Monday, July 22, 2024
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भारत की लुप्त सभ्यताएँ

भारत की लुप्त सभ्यताएँ शीर्षक से लिखी गई इस पुस्तक में बंदर के आदमी में बदलने की प्रक्रिया से लेकर हर्ष के काल तक विकसित हुई सभ्यताओं का इतिहास लिखा गया है।

विगत डेढ़ करोड़ वर्ष के कालखण्ड में भारत की धरती पर इतनी सभ्यताएँ प्रकट एवं लुप्त हुई हैं कि यदि भारत को प्राक्-सभ्यताओं एवं प्राच्य-संस्कृतियों का संग्रहालय कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। जैसे-जैसे पुरातत्व की खुदाइयाँ एवं इतिहास सम्बन्धी शोध-कार्य आगे बढ़ रहे हैं, इस क्षेत्र में नवीन जानकारियाँ उजागर होती जा रही हैं। इनके आधार पर कहा जा सकता है कि धरती के गर्भ में अभी बहुत सी सभ्यताओं के स्थल दबे पड़े हैं।

भारत की लुप्त सभ्यताओं को, अध्ययन की सुविधा के लिए दो भागों में रखा जा सकता है- 1. प्रागैतिहासिक काल एवं 2. ऐतिहासिक काल। ‘प्रागैतिहास’ शब्द का निर्माण दो शब्दों- प्राक् + इतिहास से हुआ है अर्थात् प्राचीन इतिहास। अंग्रेजी भाषा में इसे श्च्तमीपेजवतलश् अर्थात् इतिहास से पहले का इतिहास कहा जाता है। इसे अन-ऐतिहासिक काल भी कहा जाता है।

प्रागैतिहासिक काल की मानव-सभ्यताओं के अध्ययन के लिए किसी तरह की लिखित सामग्री, शिलालेख, सिक्के आदि प्राप्त नहीं होते हैं। इसलिए इतिहासकार इस काल के इतिहास को जीवविज्ञानी शोधों, पुरातत्त्व उत्खननों एवं मानवशास्त्रियों द्वारा की जा रही खोजों को आधार सामग्री बनाकर लिखते हैं।

जिस कालखण्ड से मनुष्य द्वारा लिखित सामग्री अर्थात् शिलालेख, सिक्के, बर्तनों पर उत्कीर्ण लिपियाँ, मूर्तियों के लेख, धर्मग्रंथ, शासकीय आदेश आदि प्राप्त होते हैं, उस कालखण्ड के विवरण को इतिहास कहा जाता है। प्रागैतिहास तथा इतिहास में भेद करने के लिए यह एक सामान्य सिद्धांत है किंतु इसके अपवाद भी हैं।

उदाहरण के लिए सिंधु सभ्यता के बर्तनों एवं मूर्तियों पर लिपिबद्ध संदेश हैं किंतु उन्हें अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है। फिर भी इस कालखण्ड के विवरण को हम इतिहास में ही सम्मिलित करते हैं क्योंकि इस काल की सभ्यता काफी विकसित थी।

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अर्थात् यहाँ हम इस सिद्धांत पर चल रहे हैं कि जिस कालखण्ड में मानव सभ्यता का भलीभांति विकास नहीं हुआ, उस कालखण्ड को प्रागैतिहास में रखा गया है और जिस कालखण्ड में मानव एक विकसित सभ्यता की अवस्था में दिखाई देता है, उस कालखण्ड को हम ऐतिहासिक काल में रख रहे हैं।

प्रागैतिहासिक मनुष्य के विकसित सभ्यता में पहंचने की घटना धातुकाल में प्रवेश करने के साथ ही होती हुई दिखाई देती है। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि मानव सभ्यता के उस कालखण्ड को जिसमें मानव अर्थात् ‘आदिमानव’ पत्थर, लकड़ी एवं हड्डी के औजार और उपकरण काम में ले रहा था, प्रागैतिहासिक कालखण्ड है और जहाँ से मानव अर्थात् ‘विकसित मानव’ धातुकालीन सभ्यता में प्रवेश करता है, वहीं से मानव सभ्यता का ऐतिहासिक काल आरम्भ होता है।

मानव जाति का प्रागैतिहासिक काल, ऐतिहासिक काल की तुलना में बहुत बड़ा है। प्रागैतिहासिक काल के अध्ययन के लिए हमें लगभग डेढ़ करोड़ वर्ष के कालखण्ड को टटोलना होता है जबकि ऐतिहासिक काल के अध्ययन के लिए हमें पिछले लगभग दस हजार वर्षों को खंगालना होता है।

