Monday, September 20, 2021

अध्याय – 31 (अ) : मुगल सल्तनत का विघटन

औरंगजेब के आँखें बन्द करते ही चारों तरफ से सल्तनत का बिखराव आरम्भ हो गया। सल्तनत के प्रभावशाली अमीरों और मनसबदारों ने अपने-अपने स्वतंत्र राज्य स्थापित करने आरम्भ कर दिये। आरम्भ में यह कार्य केन्दीय राजधानी दिल्ली से दूर के क्षेत्रों में हुआ, बाद में उत्तर भारत में भी कई छोटे-छोटे राज्य बन गये। मुगल सल्तनत के बिखराव के कारण निम्नलिखित प्रमुख राज्य अस्तित्व में आये।

हैदराबाद

हैदराबाद के स्वतंत्र राज्य की स्थापना चिनकुलीचखां ने की थी, जिसे बाद में मुगल बादशाह ने निजाम-उल-मुल्फ आसफजां की उपाधि प्रदान की थी। औरंगजेब की मृत्यु के समय चिनकुलीचखाँ बीजापुर में था। उसने उत्तराधिकार के संघर्ष में कोई भूमिका नहीं निभाई। उत्तराधिकार के संघर्ष में विजयी शहजादा मुहम्मद मुअज्जम, बहादुरशाह के नाम से मुगल बादशाह बना। उसने चिनकुलीचखाँ को दक्षिण-भारत से हटाकर अवध का सूबेदार नियुक्त किया। बहादुरशाह की मृत्यु के बाद पुनः मुगल शहजादों में उत्तराधिकार के लिये संघर्ष हुआ। इसमें चिनकुलीचखाँ ने जहांदारशाह के विरुद्ध फरूखसियर को सहायता दी। जहांदारशाह (1712-13 ई.) अपने भाइयों को परास्त करके तख्त पर बैठने में सफल रहा। जहांदरशाह की अयोग्यता के कारण दरबारी अमीरों के षड्यन्त्र बढ़ गये। इससे बहादुरशाह के पुत्र अजीम-उश-शान के लड़के फरूखसियर ने सैयद भाइयों की सहायता से गद्दी हथिया ली। फरूखसियर (1713-19 ई.) मुगल बादशाह बनने पर चिनकुलीचखाँ को दक्षिण भारत के छः सूबों की सूबेदारी तथा खानखाना और निजाम-उल-मुल्क बहादुर फतहजंग की उपाधि प्रदान की। उसी समय से चिनकुलीचखाँ के मन में दक्षिण भारत में स्वतंत्र राज्य की स्थापना जागृत हुई। 1715 ई. में उसे दिल्ली बुलाया गया। पहले उसे मुरादाबाद का सूबेदार बनाया गया और बाद में मालवा की सूबेदारी दी गई। चिनकुलीचखाँ ने मालवा में अपनी शक्ति का विस्तार किया। इससे सैयद बंधु उससे ईर्ष्या करने लगे और उन्होंने उसे मालवा की सूबेदारी से वंचित कर दिलावरखाँ को मालवा का सूबेदार नियुक्त किया। चिनकुलीचखाँ ने उसका विरोध किया और दिलावरखाँ को मार डाला। उसने बुरहानपुर व असीरगढ़ के किलों पर भी अधिकार कर लिया और दक्षिण-पथ का शासक बन गया।

सैयद बंधुओं ने फरूखसियार का कत्ल करवाकर बहादुरशाह के पुत्र रफी-उश-शान के लड़के रफीउद्दरजात को दिल्ली के तख्त पर बैठाया किन्तु तीन माह बाद ही उसे तख्त से हटाकर उसके भाई रफीउद्दौला को गद्दी पर बैठाया। वह साढ़े तीन माह में ही पेचिश की बीमारी से मर गया। अतः बहादुरशाह के पुत्र जहांदारशाह के लड़के मुहम्मदशाह (1719-48 ई.) को बादशाह बनाया गया। मुहम्मदशाह ने सैयद भाइयों को मरवा दिया तथा निजाम-उल-मुल्क को वजीर का पद देकर दिल्ली बुलाया। निजाम-उल-मुल्क दिल्ली गया परन्तु वहाँ पर अधिक समय नहीं रुका। वह पुनः दक्षिण भारत चला गया। दक्षिण के नये सूबेदार मुबारिजखाँ ने उसका विरोध किया। निजाम-उल-मुल्क ने मराठों से सहायता से 1724 ई. में मुबारिजखाँ को भी मार डाला। 1725 ई. में उसने हैदराबाद पर अधिकार कर लिया। उसी समय से दक्षिण भारत में हैदराबाद के स्वतंत्र राज्य की नींव पड़ी। हैदराबाद उसकी राजधानी बना। चिनकुलीचखाँ को निजामउलमुल्क की उपाधि प्राप्त थी इसलिये वह हैदराबाद के निजाम के नाम से शासन करने लगा। उसने पूर्ण स्वतंत्र शासक की भाँति शासन किया।                            

