जाटों के गोत्र यदुवंशियों से मेल खाते हैं।

निष्कर्ष- जिस प्रकार जाटों के गोत्र यदुवंशियों से मेल खाते हैं उसी प्रकार चन्द्रवंशियों एवं सूर्यवंशियों से भी मेल खाते हैं, अतः इस तथ्य को प्रमाण नहीं माना जा सकता।

मत-5. जाटों की उत्पत्ति शिव की जटाओं से हुई।

व्याख्या- इस मान्यता के अनुसार जब सृष्टि की रचना हुई तब महादेव ने अपनी जटा में से कुछ भस्म निकालकर देवी पार्वती को दी। पार्वती ने उस भस्म का पुतला बनाकर महादेव से उसमें प्राण डालने की प्रार्थना की।

महादेव ने पुतले में प्राण फूंक दिये। पार्वती ने उसका नाम ‘हरतीतरवाल’ रखा। हरतीतरवाल के दो बेटे गोदारा और पूनिया हुए जिनमें से जाटों की दो खापें गोदारा और पूनिया बनी। पीछे से और भी कौमें जाटों में मिल गईं।

इसी प्रकार की एक कथा पुराण में अन्य स्थान पर भी मिलती है। इस कथा के अनुसार जब सती के पिता दक्ष ने यज्ञ किया और उसमें शिवजी को नहीं बुलाया तो सती बिना बुलाये ही अपने पिता के घर जा पहुंची।

वहाँ सती अपने पति भगवान शिव का यज्ञ भाग न देखकर अपने पति के अपमान के कारण योगानल से जलकर भस्म हो गई। शिवजी ने दक्ष को दण्ड देने के लिये अपनी जटा से वीरभद्र नामक गण उत्पन्न किया। इसी वीरभद्र के वंशज जाट कहलाये।

निष्कर्ष- जाटों का शिवजी की जटाओं से जो सम्बन्ध स्थापित किया गया है, वह एक ऐतिहासिक रूपक प्रतीत होता है जिसमें ऐतिहासिक सच्चाई छिपी हुई है। इस पर हम विस्तार से चर्चा आगे चलकर करेंगे।

मत-6. जाट बाल्हीक कबीले की जर्तिका शाखा से उत्पन्न हुए हैं।

व्याख्या- इस मत का प्रतिपादक जेम्स कैम्पबैल नामक विद्वान था। ग्रियर्सन ने भी इसी मत को स्वीकार किया है। वराह मिहिर की पुस्तक में जटासुराः तथा जटाधराः नामक जाति के लोगों को कावेरी के उत्तर-पूर्व और दक्षिण में निवास करना बताया गया है। जेम्स कैम्पबैल कहता है कि जर्तिका विदेशी थे तथा जिस समय कुषाणों ने भारत पर आक्रमण किया, उस समय जर्तिका भी भारत में आये। यही जर्तिका आगे चलकर जाट कहलाये।

ग्रियर्सन का कहना है कि महाभारत में मद्र देश के प्रसंग में मद्रक तथा जर्तिका कबीलों का वर्णन आया है। ये दोनों कबीले, बाल्हीक अथवा वाहीक कहे गये हैं। महाभारत में कहा गया है कि गंगा-यमुना, कुरुक्षेत्र और हिमालय से बाहर तथा रावी, चेनाव, झेलम, सतलुज, व्यास और सिंधु नदी के बीच में बाह्लीक देश है। वहां आपगा नदी के तट पर शाकल नामक नगर है, उसमें जर्तिका बाह्लीक जाति के नीच मनुष्य रहते हैं।

ग्रियर्सन कहता है कि हिमालय में वर्णित यह प्रदेश आज का पंजाब है। भारत और पाकिस्तान दोनों का संयुक्त पंजाब। पंजाब में आज भी बहुत बड़ी संख्या में जाट निवास करते हैं। अतः स्पष्ट है कि जर्तिका जाति ही आगे चलकर जाटों में बदल गई।

इस मत को के. आर. कानूनगो, ठाकुर देशराज तथा डॉ. रणजीत सिंह आदि ने गलत ठहराया है। उनके अनुसार महाभारत में जिस जर्तिका जाति का वर्णन आया है, वे आज के कश्मीरी हैं, न कि जाट। अपने समर्थन में ये विद्वान महाभारत के कर्ण पर्व में कर्ण द्वारा शल्य को कहे गये इस वक्तव्य का उल्लेख करते हैं-

