Tuesday, February 27, 2024
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अध्याय – 22 भारत भूमि का स्वर्ण-युग: गुप्त काल

इतिहास में स्वर्ण युग का तात्पर्य उस युग से होता है जो अन्य युगों से अधिक गौरवपूर्ण तथा ऐश्वर्यवान रहा हो, जिसमें राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक दृष्टि से देश का चूड़ान्त विकास हुआ हो, जिसमें प्रजा को भौतिक तथा नैतिक विकास का पूर्ण अवसर प्राप्त हुआ हो, जिसमें समृद्धि तथा सम्पन्नता का बाहुल्य रहा हो, जिसमें साहित्य तथा कला का विकास हुआ हो।       

गुप्त-काल स्वर्ण युग क्यों

गुप्त काल को भारतीय इतिहास में ‘स्वर्णयुग’ कहा गया है। इस कथन के समर्थन में निम्नलिखित तर्क दिये जाते हैं-

(1) राजनीतिक एकता का युग: इस काल में भारत को जो राजनीतिक एकता प्राप्त हुई, वह इसके पूर्व कभी प्राप्त नहीं हुई थी। डॉ. राधाकुमुद मुकर्जी ने गुप्त-सम्राटों द्वारा स्थापित की गई राजनीतिक एकता पर प्रकाश डालते हुए लिखा है- ‘गुप्त साम्राज्य बड़ा ही सुसंगठित राज्य था जिसे अपनी सार्वभौम सम्प्रभुता की छत्रछाया में भारत के बहुत बड़े भाग पर राजनीतिक एकता स्थापित करने में सफलता प्राप्त हुई और इतने बड़े क्षेत्र पर अपना प्रभाव स्थापित किया जो उससे भी बड़ा था जो प्रत्यक्ष रूप में उसके साम्राज्य तथा शासन के अन्तर्गत था।’ इस काल का प्रतापी तथा दिग्विजयी सम्राट् समुद्रगुप्त था। उसने सम्पूर्ण उत्तरी भारत को जीत कर सुसंगठित तथा सुव्यवस्थित राज्य की स्थापना की थी। उसने अटवी प्रदेश, दक्षिणापथ तथा पश्चिमोत्तर प्रदेश के राज्यों को नत-मस्तक कर उन्हें अपना प्रभुत्व स्वीकार करने के लिए विवश किया। इस प्रकार समुद्रगुप्त ने उस राजनीतिक एकता को फिर स्थापित कर दिया जो अशोक की मृत्यु के उपरान्त समाप्त हो गई थी। चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने अपने पिता के साम्राज्य में वृद्धि की। उसने शकों को ध्वस्त करके ‘शकारि’ की उपाधि धारण की। उसने वाह्लीकों को नत-मस्तक किया। उसने विक्रमादित्य की

उपाधि धारण की। स्कन्दगुप्त ने हूणों के आक्रमणों का सफलता पूर्वक सामना किया और अपने पूर्वजों के विशाल साम्राज्य को सुरक्षित रखा। इस प्रकार राजनीतिक एकता की दृष्टि से गुप्त-काल को स्वर्णयुग कहना उचित है।