बंगाल

औरंगजेब के शासनकाल में बंगाल, बिहार और उड़ीसा मुगल सल्तनत के तीन अलग-अलग सूबे थे। 1705 ई. में औरंगजेब ने मुर्शीद कुली जफरखाँ को बंगाल का नायब-निजाम और उड़ीसा का सूबेदार नियुक्त किया था। 1717 ई. में बादशाह फरूखसियर ने उसके नियंत्रण में बंगाल का सूबा भी दे दिया और उसे मुत्मात-उल-मुल्क अलाउद्दीन जफरखांँ बहादुर नासिरी नासिरजंग की उपाधि से विभूषित किया। औरंगजेब की मृत्यु के बाद वह स्वतंत्र शासक की भाँति शासन करने लगा। वह नाममात्र के लिए मुगल बादशाह की अधीनता स्वीकार करता था। मुर्शीदकुली जफरखाँ एक प्रतिभावान शासक सिद्ध हुआ। उसने अपने राज्य को समृद्ध बनाने के प्रयास किये। जून 1727 ई. में उसकी मृत्यु हो गई। मुर्शीदकुली खाँ के कोई पुत्र नहीं था, अतः उसकी मृत्यु के बाद उसका दामाद शुजाउद्दीन मुहम्मदखाँ बंगाल का शासक हुआ। उसने बिहार के सूबे को भी जबर्दस्ती अपने अधीन कर लिया। इस प्रकार पूर्वी भारत के तीनों समृद्ध सूबे शुजाउद्दीन के शासन के अन्तर्गत चले गये। मार्च 1739 ई. में शुजाउद्दीन मुहम्मद खाँ की मृत्यु हो गई और उसका पुत्र सरफराज खाँ गद्दी पर बैठा। वह अत्यन्त विलासी था। इसलिये उसने शासन की तरफ ध्यान नहीं दिया। इस कारण शासन की वास्तविक शक्ति स्वार्थीं अमीरों के हाथों में चली गई। सरफराजखाँ के समय में अलीवर्दीखाँ बिहार का नायब सूबेदार था। उसका भाई हाजी अहमद भी सरफराजखां के दरबार में एक प्रभावशाली गुट का प्रमुख सदस्य था। सरफराजखाँ की असावधानी का लाभ उठाकर, अलवर्दीखाँ ने अपने भाई हाजी अहमद के समर्थन से मुर्शिदाबाद पर आक्रमण कर दिया। 10 अप्रैल 1740 को एक युद्ध में सरफराजखाँ मारा गया और बंगाल  की गद्दी पर अलीवर्दीखाँ का अधिकार हो गया। मुगल बादशाह ने भी उसके अधिकार को स्वीकार कर लिया। इससे मुगल बादशाह की कमजोरी खुलकर सामने आ गई तथा बंगाल पूरी तरह स्वतंत्र हो गया।

अवध

अवध के स्वतंत्र राज्य का संस्थापक मीर मोहम्मद अमीन सआदतखाँ (सादतखाँ) बुरहानुलमुल्क था। वह मुगल दरबार में ईरानी अमीरों का नेता था, जो वजीर निजाम-उल-मुल्क का प्रतिद्वंद्वी था। सैयद बन्धुओं के पतन में उसने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अतः बादशाह मुहम्मदशाह ने प्रसन्न होकर उसे सआदतखाँ बहादुर की उपाधि तथा आगरा की फौजदारी प्रदान की। इसी समय भरतपुर, आगरा और मथुरा के जाटों ने विद्रोह कर दिया। सआदतखाँ इस विद्रोह को कुचलने में असफल रहा। अतः सितम्बर 1722 में सवाई जयसिंह को आगरा की सूबेदारी दे दी गई। इस अपमान से सआदतखाँ को धक्का पहुँचा परन्तु बादशाह ने उसे अवध का सूबेदार नियुक्त करके उसे शान्त करने का प्रयास किया। वास्तव में इस समय से ही अवध के स्वतंत्र राज्य का इतिहास आरम्भ होता है। अवध राज्य में अवध की सीमाओं के अतिरिक्त पूर्व में कानपुर, इलाहाबाद और बनारस तक के जिले तथा पश्चिम में वर्तमान पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ जिले सम्मिलित थे। सआदतखाँ  प्रतिभावान शासक सिद्ध हुआ। वह नाममात्र के लिए मुगल बादशाह के आधिपत्य को स्वीकार करता था। वस्तुतः वह स्वतंत्र शासक था।

पंजाब

सिक्खों के दसवें और अन्तिम गुरु गोविन्दसिंह के दो पुत्र मुगलों से युद्ध करते हुए मारे गये और दो पुत्र मुगलों द्वारा दीवार में जिन्दा चुनवा दिये गये। गुरु गोविन्दसिंह ने अपनी मृत्यु से पहले गुरु बनाने की प्रथा को समाप्त कर दिया और कहा कि जहाँ भी पाँच सिक्ख एकत्रित होंगे वहाँ मैं उपस्थित रहूँगा। इस प्रकार, उन्होंने सिक्ख सम्प्रदाय के हितों के बारे में निर्णय करने का अधिकार सिक्ख पंचायत को सौंप दिया। गुरु गोविन्दसिंह ने सिक्खों को पूर्णतः सैनिक बनाया और खालसा सेना की स्थापना की। उन्होंने जीवनभर मुगलों से संघर्ष किया। औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात् हुए उत्तराधिकार युद्ध में विजयी होकर बहादुरशाह मुगल बादशाह् बना। बहादुरशाह अपने भाई कामबख्श के विद्रोह को दबाने दक्षिण की तरफ गया, तब गुरु गोविन्दसिंह उसके साथ दक्षिण की ओर गये। रास्ते में गोदावरी के किनारे नानदेड़ नामक स्थान पर दो अफगान पठानों ने छुरे से वार करके गुरु को घायल कर दिया। जब वे घायल अवस्था में मृत्यु शैय्या पर लेटे हुए थे तभी गुरु माधवदास नामक वैरागी उनसे भेंट करने आया। वह गुरु से इतना प्रभावित हुआ कि उसने स्वयं को गुरु का बन्दा (दास) कहा। गुरु ने उसे बन्दा बहादुर के नाम से पुकारा। गुरु ने बन्दा बहादुर को सिक्खों की सुरक्षा का दायित्व सौंपा तथा अपने पाँच मुख्य अनुयायी तथा कुछ अन्य सिक्ख अनुयायी उसके साथ करके उसे पंजाब जाने का आदेश दिया। बन्दा जब दिल्ली पहुँचा तभी उसे गुरु की मृत्यु का समाचार मिला। उसने गुरु के आदेश को मानकर सिक्खों को नेतृत्व प्रदान किया। वह इतिहास में बंदा बैरागी के नाम से भी प्रसिद्ध है।