‘वे (जर्तिका) धान और गुड़ की शराब बनाकर पीते हैं और लहसुन के साथ गोमांस खाते हैं। इनमें पिता, पुत्र, माता, श्वसुर और सास, चाचा, बहिन, मित्र, अतिथि, दास तथा दासियों के साथ मिलकर शराब पीने और गोमांस खाने की परम्परा है। इनकी स्त्रियां शराब में धुत्त होकर नंगी नाचती हैं। वे गोरे रंग तथा ऊँचे कद की हैं।

इस प्रदेश की ़िस्त्रयां बाहर दिखाई देने वाली मालाएं और चन्दन आदि सुगन्धि लगाकर, शराब पीकर, मस्त होकर, नंगी होकर, घर-द्वार और नगर के बाहर हँसती-गाती और नाचती हैं। वे ऊनी कम्बल लपेटती हैं, उन स्त्रियों का स्वर गधे और ऊँट के समान होता है। उनमें प्रत्येक प्रकार के शिष्टाचार की कमी है। वे खड़ी होकर पेशाब करती हैं।’

मद्रराज शल्य को नीच ठहराता हुआ कर्ण कहता है- ‘किसी समय बाह्लीक देश का एक व्यक्ति कुरुजांगल (आज का नागौर-बीकानेर क्षेत्र) में आया। एक दिन वह उदास मन से स्त्रियों के बारे में सोचने लगा कि ऊन के कम्बल की साड़ी पहनने वाली मेरी मोटी, गोरी स्त्री मेरा स्मरण करती होगी। इसलिये मैं शतद्रु तथा इरावती को पार करके अपने देश जाऊंगा तथा बड़ी-बड़ी चूड़ियांे को पहनने वाली उन सुन्दर स्त्रियों को देखूंगा। सुखद मार्गों वाले पीलू-कैर और शमी (खेजड़ी) वाले वन में, मैं कब जाऊंगा? ……. जो सूअर, मुर्गा, गाय, गधा, ऊँट और भेड़ का मांस नहीं खाते उनका जन्म निरर्थक है………….।’

कर्ण आगे कहता है – ‘हे शल्य! जहां पीलू और दाख का विशाल वन है उसी देश में सतलुज, रावी, व्यास, झेलम, चिनाव और सिंधु नदियां बहती हैं, उन देशों का नाम आरट्ट है। वहां के मनुष्य अधर्मी होते हैं। वे मिट्टी और काठ के बर्तनों में खाते हैं, उन्हीं बर्तनों को कुत्ते चाटते हैं, उन्हीं में ये लोग घृणा रहित होकर भोजन करते हैं। वे बकरी, गधी और ऊँटनी का दूध पीते हैं। उनकी सृष्टि प्रजापति से नहीं हुई। वे तो वाही और हीक नामक पिशाच दम्पत्ति की संतान हैं।’

निष्कर्ष- कानूनगो तथा उनके मत के अन्य विद्वानों का कहना है कि बाह्लीक देश कोई ठण्डा प्रदेश था तभी तो वहां की स्त्रियां ऊनी कम्बल की साड़ियां पहनती थीं। अतः बाह्लीक देश का जर्तिका कबीला कश्मीरियों का पूर्वज था, न कि जाटों का। जर्तिका जाति गौमांस खाती थी किंतु जाट तो गाय के पुजारी हैं, उसे माता मानते हैं। जर्तिका जाति को बाही तथा हीक पिशाच दम्पत्ति से उत्पन्न बताया गया है। इसका अर्थ है कि वे आर्यों से अलग थे जबकि जाट तो आर्य हैं। इस प्रकार ये विद्वान जाटों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में जर्तिका मत का खण्डन करते हैं।

मत-7. जाटों की उत्पत्ति श्रीकृष्ण द्वारा बनाये गये ‘ज्ञाति’ संघ से हुई है।

व्याख्या- इस मत के प्रतिपादक ठाकुर देशराज हैं। उनका मानना है कि यदुवंश की अन्धक तथा वृष्णि शाखाओं ने एक राजनैतिक संघ स्थापित किया। इस संघ के भीतर कंस को परास्त करने के उपरान्त श्रीकृष्ण ने यादवों के अनेक प्रजातन्त्रीय समूहों को एकत्रित करके जरासन्ध की दृष्टि से दूर एक ऐसी शासन प्रणाली की नींव डाली जो प्रजातन्त्रीय थी तथा उसमें कोई भी जाति सम्मिलित हो सकती थी।