(2) शान्ति तथा सुव्यवस्था का युग: गुप्त-काल शान्ति तथा सुव्यवस्था का युग था जिसमें प्रजा को अपनी चरमोन्नति का अवसर प्राप्त हुआ। इसी से डॉ. राधाकुमुद मुकर्जी ने लिखा है- ‘देश की जो भौतिक तथा नैतिक उन्नति हुई वह सुव्यवस्थित राजनीति दशा का ही परिणाम था।’ गुप्त शासन बड़ा ही उदार तथा दयापूर्ण था। प्रजा को अपनी उन्नति के लिये पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त थी। बाह्य तथा आन्तरिक विपत्तियों से प्रजा की रक्षा करने के लिए राज्य की ओर से पूर्ण व्यवस्था की गई थी। न्याय की बड़ी सुन्दर व्यवस्था की गई थी किंतु कठोर दण्ड विधान का प्रावधान नहीं किया गया था। किसी अपराधी को प्राण-दण्ड नहीं दिया जाता था। गुप्त-सम्राटों ने यातायात के साधनों की समुचित व्यवस्था करके व्यापार की उन्नति में बड़ा योग दिया। इस काल में न केवल आन्तरिक वरन् बाह्य-व्यापार की भी बहुत बड़ी उन्नति हुई। कृषि की उन्नति की समुचित व्यवस्था की गई। जलाशयों तथा जल-कुण्डों का निर्माण कर सिंचाई की समुचित व्यवस्था की गई जिससे अनावृष्टि होने पर कृषि की रक्षा हो सकती थी। गुप्त सम्राटों के काल में देश धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया और सोने की चिड़िया कहलाने लगा। गुप्त-सम्राटों ने स्वर्ण-मुद्राओं का प्रचलन कर वास्तव में इसे स्वर्ण युग बना दिया। राज्य की ओर से प्रजा की दैहिक, नैतिक तथा आघ्यात्मिक उन्नति का प्रयत्न किया गया। राज्य की ओर से दीन-दुखियों तथा रोगियों की सहायता का भी समुचित प्रबन्ध किया गया था। गुप्त-काल में स्थानीय संस्थाओं को पर्याप्त स्वतन्त्रता प्राप्त थी और स्वायत्त शासन को प्रोत्साहन दिया जाता था। अल्तेकर ने गुप्त कालीन शासन की प्रशंसा करते हुए लिखा है- ‘इसलिये गुप्त शासन व्यवस्था पर गर्व कर सकते हैं जो अपने काल के तथा बाद के राज्यों के लिए आदर्श व्यवस्था बन गई।’ इसलिये प्रशासनिक दृष्टिकोण से भी गुप्त काल को ‘स्वर्ण युग’ कहना सर्वथा उचित है।

(3) धार्मिक सहिष्णुता का युग: धार्मिक दृष्टिकोण से भी गुप्त काल का बहुत बड़ा महत्त्व है। यह ब्राह्मण-धर्म के पुनरुद्धार तथा विकास का स्वर्णयुग था। इस काल में न केवल भारत के कोने-कोने में ब्राह्मण-धर्म का प्रसार हुआ अपितु इण्डोचीन तथा पूर्वी-द्वीप समूह में भी इसका प्रचार हो गया। ब्राह्मण-धर्म के अनुयायी होते हुए भी गुप्तवंश के सम्राटों में उच्च-कोटि की धार्मिक सहिष्णुता थी। उन्होंने अन्य धर्मों के अनुयायियों को प्रश्रय दिया। स्मिथ ने लिखा है- ‘यद्यपि गुप्त सम्राट ब्राह्मण धर्म के अनुयायी थे परन्तु प्राचीन भारतीय परम्परा के अनुकूल वे समस्त भारतीय धर्मों को समान दृष्टि से देखते थे।’ इसलिये धार्मिक दृष्टिकोण से भी गुप्त काल को ‘स्वर्ण युग’ कहना सर्वथा उचित है।

(4) वैदिक सभ्यता तथा संस्कृति की रक्षा का युग: गुप्त-काल वैदिक सभ्यता तथा संस्कृति की रक्षा का युग माना जाता है। स्मिथ ने लिखा है- ‘इतना ही बता देना पर्याप्त है कि ब्राह्मण धर्म के पुनरुद्धार के साथ-साथ ब्राह्मणों की पवित्र भाषा संस्कृत का भी विस्तार हुआ।’ वैदिक धर्म, जो निष्प्राण-सा हो गया था, उसे गुप्त सम्राटों ने फिर अनुप्राणित किया और उसे स्वीकार कर, उसे राज्य का आश्रय प्रदान कर उसका विकास किया। समुद्रगुप्त, चन्द्रगुप्त (द्वितीय) तथा स्कन्दगुप्त ने अश्वमेध यज्ञों को कराकर वैदिक धर्म की प्रतिष्ठा को फिर से स्थापित किया। ब्राह्मणों को दान देकर एवं उनका सम्मान कर गुप्त सम्राटों ने वर्णाश्रम धर्म की प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित किया। उन्होंने अनेक शैव तथा वैष्णव मन्दिरों का निर्माण करा कर ‘परम भागवत’ होने का परिचय दिया। गुप्त साम्राटों ने वैदिक धर्म के साथ-साथ वैदिक भाषा अर्थात् संस्कृत के विकास में भी बड़ा योग दिया। गुप्त काल में संस्कृत फिर से राष्ट्र की भाषा बन गई। गुप्त सम्राटों ने अपने अभिलेखों तथा मुद्राओं पर संस्कृत भाषा में ही श्लोक लिखवाये। इस कारण संस्कृत ही एक मात्र साहित्यिक भाषा हो गई। बौद्ध तथा जैन धर्मों के लेखक भी संस्कृत भाषा में ही ग्रन्थ रचना करने लगे। इसलिये वैदिक सभ्यता तथा संस्कृति की दृष्टि से निश्चय ही यह काल स्वर्ण युग था।