बन्दा बहादुर ने सिक्खों को गुरु का संदेश पहुँचाया और मुगलों के अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करने का आह्नान किया। उसने सोनीपत से मुगल अधिकारियों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष आरम्भ किया तथा वहाँ के मुगल फौजदार को युद्ध में परास्त किया। उसने शाहबाद, मुस्तफाबाद आदि स्थानों को जीतते हुए सरहिन्द पर आक्रमण किया जहाँ के फौजदार वजीरखाँ ने गुरु के दो पुत्रों को दीवार में जिन्दा चुनवाया था। वजीरखाँ युद्ध में मारा गया। उसकी अपार सम्पत्ति बन्दा के हाथ लगी। बन्दा ने सरहिन्द के 28 परगने अपने अधीन कर लिये। बन्दा की इन सफलताओं ने उसे अत्यन्त लोकप्रिय बना दिया। बन्दा का उद्देश्य पंजाब में एक स्वतंत्र सिक्ख राज्य की स्थापना करना था। इसके लिए उसने लौहगढ़ को राजधानी बनाया, गुरु नानक और गुरु गोविन्दसिंह के नाम के सिक्के चलाये और सिक्ख राज्य की एक सील या मुहर भी बनवायी।

बन्दा ने सरहिन्द क्षेत्र में मुगल अधिकारियों को हटाकर सिक्ख अधिकारियों को नियुक्त किया। इस प्रकार उसने सबसे पहले सिक्ख राज्य की स्थापना की किंतु बन्दा बहादुर ने स्वयं न तो कोई पदवी धारण की और न कभी दरबार लगाया। उसने सभी कार्य गुरु के नाम से किये। मुगल बादशाह पहले तो दक्षिण भारत के राज्यों के विरोध तथा उसके बाद राजपूत शासकों के विरोध को दबाने में व्यस्त रहा। इसका लाभ उठाते हुए बन्दा बहाुदर ने पंजाब से बाहर निकलकर गंगा-यमुना दोआब में सहारपुर और उसके निकट के क्षेत्रों तक आक्रमण किये। इस पर मुगल बादशाह ने फीरोजखाँ के नेतृत्व में एक सेना बन्दा के विरुद्ध भेजी। बन्दा भागकर पहाड़ों में छिप गया। उसकी राजधानी लौहगढ़ पर मुगलों का अधिकार हो गया। बन्दा बहादुर ने साहस नहीं छोड़ा। वह निरन्तर मुगलों से संघर्ष करता रहा। पहले जहाँदरशाह और उसके बाद फरूखसियर ने सिक्खों के विद्रोह को दबाने का भरसक प्रयत्न किया। अन्त में 1716 ई. में गुरूदास-नांगल नामक स्थान पर बन्दा बहादुर को मुगल सेना ने घेर लिया। आठ महिने तक मुगल सेना से घिरे रहने के बाद विवश होकर बन्दा बहादुर आत्म-समर्पण कर दिया। उसे तथा उसके साथियों को दिल्ली ले जाया गया, जहाँ उसे इस्लाम स्वीकार करने को कहा गया। उसकी अस्वीकृति के बाद उसे तथा उसके साथियों का निर्ममता से वध कर दिया गया।

बन्दा की मृत्यु के बाद सिक्ख नेतृत्व-विहीन हो गये । जब सिक्खों के सामने न गुरु रहा, न गुरु का बन्दा, तब सिक्खों ने सरबत खालसा और गुरुमत्ता की प्रथाएँ आरम्भ कीं। वर्ष में दो बार- बैशाखी और दीवाली पर, सिक्खों ने विशाल सभाएँ करनी आरम्भ कीं जिन्हें सरबत खालसा कहा जाता था। सरबत खालसा में लिये गये निर्णयों को गुरूमत्ता कहा जाता था। बन्दा बहादुर के पश्चात् भी सिक्खों और मुगलों के बीच संघर्ष चलते रहे।

नादिरशाह के आक्रमण के बाद मुगल सत्ता का बिखराव चरम पर पहुंच गया था। इस कारण चारों तरफ अव्यवस्था का वातावरण था। पंजाब में सिक्खों का संघर्ष जारी था। नादिरशाह के आक्रमण से उत्पन्न अव्यवस्था का अंत भी नहीं हुआ था कि अहमदशाह अब्दाली के आक्रमण आरम्भ हो गये। नादिरशाह के आक्रमण के बाद सिक्खों ने स्वयं को 100-100 व्यक्तियों के छोटे दलों में संगठित कर लिया। प्रत्येक दल का एक नेता होता था। दल के सभी सदस्य अपने नेता के आदेश का पालन करते थे। 1748 ई. में सभी दलों ने मिलकर दल खालसा का गठन किया। दल खालसा में सम्मिलित सभी दलों को पुनः 11 जत्थों में विभाजित किया, जो बाद में मिसलों के नाम से विख्यात हुए। इन मिसलों के पराक्रमी और योग्य सिक्ख नेताओं ने पंजाब के भिन्न-भिन्न भागों में अपने-अपने राज्य स्थापित कर लिये। धीरे-धीरे सम्पूर्ण पंजाब में 12 छोटे-छोटे राज्य स्थापित हो गये। आगे चलकर रणजीतसिंह ने इन मिसलों को जीतकर पंजाब में एक शक्तिशाली राज्य स्थापित किया। इस प्रकार पंजाब मुगल सल्तनत से बाहर हो गया।