यह संघ ‘ज्ञाति’ कहलाता था। इसमें सम्मिलित होने वाले व्यक्ति को अपने पूर्व वंश से पुकारे जाने के स्थान पर ‘ज्ञाति’ कहा जाता था। इस प्रकार विभिन्न जातियांे का समूह ‘ज्ञाति’ कहलाया और आगे चलकर जाट बन गया।

निष्कर्ष- यह मत स्वीकार नहीं किया जा सकता। जाट जाति एक स्वतंत्र तथा सबसे भिन्न जाति है। यह विभिन्न प्रकार की जातियों का समूह नहीं है, इस बात की पुष्टि जाटों की शारीरिक रचना को देखने मात्र से हो जाती है।

मत-8. जाट अजातीय हैं।

व्याख्या- यह मान्यता लोक प्रचलित है। इसके अनुसार जब महाभारत के युद्ध में क्षत्रिय पुरुष नष्ट हो गये तब श्रीकृष्ण ने क्षत्रिय नारियां विभिन्न वर्णों के पुरुषों को सौंप दी। इन क्षत्रिय स्त्रियों से उत्पन्न संतान की कोई एक जाति नहीं थी। अतः वे अजातीय कहलाये और आगे चलकर ‘जाट’ बन गये।

निष्कर्ष- यह मत भी स्वीकार नहीं किया जा सकता। वस्तुतः ठाकुर देशराज ने श्रीकृष्ण द्वारा जिस ‘ज्ञाति’ संघ की स्थापना की कल्पना की है, वह कल्पना इसी मत का परिष्कृत रूप मात्र है।

मत- 9. जाट दसरेक जाति के वंशज हैं।

व्याख्या- राजशेखर रचित काव्यमीमांसा के पंचादेशों में दसरेक जनपद के एक दूत का वर्णन है। उसका मुख बकरे का सा, आंखें बंदर की सी भूरी तथा कन्धा भूरे बालों से युक्त बताया गया है। अपने गुह्य स्थानों को ढंकने के लिये उसने फटे-पुराने चिथड़े काम में लिये थे और वह मूली खाता आ रहा था जिससे ऐसा प्रतीत होता था कि यह पिशाच है। उसकी भाषा भी प्राचीन राजस्थानी अपभ्रंश जैसी है। इस दूत के ‘दसरेक जनपद’ को आज का पश्चिमी राजस्थान तथा इस दूत को प्राचीन आभीर माना जाता है। आचार्य परमेश्वर सोलंकी ने इन आभीरों को जाटों का पूर्वज अनुमानित किया है।

निष्कर्ष- राजशेखर की काव्यमीमांसा में वर्णित दसरेक जनपद का व्यक्ति जाट है, यह किसी भी प्रकार से सिद्ध नहीं होता। आभीरों की संतानें जाट हुईं, इस सम्बन्ध में भी कोई प्रमाण प्राप्त नहीं होता। अतः यह मत पूर्णतः गल्पमात्र है।

मत- 10. जाट नागवंशी हैं।

व्याख्या- जाटों में तक्षक, कालिय, कुठर तथा कुण्डु आदि गोत्र पाये जाते हैं। अतः इस मत को मानने वाले विद्वानों का कहना है कि जाट ‘जितनाग’ नामक जाति के वंशज हैं। पुराणों में नागों की इन शाखाओं का प्रमुखता से उल्लेख हुआ है- (1.) तक्षक, (2.) जितनाग, (3.) वसाति, (4.) कालपौनिया, (5.) कलकल।

जितनागों से जाटों की उत्पत्ति हुई तथा वसाति, जाटों के वैस वंश के नाम से विख्यात हुआ। वैस वंश की चार शाखाएं कादियान, सांगवान, सौराण तथा जाखड़ आज भी प्रचलित हैं। डॉ. योगेन्द्रपाल शास्त्री के अनुसार होशियारपुर (पंजाब) के समीप श्रीमालपुर वसाति जाटों की जन्म भूमि थी।