(5) साहित्य तथा विज्ञान की उन्नति का युग: साहित्य तथा विज्ञान की उन्नति के दृष्टिकोण से भी गुप्त काल ‘स्वर्ण युग’ था। इस काल के साहित्यिक गौरव की प्रशंसा करते हुए स्मिथ ने लिख है- ‘गुप्त युग अनेक क्षेत्रों में अद्वितीय क्रियाशीलता का युग था। यह ऐसा युग था जिसकी तुलना इंगलैण्ड के एलिजाबेथ और स्टुवर्ट के काल से करना अनुचित न होगा। जिस प्रकार इंगलैण्ड में शेक्सपियर अन्य समस्त लेखकों का सिरमौर था, उसी प्रकार भारत में कालिदास सर्वोपरि था। जिस प्रकार यदि शेक्सपियर ने कुछ भी नहीं लिखा होता तो भी एलिजाबेथ का काल साहित्य-सम्पन्न रहा होता, उसी प्रकार यदि भारत में कालिदास का साहित्य जीवित न रहा होता तो भी अन्य लेखकों की रचनाएं इतनी प्रचुर हैं कि वे इस काल की अद्वितीय साहित्यिक सफलता प्रमाणित करने के लिये पर्याप्त हैं।’ गुप्तकाल में देश में साहित्य तथा दर्शन का चूड़ान्त विकास हुआ। इस युग में अनेक महाकवि, नाटककार तथा दार्शनिक हुए जिनमें कालिदास, हरिषेण, वसुबन्धु, विशाखदत्त, वराहमिहिर आदि अग्रगण्य हैं। साहित्य की चरमोन्नति के कारण ही इसकी तुलना एलिजाबेथ तथा पेरिक्लीज के युग से की गई है। गुप्तकाल में भौतिक, आध्यात्मिक तथा दार्शनिक समस्त प्रकार की साहित्य की उन्नति हुई। विज्ञान की भी इस काल में बड़ी उन्नति हुई। गणित, ज्योतिष, वैदिक, रसायन विज्ञान, पदार्थ विज्ञान तथा धातु विज्ञान के क्षेत्र में बहुत प्रगति हुई। आर्यभट्ट इस काल का बहुत बड़ा गणितज्ञ तथा ज्योतिषी था। वराहमिहिर भी इस काल का बहुत बड़ा ज्योतिषी था। चरक तथा सुश्रुत इस काल के विख्यात वैद्य थे।

