Monday, May 20, 2024
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स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हिन्दी एवं उर्दू

डिसमिस दावा तोर है सुन उर्दू बदमास (17)

भारत विभाजन

ई.1947 में भारत को ब्रिटिश शासन के नियंत्रण मुक्ति मिली और भारत एवं पाकिस्तान नामक दो स्वतंत्र देश अस्तित्व में आए। स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास लिखने वालों में से बहुत से इतिहासकारों का मानना है कि भारत के विभाजन में हिन्दी-उर्दू विवाद ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

भारत में हिन्दी

स्वतंत्र भारत के हिन्दू हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा घोषित करना चाहते थे किंतु भारत में भाषा का प्रश्न फिर से उलझ गया और जब ई.1950 में भारत का संविधान लागू किया गया तो हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा घोषित न करके राजभाषा घोषित किया गया। भारत के संविधान की आठवीं अनुसूचि में हिन्दी के साथ-साथ 21 अन्य भाषाओं को भी राजभाषा घोषित किया गया।

किसी भी राज्य की विधान सभा अपने प्रांत में इन 22 भाषाओं में किसी भी एक या अधिक भाषाओं को राजकीय कार्यालयों में कामकाज की भाषा अपना सकती है। भारत के लगभग 90 प्रतिशत लोग इन्हीं 22 भाषाओं में से किसी एक को या उससे अधिक भाषाओं को जानते हैं। भारत में 121 भाषाएं ऐसी हैं जिन्हें 10 हजार अथवा उनसे अधिक लोगों का समुदाय बोलता है।

वर्ष 2011 की जनगणना में भारत के 57 प्रतिशत लोगों ने अपनी मातृभाषा हिन्दी लिखवाई। जबकि यदि पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में रहने वाले जनजातीय कबीलों को छोड़ दिया जाए तो आज भारत में कदाचित ही कोई व्यक्ति होगा जिसे हिन्दी बोलनी नहीं आती होगी या उसे हिन्दी में कही गई बात समझने में कठिनाई होती होगी।

मानक हिन्दी को बोलने एवं लिखने का ढंग एक ही है किंतु भारत के प्रत्येक प्रांत में हिन्दी को उच्चारित करने के ढंग अलग-अलग हैं। इसका प्रमुख कारण वहाँ बोली जाने वाली क्षेत्रीय भाषाओं का हिन्दी के उच्चारण पर होने वाला प्रभाव है।

दक्षिण भारत के प्रांतों में राजनीतिक व्यक्तियों द्वारा हिन्दी का विरोध किया जाता है, उसका मुख्य कारण सांस्कृतिक नहीं है, राजनीतिक है। जब भी दक्षिण भारत का कोई व्यक्ति उत्तर भारत के प्रांतों में या केन्द्र सरकार के संस्थानों में काम करने आता है, तब वह बड़ी सरलता से हिन्दी का प्रयोग करता है।

इस प्रकार हिन्दी आज सम्पूर्ण भारत की सम्पर्क भाषा है जबकि दूसरी ओर उर्दू भाषा भारत से शनैःशनैः समाप्त होती जा रही है। इतना अवश्य है कि हिन्दी भाषा में आज भी कुछ अरबी-फारसी शब्द अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं जिन्हें उर्दू की आखिरी निशानियां माना जा सकता है। कुछ साम्यवादी लेखक और कुछ उर्दू भाषा के लेखक अपनी राजनतिक रोटियां सेकने के लिए आज भी उर्दू की उतनी ही जोश से पैरवी करते हैं, जितनी कि उन्नीसवीं सदी के अंत तथा बीसवीं सदी के मध्य में की जाती थी।

पाकिस्तान में उर्दू

पाकिस्तान ने अपने अस्तित्व में आते ही अर्थात् ई.1947 में उर्दू को अपनी राष्ट्रभाषा घोषित किया किंतु सम्पूर्ण पाकिस्तान में उर्दू अपनी स्वीकार्यता नहीं बना सकी। पाकिस्तान में सिंधी, पंजाबी, बलूच आदि भाषाओं को बोलने वाले लोगों की संख्या उर्दू बोलने वालों से अधिक थी फिर भी पश्चिमी पाकिस्तान के लोग चाहते थे कि पाकिस्तान में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को केवल उर्दू में ही बोलने-लिखने की अनुमति हो। जबकि पूर्वी पाकिस्तान के लोग चाहते थे कि हम पर उर्दू न थोपी जाए क्योंकि पूर्वी पाकिस्तान में अधिक संख्या बांग्ला बोलने वालों की थी।