हेरोडोटस कहता है कि जित लोग एकेश्वरवादी थे। डिगायन के अनुसार ये बौद्ध धर्म के अनुयायी थे। कर्नल टॉड ने अग्निवंश से उत्पन्न क्षत्रियों के छत्तीस कुलों में जित नामक राजकुल भी वर्णन किया है।

कर्नल टॉड को ईस्वी 1820 में कोटा से दक्षिण में कुछ दूरी पर स्थित कुनसूयां नामक गांव में एक प्राचीन शिलालेख प्राप्त हुआ था। इस शिलालेख के अनुसार जित वंश के किसी राजा ने यदुकुल की किसी स्त्री से विवाह किया था।

ज्वालाप्रसाद मिश्र ने भी एक प्राचीन शिलालेख का हवाला देते हुए लिखा है कि जित तक्षक वंशीय हैं। इस शिलालेख के अनुसार- ‘विख्यात जित् पार्वती के स्तनों से निकलने वाले अमृत का पान करता है, जिसके पूर्व पुरुष वीर तुरक्ष (तक्षक) महादेव के गले में हार की भांति विराजमान रहते हैं।’

कर्नल टॉड ने तक्षकों की गणना छत्तीस राजकुलों में की है। यह राजवंश महाभारत के समय भी अस्तित्व में था। कर्नल टॉड के अनुसार तक्षक शकद्वीप से भारत में आये थे और एक समय इन्होंने अपने पराक्रम से सारे भूमण्डल को कंपा दिया था।

निष्कर्ष- यह मत पूर्णतः सही नहीं जान पड़ता कि जाट नागों की जित अथवा तक्षक शाखा से हैं। नाग नगर व्यवस्था बनाकर रहने वाले थे। जबकि जाट ग्राम्य सभ्यता के निवासी हैं। इस मत में से इतना तथ्य स्वीकार किया जा सकता है कि जब जाट जाति पूरे उत्तर भारत में फैल गई थी, तब नागों के कुछ कबीले जाट जाति में सम्मिलित हो गये।

मत-11. जाट आर्य हैं।

व्याख्या- नेसफील्ड ने लिखा है- ‘यदि सूरत शक्ल, कुछ समझे जाने वाली चीज है तो जाट सिवाय आर्यों के कुछ नहीं हो सकते।’

हैवेल ने लम्बे कद, सुन्दर चेहरा, पतली-लम्बी नाक, चौड़े कन्धे, लम्बी भुजाएं, शेर की सी कमर और हिरण की सी पतली टांगों के कारण इन्हें आर्य ठहराया है।

चिन्तामणि वैद्य ने लिखा है कि जाट हूणों के सम्बन्धी नहीं अपितु शत्रु थे। जाटों ने हूणों का सामना किया और उन्हें परास्त किया। वे सुन्दर, लम्बी और बड़ी नाक वाले हैं।

इलियट इनकी बोली एवं शारीरिक गठन से इन्हें आर्यों का वंशज बताता है।

निष्कर्ष- इस मत के विरोध में कोई प्रमाण नहीं दिया जा सकता। आज भी हिमालय पर्वत पर जो परम्पारगत आर्य कबीले निवास करते हैं और जिनका बाह्य दुनिया से सम्पर्क कम रहा है, वे देहयष्टि में जाट जाति के काफी निकट प्रतीत होते हैं। अतः इस मत को मानने में कोई आपत्ति नहीं है।

मत-12. जाट विदेशी मूल के हैं।

व्याख्या- विभिन्न विदेशी विद्वानों तथा कतिपय भारतीय विद्वानों ने आर्यों के विदेशी जाति होने के सम्बन्ध में मुख्यतः तीन सिद्धांत प्रतिपादित किये हैं- 1. यूरोपीय सिद्धांत, 2. मध्य एशिया का सिद्धांत, 3. आर्कटिक प्रदेश का सिद्धांत।

यदि उपरोक्त तीनों सिद्धांतों में से किसी भी एक मत को सही मान लिया जाता है तो जाट भी सम्पूर्ण आर्य जाति की तरह विदेशी मूल के ठहरते हैं।

