Monday, May 20, 2024
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अध्याय – 24 – आर्यों की वर्ण व्यवस्था (अ)

इस संसार में जन्म से कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र या म्लेच्छ नहीं होता है, गुण तथा कर्म के भेद से ही होता है।                  

– शुक्रनीति, प्रथम अध्याय। 

भारतीय संस्कृति की मुख्य विशेषताओं को समझने के लिए आर्यों द्वारा स्थापित वर्ण व्यवस्था को समझना अत्यन्त आवश्यक है क्योंकि भारतीय संस्कृति के मूल में आज भी वर्ण व्यवस्था, अपने बदले हुए स्वरूप में विद्यमान है। आर्यों के सामाजिक संगठन का इतिहास पाँच हजार वर्ष से भी अधिक पुराना है। जब विश्व के अधिकांश भू-भागों में सभ्यता अपने उषा-काल में थी, तब ही आर्यों की सामाजिक व्यवस्था सुव्यवस्थित रूप ले चुकी थी।

आर्यों ने ‘जन’ अर्थात् कबीलों के रूप में बसने से पहले ही इस बात को भली-भांति समझ लिया था कि मनुष्य जाति के सामाजिक संगठन की सबसे छोटी इकाई ‘परिवार’ है न कि ‘व्यक्ति’। ‘व्यक्ति’ ‘परिवार’ में सुरक्षित होता है, ‘परिवार’ ‘कुटुम्ब’ के भीतर सुरक्षित रहता है और ‘कुटुम्ब’ की सुरक्षा ‘जन’ में होती है।

आर्यों के प्राचीनतम ग्रन्थ ‘ऋग्वेद’ में ‘पारिवारिक-व्यवस्था’ का विकसित स्वरूप दिखाई देता है। आर्यों ने अनुभव किया कि किसी भी ‘जन’ में रहने वाले व्यक्तियों, परिवारों एवं कुटुम्बों को एक दूसरे से सहयोग करना पड़ता है तथा अपनी क्षमता एवं रुचि के अनुसार विशिष्ट प्रकार के कार्य करने पड़ते हैं। ये विशिष्ट प्रकार के कार्य ही आगे चलकर ‘वर्ण व्यवस्था’ का आधार बने।

प्राचीन भारतीय ऋषि-मुनियों एवं चिन्तकों ने अनुभव किया कि मनुष्य के समस्त क्रिया-कलापों को चार भागों में विभक्त किया जा सकता है-

(1.) यज्ञ-हवन एवं धार्मिक अनुष्ठान करना तथा करवाना, दान लेना एवं देना, बालकों को शिक्षा देना, मनुष्यों को श्रेष्ठ आचरण हेतु प्रेरित करना आदि।

(2.) व्यक्ति, परविार, कुटुम्ब, जन, धार्मिक अनुष्ठान, गौ आदि पशु एवं ऋषि-मुनियों के आश्रमों की रक्षा करना।

(3.) कृषि एवं पशुपालन के माध्यम से मनुष्यों के लिए भोजन सामग्री जुटाना, बाद में व्यापार भी इसमें जुड़ गया।

(4.) ‘जन’ में निवास करने वाले व्यक्तियों के लिए ईंट बनाना, भवन बनाना, कुम्भ बनाना, कूप खनन करना, कृषि उपकरण बनाना, लकड़ी काटना आदि।

इन चारों प्रकार के कार्य करने वालों को क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र नामक चार वर्णों में रखा गया। भारतीय ऋषियों ने ‘आश्रम व्यवस्था’ की तरह ‘वर्ण व्यवस्था’ को भी मनुष्य के लिए अनिवार्य बताया। कालांतर में वर्ण एवं आश्रम व्यवस्था को ‘वर्णाश्रम धर्म’ कहा जाने लगा।

वर्ण शब्द की उत्पत्ति एवं उसका अर्थ

वर्ण शब्द संस्कृत भाषा के ‘वृ’ धातु अथवा ‘वर्ण’ धातु से उत्पन्न हुआ है। जब यह शब्द, ‘संज्ञा’ रूप में प्रयुक्त होता है तो रंग, सौन्दर्य, अक्षर, स्वर, प्रशंसा आदि अर्थों को प्रकट करता है। क्रिया रूप में प्रयुक्त होने पर इसका अर्थ रंगना अथवा प्रकट करना होता है। वर्ण शब्द से आर्यों के चार सामाजिक वर्गों- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र का भी बोध होता है किंतु प्रारम्भ में वर्ण-व्यवस्था कतिपय भिन्न रूप में प्रकट हुई थी।