कुछ ही वर्षों में पाकिस्तान में उर्दू-बांग्ला का विवाद इतना अधिक बढ़ गया कि पूर्वी पाकिस्तान के लोगों ने बांग्ला भाषा के समर्थन में तथा उर्दू भाषा के विरोध में संघर्ष छेड़ दिया। इस संघर्ष में पाकिस्तान की फौज ने लगभग 30 लाख बांग्लाभाषी लोगों की हत्या की।

यह तो नहीं कहा जा सकता कि पूर्वी पाकिस्तान एवं पश्चिमी पाकिस्तान के लोगों के बीच केवल उर्दू एवं बांग्ला भाषा को लेकर संघर्ष हुआ, अन्य राजनीतिक कारण भी थे किंतु सबसे बड़ा मुद्दा भाषा का ही था। पाकिस्तान की पंजाबी लॉबी नहीं चाहती थी कि कोई गैर पंजाबी या कोई गैर उर्दूभाषी मुसलमान पाकिस्तान का राष्ट्रपति बने। इसी संघर्ष के चलते ई.1971 में पाकिस्तान का विभाजन हुआ और पाकिस्तान तथा बांग्लादेश नामक दो देश अस्तित्व में आए।

बांग्लादेश में भाषाई संघर्ष

ई.1971 में बांग्लादेश ने अस्तित्व में आते ही बांग्ला को अपनी राष्ट्रभाषा घोषित किया। अब बांग्लादेश के लोग समझते थे कि केवल उन्हीं लोगों को बांग्लादेश में रहने का अधिकार है जो बांग्ला भाषा बोलना जानते हैं।

जबकि इस काल में बांग्लादेश में करोड़ों लोग ऐसे थे जो बांग्ला भाषा बोलना नहीं जानते थे। इनमें अधिकतर वे मुसलमान थे जो भारत विभाजन के कारण भारत से भागकर पूर्वी पाकिस्तान पहुंचे थे तथा उर्दूभाषी थे। जब बांग्लाभाषी मुसलमानों ने गैर-बांग्ला भाषी मुसलमानों को मारना आरम्भ किया तो उनकी स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई। इतिहास ने उन्हें उस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया था जहाँ उन्हें पैर रखने के लिए धरती कम पड़ गई थी।

जब पूर्वी-पाकिस्तान में हिन्दुओं को सताया जाता था अथवा मारा जाता था तो हिन्दू परिवार बांग्लादेश से भारत की ओर भागने का प्रयास करते थे किंतु जब पूर्वी पाकिस्तानके उर्दू बोलने वाले बिहारी मुसमलमानों को बंग्ला-भाषी मुसलमानों द्वारा सताया जाता था या मारा जाता था, तो उन्हें ऐसे देश की तरफ भागना पड़ता था जहाँ से वे अथवा उनके धर्म के लोग कुछ समय पूर्व ही धर्म के आधार पर भागकर आए थे।

इस प्रकार पूर्वी-पाकिस्तान में भयानक मारकाट मच गई। बंग्ला-भाषी मुसलमान एक ओर तो बंग्ला-भाषी हिन्दुओं को मारकर भगा रहे थे तो दूसरी ओर उर्दू-भाषी बिहारी मुसलमानों को। एक बार फिर से पूर्वी-पाकिस्तान खून से भीग गया और पश्चिमी बंगाल जान बचाकर भाग आने वाले शरणार्थियों से भर गया।

विश्व भर में हिन्दी भाषा

आज विश्व भर में हिन्दी बोलने वालों की संख्या दूसरे नम्बर पर है। संसार में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा चीनी है तथा उसके बाद हिन्दी भाषियों की संख्या है। संसार भहर में 80 करोड़ लोगों से अधिक जनसंख्या हिन्दी बोलती है। इसे संसार के 28 देशों में प्रमुखता के साथ बोला जाता है तथा साथ ही आज संसार में शायद ही कोई ऐसा देश होगा जहाँ हिन्दी भाषी लोग न रहते हों।

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