मैसूर

भारत के पूर्वी और दक्षिणी घाट के सुदूर भाग में मैसूर नामक छोटा राज्य था। किसी समय में यह क्षेत्र विजयनगर साम्राज्य का अंग था। 1565 ई. में तालीकोटा के युद्ध के बाद विजयनगर साम्राज्य पतनोन्मुख हो गया।  इस महान् साम्राज्य के पतन के बाद 1570 ई. में रामराय के भाई तिरूमाल ने वेनुगोंडा को राजधानी बनाया और अरविंदु वंश की नींव रखी। तिरूमाल के बाद रंग (द्वितीय) और उसके बाद वेंकट (द्वितीय) ने शासन किया। वेंकट (द्वितीय) के शासन काल में विजयनगर राज्य का तेजी से विघटन आरम्भ हो गया। 1612 ई. में विजयनगर के शासक वेंकट (द्वितीय) ने मैसूर के एक सरदार वाडियार को ‘राजा’ की उपाधि से विभूषित किया। तब से मैसूर के स्वतंत्र राज्य की स्थापना हो गई। वाडियार वंश के हिन्दू राजाओं ने मैसूर राज्य पर लम्बे समय तक शासन किया। 1704 ई. में उन्हें औरंगजेब की अधीनता स्वीकार करनी पड़ी किन्तु व्यवहार में वे स्वतंत्र शासक बने रहे। यहाँ के शासकों ने स्वतंत्र शासकों की भाँति राज्य विस्तार की नीति अपनायी। 1732 ई. में अल्पवयस्क राजकुमार चिकाकृष्णराज मैसूर राज्य का शासक बना। कृष्णराज नाममात्र का शासक था। शासन की वास्तविक शक्ति देवराज तथा नन्दराज नामक दो भाइयों के हाथों में थी। बाद में नन्दराज राज्य का सर्वेसर्वा बन गया। नन्दराज के समय में ही मैसूर राज्य की सेना के एक अधिकारी हैदरअली ने 1761 ई. में सेना की सहायता से मैसूर राज्य हड़प लिया। 18वीं शताब्दी के अन्त तक मैसूर राज्य ने भारत के इतिहास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

मराठा राज्य

मराठों के स्वतंत्र राज्य की स्थापना छत्रपति शिवाजी ने की थी। शिवाजी की मृत्यु के बाद औरंगजेब ने शिवाजी के पुत्र और उत्तराधिकारी शम्भाजी को समाप्त करके महाराष्ट्र पर अधिकार करने में सफलता प्राप्त की किन्तु यह सफलता स्थायी न रह सकी। शम्भाजी की मृत्यु के बाद महाराष्ट्र को स्वतंत्र करवाने के लिए मराठों का स्वतंत्रता संग्राम आरम्भ हुआ जो औरंगजेब की मृत्यु तक चला। औरंगजेब अपने जीवनकाल में मराठों का दमन नहीं कर सका। शम्भाजी के बाद शिवाजी के दूसरे पुत्र राजाराम ने और तत्पश्चात् राजाराम की पत्नी ताराबाई ने संघर्ष जारी रखा। मराठों ने न केवल महाराष्ट्र को ही स्वतंत्र करा लिया, अपितु मुगल-छावनी पर भी धावे मारने आरम्भ कर दिये। 1707 ई. में शम्भाजी का पुत्र शाहूजी छत्रपति बना। उसके शासनकाल में पेशवा की शक्ति का उत्कर्ष हुआ, जो बाद में छत्रपति से भी ऊपर उठ गया। पेशवाओं के नेतृत्व में मराठों ने उत्तर भारत तक अपना प्रभाव स्थापित किया किन्तु अंग्रेजों ने कूटनीति एवं सैनिक शक्ति के बल पर मराठा शक्ति को समाप्त कर दिया। भारतीय इतिहास में लगभग डेढ़ सौ वर्षों तक मराठों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उपर्युक्त राज्यों के अतिरिक्त मुगल सत्ता के पतनोन्मुख काल में राजपूताने के कई शासक मुगल सत्ता से मुक्त होकर स्वतंत्र हो गये। इसी काल में भारत में यूरोपीय शक्तियाँ भी प्रबल हो उठीं। यूरोपीय शक्तियों ने पहले दक्षिण में और बाद में पूर्वी भारत में अपनी बस्तियाँ स्थापित कीं। इनके अतिरिक्त भी भारत में अनेक छोटे-छोटे राज्य स्थापित हो गये और मुगल सल्तनत का पूरी तरह विघटन हो गया।

मुगल सल्तनत के पतन के प्रमुख कारण

औरंगजेब की कट्टर नीतियों के कारण भारत में मुगलों के मित्रों एवं निष्ठावान सेनापतियों की संख्या में तेजी से कमी आई तथा चारों ओर शत्रुओं और विरोधियों का बोलबाला हो गया। इस कारण मुगलों के राज्य का वैभव और ऐश्वर्य मंद पड़ने लगा। यद्यपि औरंगजेब के जीवन काल में मुगल सत्ता का विघटन नहीं हुआ किंतु उसकी मृत्यु के बाद चारों तरफ नित्य नये राज्य स्थापित होने लगे जिससे मुगल राज्य बहुत कम समय में ही पतन के गर्त में लुढ़क गया। अधिकांश इतिहासकार औरंगजेब को मुगल सल्तनत के पतन के लिए उत्तरदायी ठहराते हैं। इस मत के समर्थन में निम्नलिखित तर्क दिये जाते हैं।

(1.) औरंगजेब की धार्मिक कट्टरता

औरंगजेब कट्टर सुन्नी और धर्मान्ध शासक था। वह स्वयं को केवल सुन्नी मुसलमानों का बादशाह मानता था। उसने शासन के लिये कुरान द्वारा निर्देशित नियम बनाये और लोगों को इन नियमों का पालन करने के लिए बाध्य किया। भारत को इस्लामी राज्य में परिवर्तित करने के उद्देश्य से उसने गैर-मुसलमानों को इस्लाम स्वीकार कराने के लिये सुनियोजित ढंग से काम किया। देश की अधिकांश प्रजा गैर-मुस्लिम थी जो अपने धर्म और संस्कृति को बनाये रखने के लिये दृढ़ संकल्प थी। अतः प्रजा में औरंगजेब की नीति का विरोध होना स्वाभाविक था। औरंगजेब को इस बात की परवाह नहीं थी कि उसकी धर्मान्ध नीति के क्या परिणाम होंगे? उसकी धर्मान्धता के कारण जाटों, सतनामियों, सिक्खों, मराठों, राजपूतों के विद्रोह फूट पड़े और सम्पूर्ण देश विद्रोहों की आग से झुलसने लगा। राजपूत जाति अकबर के समय से मुगलों की सेवा कर रही थी किंतु औरंगजेब ने राजपूतों को बुरी तरह नाराज कर दिया जिन्होंने सल्तनत से मुख मोड़ लिया। औरंगजेब का विनाश तो उसी समय आरम्भ हो गया था जब उसने मारवाड़ के राठौड़ों का राज्य खालसा कर लिया। सम्पूर्ण उत्तर भारत के हिन्दू मन्दिरों को ध्वस्त करके वहाँ की दैव मूर्तियों को अपमानित करने, तोड़ने तथा नष्ट करने की कार्यवाही से समस्त हिन्दू प्रजा मुगलों के खिलाफ हो गई। औरंगजेब ने हिन्दुओं पर जजिया कर लगाकर यह सिद्ध कर दिया कि वह विधर्मी प्रजा को सुख से नहीं जीने देगा। उसने शिया मुसलमानों को भी नष्ट करने का प्रयास किया। इससे शिया मुसलमान भी उसके शत्रु बन गये।