त्वचा के रंग के आधार पर वर्णों की उत्पत्ति

कुछ विद्वानों की मान्यता है कि भारत में आने से पूर्व आर्यों में वर्ण-व्यवस्था नहीं थी। एक परिवार, कुटुम्ब एवं जन में रहने वाले समस्त आर्य जीवन-यापन के लिए आवश्यक सभी कार्य करते थे। एक व्यक्ति एक काम छोड़कर दूसरा काम कर सकता था। जब आर्य भारत में आए तो उन्होंने स्वयं को ‘गौर वर्ण’ का तथा भारत के आदिवासियों को ‘कृष्ण वर्ण’ का पाया।

आर्यों ने इन श्याम-वर्णी लोगों को ‘अनार्य’ कहा। त्वचा के रंग के भेद के कारण आर्यों में अपने रक्त की शुद्धता बनाए रखने की कामना उत्पन्न हुई। इसलिए उन्होंने अनार्यों से दूरी बनाई। इस प्रकार त्वचा के रंग के आधार पर उस काल के भारतीय समाज में दो वर्ण बन गए- (1.) आर्य, तथा (2.) अनार्य।

भारत में अनार्यों की अनेक समृद्ध एवं सुसंस्कृत बस्तियाँ विद्यमान थीं। अधिकांश इतिहासकारों की मान्यता है कि आर्यों ने उन ‘दासों’ अथवा ‘दस्युओं’ पर विजय प्राप्त कर उन्हें अपने अधीन कर लिया। अनार्य लोग, आर्य-जनपदों में आर्य-राजाओं की अधीनता में रहने लगे। आर्यों ने अनार्यों को परिश्रम पर आधारित छोटे-मोटे कार्य करने को दिए।

आर्य लोग उन्हें अपने से हीन समझते थे। इस कारण अनार्यों की सामाजिक स्थिति आर्यों की अपेक्षा हीन हो गई तथा उन्हें ‘दास’ एवं ‘दस्यु’ कहा गया, जिसका अभिप्राय सेवक, अधीनस्थ एवं गुलाम होने से था। इस प्रकार आर्य जनपदों में रहने वाली प्रजा दो वर्णों में विभक्त हो गयी-

(1.) आर्य: ये गौर वर्ण के थे, विजेता थे और स्वामि थे। वे याज्ञिक आदि श्रेष्ठ कर्म करते थे। इस कारण सब प्रकार से श्रेष्ठ थे।

(2.) दास: ये श्याम वर्ण के थे, पराजित थे, सेवक थे और यज्ञ आदि श्रेष्ठ कर्मों से वंचित थे। इस कारण सब प्रकार से हीन थे।

आर्यों और दासों के कामों में अंतर

दास लोग ‘शिल्प कर्म’ में अत्यन्त चतुर थे। ये सुन्दर और विशाल भवनों का निर्माण करते थे और अनेक प्रकार के व्यवसायों में दक्ष थे। आर्यों द्वारा पराजित हो जाने के बाद भी उनकी, शिल्प एवं व्यवसाय सम्बन्धी निपुणता नष्ट नहीं हुई थी, अतः वे विभिन्न प्रकार के शिल्प एवं व्यवसायों में लगे रहे। आर्य श्रेष्ठ सैनिक और विजेता थे।

वे याज्ञिक अनुष्ठानों को गौरव की बात समझते थे और भू-स्वामी बनकर खेती, पशु-पालन आदि द्वारा जीवन निर्वाह करते थे जबकि विविध प्रकार के शिल्प और श्रम आधारित कार्य अनार्यों के हाथों में रहे। फलस्वरूप प्राचीनकाल से ही भारत में शिल्पियों को कुछ हीन समझने की प्रवृत्ति रही।

व्रात्यों की उत्पत्ति

समाज में आर्यों की अपेक्षा अनार्यों अथवा दासों की संख्या अधिक थी। इसलिए स्वाभाविक था कि आर्य युवक, अनार्य युवतियों से विवाह करें। इस कारण आर्यों एवं अनार्यों में पारस्परिक वैवाहिक सम्बन्ध भी होने लगे। इस कारण आर्य-प्रदेशों में ऐसे लोगों की संख्या निरन्तर बढ़ती गई, जो शुद्ध आर्य या शुद्ध दास न होकर वर्णसंकर थे। ऐसे वर्णसंकर लोगों को ही सम्भवतः ‘व्रात्य’ कहा जाता था।