निष्कर्ष- चूंकि आर्यों के भारत में बाहर से आने का सिद्धांत अधिकांश भारतीय इतिहासकारों द्वारा अमान्य घोषित कर दिया गया है, इसलिये जाटों के सम्बन्ध में भी यह धारणा अमान्य हो जाती है। क्योंकि जाट भी आर्य ही हैं।

मत-13. जाट जुटलैण्ड के निवासी हैं।

व्याख्या- इस सिद्धांत की स्थापना करने वालों का कहना है कि डेन्मार्क में जुटलैण्ड नामक एक जिला है। जाट मूलतः वहीं के रहने वाले हैं।

इस मत के समर्थन में ‘डेन्मार्क’ शब्द की संस्कृत शब्द के ‘धेनुमार्ग’ शब्द से समानता को भी देखा जा सकता है। धेनुमार्ग का अर्थ होता है- गायों का मार्ग, जहाँ बहुत बड़ी संख्या में गायें विचरण करती हैं।

आज भी डेन्मार्क पूरे विश्व में सर्वाधिक दुग्धोत्पादन के लिये प्रसिद्ध है।

निष्कर्ष- जाटों का मुख्य व्यवसाय खेती तथा पशुपालन है। अतः इस मत को मानने में कोई अतिश्योक्ति दिखाई नहीं देती कि धेनुमार्ग (डेन्मार्क) में जाट रहते थे। वे गायें पालते थे और उनका मूल स्थान आज भी जुटलैण्ड कहलाता है।

यहाँ एक बात यह भी देखनी होगी कि ‘जाट’ भारत से लेकर जर्मनी तक पाये जाते हैं।

वास्तविकता क्या है ?

जाटों को विदेशी विद्वानों ने शक, कुषाण, हूण, यूची अथवा विदेशी जातियों की संतान होना बताया है, वस्तुतः ये विद्वान एक सोची समझी साजिश के तहत ऐसी मान्यताएं स्थापित करते थे। उन्होंने न केवल जाटों को अपितु गुर्जरों, चौलुक्यों, चावड़ों, प्रतिहारों तथा राठौड़ों को भी विदेशी ठहराने का प्रयास किया।

अंग्रेज एवं अन्य यूरोपीय जातियां जो मध्यकाल में भारत आईं और उन्नीसवीं शताब्दी में देश की वास्तविक शासक बन गईं तो उन्होंने यहाँ की जनता को यह समझाने का प्रयास किया कि न केवल हम, अपितु भारत के पुराने शासक क्षत्रिय अथवा राजपूत भी विदेशी थे। अतः हमसे घृणा करने की कोई आवश्यकता नहीं है।

विदेशी विद्वानों ने तो यहाँ तक सिद्ध कर दिया कि सम्पूर्ण आर्य जाति ईरान, यूनान, उत्तरी ध्रुव, भूमध्य सागर के तट अथवा किसी अन्य प्रदेश से भारत में आये। ये मान्यताएं भौगोलिक, ऐतिहासिक, सामाजिक तथा धार्मिक परम्पराओं के आधार पर अमान्य ठहराई जा चुकी हैं। जाटों को विदेशी बताना भी इन विदेशी विद्वानों का यही कारण था।

भारतीय समाज का इतिहास ऋग्वेद से मिलना प्रारम्भ होता है। ऋग्वेद में जाति व्यवस्था का नहीं अपितु वर्ण व्यवस्था का उल्लेख है। जातियां तब बनी ही नहीं थीं।

भारतीय समाज के इतिहास की दूसरी महत्वपूर्ण पुस्तक भगवान वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत है। इस पुस्तक में क्षत्रिय जातियों अथवा क्षत्रिय वंशों का विस्तार से उल्लेख हुआ है।

महाभारत में मद्रकों के साथ जाटतृकों का उल्लेख भी हुआ है। महाभारत में जाटतृक (अथवा जर्तिका) जाति के रहने का जो स्थान बताया गया है, वह आधुनिक पंजाब ही है। अतः इस बात की प्रबल की सम्भावना है कि जाटों की उत्पत्ति जाटतृकों से हुई हो।

कर्ण द्वारा मद्रराज शल्य को जाटतृकों के बारे में जो ऊँची-नीची बातें कही गई हैं, वे शाश्वत सत्य नहीं मानी जा सकतीं। कर्ण अपने परिवार एवं समाज से च्युत व्यक्ति था। उसके दुष्ट स्वभाव के कारण ही दुर्योधन ने उसे अपना मित्र एवं सेनापति बनाया था।

