Wednesday, June 29, 2022

साढ़े पांच रुपए में बिका करोड़ों का रेडियो!

एक बादशाह अपनी रियासत से रुखसत हो गया और किसी को कानोंकान खबर न हुई!

जब मैंने इस धरती पर आखें खोलीं और घर की चीजों को पहचानना आरम्भ किया तो मैंने पाया कि हमारे घर में कुछ वस्तुएं बहुत ही आकर्षक थीं और इतनी विशिष्ट थीं कि आसपास के घरों में दिखाई भी नहीं देती थीं। इन्हीं वस्तुओं में फिलिप्स का एक बड़ा सा रेडियो भी शामिल था। यह रेडियो मेरे पिताजी ने मेरे जन्म से दो साल पहले अर्थात् वर्ष 1960 में 550 रुपए में खरीदा था। उस समय पिताजी का वेतन लगभग 110 रुपए मासिक था और सोने का भाव लगभग 110 रुपए प्रति दस ग्राम था। उन दिनों घर में रेडियो सुनने के लिए भारत सरकार से लाइसेंस प्राप्त करना होता था जिसकी फीस हर साल चुकानी होती थी।

मेरा जन्म 1962 की गर्मियों में हुआ। उस समय भारत अपनी आजादी की पंद्रहवीं सालगिरह मनाने की तैयारी कर रहा था। भारतीय जनता के लिए यह काल अपनी आजादी को उत्सुकता भरी दृष्टि से देखने का और राजनेताओं के लिए यह काल देश की जनता को समृद्धि भरे भविष्य के सपने दिखाने का था। प्रजा और शासकों के आशावाद से उलट, कड़वी सच्चाई यह थी कि उन दिनों भारत में बहुत से लोगों को दो जून की रोटी नहीं मिलती थी और लाखों लोग सड़कों पर भूखे सोते थे। भारत सरकार जनता का पेट भरने के लिए अमरीका से पीएल 480 समझौते के तहत सस्ता गेहूं खरीदती थी।

भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने चीनी नेता चाऊ एन लाई के साथ मिलकर पंचशील का जो गुब्बारा फुलाया था, वह मेरे जन्म के समय, अर्थात् 1962 की गर्मियों में तेजी से पिचक रहा था और भारत के लोग जवाहरलाल नेहरू की वैदेशिक नीतियों की जमकर आलोचना करते थे। हालांकि हमारा रेडियो उन दिनों भी जवाहरलाल नेहरू के करिश्माई व्यक्तित्व के समाचार सुनाया करता था।

1962 की सर्दियों में भारत पर अचानक हुए चीनी आक्रमण ने नेहरूजी के आभामण्डल को पूरी तरह फीका कर दिया। नेहरूजी ने जिस खराब तरीके से उस युद्ध को लड़ा, उससे हर देशवासी स्तब्ध रह गया। भारतीय सेना द्वारा नेहरूजी से अनुरोध किया गया कि वे हवाई मोर्चा खोलें किंतु नेहरूजी ने हवाई मोर्चा नहीं खोला। बाद में नेहरूजी ने कहा भी- ‘इन अफीमचियों को उठाकर बाहर फैंक दो!’ किंतु तब तक बहुत विलम्ब हो चुका था।

यद्यपि भारतीय सेना के अतुल शौर्य के कारण उस युद्ध में चीन को काफी नुक्सान उठाना पड़ा किंतु भारत की सेनाओं को भी भारी क्षति पहुंची और अक्साईचिन का महत्वपूर्ण क्षेत्र चीन ने दबा लिया। देश का माथा शर्म से झुक गया। इस दौर में भारत के अधिकांश व्यक्ति जवाहरलाल नेहरू की नीतियों के सम्बन्ध में अपने विचारों को एक-दूसरे तक पहुंचाना चाहते थे और अपने विचारों पर एक-दूसरे की राय चाहते थे। इस कारण देश में वैचारिक मंथन की बाढ़ सी आई हुई थी। देश का लगभग हर पढ़ा-लिखा व्यक्ति इस वैचारिक मंथन में खुलकर भाग लेता था।