अथर्ववेद में व्रात्य जातियों का उल्लेख अनेक स्थानों पर मिलता है। बाद में ‘व्रात्य-सोम-यज्ञ’ द्वारा व्रात्यों को आर्य जाति में सम्मिलित करने की व्यवस्था की गई थी। इससे स्पष्ट है कि वैदिक युग में आर्यों और दासों का भेद बहुत स्पष्ट था तथा आर्य-जनपदों में दो वर्ण स्पष्ट रूप से विद्यमान थे किंतु अथर्ववेद का युग आते-आते आर्यों एवं दासों की वर्ण-संकर संततियों को आर्य-वर्ण में सम्मिलित किया जाने लगा।

कर्म के आधार पर वर्णों की उत्पत्ति

ऋग्वेद में ब्राह्मणों और क्षत्रियों का उल्लेख कई स्थानों पर हुआ है किन्तु वैश्यों और शूद्रों का उल्लेख केवल ‘पुरुष सूक्त’ में मिलता है। पुरुष सूक्त को प्रायः समस्त विद्वान् बाद में जोड़ा हुआ मानते हैं। अतः कहा जा सकता है कि ऋग्वैदिक-काल में कर्म के आधार पर दो वर्ण अस्त्तिव में आए-

(1.) ब्राह्मण: जब आर्य लोग स्थायी रूप से भारत में बस गए तब उनके विधि-विधानों एवं अनुष्ठानों में भी वृद्धि हो गयी। प्राचीन काल का सादगी पूर्ण और सरल धर्म अधिकाधिक जटिल होता चला गया। ऐसी परिस्थिति में यह स्वाभाविक था कि कुछ लोग जटिल याज्ञिक कर्मकाण्ड में विशेष निपुणता प्राप्त करें। इन्हें ब्राह्मण कहा गया क्योंकि वे ‘ब्रह्म’ अर्थात् ‘ईश्वर’ सम्बन्धी ज्ञान में निपुण थे। उन्हें भी ‘आर्य-विशः’ अर्थात् जन-सामान्य आदर से देखने लगा।

(2.) क्षत्रिय: बहुत बड़ी संख्या में अनार्य अब भी आर्य जनों से स्वतंत्र थे। उनसे आर्यों का निरंतर संघर्ष चलता था। अतः आर्यों को ऐसे वीर सैनिकों की आवश्यकता अनुभव हुई जो युद्ध-विद्या में निपुण हों तथा निरंतर युद्धरत रह सकें ताकि शेष ‘विषः’ (प्रजा) शांति के साथ यज्ञ-हवन आदि कर सके। ‘जन’ के शत्रुओं से ‘प्रजा’ की रक्षा करना ही उन सैनिकों का मुख्य कार्य था।

क्षति (हानि) से त्राण (रक्षा) करने के कारण उन्हें ‘क्षत्रिय’ कहा गया। ये क्षत्रिय, आर्य-विशः के ही अंग थे किन्तु उन्हें सर्वसाधारण लोगों से अधिक सम्मानित और ऊँचा समझा गया। क्षत्रिय सैनिकों के विशिष्ट कुल ‘राजन्य’ कहलाते थे। सम्भवतः ये राजन्य ही अपने में से किसी एक को राजा स्वीकार कर लेते थे।

(3.) जन-साधारण अर्थात् आर्य-विशः: जन-साधारण अर्थात् ‘आर्य-विशः’ का कोई भी व्यक्ति अपनी इच्छा से ‘ब्राह्मण कर्म’ अथवा ‘क्षत्रिय कर्म’ कर सकता था अथवा एक कर्म को छोड़कर दूसरा कर्म स्वीकार कर सकता था। किसी व्यक्ति की कर्म-स्वीकार्यता का आधार उसकी कर्म में निपुणता एवं रुचि होती थी। ब्राह्मण का पुत्र ब्राह्मण ही हो, अथवा क्षत्रिय का पुत्र क्षत्रिय हो, यह अनिवार्य नहीं था।

