मुगल इतिहास में माचातोड़ सैनिक दो बार सामने आते हैं। ये वे हिन्दू सैनिक होते थे जो अपने देश पर शत्रु की सेना का आक्रमड़ होने पर माचा अर्थात् चारपाई पर लेट जाते थे और जब शत्रु सेना आती थी तो उसका खूब सर्वनाश करके वीर गति को प्राप्त करते थे। अकबर की सेना को सिरोही में और औरंगजेब की सेना को उदयपुर में माचातोड़ सैनिक देखने को मिले थे। निश्चित रूप से गुगलों को माचातोड़ सैनिकों का सामना अन्य स्थानों पर भी करना पड़ा होगा किंतु इतिहास में उल्लेख केवल दो ही स्थानों पर मिलता है।
जब ईस्वी 1570 में बादशाह अकबर (AKBAR) को गुजरात में मिर्जा लोगों द्वारा उत्पात मचाए जाने की सूचना मिली तो बादशाह एक सेना लेकर गुजरात के लिए निकल पड़ा। मार्ग में बादशाह ने अपने हरम को अजमेर भिजवा दिया तथा स्वयं शिकार खेलने के लिए जंगलों में रुक गया।
चीतों से शिकार
उन दिनों मरुस्थलीय जंगलों में एशियाई चीतों की बड़ी संख्या निवास करती थी। राजा एवं बादशाह उनका शिकार किया करते थे। साथ ही उन्हें पकड़ कर पालतू बना लिया जाता था ताकि उन्हें शिकार के आयोजनों में साथ ले जाया जा सके।
अकबर ने इस यात्रा में चीतों द्वारा जंगली जानवरों का शिकार करने का आयोजन किया। यह एक खतरनाक प्रकार का शिकार था। इसके अंतर्गत, सधे हुए पालतू चीतों को जंगली पशुओं के पीछे छोड़ा जाता था।
आज्ञाकारी चीते अपने स्वामी के आदेश पर जंगली पशु का पीछा करते और उसे पकड़कर अपने मुँह से उसकी गर्दन दबोच लेते। जब जंगली पशु की सांस थम जाती तब ये चीते जंगली पशु को घसीटकर अपने मालिक के पास ले आते।
एक दिन बादशाह ने अपने एक सधे हुए चीते के साथ एक हिरण का पीछा किया। हिरण भागने में बहुत तेज था और वह लगभग डेढ़ मील तक भागता चला गया। चीता भी उसके पीछे लगा रहा और घोड़े पर सवार अकबर (AKBAR) तथा उसके सेवक चीते के पीछे लगे रहे।
अबुल फजल (ABUL FAZAL) लिखता है कि एक स्थान पर लगभग 25 गज चौड़ा नाला आ गया। हिरण ने नाले की परवाह नहीं की तथा लम्बी-लम्बी छलांगें मारते हुए नाले के दूसरी तरफ चला गया। चीते ने भी उसका पीछा नहीं छोड़ा। वह भी नाले के दूसरी तरफ चला गया और उसने हिरण को पकड़ लिया।
बादशाह चीते के इस साहस से इतना प्रसन्न हुआ कि उसने चीते का पद बढ़ाकर उसको चीता-ए-खास नियुक्त कर दिया तथा आदेश दिया कि उस चीते के सम्मान में उसके सामने ढोल बजाया जाये।
शाहबाज खाँ का अपमान
अकबर (AKBAR) की सेवा में शाहबाज खाँ नामक एक अमीर रहा करता था। वह अफगानिस्तान से आया हुआ तुजक अमीर था जिन्हें आजकल ताजिक कहा जाता है। उसका काम शाही सवारी की व्यवस्था करने का था। बादशाहकी सेवा में बाबा खान काकशाल नामक अमीर भी रहा करता था। उसे अपने तुर्क होने पर बड़ा घमण्ड था।
इसलिए वह ताजिकों को अपने सामने कुछ भी नहीं गिनता था। एक दिन बाबा खान काकशाल ने शाहबाज खाँ तुजुक का बड़ा अपमान किया। शाहबाज खाँ ने बादशाह से बाबा खान की शिकायत की। इस पर बादशाह अकबर ने बाबा खान को बंदी बनाने तथा उसे कठोर सजा देने के आदेश दिए ताकि भविष्य में किसी भी अमीर को शहंशाह के सेवकों का अपमान करने की हिम्मत न हो सके।
अकबर के सेनापति
12 अगस्त 1572 को शहंशाह अकबर ने खान अकेला (Khan Akela) को गुजरात की ओर रवाना किया। उसके साथ अशरफ खाँ, शाहकुली खाँ, मेहरम शाहबुदाग खाँ, सईद महमूद खाँ कुलीच खाँ, सादिक खाँ, शाह फखरुद्दीन, हैदर मोहम्मद खान, अख्तर बेगी, सईद अहमद खान, क़त्लक कदम खाँ, खान किला का दामाद मुहम्मद कुली खान, मेहर अली खान सिल्दूज, सईद अब्दुल्लाह खान, अमीरजादा अली खाँ और बहादुर खाँ भेजे गए।
1 सितंबर 1572 को बादशाह ने भी अजमेर से प्रयाण किया। वह मार्ग में शिकार करना चाहता था और यह देखना चाहता था कि जो सेनानायक आगे भेजे गए हैं, वे कैसा काम करते हैं! वह यह भी चाहता था कि यथासंभव शीघ्र अति शीघ्र गुजरात प्रांत शाही सेवकों के हाथों में आ जाए।
खान कसाँ की छाती में जमधारा
मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने अपनी पुस्तक मुंतखब उत् तवारीख में लिखा है कि जब शहंशाह अकबर मेड़ता के पास पहुंचा तब यह खबर आई कि सिरोही राज्य में एक राजपूत ने खान कसाँ को जमधारा मारा जो कि एक हथियार है और भारत में बहुत प्रचलित है।
वह जमधारा खान कसाँ की छाती में घुसा और कंधे के पुट्ठे से बाहर निकल गया। घाव गहरा था किंतु मारक नहीं था। मुगल सेना ने उस राजपूत को वहीं पर घेरकर मार डाला। अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने यह घटना भाद्राजून की बताई है जो कि सिरोही राज्य में न होकर उसके निकटवर्ती जालौर राज्य में था।
इस सूचना से अकबर समझ गया कि सिरोही के राजपूत, शाही सेना का विरोध करेंगे और उसे अपने राज्य से होकर नहीं जाने देंगे। इस कारण वह संभल कर चलने लगा।
माचातोड़ सैनिक
मुल्ला बदायूंनी लिखता है कि जब शहंशाह की सेना सिरोही राज्य में पहुंची तो लगभग डेढ़ सौ राजपूतों की एक टुकड़ी ने अपने पैतृक रीति-रिवाज के अनुसार कुछ ने मंदिर में और कुछ ने सिरोही राजा के महल में मरने-मारने का प्रण किया। ये माचातोड़ सैनिक थे जो शरीर में प्राण रहने तक अपने शत्रु का नाश करते रहते थे!