इस वैचारिक द्वंद्व को खाद-पानी उन थोड़ी-बहुत सूचनाओं एवं समाचारों से मिलता था जो अखबार, रेडियो और पुस्तकों के माध्यम से जनता तक पहुंचते थे। यह अलग बात थी कि उन दिनों अखबार बहुत कम छपते थे, रेडियो बहुत कम घरों में थे और टेलिविजन की तो कल्पना भी नहीं थी। लोगों की आमदनी कम थी और देश की जनता दो जून की रोटी के लिए संघर्ष कर रही थी। फिर भी रेडियो द्वारा किए जा रहे जवाहरलाल नेहरू के गुणगान बिना किसी हिचक के जारी थे।

रेडियो सरकारी नियंत्रण में था इसलिए प्रबुद्ध लोगों को सरकारी सूचनाएं देता था किंतु लोग सरकारी सूचनाओं के साथ-साथ वैचारिक-विश्लेषण एवं राजनीतिक टिप्पणियां भी चाहते थे। इसलिए कुछ लोग अखबार भी खरीदते थे। उस कठिन दौर में भी मेरे पिताजी अखबार खरीद कर पढ़ा करते थे। हमारे घर की अलमारियों में बहुत सी पुस्तकें रखी रहती थीं जिनमें आचार्य चतुरसेन और गुरुदत्त के विचारोत्तेजक उपन्यास प्रमुख थे।

भले ही रेडियो प्रबुद्ध वर्ग की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता था, फिर भी वह प्रबुद्ध वर्ग के लोगों की दिनचर्या का अनिवार्य अंग बना हुआ था। यही कारण था कि हमारे घर का रेडियो भी घर के सदस्यों के बीच अपनी प्रतिष्ठा बनाए हुए था। समाचारों के नियमित प्रसारण के समय उसकी आवाज सबसे ऊंची होती थी। समाचार प्रसारण के समय घर का कोई सदस्य कुछ भी बोलने का साहस करता था तो पिताजी की झिड़की खाकर तुरंत ही चुप हो जाता था।

1962 के चीनी आक्रमण के बाद डेढ़ साल से भी कम समय में अर्थात् 1964 की गर्मियों में नेहरूजी का निधन हो गया और लालबहादुर शास्त्री देश के प्रधानमंत्री हुए। 1965 की सर्दियों में अचानक ही पाकिस्तान ने भारत पर हमला बोल दिया। पिटे हुए को कौन नहीं पीटना चाहता, कुछ इसी अंदाज में पाकिस्तान भारत की ठुकाई करना चाहता था!

भारत अब भी पीएल 480 में खरीदा गया खराब गेहूँ खा रहा था और अब भी भारत के पास उस खराब एवं सस्ते गेहूं को खरीदने जितने पैसे नहीं थे। इसलिए शास्त्रीजी ने जनता से अपील की कि जो लोग अण्डे खा सकते हैं, अण्डे खाएं और जो लोग सप्ताह में एक दिन उपवास कर सकते हैं, उपवास करें। देश की हालत इतनी खराब होने पर भी शास्त्रीजी ने भारत की सेनाओं से गरजकर कहा- ‘जवानो! बढ़े चलो।’ शास्त्रीजी, 1965 में नेहरूजी द्वारा की गई गलती को नहीं दोहरना चाहते थे। उन्होंने तुरंत हवाई मोर्चा खोल दिया और पाकिस्तान को जमकर ठोक-पीट दिया।

जब हमारा रेडियो प्रातः, मध्याह्न और संध्याकाल में भारतीय सेनाओं की जीत के समाचार सुनाता तो घर का प्रत्येक सदस्य खुश होता। इन दिनों रेडियो की प्रतिष्ठा में और अधिक वृद्धि हो गई थी।

शास्त्रीजी नहीं जानते थे कि यह युद्ध कितना लम्बा चलेगा। उन्होंने नेशरल वार फण्ड की स्थापना की तथा भारत की जनता, पूर्व रियासतों के शासकों एवं बड़े सेठों से अपील की कि भारतीय सेना के लिए धन दें।

रेडियो समाचार सुनाने के साथ-साथ देशभक्ति के गीत बजाता था और जनता से अपील करता था कि भारतीय सेनाओं का हाथ मजबूत करें। शास्त्रीजी की अपील का परिणाम था कि सन् बांसठ में चीन के हाथों चोट खाया हुआ भारत सन् पैंसठ में अपने घावों पर मरहम लगाने के लिए एकजुट हो गया।