लगभग डेढ़ करोड़ वर्ष की अवधि में फैले प्रागैतिहासिक काल का विभाजन, विभिन्न प्रजातियों के आदिमानवों द्वारा प्रयुक्त औजारों एवं हथियारों तथा उनमें प्रयुक्त सामग्री की सहायता से किया जाता है। इसलिए प्रागैतिहासिक काल के प्रत्येक खण्ड को उस कालखण्ड में प्रयुक्त निर्माण सामग्री से पहचाना जाता है तथा उस कालखण्ड का नामकरण भी उसी सामग्री के आधार पर किया जाता है।

प्रागैतिहासिक साक्ष्य मुख्यतः तीन प्रकार के हैं- (1) प्रागैतिहासिक काल के मानवों की अस्थियों के अवशेष (2) प्रागैतिहासिक काल के मानवों द्वारा शिकार किए गए पशु-पक्षियों की अस्थियों के अवशेष (3) उस काल के मानव द्वारा प्रयुक्त औजारों, हथियारों एवं बर्तनों आदि के अवशेष।

प्रागैतिहासिक सामग्री धरती पर, पहाड़ों पर, गुफाओं में, धरती में दबे हुए तथा प्राचीन नदी-निक्षेपों के साथ मिलती है। प्रागैतिहासिक सामग्री के काल-निर्धारण में कार्बन डेटिंग पद्धति तो सहायता करती ही है, साथ ही वह सामग्री धरती के किस स्तर से प्राप्त हुई है, धरती के किस भाग में प्राप्त हुई है, उस सामग्री को बनाने में किस प्रकार की मिट्टी, पत्थर अथवा धातु का प्रयोग हुआ है और वह सामग्री किन अन्य सामग्रियों के साथ प्राप्त हुई है, आदि तथ्यों से भी उस सामग्री की प्राचीनता का अनुमान लगाया जाता है।

प्राकृतिक गतिविधियों के परिणामस्वरूप धरती में दब गई सामग्री का अध्ययन स्तरक्रम-विज्ञान के नियम के अनुसार किया जाता है। इस नियम के अनुसार किसी भी स्तरीकरण में निम्नतम स्तर सबसे पुराना होता है और ऊपर का स्तर क्रमशः बाद का।

यदि यह निक्षेप किसी नदी का हो, तो नदी का पाट उसमें किसी दूसरी नदी के गिरने से या भूकंप के कारण टुकड़े-टुकड़े हो गया हो, तो यह संभव है, कि क्रमशः बाद वाला स्तर उत्तल संरचना पर जमा हो गया हो। इस संरचना में सबसे नया निक्षेप निम्नतम तल पर होगा, जबकि सबसे पुराना निक्षेप उच्चतम तल पर होगा।

यही नदी के सबसे पुराने पाट का सूचक भी होगा। इसके साथ ही जब किसी बड़े क्षेत्र के सन्दर्भ में एक जैसे अनेक कालक्रम उपलब्ध हों, तब इन निक्षेपों के प्रमुख लक्षणों की तुलना करके उस क्षेत्र में मानव हलचल का संश्लिष्ट काल-क्रम तैयार किया जाता है।

प्रागैतिहासिक सामग्री प्रायः एक क्रम में तथा निरंतरता में नहीं मिलती। इस कारण इस सामग्री का कालक्रम निश्चित करना प्रायः एक जटिल काम होता है। इस सामग्री के आधार पर किसी क्षेत्र में पुरा-पाषाण काल, मध्यपाषाण काल और नवपाषाण काल के स्तर दिखाई पड़ते हैं तो कहीं इनमें से कोई एक या दो स्तर अनुपस्थित होते हैं। भारत के अधिकांश पुरा-पाषाण स्थलों में कालक्रम का व्यवधान एवं अनिश्चितता दिखाई पड़ती है।

यह आवश्यक नहीं है कि विश्व में सभी स्थानों पर एक समय में सभ्यता का एक समान चरण चल रहा हो। यदि किसी स्थान पर जब पुरा-पाषाण काल आरम्भ हो रहा हो तो यह पर्याप्त संभव है कि उसी समय धरती के किसी अन्य क्षेत्र में मध्यपाषाण काल आरम्भ हो गया हो तथा किसी अन्य स्थल पर मानव सभ्यता नव-पाषाण काल में प्रवेश कर गई हो।