(6) कला की चरमोन्नति का युग: गुप्तकाल भारतीय कलाओं का स्वर्ण युग था। इस काल में वास्तु कला, शिल्प कला, मूर्ति निर्माण कला, वाद्य कला, संगीत कला तथा अन्य समस्त कलाओं की उन्नति हुई। अजन्ता की गुफाओं की चित्रकारी, बौद्ध तथा हिन्दू मूर्तियाँ, शैव तथा वैष्णव मन्दिर, विहार, चैत्य तथा स्तूप इस कला की उच्चता के ज्वलंत प्रमाण हैं। इस काल की कला बड़ी ही स्वाभाविक, सरल तथा विदेशी प्रभाव से मुक्त है। सॉण्डर्स ने लिखा है- ‘सारनाथ की बौद्ध प्रतिमाएं इस जागरण का उतना ही प्रतिनिधित्व करती हैं जितना कालिदास की कविताएं। गुप्त काल में एक नवीन बौद्धिकता व्याप्त थी जो वास्तु तथा स्थापत्य कलाओं में उतनी ही प्रतिबिम्बित होती है जितनी साहित्य और विज्ञान में। एक प्रकार का तार्किक सौन्दर्य जो अनेक रूपों में अपनी पूर्ण पराकाष्ठा पर पहुंचे हुए यूनान की याद दिलाता है और जीवन के प्रति उत्साह तथा साहसिकता की भावना में यह हमें एलिजाबेथ के काल की याद दिलाता है।’ इसलिये कला के दृष्टिकोण से भी गुप्त काल को स्वर्ण-युग मानने में कोई आपत्ति नहीं हो सकती।

(7) विदेशों पर भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति का प्रभाव: गुप्त काल में भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति का खूब प्रचार हुआ और विदेशों में भारतीय उपनिवेशों की स्थापना हुई। जावा की एक अनुश्रुति के अनुसार इस काल में गुजरात के एक राजकुमार ने कई हजार मनुष्यों के साथ समुद्र पार कर जावा में उपनिवेश की स्थापना की। गुप्तकाल में पूर्वी द्वीप समूहों के साथ भारत का घनिष्ठ व्यापारिक तथा सांस्कृतिक सम्बन्ध स्थापित हो गया। गुप्तकाल में सुमात्रा, जावा, बोर्निया, चम्पा कम्बोडिया आदि द्वीपों में भारतीय भाषा, साहित्य तथा शिक्षा का खूब प्रचार हुआ। इन द्वीपों में भारतीय सामाजिक प्रथाओं, धर्म, कला तथा शासन पद्धति का अनुसरण होने लगा। डॉ. अल्तेकर ने लिखा है- ‘यदि एक ओर भारत और दूसरी ओर चीन के बीच कोई सांस्कृतिक एकता विद्यमान है, यदि मूल्यवान स्मारक, जो भारत की संस्कृति के गौरव के मूक साक्षी हैं, समस्त इंडोचीन, जावा, सुमात्रा तथा बोर्निया में विकीर्ण परिलक्षित होते हैं तो इसका श्रेय गुप्तकाल को ही प्राप्त है, जिसने भारतीय संस्कृति को बाहर विस्तारित करने की प्रेरणा प्रदान की।’ इसलिये विदेशों में भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति के प्रचार के दृष्टिकोण से गुप्त-काल निःसंदेह ‘स्वर्ण युग है।’

निष्कर्ष

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि गुप्त काल में भारत की जो राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक उन्नति हुई वह न तो उसके पूर्व कभी हो सकी थी और न उसके बाद कभी हो सकी। हर्ष के भगीरथ प्रयास करने पर भी भारत पतनोन्मुख होने से न बच सका। इसलिये गुप्तकाल को स्वर्ण युग कहना सर्वथा उचित है। डॉ. रमाशंकर त्रिपाठी ने लिखा है- ‘साम्राज्यवादी गुप्त सम्राटों का काल हिन्दू इतिहास में प्रायः स्वर्ण युग बताया जाता है। इस काल में कई योग्य, विलक्षण प्रतिभाशाली तथा शक्तिशाली राजाओं ने शासन किया, जिन्होंने उत्तरी भारत के बहुत बड़े भाग का संगठन करके उसे एक राजनीतिक छत्र के नीचे ला दिया और एक व्यवस्थित तथा उन्नतिशील युग का प्रादुर्भाव किया। उनके शक्तिशाली शासन के अन्दर बाह्य तथा आन्तरिक दोनों ही प्रकार के व्यापार की उन्नति हुई और देश की सम्पन्नता बढ़ गई। इसलिये यह स्वाभाविक था कि आन्तरिक सुरक्षा तथा भौतिक सम्पन्नता की अभिव्यक्ति धर्म, साहित्य, कला तथा विज्ञान के विकास में उन्नति हुई हो।’