(2.) औरंगजेब की शंकालु प्रवृत्ति

औरंगजेब ने अपने पिता को बंदी बनाकर और भाइयों तथा भतीजों को तख्त प्राप्त किया था इसलिये वह हर किसी के प्रति शंकित रहता था। वह अपने पुत्रों को शासन व्यवस्था का दायित्व सौंपने में भी डरता इस शंकालु प्रवृति के कारण वह अपने पुत्रों को न केवल प्रशासन से दूर रखता था, अपितु उनके पीछे गुप्तचर भी लगाये रखता था। इसका परिणाम यह निकला कि उसके पुत्र आदेशों व नीतियों का विरोध करने को तत्पर रहते थे। इतना ही नहीं, उसके पुत्र उसके विरुद्ध षड्यन्त्र और विद्रोह करने को भी इच्छुक रहते थे। शाहजादा अकबर इस प्रवृत्ति से नाराज होकर राजपूतों से जा मिला और अपने पिता औरंगजेब के विरुद्ध विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया। इस कारण वह अपना कोई योग्य उत्तराधिकारी नहीं तैयार कर सका। औरंगजेब अपने मन्त्रियों, अधिकारियों व सेनापतियों को भी संदेह की दृष्टि से देखता था। इसलिए  वह राज्य के छोटे-से-छोटे काम को स्वयं करने का प्रयत्न करता था। फलतः उसके मंत्री और अधिकारी निर्णय लेने में असमर्थ हो गये। उसके सेनापति घोर संकट में भी असहाय होकर बादशाह के आदेशों के लिए मुँह ताकते थे। जब तक बादशाह में शारीरिक योग्यता रही, उसने सल्तनत को नियंत्रित रखा किन्तु उसकी वृद्धावस्था और मृत्यु के बाद सल्तनत छिन्न-भिन्न होने लगा।

(3.) औरंगजेब के प्रशासन में दोष

औरंगजेब ने अत्यन्त ही केन्द्रीभूत एक-तंत्रीय शासन व्यवस्था स्थापित की थी। ऐसी शासन व्यवस्था की सफलता शासक की शक्ति एवं योग्यता पर निर्भर करती है। जब तक औरंगजेब में शारीरिक योग्यता बनी रही, तब तक शासन का काम ठीक तरह से चलता रहा। वृद्धावस्था में भी वह दरबार में रहकर प्रशासन का कार्य करने का प्रयत्न करता रहा। उसके विचारों में धार्मिक कट्टरता का अतिरेक होने के कारण उसके अधिकांश निर्णय गलत होते थे। मआसिर-ए-आलमगिरी में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं कि औरंगजेब के शासन में छोटे-बड़े अधिकारी भ्रष्ट आचरण से धन कमाते थे। इतना ही नहीं, स्वंय बादशाह भी बड़ी-बड़ी रकमें तथा भेंटे लेकर, अधिकारियों के इच्छित स्थानों पर तबादले करता था। ऐसे प्रशासन का विनाश अवश्यम्भावी था।

(4.) औरंगजेब की दोषपूर्ण दक्षिण नीति

औरंगजेब की दक्षिण नीति मुगल सल्तनत के लिए विनाशकारी सिद्ध हुई। उसके समय में दक्षिण भारत में तीन मुख्य शक्तियाँ थीं- बीजापुर, गोलकुण्डा और मराठा। ये तीनों शक्तियाँ आपस में लड़ती रहती थीं जिससे दक्षिण में शक्ति-सन्तुलन बना हुआ था किन्तु औरंगजेब ने बीजापुर और गोलकुण्डा को मात्र इसलिए नष्ट कर दिया क्योंकि वे शिया राज्य थे। इस कारण मुगलों की सीधी टक्कर मराठों से होने लगी। औरंगजेब ने नवोदित मराठा शक्ति को नष्ट करने हेतु मुगल सामा्रज्य के समस्त संसाधन झौंक दिये किन्तु वह मराठा शक्तियों को दबा नही सका। औरंगजेब ने अन्तिम 25 वर्ष दक्षिण के युद्धों में ही व्यतीत किये, फलस्वरूप राज्य के समस्त बड़े सेनापति एवं अधिकारी दक्षिण पहुँच गये और केन्द्रीय शासन दूसरी श्रेणी के लोगों के हाथ में आ गया, जिनमें प्रशासनिक क्षमता की कमी थी। इससे उत्तर भारत के प्रशासन में अराजकता फैल गई एवं चारों तरफ छोटे-बड़े विद्रोह उठ खड़े हुए। दक्षिण के लम्बे युद्धों के कारण सल्तनत का राजकोष रिक्त हो गया। वस्तुतः दक्षिण भारत, औरंगजेब के लिए विनाशकारी सिद्ध हुआ। लम्बे समय तक उत्तर भारत में उसकी अनुपस्थिति से केन्द्रीय सत्ता कमजोर हो गई तथा सल्तनत की शासन व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो गयी।

(5.) औरंगजेब द्वारा भू-राजस्व की वसूली के तरीके में परिवर्तन

अकबर के समय लगान (भू-राजस्व) के निर्धारण का जो तरीका था, औरंगजेब ने उसे बन्द कर दिया। औरंगजेब से पहले, सरकारी अधिकारी लगान वसूल करते थे किन्तु औरंगजेब ने किसानों से लगान वसूलने के लिये ठेकेदारी प्रथा आरम्भ कर दी। इस कारण किसनांे से मनमाना लगान वसूल करते थे। इससे लाखों किसानों की दशा बिगड़ गई। निरन्तर युद्धों के चलने से देश में कृषि और व्यापार नष्ट प्रायः हो गये। अकाल तथा महामारी के कारण स्थिति ने विकराल रूप धारण कर लिया। दक्षिण के युद्धों में अत्यधिक जन-धन की हानि हुई थी इस कारण औरंगजेब ने किसानों एवं जनसाधारण पर कर बढ़ा दिये। इससे सल्तनत में असन्तोष बढ़ गया और विद्रोह की ज्वाला प्रज्वलित हो उठी। स्वयं औरंगजेब ऐसी स्थिति देखकर कहा करता था कि  उसकी मृत्यु के बाद कैसा प्रलय आयेगा?