माँ बताती थीं कि लोगों ने भारतीय सेनाओं के लिए खुले हाथों से सोना, चांदी, रुपए, कपड़े और बर्तन एकत्रित किए थे। हजारों औरतें घरों में बिस्किट, मठरियां और मिठाइयां बनाकर सेना को भिजवाती थी। मेरी माँ ने भी सैनिकों के लिए स्वेटर और ऊनी मोजे बुनकर भिजवाए थे। कुछ औरतों ने तो अपने शरीर के सारे गहने सरकारी कारिंदों को यह कहकर दे दिए थे कि शास्त्रीजी सेनाओं के लिए हथियार खरीदें, देश का सिर झुकने न पाए। पंजाब और उत्तर प्रदेश सहित कुछ प्रदेशों की औरतें इस काम में सबसे आगे थीं। जनता द्वारा दिया गया बहुत सा सामान उन लोगों के लिए भी था जिन्हें रातों-रात सीमावर्ती गांवों से हटाकर सुरक्षित शिविरों में स्थानांतरित किया गया था।

शास्त्रीजी ने पूर्व रियासतों के राजाओं से भी अपील की थी कि वे देश की सेनाओं का हाथ मजबूत करें किंतु पूर्व भारतीय रियासतों के राजाओं ने इस अपील के प्रति अधिक उत्साह नहीं दिखाया। कहा जाता है कि इस पर लाल बहादुर शास्त्री हैदराबाद गए तथा उन्होंने हैदराबाद के निजाम से भारतीय सेनाओं के लिए सहयोग मांगा। यह वही निजाम था जो 1947 में किसी भी कीमत पर भारत में नहीं मिलना चाहता था और जिसे बाद में सरदार पटेल ने पुलिस कार्यवाही करके भारत में सम्मिलित किया था। जब शास्त्रीजी हैदराबाद पहुंचे तो निजाम ने इसे अपने लिए स्वर्णिम अवसर समझा और 1947 में की गई अपनी छवि को सुधारते हुए उसने नेशनल वार फण्ड में 5000 किलो सोना प्रदान किया।

पूरे युद्ध के दौरान शास्त्रीजी हर मोर्चे पर सक्रिय रहे। उन्हीं दिनों शास्त्रीजी द्वारा दिए गए नारे ‘जय जवान जय किसान’ ने देश के प्रत्येक व्यक्ति के हृदय को स्पर्श किया था।

दुर्भाग्य से रूस के दबाव में इस युद्ध को बीच में ही रोक दिया गया और कुछ ही दिनों बाद ताशकंद में शास्त्रीजी का रहस्यमय परिस्थितियों में निधन हो गया। भारत अपनी विजय का उत्सव न मना सका। रेडियो ने ही शास्त्रीजी की मृत्यु का दुःखद इतिहास पूरी दुनिया को दिया था। इन्हीं परिस्थितियों में नेहरूजी की पुत्री इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री बनीं।

देश में एक बार फिर वैचारिक द्वंद्व उठ खड़ा हुआ। हर कोई यह जानना और बताना चाहता था कि इस संसार में कौन सा देश भारत का दोस्त है और कौन सा दुश्मन! शास्त्रीजी को किसने और क्यों मारा है तथा इंदिरा गांधी को किसने और क्यों प्रधानमंत्री बनवाया है! इस विचित्र से परिदृश्य में रेडियो सरकारी सूचनाएं परोसकर किसी तरह अपना दायित्व निभा रहा था।

ये सब बातें मैंने अपने माता-पिता के मुँह से सुनी थीं, इनमें से ऐसा कुछ नहीं है जो मेरी स्वयं की स्मृति का हिस्सा हो!