इस प्रकार गुप्त काल भारत की सर्वतोमुखी उन्नति का काल था। इसी कारण इतिहासकारों ने इसे स्वर्ण काल कहा है। स्मिथ ने गुप्त काल के ऐश्वर्य तथा वैभव की प्रशंसा करते हुए लिखा है- ‘हिन्दू भारत के इतिहास में महान् गुप्त सम्राटों का युग जितना सुन्दर और सन्तोषजनक है उतना अन्य कोई युग नहीं। साहित्य, कला तथा विज्ञान की असाधारण मात्रा में उन्नति हुई और बिना अत्याचार के धर्म में क्रमागत परिवर्तन किये गये।’

गुप्त कालीन शासन व्यवस्था

शासन व्यवस्था के मूल तत्व

शासन का आदर्श: गुप्त-सम्राटों के शासन का आदर्श बहुत ऊँचा था। वे स्वयं को प्रजा का ऋणी समझते थे और प्रजा की सेवा करके ही इस ऋण से मुक्त होना चाहते थे। इसलिये गुप्त-साम्राज्य ने लोक-हित के अनेक कार्य किये। गमनागमन की सुविधा के लिए सड़कें बनवाईं। उनके किनारे पर छायादार वृक्ष लगवाये। स्थान-स्थान पर कुएँ खुदवाये। धर्मशालाएँ बनवाईं। सिंचाई की सुविधा के लिए झीलें तथा तालाब खुदवाये। रोगियों की चिकित्सा के लिए औषधालय खुलवाये जिनमें रोगियों को निःशुल्क औषधि दी जाती थी। राज्य की ओर से शिक्षा की भी समुचित व्यवस्था की गई। साहित्य तथा कला को प्रोत्साहन दिया गया। राज्य के इन उदार तथा लोकोपकारी कार्यों का परिणाम यह हुआ कि प्रजा सुख तथा शान्ति का जीवन व्यतीत करती थी।

सामंती व्यवस्था: गुप्त-साम्राज्य अत्यन्त विशाल साम्राज्य था। इसलिये उस युग में जब गमनागमन के साधनों का सर्वथा अभाव था, एक केन्द्र से सम्पूर्ण शासन को चलाना सम्भव न था। फलतः गुप्त सम्राटों ने सामन्ती शासन व्यवस्था का अनुसरण किया और साम्राज्य के सुदूरस्थ प्रान्तों का शासन अपने सामन्तों को सौंप दिया, जिन पर वे कड़ा नियन्त्रण रखते थे। शासन की सुविधा के लिए सम्पूर्ण साम्राज्य को कई छोटी-छोटी इकाइयों में विभक्त किया गया था और प्रत्येक इकाई के लिए अलग-अलग पदाधिकारी नियुक्त किये गये थे परन्तु इन सब पर केन्द्रीय सरकार का कड़ा नियन्त्रण रहता था जिससे साम्राज्य सुसंगठित बना रहे।

संघीय शासन व्यवस्था: गुप्त साम्राज्य मौर्यों के साम्राज्य की भांति सम्राटों के सीधे एवं कठोर अनुशासन में नहीं था। साम्राज्य में अनेक महाराजा, राजा और गणराज्य सम्मिलित थे जो सम्राट की अधीनता मानते थे किंतु आंतरिक शासन में स्वतंत्र थे। विशाल गुप्त साम्राज्य के अंतर्गत यद्यपि उत्तरी भारत के अधिकांश भागों पर गुप्त नरेशों का प्रत्यक्ष शासन स्थापित था। अन्य क्षेत्रों में उनके शासन का स्वरूप संघीय था। जहां उनके अधीनस्थ राजा अर्द्ध स्वतंत्र शासकों की तरह राज्य करते थे। ऐसे क्षेत्रों में गुप्तों का शासन प्रबंध पूरी तरह प्रभावी नहीं था।