कभी-कभी ऐसा भी देखने को मिलता है कि एक ही सभ्यता के लोग पुरा-पाषाण काल से सीधे ही नवपाषाण काल में आ गए, वहाँ मध्यपाषाण काल आया ही नहीं। ऐसा भी देखने को मिला है कि कुछ स्थलों पर मध्यपाषाण काल की सभ्यता अचानक ही धातु-सभ्यता में प्रवेश कर गई, वहाँ नवपाषाण काल आया ही नहीं।

आधुनिक विज्ञान के अनुसार आज से लगभग 2.80 करोड़ वर्ष पहले धरती पर बंदरों का उद्भव हुआ। चार्ल्स डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत के आधार पर यह सिद्धांत स्वीकार किया गया है कि आज से लगभग 38 लाख साल पहले इन्हीं बंदरों में से कुछ बुद्धिमान बंदर अपने मस्तिष्क के आयतन, हाथ-पैरों के आकार, रीढ़ की हड्डी एवं स्वर-रज्जु (वोकल कॉड) की लम्बाई में सुधार करते हुए और विकास की विभिन्न अवस्थाओं से गुजरते हुए, आदिमानवों में बदल गए।

विकास की विभिन्न अवस्थाओं से गुजरते हुए इन्हीं आदि मानवों ने पाषाण सभ्यताओं को जन्म दिया। ये पाषाण सभ्यताएँ भी अनेक चरणों से होकर गुजरीं। यही आदिमानव आगे चलकर विकसित मानव में बदल गए और उन्होंने मानव-सभ्यता का निरंतर परिष्कार करते हुए सभ्यता के विकसित चरणों को पार किया।

भारत की लुप्त सभ्यताएँ पुस्तक में भारत की धरती पर जन्म लेने, विकसित होने एवं लुप्त हो जाने वाली प्राचीन सभ्यताओं का इतिहास लिखा गया है। जिस प्रकार आज का भारत सांस्कृतिक स्तर पर विविधताओं वाला देश है, उसी प्रकार भारत की लुप्त सभ्यताएँ भी इतनी अधिक विविधताएं लिए हुई थीं कि उनके बारे में जानकर आश्चर्य होता है।

कहीं पर बंदर ही पत्थरों के औजार बनाकर अपने आदमी होने का भ्रम उत्पन्न कर रहे हैं तो कहीं आदमी लाखों वर्षों तक हाथों में पत्थर लेकर घूमता हुआ दिखाई देता है। कहीं कच्ची ईंटों का प्रयोग आरम्भ होने में लाखों साल का समय लगता हुआ दिखाई दे रहा है तो कहीं पर आदमी सभ्यता की इतनी लम्बी छलांगें लगाता है कि वह पुरा-पाषाण युग से सीधा नवपाषाण युग में जा रहा है और कहीं पर मनुष्य मध्यपाषाण से सीधा धातुयुग में घुस जाता है।

कहीं पर मनुष्य खेती करना सीख जाता है तो कहीं पर मनुष्य बर्तन बनाना नहीं सीख पाता। कहीं पर मनुष्य हजारों साल तक कच्ची मिट्टी के बर्तनों में खाता हुआ दिखाई देता है तो कहीं पर केवल कुछ सौ साल में ही अपनी सभ्यता को लुप्त करके चल देता है।

आदिम सभ्यताओं की यह उथुल-पुथल न केवल मनुष्य द्वारा प्रयुक्त सामग्री की बनावट और सामग्री के प्रकार की कहानी कहती है अपितु यह भी बताती है कि किस प्रकार मनुष्य अपने मस्तिष्क का विकास करता हुआ, जीवन की कठिनाइयों एवं अभावों को समाप्त करके सुख-सुविधाओं की खोज में कठिन परिश्रम का अवलम्ब ग्रहण किए हुए है।

जब धातु की खोज हो गई तो मनुष्य आदिम अवस्था से निकलकर सभ्यता के ऐतिहासिक युग में प्रवेश कर गया। ऋग्वैदिक काल, सिंधु सभ्यता का काल, राम का काल, उत्तर-वैदिक काल, महाभारत काल, मौर्यकाल, गुप्तकाल तथा हर्षकाल को भारतीय इतिहास के प्राचीन कालखण्ड में रखा जाता है। इसलिए इस पुस्तक में इन कालों की सभ्यताओं का भी संक्षेप में वर्णन किया गया है।

हर्ष की मृत्यु के केवल 65 वर्ष बाद भारत की धरती पर इस्लाम के आक्रमण होने लगते हैं और भारतीय सभ्यता का स्वर्णिम-परिदृश्य चूर-चूर होकर बिखरने लगता है। इसलिए इस पुस्तक को हर्ष कालीन सभ्यता तक ही सीमित रखा गया है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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