आम्बेर के राजा भारमल ने ई.1562 में अकबर की अधीनता स्वीकार की थी। ई.1563 में मेड़ता राज्य तथा ई.1564 में जोधपुर राज्य ने भी अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली! ई.1568 में चित्तौड़ का तथा ई.1569 में रणथंभौर का दुर्ग बादशाह अकबर (AKBAR) के अधीन हो गए।
इन दोनों किलों के पतन के बाद ई.1569 के अंतिम महीनों में कालिंजर के राजा रामचंद्र ने भी अकबर की अधीनता स्वीकार करते हुए अपने दुर्ग की चाबियां अकबर को भिजवा दीं। इस आलेख में हम ई.1570 में बीकानेर एवं जैसलमेर रियासतों द्वारा अकबर की अधीनता स्वीकार किए जाने की चर्चा करेंगे।
अकबर (AKBAR) की ढेर सारी बेगमों ने कई लड़कों को जन्म दिया था किंतु वे सब शैशव काल में ही मृत्यु को प्राप्त हुए। इस पर अकबर अपनी बेगम मरियम उज्जमानी अर्थात् हीराकंवर के गर्भवती होने पर उसे फतहपुर सीकरी में शेख सलीम चिश्ती के घर में छोड़ आया ताकि बेगम को सूफी दरवेश का आशीर्वाद मिल सके और अकबर को कोई पुत्र प्राप्त हो सके।
अकबर (AKBAR) के दरबारी लेखक अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि ऐसा समझा गया कि शेख सलीम चिश्ती की कृपा से ई.1569 में बेगम मरियम उज्जमानी की कोख से एक पुत्र का जन्म हुआ इसलिए शहजादे का नाम सलीम रखा गया। सलीम के जन्म के कुछ समय बाद ही अकबर ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के दर्शन करने के लिए पैदल ही अजमेर के लिए रवाना हो गया।
बादशाह अकबर की इस यात्रा का विवरण हम पूर्व की कड़ियों में कर चुके हैं। जिस समय मरियम उज्मानी गर्भवती थी, उस समय अकबर की एक और बेगम गर्भवती थी किंतु उसे शेख सलीम चिश्ती के आशीर्वाद के लिए सीकरी नहीं भेजा गया था। सलीम के जन्म के कुछ दिनों बाद इस बेगम की कोख से एक पुत्री ने जन्म लिया जिसका नाम खानम रखा गया।
जब अकबर ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह की यात्रा के बाद वापस लौटा, तब शुक्ल पक्ष चल रहा था और आकाश साफ होने से रात्रि में चंद्रमा बड़ी तेजी से चमकता था।
इसलिए अकबर (AKBAR) ने चंद्रमा के प्रकाश में शिकार खेलने की योजना बनाई। वह रात होते ही जंगलों में चला जाता और जंगलों में निर्भय होकर आराम करते हुए हिरणों को मार डालता। इस शिकार में अकबर (AKBAR) का बड़ा मनोरंजन हुआ जिसके बारे में उसके दरबारी लेखक ने विस्तार से लिखा है।
ई.1570 में शहजादे मुराद का जन्म हुआ। इस पर अकबर (AKBAR) पुनः अजमेर की यात्रा पर गया। इसी वर्ष उसने अजमेर के मैदानी दुर्ग का जीर्णोद्धार करने के आदेश दिए। यह एक प्राचीन हिन्दू किला था किंतु इस जीर्णोद्धार के बाद इसे अकबर का किला कहा जाने लगा।
इसी यात्रा के बाद अकबर नागौर गया था। नागौर के सूबेदार ने अकबर के स्वागत में एक शानदार भोज का आयोजन किया जिसमें मुगल अधिकारियों के साथ-साथ बहुत से हिन्दू राजाओं एवं जागीरदारों को भी बुलाया गया ताकि वे अकबर की अधीनता स्वीकार कर सकें।
अकबर की नागौर यात्रा का उल्लेख कुछ पिछले आलेखों में भी हुआ है। बीकानेर तथा जैसलमेर के राजाओं ने नागौर में ही अकबर की अधीनता स्वीकार करके मुगलों से अधीनस्थ मित्रता स्थापित कर ली।