पंच-जन का उदय तथा विस्तार

ऋग्वेद में अनेक स्थलों पर ‘पंचजनाः’ और ‘पंचकृष्टयः’ शब्दों का उल्लेख हुआ है। ये निश्चय ही उस युग के आर्यों के पाँच प्रमुख कबीले थे जो अपनी अलग-अलग पहचान रखते थे। ये पंच-जन- अनु, द्रुह्यु, यदु, तुर्वशु और पुरू थे। वेदों में इन ‘पंच-जन’ के अलावा भरत, त्रित्सु, शृंजय आदि अन्य जनों का उल्लेख भी मिलता है।

इससे अनुमान होता है कि ज्यों-ज्यों आर्यों का भारत में विस्तार होता गया, उनमें विविध जनों का गठन भी होता गया। प्रत्येक जन में समस्त व्यक्तियों की स्थिति एक समान थी और एक जन के समस्त व्यक्ति एक ही ‘विशः’ (जनता) के अंग समझे जाते थे। विभिन्न ‘जन’ एक-दूसरे से स्वाभाविक प्रतिद्वंद्विता अथवा सौहार्द रखते थे किंतु उनमें किसी तरह का जातीय अथवा वर्ण सम्बन्धी भेद नहीं था।

ऋग्वैकिद काल में दासों की स्थिति

यद्यपि आर्य, दासों अथवा दस्युओं को अपने से हीन समझते थे तथापि उन्हें अस्पृश्य नहीं समझा जाता था। ऋग्वैदिक-काल में कुछ दास परिवार, बहुत समृद्ध थे तथा आर्य ब्राह्मण, उनसे दान-दक्षिणा स्वीकार करते थे। ऋग्वेद के एक मन्त्र में बल्बूथ नामक दास द्वारा सौ गायें दान में देने का उल्लेख है। कुछ मन्त्रों में आर्य ब्राह्मणों द्वारा दासों के हित-सुख के लिए प्रार्थना की गई है।

उत्तर-वैदिक युग में चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था का उदय

यजुर्वेद तथा अथर्ववेद में अनेक स्थानों पर चार वर्णों का उल्लेख हुआ है। इस काल में याज्ञिक कर्मकाण्ड जटिल हो चुके थे तथा उनकी प्रक्रियाओं को सम्पादित करने के लिए विशेषज्ञता एवं शिक्षा-दीक्षा की आवश्यकता होने लगी। इस कारण ब्राह्मण पुत्र ही इस शिक्षा को भली भांति प्राप्त करने लगे। सामान्य आर्य विषयः के लिए इस वर्ग का द्वार धीरे-धीरे बंद होता जा रहा था।

इसी प्रकार क्षत्रियों को भी अब अधिक पराक्रम के साथ-साथ श्रेष्ठ रथी होने और युद्ध-व्यूह रचना करने में निपुणता की आवश्यकता होने लगी। अतः क्षत्रिय कर्म में भी वंश परम्परा की शुरुआत होने लगी। इन योद्धाओं एवं राजाओं के बल पर आर्यों ने बहुत से नए प्रदेशों पर अधिकार करने में सफलता प्राप्त की।

वैश्य वर्ण की उत्पत्ति: उत्तर-वैदिक-काल के आते-आते आर्यों को यज्ञ-कर्म एवं युद्ध-कर्म के साथ-साथ समाज के अन्य कार्यों में भी विशिष्टता एवं निपुणता की आवश्यकता अनुभव होने लगी। इस कारण शिल्पी, वणिक्, कृषक, पशु-पालक आदि भी दो वर्णों में पृथक् होने लगे। उन्हें ‘विशः’ या ‘वैश्य’ कहा गया और तीसरा वर्ण सामने आया। ‘ताण्ड्य ब्राह्मण’ वैश्यों को ब्राह्मणों एवं क्षत्रियों से निम्न श्रेणी का घोषित करता है।

शूद्र वर्ण की उत्पत्ति: समाज का अब भी बहुत बड़ा वर्ग ऐसा था जो उपरोक्त तीनों वर्णों से बाहर रहा। यह वर्ग आर्य-गृहस्थों की सेवा-टहल करने, हाथों से कार्य करने, मिट्टी के बर्तन बनाने, चमड़े का काम करने, धातुकर्म करने आदि से सम्बन्धित था। इन कार्यों को करने के लिए किसी विशेष प्रतिभा, कौशल एवं दक्षता की आवश्यकता नहीं होती थी इसलिए इन्हें क्षुद्र कार्य अर्थात् छोटा कार्य कहा गया।

