Saturday, April 4, 2026
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अकबर और मानसिंह शराब पीकर कुश्ती लड़ते थे (74)

हालांकि अकबर (Shahanshah Akbar) मानसिंह (Raja Mansingh of Amber) का फूफा लगता था किंतु अकबर और मानसिंह एक ही उम्र के थे। दोनों एक साथ शराब पीते और नशे में धुत्त होकर कुश्ती लड़ते थे।

कुंअर मानसिंह अकबर के दरबार में प्रमुख मंत्रियों, प्रमुख सलाहकारों, प्रमुख सेनापतियों एवं नवरत्नों में से एक था। राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है कि मानसिंह अकबर को अपने सगे भाई से भी अधिक प्रिय था। हालांकि अकबर का कोई सगा भाई नहीं था, उसका केवल एक सौतेला भाई था जो काबुल (Kabul) का शासक था।

फिर भी राहुल सांकृत्यायन के इस कथन में छिपे इस सत्य को स्वीकार करना पड़ेगा कि राजा मानसिंह उन लोगों में से था जिन्हें अकबर बहुत प्रेम करता था।

एक बार जब अकबर के सौतेले भाई मिर्जा हकीम मुहम्मद खाँ (Mirza Hakim) ने अकबर से बगावत की, तब अकबर ने राजा मानसिंह को मिर्जा हकीम की बगावत कुचलने के लिए भेजा। यहाँ तक कि अकबर ने राजा मानसिंह को अफगानिस्तान का शासक भी बना दिया।

राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है- ‘जब अकबर ने दीन-ए-इलाही नामक नया मजहब चलाया तो उसने मानसिंह से भी चेला बनने के लिए कहा। इस पर मानसिंह ने कहा कि यदि चेला होने का अर्थ जान न्यौछावर करना है तो उसे आप अपनी आंखों से देख रहे हैं। यदि जरूरत हो तो परीक्षा देने के लिए भी तैयार हूँ। जहाँ तक धर्म का सवाल है, मैं हिन्दू हूँ। मुझे नए मजहब की आवश्यकता नहीं है।’

मानसिंह के इस जवाब ने अन्य हिन्दू राजाओं के लिए भी राह आसान कर दी और एक भी हिन्दू राजा ने दीन-ए-इलाही स्वीकार नहीं किया।

मानसिंह का जन्म 21 दिसम्बर 1550 को आम्बेर में हुआ था। वह आम्बेर नरेश बिहारी मल अथवा भारमल (Raja Bharmal)  का पौत्र था एवं भगवंतदास अथवा भगवानदास (Raja Bhagwan Das) का दत्तक पुत्र था। राजा भारमल के बाद उसके पुत्र भगवानदास को आम्बेर (Amber) की गद्दी मिली थी। भगवानदास के कोई पुत्र नहीं था। इसलिए भगवानदास ने अपने नौ भाइयों में से किसी एक भाई के पुत्र मानसिंह को गोद लिया था।

जिस समय राजा भारमल ई.1560 में पहली बार अपने पुत्र भगवानदास तथा पौत्र मानसिंह को लेकर अकबर से मिला, उस समय अकबर की आयु 18 वर्ष तथा मानसिंह की आयु 10 वर्ष थी। अकबर तथा राजा भारमल की इस भेंट के बारे में हम पिछले आलेखों में चर्चा कर चुके हैं।

इसी भेंट में राजा भारमल ने अपनी पुत्री हीराकंवर (Heera Kunwari) का विवाह अकबर से करना निश्चित किया था। इसी भेंट में अकबर ने अपने पुत्र भगवान दास तथा पौत्र मानसिंह को अकबर के दरबार में भेजना निश्चित किया था। इसी भेंट के बाद अकबर और मानसिंह अच्छे मित्र बन गए थे। इस कारण ही राजपूताना के राजाओं के अकबर के मैत्री-सम्बन्ध साथ बनने आरम्भ हुए थे।