मद्रराज शल्य की बहिन माद्री कुरुवंशी महाराज पाण्डु को ब्याही गई थी। पाण्डु की महारानी किसी हीन कुलोजात राजकुल की नहीं हो सकती थी। मद्रराज शल्य निःसंदेह कर्ण से श्रेष्ठ था।

कर्ण का स्वभाव श्रेष्ठ पुरुषों से द्रोह करने तथा उन्हें येन-केन-प्रकरेण नीचा दिखाने का था। अतः कर्ण की किसी बात का विश्वास नहीं किया जा सकता। उसके द्वारा यह कहा जाना कि जर्तिका स्त्रियां शराब पीकर और नशे में नंगी होकर नाचती हैं तथा जिन बर्तनों को कुत्ते चाटते हैं, उन्हीं में जर्तिका लोग भोजन करते हैं, सिवाय दुष्टता के और कुछ नहीं है।

यदि ये लोग ऐसे होते तो इनकी राजकुमारी महाभारत काल के सर्वशक्तिशाली, परम प्रतापी नरेश पाण्डु को न ब्याही गई होती।

लेखक की धारण है कि आज के जाट महाभारत में वर्णित जाटतृक अथवा जर्तिका जाति के वंशज हैं जो बाह्लीक (स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले के संयुक्त पंजाब) देश में रहते थे और वहां से चलकर इनका प्रसार भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, ईराक, चीन, तिब्बत, मंगोलिया, स्पेन, स्कैण्डिवेनिया, नो-वो गोर्ड, मिश्र, यूनान, तुर्किस्तान, अरब, इंग्लैण्ड, ग्रीक, रोम तथा जर्मनी तक हुआ।

विभिन्न देशों के जाटों ने कालान्तर में अपने देश की सभ्यता, संस्कृति और धर्म को अपना लिया।

यद्यपि भारत के जाटों में नागों के अतिरिक्त अन्य कई जातियां सम्मिलित हैं तथापि वर्तमान समय में जाट अपने मूल स्वरूप से निकटता बनाये रखने में केवल भारत में ही सफल हो सके हैं। वे यहाँ आज भी वैदिक सभ्यता को अपनाये हुए हैं, कृषिकर्म में संलग्न हैं तथा अपने स्वातंत्र्य-प्रिय स्वभाव के कारण सबसे अलग दिखाई देते हैं।

जाटों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में कुछ भ्रामक बातों का निराकरण यहीं कर देना उचित होगा। जाटों को आर्येतर जाति मानने, नागों से उत्पन्न होने अथवा शिवजी की जटाओं से उत्पन्न होना बताये जाने के कुछ कारण हैं।

वस्तुतः जिस समय भारतीय समाज वैदिक सभ्यता से आगे निकलकर पौराणिक काल में पहुंचा तो ना-ना प्रकार की जातियां उत्पन्न हो गईं। इन जातियों की उत्पत्ति ऊपर से नीचे हुई थी।

अर्थात् भारतीय समाज में प्रारम्भ में समस्त आर्य ब्राह्मण थे। वे ईश्वर तथा सत्य के साथ-साथ प्रकृति के रहस्यों की खोज करते थे। वे प्रकृति से प्राप्त कन्द, मूल, फल आदि पर जीवन यापन करते थे।

जब उन्हें दूसरे देशों से आने वाले आक्रान्ताओं से अपनी रक्षा करने की आवश्यकता अनुभव हुई तो कुछ ब्राह्मण क्षत्रियों में परिवर्तित हो गये। ऐसा करते समय आर्यों ने देवताओं से अस्त्र-शस्त्र एवं उनके संचालन का ज्ञान प्राप्त किया।

जब समाज के भरण-पोषण के लिये कृषि कर्म एवं पशुपालन की आवश्यकता हुई तो कुछ ब्राह्मण एवं क्षत्रिय; वैश्यों में परिवर्तित हो गये।