वे लड़े तथा मुगल सैनिकों द्वारा काट दिए गए। इस लड़ाई में दिल्ली के प्रशासक मरहूम तातार खाँ का बेटा दोस्त मोहम्मद शहीद हो गया। मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने बहुत संक्षेप में इस घटना का उल्लेख किया है। अबुल फजल ने लिखा है कि बहुत से लोग मंदिर में छिप गए।
वस्तुतः उस काल में हिन्दुओं में यह प्रथा थी कि जब उनके राज्य से मुसलमानों की बड़ी सेनाएं गुजरती थीं, जिनका वे सामना नहीं कर सकते थे तो वे अपने मंदिरों से देव-प्रतिमाओं को निकाल कर छिपा देते थे और प्रजा के साथ पूरा नगर खाली करके जंगलों में अथवा ऐसे स्थानों में चले जाते थे जहाँ से वे शत्रु सेना को नुक्सान पहुंचा सकें।
नगर खाली करते समय हिन्दू राजाओं द्वारा प्रतीकात्मक रूप से कुछ बलिष्ठ सैनिकों को मंदिरों एवं राजमहलों के बाहर सुला दिया जाता था। ये सैनिक अपने देवता एवं राजा के स्थान की रक्षा करने के लिए शत्रु से लड़ते हुए अपने प्राण न्यौछावर करने के लिए वहाँ छोड़े जाते थे।
ये हिन्दू सैनिक खूब खाते-पीते और दिन भर चारपाई पर पड़े रहकर शत्रु के आने की प्रतीक्षा करते। इसलिए उन्हें माचातोड़ अर्थात् चारपाई तोड़ने वाला कहा जाता था।
माचातोड़ सैनिक अपने शत्रु से एक साथ नहीं लड़ते थे। अपितु जब शत्रु सेना मंदिर अथवा राजमहल में प्रवेश करने का प्रयास करती तो माचातोड़ सैनिकों में से कोई एक सैनिक उठता और दोनों हाथों से तलवार चलाता हुआ शत्रुओं को गाजर-मूली की तरह काटता था।
इसी क्रम में वह अपने देवता एवं राजा के निमित्त अपने प्राणों को पुष्प की तरह अर्पित करता था। वस्तुतः सिरोही में अकबर (AKBAR) का सामना इन्हीं माचातोड़ सैनिकों से हुआ था। उसी समय अकबर को सूचना मिली कि राणा कीका, मुगल चौकियों पर हमला करके उन्हें फिर से अपने अधीन कर रहा है।
महाराणा प्रताप के धावे
अकबर कालीन मुस्लिम लेखकों की पुस्तकों में उदयपुर के महाराणा प्रतापसिंह को राणा कीका लिखा गया है। क्योंकि प्रताप के बचपन का नाम कीका था। मेवाड़ क्षेत्र के भील भी प्रताप को कीका के नाम से ही पुकारते थे। मेवाड़ी भाषा में कीका का अर्थ होता है- बच्चा!
पाठकों को स्मरण होगा कि ई.1568 में अकबर ने महाराणा उदयसिंह से चित्तौड़ छीन लिया था और चित्तौड़ के आसपास के काफी बड़े क्षेत्र में मुगल चौकियां स्थापित कर दी थीं जिन्हें उन दिनों थाना कहा जाता था।
28 फरवरी 1572 को महाराणा उदयसिंह का निधन हो चुका था और उसका बड़ा पुत्र प्रतापसिंह मेवाड़ की गद्दी पर बैठ चुका था। राणा प्रताप ने गद्दी पर बैठते ही मेवाड़ क्षेत्र की मुगल चौकियों को उजाड़कर उन्हें फिर से मेवाड़ राज्य में मिलाना आरम्भ कर दिया था।
मेवाड़ से आई इस सूचना से अकबर (AKBAR) चिंतित हुआ। उसने बीकानेर के राजकुमार रायसिंह को जो इन दिनों जोधपुर का भी प्रशासक था, महाराणा प्रताप के पीछे भेजा।
✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Third Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।