आठ-नौ साल की उम्र के आसपास अर्थात् जिस समय मैंने कुछ सोचना-समझना आरम्भ किया, या यूं कहें कि जीवन के जिस हिस्से के कुछ प्राचीनतम दृश्य मुझे आज भी याद हैं, उन दिनों लोग सरकारी राशन की दुकान से लाल गेहूं, सूती कपड़ा, मिट्टी का तेल और चीनी खरीदने के लिए सरकारी राशन की दुकानों पर लाइनें लगाकर खड़े रहते थे। उन दिनों बहुत समय तक मिट्टी का तेल केवल राशन की दुकान पर ही मिलता था। इसलिए देश के हर मध्यमवर्गीय व्यक्ति को इन लाइनों में खड़ा होना ही था। इनमें से कुछ लाइनों का हिस्सा मैं भी, अपने कॉलेज के दिनों में रहा था। इन दिनों में रेडियो समाचार सुनने के लिए कम, गीत सुनने के लिए अधिक प्रयुक्त होने लगा था।

ई.1971 की सर्दियों में पश्चिमी पाकिस्तान की सेनाओं ने पूर्वी पाकिस्तान की जनता को रौंदना आरम्भ किया। पूर्वी पाकिस्तान के लाखों लोग भाग-भाग कर भारत में घुसने लगे। इस खूनी-कलह का सार केवल इतना था कि बंगलाभाषी मुसलमानों पर पंजाबी बोलने वाले मुसलमानों ने अमानवीय जुल्म ढहाए थे। अभी दुनिया ढाका से आने वाले इन समाचारों के निहित अर्थों को समझने का प्रयास कर ही रही थी कि इंदिरा गांधी ने बंगलादेश में मुक्तिवाहिनी उतारकर पूरी दुनिया को अचम्भित कर दिया। रेडियो इन समाचारों को विस्तार से सुनाता था और भारत की जनता हर समय रेडियो से कान लगाए रहती थी। जब तक अखबार छपकर आते थे, तब तक तो भारत की सेना और आगे बढ़ चुकी होती थी। इसलिए रेडियो अखबारों पर भारी पड़ रहा था और जनमानस पर हावी हो रहा था। 

1971 की उन सर्दियों में भारत की सेनाओं ने पाकिस्तानी सेनाओं को जमकर ठोका-पीटा और नब्बे हजार पाकिस्तानी सैनिकों की कमर में रस्सियां बांधकर उन्हें घुटनों पर ला दिया। विश्व  के मानचित्र पर बांगलादेश नामक नवीन देश का जन्म हुआ। मैं उस समय केवल साढ़े नौ साल का था, फिर भी मुझे धुंधला सा स्मरण है कि मैंने भारत की मुक्तिवाहिनी की विजय, पाकिस्तानी सेना का आत्मसमर्पण, शेख मुजीबुर्रहमान की सरकार का गठन आदि घटनाओं के समाचार बड़ी उत्सुकता से उसी रेडियो पर सुने थे जिसे मेरे पिता ने मेरे जन्म से भी दो साल पहले अपने साढ़े पांच माह के वेतन के बदले खरीदा था।

रेडियो पर आने वाले इन समाचारों का अर्थ मेरे लिए केवल इतना होता था कि भारत ने अपने दुश्मनों को हरा दिया है। वह दुश्मन कौन था और हमारे घर से कितनी दूर बैठा था, मैं नहीं जानता था! उस दौर में मेरी समझ का हाल यह था कि मेरा पूरा विश्वास था कि हमारे बड़े से रेडियो के भीतर छोटे-छोटे आदमी और औरत बैठे हैं जो सुबह, दोपहर और शाम को समाचार सुनाते हैं। रेडियो के भीतर बैठे वही लोग कभी-कभी गीत भी गाते हैं और ढोलक बजाते हैं। जब मैं, हमारे कस्बे तक चले आए बंगला शरणार्थियों को सिर पर पोटलियां धरकर चलते हुए देखता और हैण्डपम्पों पर भीड़ लगाए हुए देखता तो मुझे लगता था कि ये लोग हमारे रेडियो से ही निकलकर बाहर आए हैं।

