Friday, June 14, 2024
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135. हिंजड़ों के मुखिया को लेकर बादशाह एवं वजीर में ठन गई!

बादशाह अहमदशाह बहादुर ने अवध के नवाब सफदरजंग को सल्तनत के मुख्य वजीर के पद पर बने रहने दिया था तथा चिनकुलीच खाँ के पुत्र मुइन-उल-मुल्क को पंजाब का सूबेदार नियुक्त किया था। बादशाह ने अपनी माता ऊधम बाई उर्फ कुदसिया बेगम को पचास हजार सवारों का मनसबदार नियुक्त किया था तथा ऊधमबाई के कहने पर शाही हरम के दरोगा जाविद खाँ को नवाब बहादुर की उपाधि देकर पांच हजार सवार का मनसबदार बना दिया था। अकबर से लेकर औरंगजेब तक के शासनकाल में पांच हजार सवार का मनसब बड़े-बड़े राजाओं-महाराजाओं एवं उनके पुत्रों को दिया जाता था किंतु अब मुगल सल्तन वही मनसब ख्वाजासरों को बांट रही थी।

ख्वाजासरा जाविद खाँ पर बादशाह की इनायतों का कोई अंत नहीं था, उसे बादशाह का मीर बख्शी भी बना दिया गया। इस काल में मीर बख्शी के पास दो बड़े अधिकार होते थे, पहले अधिकार के तहत मीर बख्शी यह तय करता था कि बादशाह से कौन मिलेगा और कौन नहीं। दूसरे अधिकार के तहत मीर बख्शी सल्तनत के समस्त खजाने का प्रभारी होता था। जाविद खाँ शाही हरम के ख्वाजासरों अर्थात् हिंजड़ों का मुख्यिा होने के साथ-साथ बादशाह की माता ऊधम बाई का प्रेमी भी था।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

एक ख्वाजासरा को मीर बख्शी जैसा बड़ा पद एवं सम्मान दिए जाने पर वजीर सफदरजंग नाराज हो गया। उसने बादशाह की माता कुदसिया बेगम पर आरोप लगाया कि वह शासन में पक्षपात कर रही है तथा अपने चहेते लोगों को जरूरत से ज्यादा बढ़ावा दे रही है। इस पर जाविद खाँ ने कुदसिया बेगम का बचाव करते हुए वजीर को दबाने का प्रयास किया।

वजीर सफदरजंग ने जाविद खाँ पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। इस पर कुछ तूरानी अमीर कुदसिया बेगम और जाविद खाँ के पक्ष में आ गए और उन्होंने वजीर सफदरजंग का विरोध करना आरम्भ कर दिया। वजीर सफदरजंग ने विरोध करने वाले तूरानी अमीरों को दण्डित करना आरम्भ किया। इस प्रकार नए बादशाह के तख्त पर बैठते ही मुगल दरबार में अमीरों के नए गुट बन गए और वे आपस में लड़ने लगे।

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जब दोनों पक्षों में झगड़ा बढ़ गया तो ऊधम बाई ने हिंजड़ों के प्रमुख जाविद खाँ का बचाव करते हुए जाविद खाँ को अधिकार दिए कि वह सेना लेकर उन अमीरों और वजीरों का दमन करे जो कुदसिया बेगम तथा जाविद खाँ का विरोध कर रहे हैं। ई.1749 में जाविद खाँ ने वजीर सफदरजंग की हत्या करने का षड़यंत्र रचा किंतु सफदरजंग इस षड़यंत्र में बच गया।

 ईस्वी 1750 में शाही सेना का एक सेनापति सलाबत खाँ 18 हजार सैनिकों का मुखिया था। उसे मारवाड़ में राठौड़ों का दमन करने के लिए भेजा गया था किंतु उसे सैनिकों को वेतन देने के लिए शाही खजाने से भुगतान नहीं दिया गया। जब काफी दिनों तक सलाबत खाँ की सेना को वेतन नहीं मिला तो सलाबत खाँ ने बादशाह के दरबार में अपील की।