क्षुद्र कार्य करने वालों को ‘क्षुद्र’ कहा गया तथा आगे चलकर यही क्षुद्र शब्द ‘शूद्र’ में बदल गया। क्षुद्र कार्य करने वालों के लिए लिए आध्यात्मिक उन्नति करना आवश्यक नहीं समझा गया। इसलिए यह वर्ग शनैः-शनैः यज्ञ करने, यज्ञोपवीत धारण करने, युद्ध करने आदि आदि अभिजात्य कर्मों से वंचित होने लगा।

उत्तर-वैदिक ग्रंथों में वर्ण-उत्पत्ति के सिद्धांत

ऋग्वेद के पुरुषसूक्त की एक ऋचा में समाज में चार वर्णों की उत्पत्ति का रूपक खड़ा किया गया है जिसके अनुसार विराट पुरुष (ब्रह्म) के मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, जंघाओं से वैश्य तथा चरणों से शूद्रों की उत्पत्ति हुई। वर्ण-उत्पत्ति के इस रूपक से आर्यों के चारों वर्णों की समाज में भूमिका, महत्ता एवं स्थिति का भान होता है।

चूंकि ऋग्वेद काल में वैश्य एवं शूद्र वर्णों की उत्पत्ति नहीं हुई थी इसलिए अनुमान लगाया जाता है कि यह रूपक उत्तर-वैदिक-काल में ऋग्वेद में जोड़ा गया होगा। बाद में इस रूपक को महाभारत के शांति पर्व, मनुस्मृति, विष्णु-पुराण तथा वायुपुराण में भी दोहराया गया। ऋग्वेद के बाद के ग्रंथों में शूद्रों को शेष वर्णों की सेवा करने हेतु उत्पन्न माना गया।

बृहदारण्यकोपनिषद् में कहा गया है कि प्रारम्भ में ब्रह्म अकेला था वह ब्राह्मण रूप था। उसने अकेले प्रगति न कर सकने के कारण एक और रूप बनाया। यह दूसरा रूप क्षत्र था जिसमें इन्द्र, वरुण, सोम, रुद्र, पर्जन्य, यम, मृत्यु तथा ईशान देवता सम्मिलित थे। तब भी संतुष्ट न होने पर उन्होंने वैश्यत्व का निर्माण किया जिसमें वसु, रुद्र, आदित्य, विश्वदेव तथा मरुत् आदि देव समाहित थे। इसके बाद भी न्यूनता अनुभव होने पर उन्होंने शूद्र के रूप में पूषण देवता का निर्माण किया। बृहदारण्यकोपनिषद् द्वारा प्रतिपादित इस सिद्धांत में चारों ही वर्णों को समान स्तर का माना गया है।

उत्तर-वैदिक-काल में द्विज एवं उपनयन की अवधारणा

यद्यपि उपनयन संस्कार वैदिक-काल से चला आ रहा था किंतु उत्तरवैदिक-काल में वह वर्ण की उच्चता की पहचान बन गया। उच्च वर्ण के व्यक्ति ही उपनयन संस्कार के बाद यज्ञोपवीत धारण कर सकते थे और केवल यज्ञोपवीत धारण करने वाले व्यक्ति को ही यज्ञ करने का अधिकार था। इस प्रकार उत्तर-वैदिक-काल में आध्यात्मिक उन्नति का अधिकार रखने एवं यज्ञोपवीत धारण करने के कारण ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य वर्ण, समाज के उच्च वर्ण समझे गए।

यज्ञोपवीत धारण करने को मनुष्य का दूसरा जन्म माना गया तथा उन्हें ‘द्विज’ कहा गया। तैत्तिरीय ब्राह्मण ग्रन्थ में ब्राह्मण के लिए सूत के, क्षत्रिय के लिए सन के तथा वैश्य के लिए ऊन के यज्ञोपवीत धारण करने का विधान किया गया है। इसी ग्रन्थ में कहा गया है कि ब्राह्मण का वसंत ऋतु में, क्षत्रिय का ग्रीष्म ऋतु में और वैश्य का शीत ऋतु में ‘उपनयन’ होना चाहिए। इससे ज्ञात होता है कि ब्राह्मण ग्रन्थों की रचना के समय वर्ण-भेद भलीभाँति विकसित हो चुका था। इन भेदों के उत्पन्न हो जाने से शूद्र वर्ण को शेष तीनों वर्णों से निम्नतर समझा गया।