1971 की गौरवशाली विजय के पश्चात् देश में एक बार फिर वैचारिक गदर मचा। यह वैचारिक गदर जवाहरलाल नेहरू द्वारा दिखाई गई कायरता और उनकी बेटी इंदिरा गांधी द्वारा दिखाए गए साहस को लेकर मचा था। लोग कहना, सुनना और बताना चाहते थे कि पिता-पुत्री की नीतियों में इतना अंतर क्यों है! भारत के इस अद्भुत पराक्रम के लिए कुछ लोगों ने इंदिरा गांधी को दुर्गा का अवतार तक कहा। निश्चित रूप से साहसपूर्ण राजनीतिक नेतृत्व एवं देश की सेनाओं द्वारा दिखाए गए इस पराक्रम से भारत की जनता का मनोबल ऊँचा हुआ था, जिसकी चर्चा हमारी कक्षाओं में पढ़ाने वाले शिक्षक, पड़ौस में रहने वाले बूढ़े-बुजुर्ग और घर के वरिष्ठ सदस्य किया करते थे।

इंदिरा गांधी द्वारा दिखाए गए इस पराक्रम के उपरांत भी, भारत के लोगों की आर्थिक स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ था। ‘रोटी कपड़ा और मकान’ जैसी फिल्मों के गीत ‘बाकी जो बचा था महंगाई मार गई’ उन दिनों की वास्तविकता का वर्णन बहुत सटीक रूप से करते थे। मुझे आज भी याद है, यह गीत हमारे उस रेडियो पर दिन में कई बार बजा करता था। महंगाई और बेरोजगारी को लेकर देशभर में हर कहीं बहस होती थी। रेल के डिब्बों, बसों, पान की दुकानों तथा चाय की थड़ियों पर होने वाली ये चर्चाएं इतनी गर्म और जोरदार होती थी कि वर्तमान समय में टेलिविजन के पर्दे पर होने वाली बहसें उनके सामने फूहड़ता से भरा शोर मात्र लगती हैं। आकाशवाणी के साथ-साथ बीबीसी और रेडियो सीलोन भी उस युग में काफी लोकप्रिय थे।

वर्ष 1975 में इंदिरा गांधी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में मुकदमा हारने के बाद, देश में अचानक आपातकाल लगा दिया। जिस दिन देश में आपातकाल की घोषणा हुई, उस दिन के कुछ दृश्य मुझे आज भी स्मरण हैं। मैंने इस आपातकाल की घोषणा अपने पिताजी के कमरे में रखे उसी रेडियो पर सुनी थी। इस समय तक मेरी समझ का दायरा कुछ बढ़ चुका था और मैं समझ पा रहा था कि इस बार देश में ऐसा वैचारिक तूफान उठा है कि पूरा देश ही दो वैचारिक खेमों में बंट गया है। कुछ लोग इंदिरा गांधी को अब भी दुर्गा मानने पर अड़े थे तो कुछ लोग इंदिरा गांधी को तानाशाह बताकर उनकी घनघोर आलोचना किया करते थे।

1977 में इमरजेंसी के दौरान ही लोकसभा चुनाव हुए। मुझे आज भी याद है कि जब माँ और पिताजी वोट डालकर आए मैंने अपनी माँ से पूछा था कि आप कहाँ गई थीं! इस प्रश्न का जवाब मेरे पिताजी ने दिया था। उस जवाब का छोटा सा हिस्सा मुझे आज भी याद है- ‘तेरी माँ जॉर्ज फर्नाण्डीस को जेल से बाहर निकालने गई थी।’

20 मार्च 1977 को मतगणना आरम्भ हुई तो पूरा देश रेडियो से चिपक कर बैठ गया। मेरे पिताजी भी पूरी रात जागकर चुनाव परिणाम सुनते रहे। मैं भी पिताजी के साथ जागता रहा। 21 मार्च की प्रातः तीन-चार बजे के बीच में आखिर वह परिणाम आया जिसकी प्रतीक्षा में पूरा देश पूरी रात जागता रहा था। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी चुनाव हार गई थीं।

मुझे ऐसा याद पड़ता है कि भारत भर के रेडियो स्टेशनों द्वारा यह समाचार आकाशवाणी इलाहाबाद से रिले किया गया था। इस समाचार प्रसारण के कुछ ही देर बाद देश से आपतकाल समाप्त होने की घोषणा की गई। आकाशवाणी इलाहाबाद (अब प्रयागराज) की समाचार वाचिका ने इस समाचार को पढ़ने के बाद जो गीत प्रसारित किया था, उसने सबके रोंगटे खड़े कर दिए। वह गीत था- गंगा तेरा पानी अमृत, झर-झर बहता जाए। युग-युग से इस देश की माटी तुझसे जीवन पाए। मेरे पिताजी का मानना था कि उद्घोषिका ने वह गीत अनायास ही नहीं प्रसारित किया था, अपितु तानाशाही पर लोकशाही की विजय के उपलक्ष्य में सोच-समझ कर प्रसारित किया था।

