चित्तौड़ दुर्ग में तीन साके हुए थे। प्रथम साका ई.1303 ईस्वी में रावल रतनसिंह के समय हुआ था। जब उल्लाउद्दीन खिलजी ने रानी पद्मिनी को पाने के लिए चित्तौड़ के रावल को छल से पकड़ लिया था। महाराणा विक्रमादित्य के समय में ई.1534 में भी चित्तौड़ दुर्ग में साका हुआ था जब गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने चित्तौड़ पर आक्रमण करके दुर्ग की दीवारें बारूद से उड़ा दी थी। अब फिर से चित्तौड़ दुर्ग में साका होने जा रहा था।
अकबर (AKBAR) की सेनाओं ने लगातार चार महीनों तक चित्तौड़ दुर्ग पर गोलाबारी करके तथा दीवारों के नीचे सुरंगें खुदवाकर उन्हें बारूद से उड़ा दिया। अकबर के सैनिकों ने दुर्ग तक पहुंचने के लिए एक साबात भी बना ली।
अबुल फजल (ABUL FAZAL) तथा मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी दोनों ने लिखा है कि एक दिन मुगल सेना ने दुर्ग की दीवारों को तोड़कर दुर्ग में प्रवेश किया तथा अकबर ने जयमल (Jaimal Rathore) को गोली मार दी जिससे जयमल की मृत्यु हो गई।
मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी लिखता है कि काफी समय के बाद, छः महीना या अधिक, अंततः एक रात इसी शाबान माह की पच्चीसवीं तारीख को मंगलवार के दिन सभी ओर से शाही फौज ने आक्रमण करते हुए किले की दीवार को तोड़ दिया और तूफान की तरह दुर्ग में घुस गई।
बंदूकों और तोपों के छोड़ने की रौशनी में जयमल का क्रोधित चेहरा दिखाई देने लगा जो कि इस्लाम के सिपाहियों की ओर मुखातिब था।
मुल्ला लिखता है- ‘इस समय साफ-साफ पहचान वाले जयमल के ललाट पर एक गोली लगी और वह मृत होकर गिर पड़ा। यह ऐसा था जैसे चिड़ियाओं के झुण्ड पर कोई पत्थर गिर पड़ा हो क्योंकि जब किला रक्षक सेना ने देखा कि उनका मुखिया मर चुका है तो वे सब अपने-अपने घर भाग गए। मुल्ला लिखता है कि तब उन्होंने अर्थात् चित्तौड़ी सैनिकों ने अपने परिवार व सामान वालों को इकट्ठा किया और जला दिया जिसे हिंद की भाषा में जौहर कहते हैं।
जो बच गए उनमें से अधिकतर रक्तपिपासु तलवार रूपी मगरमच्छ के भोजन बन गए। वे दारूण दुःख के फंदे में फंस गए। पूरी रात जंगजुओं की तलवारों ने गंवारों के कत्ल से आराम नहीं पाया और उनकी तलवारें अपने म्यानों में नहीं लौटीं। तब तक दोपहर की झपकी का समय हो गया। आठ हजार साहसी राजपूत कत्ल कर दिए गए।’
अबुल फजल (ABUL FAZAL) तथा मुल्ला बदायूंनी (Mulla Badayuni) दोनों ने लिखा है कि उस रात अकबर की सेना ने दुर्ग में प्रवेश करके जयमल को मार दिया किंतु इन दोनों लेखकों के विवरण हिन्दू लेखकों के विवरण से मेल नहीं खाते।
अबुल फजल कहता है कि अकबर ने किले के बाहर से गोली मारी तथा उसने जिसे गोली मारी, उसे वह पहचानता नहीं था। जबकि बदायूंनी कहता है कि गोली किले के भीतर घुसकर मारी गई थी तथा जिसे मारी गई थी उसे आसानी से पहचाना जा सकता था किंतु बदायूंनी ने गोली मारने वाले का नाम नहीं लिखा है।
इन दोनों कथनों में से अबुल फजल का कथन अधिक सही प्रतीत होता है कि गोली बाहर से मारी गई थी और जिसे मारी गई थी उसे अकबर (AKBAR) पहचानता नहीं था किंतु यह कथन गलत है कि गोली लगने से जयमल की मृत्यु हो गई थी।
गोली जयमल के पैर में लगी थी जिससे वह लंगड़ा हो गया था। गोली लगने के बाद राजा जयमल काफी दिनों तक जीवित रहा था और युद्ध का नेतृत्व करता रहा था।
हिन्दू लेखकों के अनुसार जब युद्ध कई महीनों तक चलता रहा तो दुर्ग के भीतर भोजन सामग्री समाप्त होने लगी। इस पर जयमल मेड़तिया ने मेवाड़ी सरदारों को एकत्रित करके कहा कि अब किले में भोजन सामग्री समाप्त हो रही है, इसलिये साका किया जाए।
मेवाड़ी सामंतों (Mewari feudal lords) ने निर्णय लिया कि जौहर (Jouhar) करके दुर्ग के द्वार खोल दिये जायें तथा सब राजपूत बहादुरी से लड़कर वीर-गति प्राप्त करें। यह सलाह सबको पसंद आई और उन्होंने अपनी स्त्रियों तथा बच्चों को जौहर करने की अनुमति दे दी।