(6.) औरंगजेब की अन्य त्रुटियाँ

औरंगजेब में चालाकी और मक्कारी कूट-कूटकर भरी हुई थी। अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए वह निम्नतम साधन अपनाने में संकोच नहीं करता था। षड्यन्त्र और चालाकी से शत्रु को जीतना उसका स्वभाव था। इस स्वभाव के कारण उसने बहुत से लोगों को शत्रु बना लिया। उसने शियाओं और दाऊदी बोहरों पर भीषण अत्याचार किये। शाही नौकरियाँ देने में पक्षपात किया। राजपूतों के राज्य हड़प लिये। उसने देश की सांस्कृतिक थाती को विकसित करने का कोई प्रयास नहीं किया। ललित कलाओं की ओर ध्यान न देने से भारत की सभ्यता ही खतरे में पड़ गई। ऐसी शासन व्यवस्था का अन्त होना निश्चित ही था।

मुगल सल्तनत के पतन के अन्य कारण

उपर्युक्त कारणों से औरंगजेब को मुगल सल्तनत के पतन के लिए उत्तरदायी ठहराया जाता है किन्तु मुगल सल्तनत के पतन के कुछ बड़े कारण औरंगजेब के पूर्व भी विद्यमान थे और कुछ नये कारण उसकी मृत्यु के बाद उत्पन्न हो गये थे। इसलिये केवल औरंगजेब को मुगल सल्तनत के पतन के लिए उत्तरदायी नहीं माना जा सकता। मुगल सल्तनत के पतन के लिए अन्य निम्नलिखित कारण इस प्रकार थे-

(1.) परवर्ती मुगल बादशाहों की चारित्रिक दुर्बलताएँ

मध्ययुगीन राज्य, शासक की योग्यता पर टिके हुए होते थे। यदि शासक योग्य और चरित्रवान होता था तो ही राज्य को स्थायित्व प्राप्त होता था किन्तु औरंगजेब के उत्तराधिकारी न तो योग्य थे और न चरित्रवान। वे सुरा, सुंदरी और आखेट से अत्यधिक प्रेम करते थे। औरंगजेब के उत्तराधिकारी बहादुरशाह (प्रथम) को तो लोग मस्त राजा ही कहा करते थे। वह अपनी प्रेयसी लालकंुवर के प्रेम में डूबा रहता था। फरूखसियर जैसा डरपोक बादशाह, मुगल वंश में कोई हुआ ही नहीं था। अहमदशाह और उसके उत्तराधिकारी सर्वथा अयोग्य थे। इस कारण मुगलिया सल्तनत का काम स्वार्थी और षड्यन्त्री लोगों के हाथों में चला गया जिन्होंने सल्तनत का नाश कर दिया। मुगल बादशाहों ने अपने जीवन के आदर्श और यहाँ तक कि दीवानी व फौजदारी कानून भी अरब, बगदाद और काहिरा से लेकर भारत में लागू करने के प्रयास किये जो भारतीय परिस्थितियों में अत्यंत अव्यवहारिक थे। इस कारण औरंगजेब तथा उसके बाद के मुगल बादशाहों को बहुसंख्यक हिन्दू प्रजा का समर्थन नहीं मिला। औरंगजेब तथा उसके बाद के मुगल बादशाहों ने इसकी परवाह भी नहीं की कि उन्हें हिन्दुओं का समर्थन और सहयोग मिले। शासकों की धार्मिक कट्टरता के कारण सल्तनत के समस्त गैर-मुसलमान, शासन के शत्रु बन गये। उन्होंने मुगलों से लोहा लिया जिससे सल्तनत का पतन हो गया।

(2.) मुगल अमीरों एवं सामंतों का नैतिक पतन

जिस प्रकार मुगल बादशाहों का नैतिक पतन हो गया, उसी प्रकार मुगल सल्तनत के अमीरों तथा सामंतों में राजभक्ति और कर्त्तव्यपरायणता का लोप हो गया। वे भी बादशाहों और शहजादों की भांति स्वार्थी एवं विलासी हो गये। सैयद बन्धु, अवध का सूबेदार सफदरजंग और दक्षिण का सूबेदार निजामउलमुल्क यद्यपि योग्य अमीर थे किन्तु उन्होंने मुगल बादशाहों को अपनी स्वार्थसिद्धि का साधन बना लिया। अमीरों के हरम में सुन्दर स्त्रियों की भीड़ रहने लगी। वे युद्ध-क्षेत्र में भी अपना हरम साथ रखने लगे और अत्यधिक शराब सेवन के अभ्यस्त हो गये। ऐसे अमीरों के युवा पुत्रों का दुश्चरित्र होना स्वाभाविक ही था। इस प्रकार समस्त सामन्तीय व्यवस्था का ही नैतिक पतन हो गया। सर जदुनाथ सरकार ने लिखा है- ‘कोई भी मुगल सामन्त एक या दो पीढ़ियों से अधिक समय तक अपना महत्त्व बनाये नहीं रख सका था। यदि किसी सामन्त की वीरता के विषय में इतिहासकार ने तीन पृष्ठ लिखे तो उसके पुत्र के कार्यों का वर्णन केवल एक ही पृष्ठ में हुआ और उसके पौत्र का वर्णन कुछ इस प्रकार के शब्दों में- ‘उसने कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं किया’ समाप्त हो जाता।’ मुगल सामन्त सल्तनत की शक्ति के वास्तविक आधार थे, जब उनकी निष्ठायें समाप्त हो गईं तो सल्तनत का आधार भी समाप्त हो गया।