सभ्यता और समाज के और आगे बढ़ने पर अनुचरों और सेवकों की आवश्यकता हुई तो कुछ ब्राह्मण,  क्षत्रिय और वैश्य; शूद्र कर्म करने लगे। इन शूद्रों में अन्त्यज सम्मिलित नहीं थे। इन शूद्रों में कुम्हार, सुथार, नाई, माली आदि जातियां सम्मिलित थीं न कि चाण्डाल तथा डोम जैसी अन्त्यज कही जाने वाली जातियां। अंत्यज जातियां तो बहुत आगे चलकर उत्पन्न हुईं।

जैसे-जैसे समाज बढ़ता गया, उसे अनुशासनबद्ध रखने के प्रयास भी बढ़ते गये। ब्राह्मणों ने समाज को धार्मिक अनुशासन में तथा क्षत्रियों ने प्रशासनिक एवं सामरिक अनुशासन में आबद्ध किया।

इस सामाजिक व्यवस्था में ब्राह्मणों का देवताओं से सीधा सम्पर्क था। चूंकि देवता पहाड़ों में रहते थे इसलिये ब्राह्मण धरती के देवता कहे जाने लगे।

जब देव जाति नष्ट हो गई और आक्रांताओं से समाज की रक्षा के लिये क्षत्रियों को ही जूझना पड़ा तो वे राजा बन गये और ब्राह्मण या तो उनके पुरोहित एवं मंत्री बनकर रह गये या मानव समाज से दूर जंगलों एवं पर्वतों में ऋषि-मुनि बनकर तपस्या करने लगे।

कुछ वैश्यों ने जो कि कृषि कर्म एवं पशुपालन में संलग्न थे, ब्राह्मणों और क्षत्रियों दोनों की बनाई व्यवस्थाओं को मानने से इन्कार कर दिया और वे स्वतंत्र आचरण करने लगे। यही कारण है कि ब्राह्मणों ने इन्हें अजातीय (बिना जात का) कहकर अपनी खीझ उतारनी चाही। यही कृषिकर्मा लोग आगे चलकर जाट कहलाये।

आगे चलकर आर्यों की नाग उपजाति भी इन्हीं जाटों में विलीन हो गई। समय-समय पर अन्य क्षत्रिय जातियां भी युद्धकर्म त्यागकर कृषि एवं पशुपालन में संलग्न हो गईं तथा वे भी जाटों में सम्मिलित हो गये।

यही कारण है कि जाटों में नागों के तक्षक, कालिय, कुठर तथा कुण्डु गोत्र पाये जाते हैं तो क्षत्रियों के गहलोत, दाहिमा, पंवार, यादव, तंवर तथा मॉर गोत्र भी मिलते हैं।

जाटों की स्त्रियां सिर पर बोर धारण करती हैं जो कि जाटों की नागों से निकटता का परिचायक है। जाटों और नागों की निकटता के सम्बन्ध में दो प्रमाण और दिये जा सकते हैं। एक तो यह कि जहां-जहां नाग रहते थे, उस पूरे क्षेत्र में अब जाट बहुलता से पाये जाते हैं।

नागौर नगर नागों द्वारा बसाया गया था इस कारण नागौर, नागपुर, नागद्रह, अहिच्छत्रपुर (बरेली) तथा अन्य नामों से जाना जाता था। इस क्षेत्र में जाट बहुलता से रहते हैं।

कहा जाता है कि जन्मेजय के नागयज्ञ के बाद बचे हुए नाग इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली) से चलकर राजस्थान से लेकर नागपुर (महाराष्ट्र) तथा उसके नीचे तक फैल गये।

यही कारण है कि दिल्ली से लेकर हिसार, सीकर, चूरू, झुंझुनूं, बीकानेर, नागौर, जोधपुर, बाड़मेर तथा जैसलमेर आदि जिलों में बड़ी संख्या में जाट रहते है। वस्तुतः इस पूरे क्षेत्र में नागों की बस्तियां थीं जिनके साथ-साथ जाट रहते थे।

नाग नगरों में तथा जाट गांवों एवं ढाणियों में रहते थे। नागों से जाटों की निकटता का दूसरा प्रमाण यह है कि जाटों को भगवान शंकर की जटाओं से उत्पन्न होना बताया गया है। नाग भगवान शंकर के गले में रहते हैं तो जाट नागों से श्रेष्ठ होने के कारण शंकर के सिर की जटाओं से निकले हैं। यही ऐतिहासिक रूपक इस मिथक के पीछे दिखाई देता है।