उस समय सुबह के चार बजे नहीं थे, पौ फटने में कुछ देर थी किंतु लगता था जैसे पूरे देश में उजाला हो गया था। लोग इस समाचार को सुनकर कितने प्रसन्न थे, इस बात का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि उस दिन छोटे-छोटे गांवों, कस्बों एवं नगरों में इंदिरा गांधी की पराजय का उत्सव मनाया गया। उस दिन गली मुहल्लों में कोई भी चुपचाप नहीं चल रहा था। लोग जोर-जोर से बोल रहे थे और उनकी बातें खत्म होने को नहीं आती थीं।

अगले दिन जनता पार्टी के नेताओं ने दिल्ली के रामलीला मैदान में विजय उत्सव का आयोजन किया जिसमें मोरारजी भाई, जगजीवनराम, चौधरी चरणसिंह, अटलबिहारी वाजपेई तथा शाही इमाम आदि नेताओं ने लम्बे-लम्बे भाषण दिए थे। इन भाषणों का प्रसारण मैंने हमारे घर के रेडियो पर ही सुना था। जिस समय अटलजी का भाषण आरम्भ हुआ तो मैंने हैरत से देखा कि अटलजी द्वारा बोले जा रहे भाषण की बहुत सी पंक्तियाँ मेरे पिताजी पहले ही बोल देते थे, उन्हें पूरा अनुमान था कि अटलजी अगली पंक्ति में क्या बोलने वाले हैं!

मुझे आज भी याद है कि इसी कार्यक्रम में दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम ने देश के नए प्रधानमंत्री मोरारजी भाई को छड़ी दिखाते हुए कहा था कि यदि इस सरकार ने पुरानी सरकार वाली गलती दोहराई तो यह छड़ी उन्हें भी नहीं बक्शेगी। जब शाही इमाम द्वारा बोली गई यह पंक्ति रेडियो पर प्रसारित हुई तो बहुत से लोगों को शाही इमाम द्वारा छड़ी उठाकर प्रधानमंत्री की ओर संकेत करना बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा था। कुछ ऐसी ही राय मेरे पिताजी की भी थी।

बदले की आग में झुलसती, अपने-अपने अहंकारों के लिए लड़ती, भिन्न-भिन्न राजनीतिक विचारों वाले नेताओं द्वारा गठित मोरारजी भाई की यह सरकार बड़ी मुश्किल से ढाई साल चली और रेडियो पर नेताओं के बीच जूतियों में दाल बंटने के समाचार आने लगे। अंत में यह सरकार बिना किसी विशेष कारण के धड़ाम से गिर गई। इस बीच इंदिरा गांधी जेल गईं, बाहर आईं, चुनाव जीतीं और फिर से प्रधानमंत्री बन गईं। ये सारे समाचार मैंने अपने घर में रखे फिलिप्स के उसी रेडियो पर सुने थे।

मुझे याद है कि इस दौर में पूरे देश में रेडियो और अखबार पूरे जोश से सुने और पढ़े जा रहे थे। रेडियो पर समाचार सुनने वालों को, रेल्वे स्टेशन पर अखबार खरीदकर पढ़ने वालों को और बुकस्टाल पर खड़े होकर पुस्तकें टटोलने वालों को अत्यंत आदर की दृष्टि से देखा जाता था। बहुत से लोग घरों में सुविधा न होने के कारण निकट के वाचनालयों एवं पुस्तकालयों में जाकर अखबार एवं पुस्तकें पढ़ा करते थे और उनमें लिखी बातों पर अपने परिवार के सदस्यों एवं मित्रों से चर्चा किया करते थे।