जोधपुर का अपदस्थ राव चंद्रसेन भी अकबर से मिलने के लिए नागौर आया। वह छः साल से जोधपुर से बाहर भाद्राजून की पहाड़ियों में रहकर अकबर की सेनाओं से संघर्ष कर रहा था।
अकबर बादशाह ने राव चंद्रसेन से कहा कि वह अकबर की अधीनता स्वीकार कर ले किंतु राव चंद्रसेन ने बादशाह अकबर की अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया तथा फिर से भाद्राजून की पहाड़ियों में चला गया।
राजपूताना राज्यों में अब केवल सिसोदिये ही अपनी स्वतंत्र सत्ता बनाए हुए थे जिनमें मेवाड़ और उसके अधीनस्थ राज्य डूंगरपुर, बांसवाड़ा तथा प्रतापगढ़ सम्मिलित थे। इन सभी राज्यों के राजा चित्तौड़ के सिसोदिया कुल से निकले थे तथा मेवाड़ राज्य के अधीन थे। ये अकबर की अधीनता स्वीकार करने को तैयार नहीं थे।
अकबर (AKBAR) के दरबारी लेखक अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि कजली के राजा का दूत अकबर के दरबार में आया। यह राज्य मलाबार के समीप स्थित था। वहाँ का राजा अपने देश और धन के लिए प्रसिद्ध था।
उसे जोगियों से बड़ा लाभ पहुंचा था इसलिए वह उनका सम्मान करता था और उनके जैसे ही कपड़े पहनता था। अबुल फजल लिखता है कि कजली का राजा बहुत अरसे से बादशाह की सेवा में भेंट भेजने का विचार कर रहा था परंतु दूरी के कारण और अन्य भौगोलिक कठिनाइयों के कारण वह अपनी इच्छा पूरी नहीं कर पा रहा था।
कजली के राज-सेवकों में से कोई व्यक्ति इतनी दूर आने को तैयार नहीं था। कजली के राजा के एक मंत्री के पुत्र ने यह काम करना स्वीकार किया।
कजली के राजा ने मंत्री के पुत्र को बादशाह अकबर के लिए बहुमूल्य उपहार दिए तथा उससे कहा कि मेरे पास एक चमत्कारी चाकू है जो कजली देश के प्राचीन वैद्य ने बनाया है। प्रत्यक्ष रूप में इस चाकू में कोई गुण नहीं है परंतु इसको जिसे भी छुआ जाए उसकी सूजन दूर हो जाती है। तुम इस चाकू को ले जाओ और अकबर (AKBAR) को भेंट करना।
अबुल फजल (ABUL FAZAL) लिखता है कि कजली का राजदूत अकबर (AKBAR) की राजधानी आ गया परंतु बहुत अर्से तक वह बादशाह के दरबार में उपस्थित नहीं हो सका। फिर उसका परिचय राजा बीरबल से हुआ।
बीरबल ने कजली के राजदूत का परिचय बादशाह से करवाया। कजली के राजदूत ने वह चाकू बादशाह को भेंट किया तथा उसे चाकू के रहस्य के बारे में बताया। इस पर अकबर ने राजदूत पर कृपा करके उसे पुरस्कार दिया। इसके बाद कजली का राजदूत अकबर (AKBAR) से अनुमति लेकर अपने देश को लौट गया।
अबुल फजल लिखता है कि यह चाकू अब तक शाही-कोष में रखा हुआ है। मैंने स्वयं बादशाह से सुना है कि इससे 200 से अधिक रोगियों को लाभ हो चुका है।
हालांकि बदायूंनी ने इस घटना का उल्लेख नहीं किया है किंतु इस घटना से यह स्पष्ट हो जाता है कि अकबर के उत्तर भारत विजय अभियानों की चर्चा अब दक्षिण भारत में मलाबार प्रांत तक होने लगी थी और उस क्षेत्र के राजा भी अकबर (AKBAR) अकबर की अधीनता स्वीकार करने को लालायित हो उठे थे।
✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Third Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।