(3.) दरबार एवं हरम की गुटबंदी

अकबर के समय से ही मुगल दरबार एवं हरम की गुटबंदी शासन में दखल करती आई थी। जहाँगीर के समय में यह गुटबंदी और बढ़ गई। इस कारण मुगल दरबार एवं हरम गुटबन्दियों एवं षड्यन्त्रों के अखाड़े बने रहते थे। सत्ता और शक्ति की लूट खसोट के कारण बादशाह के अतिरिक्त और किसी को सल्तनत की दुर्दशा के प्रति चिंता नहीं रहती थी। अधिकांश लोग स्वार्थ-सिद्धि में लगे रहते थे। अमीर, शहजादे एवं बेगमें अपने गुट को शक्तिशाली बनाने के लिये एक दूसरे के विरुद्ध षड्यंत्र करते थे तथा एक दूसरे के विरुद्ध बादशाह के कान भरते थे। यहाँ तक कि विरोधी गुट पर सशस्त्र आक्रमण कर देते थे। इस अव्यवस्था ने राज्य परिवार की शक्ति को छिन्न-भिन्न कर दिया। इससे सल्तनत की शक्ति भी छिन्न-भिन्न हो गई।

(4.) उत्तराधिकार के नियम का अभाव

मुगलों में उत्तराधिकार का कोई सर्वमान्य नियम नहीं था। उत्तराधिकार का निर्णय सदैव युद्ध से ही होता था। इस कारण तख्त प्राप्ति के लिये शहजादों में, बादशाह के जीवन काल में ही युद्ध चलते रहते थे जो बाद में भी जारी रहते थे। हुमायूँ का जीवन भर अपने तीनों भाइयों से झगड़ा रहा। हुमायूँ के भाइयों को जब भी अवसर मिला उन्होंने स्वयं को हुमायूँ से विद्रोह करके स्वयं को बादशाह घोषित कर दिया। भाइयों के कारण ही हुमायूँ का राज्य पूरी तरह नष्ट हो गया। भाइयों को नष्ट करके ही हुमायूँ दुबारा राज्य का निर्माण कर सका। अकबर के भाई मिर्जा हकीम ने वयस्क होते ही स्वयं को स्वतंत्र बादशाह घोषित कर दिया। अकबर को उसके विरुद्ध सेना भेजनी पड़ी। अकबर के पुत्र सलीम ने भी वयस्क होने पर तख्त प्राप्त करने के लिए विद्रोह किया और उसके विरुद्ध शाही सेना भेजनी पड़ी। जहाँगीर के पुत्र खुसरो ने भी विद्रोह किया। जहाँगीर की मृत्यु के बाद नूरजहाँ ने शहरयार को बादशाह घोषित कर दिया किन्तु शाहजहाँ ने अपने श्वसुर आसफखाँ की सहायता से शहरयार व अन्य शहजादों की हत्या करवाकर मुगलों के तख्त पर अधिकार किया। शाहजहाँ के उत्तराधिकार के लिये उसके जीवनकाल में ही उसके पुत्रों में इतना भीषण युद्ध हुआ कि सारा उत्तर भारत अस्त-व्यस्त हो गया। शाहजहाँ के जीवित रहते ही औरंगजेब उसे कैद करके बादशाह बन गया। औरंगजेब के जीवन काल में शहजादा अकबर ने विद्रोह किया और अंत में उसे भारत से ही चले जाना पड़ा। औरंगजेब की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार के लिये संघर्ष की परम्परा और तेज हो गई। इस कारण सल्तनत की शक्ति इतनी कमजोर पड़ गई कि उसे हल्के प्रहार से भी ध्वस्त किया जा सकता था।

(5.) सैन्य प्रणाली की कमजोरी

मुगल सेना में विभिन्न मनसबदारों द्वारा सैनिकों की भरती की जाती थी। वे सैनिक मनसबदार के नियंत्रण में कार्य करते थे। सैनिकों को वेतन शाही खजाने से न दिया जाकर मनसबदारों द्वारा चुकाया जाता था। अतः सैनिक मनसबदार को ही अपना मालिक मानते थे। बादशाह से उन्हें कोई लेना-देना नहीं था। इस कारण वे मनसबदार के निर्देश पर शाही सेना से भी लड़ने में संकोच नहीं करते थे। मनसबदार शत्रु से घूस लेकर बादशाह से विश्वासघात करता था तथा सेना उस मनसबदार के नेतृत्व में बनी रहती थी। मनसबदारों की पारस्परिक ईर्ष्या इतनी बढ़ गई थी कि एक मनसबदार यह नहीं चाहता था कि दूसरे मनसबदार को किसी भी जीत का श्रेय मिले। इस कारण कई बार शाही सेना जीती हुई लड़ाई हार जाती थी। परवर्ती मुगल बादशाहों ने बदलती हुई नवीन सैनिक प्रणाली के प्रति उदासीनता दिखाई। अकबर के काल में ही भारतीय तोपों की अपेक्षा पाश्चात्य तोपों का महत्त्व स्पष्ट हो गया था, क्योंकि पाश्चात्य तोपें हल्की होने से बड़ी सरलता से एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जायी जा सकती थीं किन्तु मुगल शासक ऐसी तोपों का महत्त्व नहीं समझ सके। मुगलों ने सामुद्रिक शक्ति की भी अवहेलना की, इसलिए जहाजी बेड़ों की लड़ाई से वे सर्वथा अनभिज्ञ रहे। आगे चलकर यूरोपीय शक्तियों ने सामुद्रिक युद्धों में मुगलों को करारी मात दी। पाश्चात्य हथियारों और नवीन युद्ध प्रणाली के प्रति दिखाई गई उपेक्षा मुगलों के लिए घातक सिद्ध हुई।