केन्द्रीय प्रशासन

            सम्राट: गुप्त कालीन शासन व्यवस्था राजतन्त्रात्मक थी। राजा ही शासन का प्रधान होता था और विभिन्न विभागों पर पूरा नियन्त्रण रखता था। वह शासन के तीनों अंगों- सेना, शासन तथा न्याय का प्रधान होता था। सम्राट अपने मंत्रियों तथा पदाधिकारियों के परामर्श तथा सहायता से शासन चलाता था। राज्य की राजधानी में केन्द्रीय राजकीय कार्यालय होता था। केन्द्रीय शासन कई उपविभागों में विभक्त था जिनमें- सैन्य विभाग, विदेश विभाग, पुलिस विभाग, माल विभाग, न्याय विभाग, धर्म विभाग आदि प्रमुख रहे होंगे। प्रशासनिक कार्यों के लिये अधिकारियों एवं कर्मचारियों का एक बड़ा वर्ग होता था।

मंत्रिपरिषद्: सम्राट शासन के समस्त महत्वपूर्ण कार्यों में मंत्रिपरिषद् से परामर्श लेता था। केन्द्रीय विभागों के कार्य प्रधानमंत्री, अमात्य, कुमारामात्य, युवराज-कुमारामात्य आदि पदाधिकारी करते थे। मंत्रिपरिषद के विभिन्न विभागों के निश्चित स्वरूप की जानकारी नहीं मिलती किंतु गुप्त अभिलेखों से दो प्रमुख मंत्रियों- संधिविग्रहिक (युद्ध एवं संधि सम्बन्धी मंत्री) तथा अक्षपटलाधिकृत (शासकीय पत्रों से सम्बन्धित मंत्री) के बारे में जानकारी मिलती है।

शासन के वरिष्ठ अधिकारी: गुप्त कालीन अभिलेखांे से कुछ अन्य केन्द्रीय पदाधिकारियों के नाम मिलते हैं- विनयस्थितिस्थापक (न्यायाधीश), दण्डपाशिक (पुलिस विभाग का सर्वोच्च अधिकारी), कुमारामात्य (शासन का वरिष्ठ अधिकारी), महासेनापति (सेना का सर्वोच्च अधिकारी), भाण्डारिक (सैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाला) आदि।

सैनिक शासन: गुप्त-काल साम्राज्यवाद का युग था। गुप्त सम्राटों ने अत्यन्त विशाल साम्राज्य की स्थापना की। इस साम्राज्य की स्थापना विशाल, प्रशिक्षित तथा सुसज्जित सेना की सहायता से की गई थी। इस सेना के चार प्रधान अंग थे- हाथी, घोड़े, रथ तथा पैदल। सम्राट स्वयं सैनिकों को भर्ती करता था। वह अपनी सेना का प्रधान सेनापति होता था और रणस्थल में सेना की प्रथम पंक्ति में विद्यमान रहता था। सैनिक विभाग का मुख्य अधिकारी संधि-विग्रहिक था जिसे संधि और युद्ध करने का अधिकार प्राप्त होता था। उसके अधीन महासेनापति अथवा महादण्डनायक (प्रमुख सेनापति), रण भाण्डारिक (सैन्य सामग्री की आपूर्ति करने वाला अधिकारी), बलाधिकृत (सैनिकों की नियुक्ति करने वाला अधिकारी), भटाश्वपति (पैदल सेना और घुड़सवारों का अध्यक्ष) आदि अधिकारी होते थे। सेना का कार्यालय बलाधिकरण कहलाता था।

प्रांतीय शासन

शासन की सुविधा के लिये साम्राज्य को अनेक इकाइयों में विभक्त किया गया था। सबसे बड़ी इकाई प्रांत थी जिसे देश या भुक्ति कहते थे। सौराष्ट्र, अवन्ति (पश्चिमी मालवा), ऐरण (पूर्वी मालवा), तीरभुक्ति (उत्तरी बिहार), पुण्ड्रवर्द्धन (उत्तरी बंगाल) आदि गुप्त साम्राज्य के प्रमुख प्रांत थे। प्रान्तीय शासक भोगिक, भोगपति, गोप्ता, उपरिक, महाराज या राजस्थानीय कहलाते थे। प्रांत से छोटी इकाई को प्रदेश कहा जाता था। उससे छोटी इकाई विषय कहलाती थी। विषयों के अधिकारी विषयपति कहलाते थे। शासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम थी।