मुगल सेनापतियों की सेनाओं को समय पर वेतन मिले इसकी जिम्मेदारी मीर बख्शी होने के कारण जाविद खाँ की थी किंतु एक ओर तो उसने अपना कर्त्तव्य पूरा नहीं किया तथा दूसरी ओर उसने सलाबत खाँ की अपील को अपनी व्यक्तिगत शिकायत समझा और वह सलाबत खाँ से नाराज हो गया। जाविद खाँ ने सलाबत खाँ को दिल्ली बुलाकर गिरफ्तार कर लिया। इस पर सलाबत खाँ ने अपनी सारी निजी सम्पत्ति बेच दी तथा उससे प्राप्त धन से अपनी सेना का बकाया वेतन चुका दिया और सेना भंग कर दी।

इसके बाद सलाबत खाँ ने फकीर की तरह जीवन जीने का निर्णय लिया ताकि उसे शाही हरम में हिंजड़ों के हाथों अपमानित न होना पड़े। इस घटना का दूसरी मुगल सेनाओं पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा और उन्हें अपना भविष्य अंधकारमय दिखाई देने लगा। वजीर सफदरजंग ने मीर बख्शी जाविद खाँ के विरुद्ध हो-हल्ला मचाया किंतु बादशाह ने वजीर की कोई बात नहीं सुनी। इसलिए वजीर मन ही मन बादशाह से नाराज हो गया। उन्हीं दिनों वजीर सफदरजंग ने उन अफगान अमीरों की पेंशनें बंद कर दीं जो कई वर्षों से मुगल खजाने से बिना कोई काम किए पेंशनें प्राप्त कर रहे थे। ये लोग मीरबख्शी के पक्ष के थे। मीर बख्शी के उकसावे पर अफगान अमीरों के गुट के नेता अहमद खाँ बंगश ने अवध पर आक्रमण कर दिया। वजीर सफदरजंग अपने सूबे को बचाने के लिए सेना लेकर गया किंतु सफदरजंग युद्ध के मैदान में बुरी तरह घायल हो गया। उसकी गर्दन में बड़ा घाव हो गया था किंतु उसके प्राण बच गए।

इस पर कुदसिया बेगम ने रोहिलखण्ड के अमीरों को सफदरजंग के विरुद्ध उकसाया। जब रोहिलखण्ड के अमीरों ने अवध पर आक्रमण किया तो सफदरजंग ने जाटों एवं मराठों से भाड़े पर सैनिक सहायता प्राप्त की तथा रोहिलखण्ड में कुदसिया बेगम के पक्ष की सेना को परास्त कर दिया। बादशाह अहमदशाह बहादुर ने वजीर सफदरजंग से अपील की कि वह तुरंत युद्ध बंद कर दे। बादशाह के आदेश से सफदरजंग ने युद्ध तो रोक दिया किंतु उसने अपनी सेना के तुर्की सरदार मुहम्मद अली जेरची को आदेश दिया कि वह इस सारे फसाद की जड़ जाविद खाँ को मार डाले। अगस्त 1752 में मुहम्मद अली जेरची ने जाविद खाँ को मार डाला।

इसके बाद सफदरगंज मुगल दरबार में पुनः शक्तिशाली बन गया। इस पर ऊधम बाई ने सफदरजंग का विरोध करने के लिए इन्तजामुद्दौला, इमादुलमुल्क, संसामुद्दौला और अकवित खाँ के सहयोग से एक नया दल बना लिया। इमादुलमुल्क इस गुट का नेता था।

कुदसिया बेगम ने जाविद खाँ के स्थान पर इंतजामुद्दौला को मीर बख्शी नियुक्त करवा दिया किंतु कुछ दिन बाद ही इंतजामुद्दौला की मृत्यु हो गई तो हैदराबाद के मरहूम शासक चिनकुलीच खाँ के पौत्र फीरोजजंग (तृतीय) को मीरबख्शी नियुक्त किया गया। बादशाह ने उसे इमादुलमुल्क तथा अमीर-उल-उमरा की उपाधियाँ प्रदान कीं। इतिहास की तत्कालीन पुस्तकों में उसे इमादुलमुल्क के नाम से भी जाना जाता है। उसका मुख्य कार्य वजीर सफदरजंग के प्रभाव को समाप्त करके उस पर नियंत्रण स्थापित करना था।

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