(6.) बादशाहों द्वारा धन का अपव्यय

अकबर ने शासन में जिस संतुलित नीति का अवलम्बन किया था, उससे मुगल सल्तनत का चहुंमुखिी विकास हुआ। इस कारण प्रजा में समृद्धि आई और सरकार की आय में भारी वृद्धि हुई किन्तु उसके उत्तराधिकारियों के शासनकाल में आर्थिक ढाँचा बिगड़ने लग गया। कोष की पूर्ति करने के लिये सरकार ने किसानों, व्यपारियों एवं जिन्स-उत्पादकों पर करों का इतना बोझ लाद दिया कि प्रजा की आर्थिक स्थिति बिगड़ने लगी। अकबर के काल में भू-लगान सीधा किसानों से लिया जाता था किन्तु औरंगजेब तथा उसके उत्तराधिकारियों के काल में यह पद्धति  लगभग समाप्त कर इसके स्थान पर ठेकेदारी प्रथा आरम्भ की गई, जिससे किसानों का अधिक शोषण होने पर भी राज्य की आय घट गई। मुगल बादशाहों की फिजूलखर्ची ने देश को बर्बाद कर दिया। शाहजहाँ ने कन्धार और मध्य एशिया के युद्धों में विपुल धन का अपव्यय किया। औरंगजेब के काल में विद्रोहों को दबाने और दक्षिण भारत के मोर्च पर पच्चीस वर्ष तक युद्ध लड़ने के कारण राज्य का कोष रिक्त हो गया। बहादुरशाह (प्रथम) न तो अच्छी सेना रख सकता था और न ठीक प्रकार से शासन ही चला सकता था। आलमगीर (द्वितीय) के शासनकाल में तो स्वयं बादशाह भूखा मरने लगा और शाही परिवार के जेब खर्च को वजीर हड़पने लगा। सर जदुनाथ सरकार ने लिखा है- ‘एक बार तो तीन दिन तक जनानखाने के रसोई घर में चूल्हा तक नहीं जला।’ आश्चर्य की बात यह है कि ऐसी दिवालिया मुगल सरकार भी पचास वर्ष तक चलती रही।

(7.) हिन्दुओं की उपेक्षा

अकबर के अतिरिक्त समस्त मुगल बादशाह अपने चार प्रमुख कर्त्तव्य मानते थे- (1.) सल्तनत के भीतर शान्ति और व्यवस्था कायम रखना, (2.) बाह्य आक्रमणों से सल्तनत की रक्षा करना, (3.) अधिक से अधिक लगान वसूल करना तथा (4.) भारत से कुफ्र समाप्त करके इस्लाम का प्रचार करना। इनमें से अंतिम दो उद्देश्य भारत जैसे हिन्दु बहुल एवं विशाल देश के लिये उपयुक्त नहीं थे। साधारण जनता मुगलों को विदेशी समझकर उनसे असहयोग करती थी।

(8.) शियाओं की उपेक्षा

बैरमखाँ तथा अब्दुर्रहीम खानखाना जैसे प्रबल शिया सेनापतियों की सहायता मिल जाने पर भी मुगल बादशाहों एवं सुन्नी अमीरों में शियाओं के प्रति स्वस्थ दृष्टिकोण नहीं पनप सका। शिया बादशाह तहमास्प द्वारा दी गई सहायता से भी सुन्नी मुसलमान, शियाओं के प्रति अपना दृष्टिकोण नहीं बदल सके। वे सुन्नियों को प्रोत्साहन देने एवं शियाआंे की उपेक्षा करने में कभी भी संकोच नहीं करते थे। इस कारण सल्तनत तथा समाज में शासक वर्ग से भिन्न, शिया मुसलमानों का नया विघटन खड़ा हो गया। इससे शिया-सुन्नियों के झगड़े बहुत बढ़ गये।

(9.) देश की आर्थिक व सामाजिक स्थिति

कुछ इतिहासकारों का मत है कि भारत की मध्यकालीन आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति मुगलों के पतन का मूल कारण थी। मुगलों की शासन प्रणाली ने समाज में खराब परिस्थितियों का निर्माण किया। मुगलों की जागीरदार प्रथा ने सल्तनत के पतन में बड़ा योगदान दिया। जागीरदारों की लूटमार के कारण शासन में न्याय मिलना असंभव हो गया। सरकार लोगों के जान-माल की सुरक्षा नहीं कर सकी। महत्त्वाकांक्षी सामन्तों एवं प्रान्तीय सूबेदारों ने स्वतन्त्र राज्य स्थापित कर लिये।

(10.) शासन में भ्रष्टाचार

इस कारण देश में चारों ओर अशांति, अविश्वास एवं अव्यवस्था का माहौल बना रहता था तथा देश में उद्योग-धन्धों एवं व्यापार के विकास की गति अत्यन्त धीमी बनी रहती थी। दक्षिण के दीर्घकालीन युद्धों के कारण देश के वाणिज्य, व्यापार तथा उद्योग नष्ट प्रायः हो गये। देश की निर्धन प्रजा और भी निर्धन हो गई। शासन में घूसखोरी का बोलबाला हो गया। उच्च पदाधिकारी से लेकर छोटे-से-छोटा कर्मचारी रिश्वत लेने का अभ्यस्त हो गया। बादशाह स्वयं भी घूसखोरी से अछूते न रहे। समाज का प्रत्येक वर्ग अपने से निम्न वर्ग को दबाकर धन ऐंठने का प्रयास करता था।

(11.) नादिरशाह तथा अहमशाह अब्दाली के आक्रमण

लड़खड़ाती हुई मुगल सल्तनत पर 1739 ई. में नादिरशाह और 1760 ई. में अहमदशाह अब्दाली ने घातक प्रहार किये, जिससे मुगलों की रही-सही शक्ति भी नष्ट हो गयी।

(12.) अंग्रेज शक्ति का उदय

सत्रहवीं शताब्दी में अंग्रेज भारत में व्यापार करने आये और फिर अठारवीं शताब्दी में जब उन्होंने अपने लिए अनुकूल परिस्थितियाँ देखी तो भारत में अपना राज्य स्थापित करने की सोचने लगे। शक्तिहीन मुगल सत्ता अंग्रेजों का सामना नहीं कर सकी, अतः मुगल सल्तनत का सूर्य सदा के लिये अस्त हो गया।

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