उत्तर-वैदिक-काल में वर्ण-भेद की वास्तविक स्थिति

यद्यपि ब्राह्मण ग्रन्थों के प्रणयन-काल तक वर्ण-भेद भलिभाँति विकसित हो चुके थे तथापि वर्ण का निर्धारण अभी तक पूर्णतः जन्म से नहीं होता था। कर्म अभी भी वर्ण-व्यवस्था का आधार बना हुआ था। राजा ‘सुदास’ ने ब्राह्मण ‘वशिष्ठ’ के स्थान पर क्षत्रिय कुलोत्पन्न ‘विश्वामित्र’ को अपना पुरोहित बनाया। जनक आदि अनेक क्षत्रिय राजा अध्यात्म एवं दार्शनिक चिन्तन के लिए देश भर में प्रसिद्ध थे।

ब्राह्मण-पुत्र भी उनके पास आकर शिक्षा ग्रहण करते थे। ब्राह्मण ‘श्वेतकेतु’ का पिता ‘उद्दालक’, पांचाल के क्षत्रिय राजा ‘प्रवाहण जाबालि’ के पास ज्ञान-प्राप्ति के लिए गया। ब्राह्मण गुरु अज्ञात कुलोत्पन्न बालकों को भी विद्या प्रदान करते थे। ‘छान्दोग्य उपनिषद्’ में कथा आती है कि ‘सत्यकाम जाबाल’ जब ‘गौतम ऋषि’ के पास विद्याध्ययन के लिए गया तो आचार्य ने उसके पिता का नाम एवं गौत्र पूछा।

सत्यकाम ने कहा कि मुझे अपने पिता एवं गौत्र का पता नहीं है क्योंकि मेरी माता एक परिचारिका के रूप में अनेक घरों में काम करती थी तभी मेरा जन्म हुआ। आचार्य गौतम ने उसे विद्याध्ययन कराना स्वीकार किया और विधिवत् यज्ञोपवीत संस्कार कराके उसे अपना शिष्य बनाया।

उपनिषदों के काल में शूद्र भी ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर सकते थे। रैक्व ऋषि ने जानश्रुति पौत्रायन नामक शूद्र राजा को धर्म सम्बन्धी ज्ञान प्रदान किया था। अश्वपति कैकेय नामक क्षत्रिय राजा ने पांच ब्राह्मणों को तथा क्षत्रिय राजा प्रवाहण ने गौतम नामक एक ब्राह्मण को आत्मा एवं ब्रह्म सम्बन्धी उपदेश दिए।

‘ऐतरेय ब्राह्मण’ का लेखक ‘महिदास’ किसी अज्ञात आचार्य की पत्नी ‘इतरा’ (शूद्रा दासी) का पुत्र था। इसीलिए वह ‘ऐतरेय’ नाम से विख्यात हुआ। ऐतरेय ब्राह्मण में एक कथा आती है कि एक बार ऋषि-मुनियों ने कहा कि यह तो परम विद्वान् है, देवता भी इसे जानते हैं। ऐतरेय ब्राह्मण में ‘शूद्र कवष ऐलूष’ का उल्लेख है जिसे विद्वता के कारण ऋषियों में सम्मिलित किया गया और वह ऋग्वेद की कुछ ऋचाओं का ऋषि भी बना।

एक अन्य प्राचीन कथा के अनुसार ‘राजा शान्तनु’ के भाई ‘देवापि’ ने याज्ञिक अनुष्ठान में दक्षता प्राप्त करके ब्राह्मण पद प्राप्त कर लिया। उस काल में भिन्न वर्णों में वैवाहिक सम्बन्ध भी होते थे। ‘महर्षि च्यवन’ (ब्राह्मण) ने ‘राजन्य शर्याति’ (क्षत्रिय) की कन्या से विवाह किया था। इन उदाहरणों से यह स्पष्ट है कि इस काल में कोई भी व्यक्ति अपनी प्रतिभा के आधार पर एक वर्ण से दूसरे वर्ण में चला जाता था।

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