स्थानीय शासन

नगर प्रशासन: गुप्तों के साम्राज्य में दशपुर, गिरिनार, उज्जयिनी, पाटलिपुत्र आदि प्रसिद्ध नगर थे। नगरों को पुर भी कहा जाता था। नगर या पुर के शासक को नगरपति या पुरपाल कहते थे। गुप्तों के नगर प्रशासन के सम्बन्ध में दामोदरपुर (बंगाल) के ताम्रपत्र से जानकारी मिलती है। नगर प्रशासन में स्थानीय श्रेणियों, नियमों, आदि का महत्वपूर्ण योगदान होता था। मंदसौर अभिलेख में कपड़ा बनाने वालों की पट्टवाय श्रेणी द्वारा एक सूर्यमंदिर बनवाने का उल्लेख मिला है। वैशाली मोहरों से श्रेष्ठि, सार्थवाह, निगमों के अस्तित्व का ज्ञान होता है।

ग्राम प्रशासन: ग्राम प्रशासन के मुखिया को ग्रामिक कहते थे। ग्राम सभा के सदस्य महत्तर कहलाते थे। जंगलों की देखभाल करने वाला गौल्मिक कहलाता था। ग्राम परिषद या ग्राम सभा पर ग्राम प्रशासन का दायित्व होता था।

            न्याय व्यवस्था: राजा, सर्वोच्च न्यायाधीश होता था। राजा के न्यायालय को सभा, धर्मस्थान अथवा धर्माधिकरण कहा जाता था। गुप्त काल में लिखी गई नारद स्मृति में चार प्रकार के न्यायालयों का उल्लेख है- (1.) कुल, (2.) श्रेणी, (3.) गण और (4.) राजकीय न्यायालय। न्याय विभाग के अधिकारी को विनस्थितिस्थापक कहा गया है।

दण्ड विधान: अपराधों का पता लगाने के लिये गुप्तचर और अपराधियों को दण्ड देने के लिए दंडाधिकारी होते थे। दंड-विधान कठोर नहीं था। अपराध की गुरुता के आधार पर न्यूनाधिक अर्थदण्ड ही दिया जाता था। शारीरिक यातनायें प्रायः नहीं दी जाती थीं और प्राणदण्ड देने का निषेध था।

आय-व्यय के साधन

आय: राज्य की आय का मुख्य साधन भूमिकर था, जिसे भाग, भोग या उद्रेग कहते थे। यह उपज का 1/6 भाग होता था। इसके अतिरिक्त एक दूसरा कर उपरिकर था जो राजा के व्यक्तिगत उपयोग के लिये सामान के रूप में लिया जाता था। आय के अन्य स्रोत सिंचाई कर, अर्थदण्ड, सामन्ती राजाओं से कर, उपहार इत्यिादि थे।

व्यय: राजकीय कर्मचारियों को राज्यकोष से वेतन दिया जाता था। राज्य के कोष का बहुत बड़ा भाग इस वेतन में चला जाता था। राज्य द्वारा किये गगये लोकोपकारक कार्यों, सेना व पुलिस विभाग पर भी राज्य का काफी धन खर्च होता था।

निष्कर्ष

गुप्त कालीन शासन व्यवस्था पर प्रकाश डालते हुए नीलकान्त शास्त्री ने लिखा है- ‘गुप्तकालीन शासन तथा उसकी सफलता के सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी प्राप्त है और यह निष्कर्ष निकलता है कि गुप्तों का शासन बड़ा ही सुव्यवस्थित था।’

Dr. Mohanlal Gupta
Dr. Mohanlal Gupta
Dr. Mohan Lal Gupta is a renowned historian from India. He has written more than 100 books on various subjects.

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