चित्तौड़ दुर्ग में तीन साके हुए थे। प्रथम साका ई.1303 ईस्वी में रावल रतनसिंह (Rawal Ratansingh) के समय हुआ था। जब उल्लाउद्दीन खिलजी ने रानी पद्मिनी को पाने के लिए चित्तौड़ के रावल को छल से पकड़ लिया था। महाराणा विक्रमादित्य के समय में ई.1534 में भी चित्तौड़ दुर्ग में साका हुआ था जब गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने चित्तौड़ पर आक्रमण करके दुर्ग की दीवारें बारूद से उड़ा दी थी। अब फिर से चित्तौड़ दुर्ग में साका होने जा रहा था।
यह बताना समीचीन होगा कि साका के दो हिस्से होते थे। पहला हिस्सा था जौहर और दूसरा हिस्सा था केसरिया (kesariya) । जौहर के अंतर्गत हिन्दू स्त्रियां एवं लड़कियां धधकती हुई अग्नि-चिताओं में कूदती थीं।
केसरिया के अंतर्गत वीर पुरुष केसरिया बाना पहनकर शत्रु से युद्ध करते हुए वीर गति को प्राप्त होते थे। स्वयं को शत्रुओं के हाथों में पड़ने से बचाने के लिए जौहर एवं केसरिया किए जाते थे।
हालांकि साका, केसरिया और जौहर मनुष्य-देह के लिए दारूण दुःख भोगने से कम नहीं थे किंतु हिन्दुओं की मान्यता थी कि यदि वे रण में पीठ दिखाएंगे तो उनके लिए स्वर्ग का मार्ग बंद हो जाएगा और यदि वे शत्रु के सामने झुकेंगे तो उनकी माता का दूध लज्जित होगा। साका, केसरिया और जौहर उन्हें इन दुर्गतियों से बचाते थे।
जौहर में होने वाला नरसंहार उस दुर्ग में रहने वाले मनुष्यों के लिए भगवान शिव के तीसरे नेत्र के खुलने जैसा विनाशक होता था जिसमें उनका सब-कुछ जल कर भस्म हो जाता था।
जब से देश पर विदेशी आक्रांताओं के हमले आरम्भ हुए थे, तब से जौहर की यह ज्वाला उत्तरी भारत के किलों में प्रज्जवलित हो रही थी। मौत की इस अग्नि को उस काल के हिन्दुओं ने अपनी इच्छा से स्वीकार किया था।
जब किसी दुर्ग में जौहर होता था तो इस प्रक्रिया में दुर्ग के भीतर मौजूद सभी स्त्रियां भाग लेती थीं। रानी से लेकर दासी तक देखते ही देखते अग्नि की लपटों में समा जाती थीं।
इनमें राजा के सामान्य सेवकों से लेकर सैनिकों, मंत्रियों एवं सेनापतियों की औरतें होती थीं। दुर्ग में रहने वाले किसान, महाजन, पण्डित, शिल्पी, कर्मकार एवं रंगरेज सभी घरों की औरतें अपने-अपने घरों में जौहर का आयोजन करती थीं।
शत्रु-सैनिकों द्वारा छोटे-छोटे बच्चे-बच्चियों को सैक्स गुलाम एवं वेश्या बना लिए जाने की आशंका रहती थी, इसलिए माताएं अपने बच्चों को भी अपने साथ लेकर जौहर की अग्नि में कूद पड़ती थीं।
जब जौहर के बाद राजा अपने साथियों के साथ केसरिया कर रहा होता था और अपनी आखिरी लड़ाई लड़ रहा होता था, तो राजा के सेवक, गायक, छींपा, गांछा, माली, तेली, तम्बोली, नाई, धोबी आदि समस्त जातियों के पुरुष हाथों में हथियार लेकर राजा का साथ देते थे और राजा से पहले स्वयं युद्धभूमि में काम आने की चेष्टा करते थे।
पंद्रहवीं शताब्दी ईस्वी में लिखे गए कान्हड़दे प्रबंध नामक ग्रंथ में पद्मनाभ ने चौदहवीं शताब्दी ईस्वी में अल्लाउद्दीन खिलजी के हमले के समय सिवाना दुर्ग तथा जालौर दुर्ग में हुए दो साकों का विस्तार से वर्णन किया है। इस वर्णन में किले के भीतर रहने वाली अठारह जातियों की औरतों द्वारा जौहर किए जाने का उल्लेख है।
भारत के इतिहास में ऐसे उल्लेख भी मिलते हैं जब मुस्लिम स्त्रियों ने भी जौहर किए। ई.1398 में जब तैमूर लंग (TIMUR LANG) ने भटनेर दुर्ग पर आक्रमण किया, उस समय किले में रहने वाली मुस्लिम औरतों ने भी हिन्दू औरतों के साथ जौहर में भाग लिया ताकि वे बर्बर मंगोल सैनिकों के हाथों में पड़ने से बच सकें।
✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।