जब आम्बेर की राजकुमारी का विवाह अकबर से हो गया तब अकबर ने हीराकंवर के पिता भगवान दास को अपने हरम की सुरक्षा का भार सौंप दिया। राजा भगवानदास ई.1588 तक जीवित रहा किंतु अकबर ने राजा भगवानदास के साथ-साथ उसके पुत्र मानसिंह को भी शासन में अनेक महत्वपूर्ण जिम्मदारियां सौंपी।

जब तक भगवानदास जीवित रहा तब तक मानसिंह को अकबर के महलों में कुंवर कहा जाता था और भगवानदास की मृत्यु के बाद उसे राजा कहा जाने लगा। अकबर ने मानसिंह को मिर्जा की उपाधि दी थी। यह उपाधि केवल तैमूर के वंशजों को मिलती थी। इसी आधार पर बहुत से इतिहासकारों ने लिखा है कि अकबर कुंवर मानसिंह को अपना पुत्र मानता था किंतु यह बात सही नहीं है।

सही बात यह है कि अकबर और मानसिंह घनिष्ठ मित्र थे। वे साथ-साथ बैठकर शराब पीते थे। शराब के नशे में कुश्ती लड़ते थे और गुत्थम-गुत्था होकर पड़ जाते थे। जब शराब का नशा उतर जाता तो कई-कई दिनों तक एक-दूसरे को अपनी शक्ल तक नहीं दिखाते थे। ऐसी स्थिति में उनके बीच पिता-पुत्र का सम्बन्ध नहीं हो सकता था, अपितु मित्र का सम्बन्ध ही हो सकता था!

अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने खानखानानामा में अकबर और मानसिंह की एक कुश्ती का चित्र दिया है। इस चित्र में अकबर मानसिंह के ऊपर सवार है और उसने मानसिंह का गला दबोच रखा है। मानसिंह की स्थिति इतनी खराब है कि एक दरबारी अकबर को बीरबल के ऊपर से हटा रहा है तथा समस्त दरबारी चिंतित होकर चिल्ला रहे हैं।

पी एन ओक ने लिखा है कि अकबर का शराब-प्रेम जगजाहिर था। शराब के नशे में अकबर द्वारा एक बार मानसिंह का गला दबाया गया था और फिर जहर भी खिलाने का प्रयास किया गया था किंतु भूल से अकबर ही वे गोलियां खा बैठा।

ई.1567 में अकबर ने चित्तौड़ दुर्ग पर अभियान करने का निश्चय किया। उसने चित्तौड़ पर आरोप लगाया कि उसने अकबर के शत्रु बाजबहादुर को अपने यहाँ शरण दी।

20 अक्टूबर 1567 को अकबर ने चित्तौड़ से दस मील उत्तर-पूर्व में अपनी छावनी डाली। इस समय मानसिंह केवल 17 साल का लड़का था। उसने चित्तौड़ दुर्ग का पतन होते हुए अपनी आंखों से देखा था।

आगे चलकर मानसिंह ने मेवाड़ को अकबर के अधीन करने के उद्देश्य से अपनी आधी जिंदगी खपा दी किंतु मानसिंह मेवाड़ को अकबर के अधीन नहीं कर सका। इसके लिए अकबर ने मानसिंह को अपमानित भी किया। हल्दीघाटी की लड़ाई के बाद कुछ समय के लिए अकबर और मानसिंह के सम्बन्ध अच्छे नहीं रहे।  मानसिंह ने जीवन भर अकबर तथा उसके पुत्र जहांगीर (JAHANGIR) के लिए तलवार चलाई।

अंतिम सांस तक मानसिंह तलवार चलाता रहा। भारत से लेकर अफगानिस्तान तक ऐसा कोई मोर्चा नहीं था जहाँ मानसिंह अपने घोड़े पर बैठकर नहीं गया।

उसने मेवाड़, गुजरात, स्यालकोट, सिंध, अटक, काबुल, बिहार, उड़ीसा, बंगाल, राजस्थान का कोई कोना नहीं छोड़ा जहाँ उसने अकबर तथा जहांगीर (JAHANGIR) के लिए युद्ध न किया हो और उसे न जीता हो!