जाट आज भी ब्राह्मणों की बहुत सारी व्यवस्थाओं को नहीं मानते। जाटों में विधवा विवाह अथवा नाते की प्रथा प्रचलित है। स्त्रियां सामान्यतः पर्दा नहीं करतीं। वंशानुगत अधिकार में जाटों का विश्वास नहीं है। ये वर्गवाद में भी विश्वास नहीं करते। उत्पादन एवं श्रम को महत्व देते हैं।

कानूनगो ने जाटों के बारे में लिखा है कि जाट व्यक्तिवादी हैं और व्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्षधर हैं। जाट वही करता है जो उसकी दृष्टि में ठीक जंचे और कहीं-कहीं वह उसे जानबूझ कर भी करता है जो उसे गलत लगे।

डॉ. रणजीत सिंह ने लिखा है कि चारित्रिक दृष्टि से जाट प्राचीन आंग्ल-सैक्सन और रोमनवासियों के समान प्रतीत होता है। स्वभाव की दृष्टि से वह जर्मनों से मेल खाता है। इवेटशन कहता है कि जाट बातों द्वारा कठिनता से सहमत होता है।

ये सब टिप्पणियां इस बात की द्योतक हैं कि जाटों ने भारतीय आर्य होते हुए भी ब्राह्मणों की व्यवस्था को पूरी तरह नहीं स्वीकारा।

क्षत्रियों से भी इनका पूरा विरोध रहा। जहां कहीं भी जाटों ने अपना शासन स्थापित करना चाहा, क्षत्रियों ने उनका बड़ा भारी विरोध किया किंतु भरतपुर, गोहद, धौलपुर, पंजाब तथा अन्य कुछ स्थानों पर जाटों ने अपने राज्य कायम किये।

जाटों का विरोध केवल ब्राह्मण अथवा क्षत्रियों से ही नहीं रहा अपितु अंग्रेजों के शासनकाल में तेजी से पनपी महाजनी व्यवस्था को भी जाटों ने पूरी तरह से ललकारा।

यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि भारतीय संस्कृति पर जितना प्रभाव ब्राह्मणों द्वारा बनाई धर्म-व्यवस्था, क्षत्रियों द्वारा बनाई गई शासन व्यवस्था और वैश्यों द्वारा करवाये गये लोकोपकारक कार्यों का है, उतना ही व्यापक और गहरा प्रभाव जाटों के व्यक्ति-स्वातंत्र्य चेतना का भी है।

आजाद भारत में जाटों ने उत्तर भारत की खेती को संवारा है तो भारतीय सेना को लाखों वीर सैनिक भी उपलब्ध कराये हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था पर जाटों का गहरा प्रभाव है।

शिक्षा और विज्ञान के क्षेत्र में भी जाट जाति के विद्वान व्यक्तियों ने मील के पत्थर स्थापित किये हैं। यह धर्म-प्राण जाति, गौ-सेवा के प्रति जितनी समर्पित है, उतनी समर्पित कोई अन्य जाति नहीं है।

निष्कर्ष

आदि मनु के समय में और उनके बहुत बाद के काल में भी आर्य बस्तियां भारत से लेकर मध्य एशिया तथा यूरोप महाद्वीप तक फैली हुई थीं। उस काल में अलग-अलग देश अस्तित्व में आने आरम्भ नहीं हुए थे। इसलिये उस समय धरती के जिस क्षेत्र में आर्य जाति विस्तृत थी उस पूरे भू-क्षेत्र को भारत कहा जाना चाहिये।

उस काल में कौनसा आर्य कबीला कहां रहता था और घूमते-घूमते कहाँ जाकर निवास करने लगा, इस सम्बन्ध में कोई ठोस प्रमाण नहीं दिया जा सकता। हो सकता है कि जाट उस समय जुटलैण्ड में रहते हों।

निष्कर्षतः इतना ही कहा जा सकता है कि जाट जाति आखण्ड भारत के संयुक्त पंजाब क्षेत्र की रहने वाली प्राचीन एवं विशुद्ध आर्य जाति है और पूर्णतः भारतीय है। यह नैतिक परम्पराओं पर आधारित धर्मप्रेमी एवं गौसेवक जाति है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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