मुगलों की इतनी सेवा करने पर भी मानसिंह का जीवन मुगलों द्वारा किए गए अपमान से छलनी होता रहा। जब मानसिंह हल्दीघाटी के युद्ध में न तो महाराणा को पकड़ सका, न मार सका, न उसका राज्य छीन सका, न उससे अधीनता स्वीकार करवा सका तो अकबर ने मानसिंह को अपमानित किया। उसकी ड्यौढ़ी बंद कर दी। अर्थात् मानसिंह लम्बे समय तक अकबर के महल की सीढ़ियां नहीं चढ़ सका।

मानसिंह की बुआ हीराकंवर का विवाह अकबर (Akbar) के साथ हुआ था जिसके पेट से सलीम अर्थात् जहांगीर का जन्म हुआ था। मानसिंह को अपनी बहिन मानबाई का विवाह अकबर के इसी पुत्र सलीम के साथ करना पड़ा। सलीम को मानसिंह से जबर्दस्त चिढ़ थी।

इसलिए सलीम ने एक दिन शराब के नशे में धुत्त होकर मानसिंह की बहिन मानबाई (Man Bai) को कोड़ों से पीट-पीटकर अधमरी कर दिया। मानबाई ने दुखी होकर आत्महत्या कर ली और इससे नाराज होकर अकबर ने सलीम की जगह सलीम के पुत्र खुसरो (Khusro) को अपना उत्तराधिकारी घोषित करने का मन बनाया।

जब अकबर मरने लगा तो अकबर ने अपने महल के चारों ओर मानसिंह का पहरा लगवाया किंतु जहांगीर ने रामसिंह कच्छवाहे (Ram Singh Kachhwaha) की सहायता से न केवल अकबर के ताज और राज पर कब्जा कर लिया अपितु अकबर की मृत्यु हो जाने पर मानसिंह का अपमान करके बंगाल भेज दिया।

दो साल बाद जहांगीर ने मानसिंह को बंगाल से अपने पास तलब किया। उस समय जहांगीर (JAHANGIR) काबुल में था। इसलिये मानसिंह बंगाल से रवाना होकर आगरा पहुंच गया और वहीं पर बादशाह के आगरा लौटने की प्रतीक्षा करने लगा।

जब फरवरी 1608 में बादशाह आगरा पहुंचा तो मानसिंह उसकी सेवा में उपस्थित हुआ। जहांगीर बुरी तरह से चिढ़ गया। उसने भरे दरबार में मानसिंह को कपटी और बूढ़ा भेड़िया कहकर उसकी भर्त्सना की।

8 जून 1608 को मानसिंह ने अपने पुत्र जगतसिंह (Raja Jagat Singh of Amber) की पुत्री का विवाह जहांगीर से किया। जहांगीर ने मानसिंह की पौत्री से तो विवाह कर लिया किंतु मानसिंह को शहजादे परवेज (Shahzada Parvez)  के अधीन, दक्षिण के मोर्चे पर लड़ने भेज दिया। अकबर के समय में मानसिंह मुगलों का प्रधान सेनापति था किंतु जहांगीर ने शहजादे परवेज को प्रधान सेनापति बनाकर, उसके नीचे तीन सेनापति रखे जिनमें से मानसिंह एक था।

6 जुलाई 1614 को एलिचपुर के मोर्चे पर राजा मानसिंह की मृत्यु हो गई। जहांगीर (JAHANGIR) ने अपनी आत्मकथा में राजा मानसिंह की रानियों की संख्या 1500 बताई है। ब्लॉचमैन ने भी इसी संख्या को स्वीकार किया है तथा प्रत्येक रानी से दो या तीन बच्चे होने का उल्लेख किया है। यह संख्या सही नहीं है। आमेर की पुरानी वंशावलियों में मानसिंह की लगभग दो दर्जन स्त्रियों एवं एक दर्जन बच्चों का उल्लेख हुआ है। उसके रनिवास में विभिन्न प्रांतों से आई हुई स्त्रियां भी रहती थीं।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

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