रेडियो भी इन दिनों तेजी से फैल रहा था। पान की थड़ियों एवं बहुत से वाचनालयों में तो रेडियो बजता ही था, बहुत से नगरों में नगरपालिकाएं प्रमुख चौराहों पर भोंपू लगाकर आकाशवाणी के समाचार सुनवाया करती थीं जिन्हें सुनने के लिए सड़कों पर चलते हुए लोग, रुक जाया करते थे। बहुत से पनवाड़ियों की दुकानें तो इसलिए चल निकली थीं कि बहुत से बूढ़े-बुजुर्ग और नौजवान, नियमित रूप से पान खाने के बहाने उन दुकानों पर आते थे और देर तक खड़े रहकर रेडियो पर प्रसारित होने वाले समाचार सुनते थे।

पनवाड़ियों की देखादेखी बहुत से नाइयों ने भी अपनी दुकानों में रेडियो बजाने और अखबार मंगवाने का चलन आरम्भ कर दिया था ताकि रेडियो सुनने और अखबार पढ़ने के आकर्षण में आने वाले ग्राहकों से उनकी दुकानदारी चलती रहे। कुछ रेलवे स्टेशनों एवं बस-स्टैण्डों पर भी रेडिया के समाचार प्रसारित हुआ करते थे।

मुझे याद है कि मैंने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बहुत से भाषण, वक्तव्य और साक्षात्कार सड़कों के किनारे, अपनी साइकिल रोककर सुने थे। कई बार सड़क के शोर के कारण कोई पंक्ति सुनाई नहीं देती थी, तब तेजी से साइकिल चलाकर घर पहुंचता था ताकि उस समाचार को अगले बुलेटिन में ढंग से सुना जा सके। जब रेडियो का समाचार वाचक अपनी सधी हुई आवाज में उद्घोषणा करता- ‘ये आकाशवाणी है, अब आप इंदुवाही (या देवकीनंदन पाण्डे) से समाचार सुनिए’ तो ऐसा लगता था मानो पूरे देश में कर्फ्यू लग गया है।

23 मई 1980 को इंदिरा गांधी के छोटे पुत्र संजय गांधी की वायुयान दुर्घटना में मृत्यु हुई। संजय गांधी स्वयं ही उस विमान को उड़ा रहे थे। मुझे याद है, उस दिन मैं अपने स्कूल में था। दोपहर का समय था, कक्षाएँ चल रही थीं, इस दौरान किसी ने किसी से शायद ही कोई बात की होगी। जैसे ही रेसिस हुआ और हम लोग क्लासेज से बाहर निकले, एक अजीब सी बेचैनी पूरे स्कूल में फैल गई। सब लोग दौड़कर पास के बीएड कॉलेज में जाने लगे। पूछने पर ज्ञात हुआ कि बीएड कॉलेज में एक अखबार आया है जिसमें लिखा है कि संजय गांधी की मृत्यु हो गई। हमारी क्लास भी बीएड कॉलेज की तरफ भागी और तब तक वहाँ से नहीं हिली जब तक कि यह समाचार क्लास के लड़कों ने अपनी आंखों से पढ़ नहीं लिया। मैं तो वहीं से घर चला गया और रेडियो खोलकर बैठ गया। खबर सही थी और दिन भर रह-रह कर रेडियो से प्रसारित होती रही।

1984 की गर्मियों में मैंने ग्रेजुएशन कम्पलीट कर लिया और मैंने पोस्टग्रेजुएशन के लिए दाखिला ले लिया। इसके साथ ही मैं नौकरी पाने के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने लगा। सामान्यज्ञान के पेपर के लिए मैंने अपने घर में रखे रेडियो को अपना गुरु बनाया। उस काल में कोचिंग सेंटर नहीं होते थे किंतु आकाशवाणी तथा बीबीसी से प्रसारित होने वाली बहुत सी रिपोर्टों में जो सूचनाएं, तार्किक विश्लेषण तथा सारगर्भित टिप्पणियां होती थीं, वैसी सामग्री तो आज कोचिंग सेंटरों में भी नहीं दी जाती। मैं मानता हूँ कि मेरी नौकरी लगने में फिलिप्स के उस रेडियो पर प्रसारित होने वाली रिपोर्टों का बहुत बड़ा हाथ था। इतना बड़ा कि मुझे एक भी दिन की बेरोजगारी नहीं झेलनी पड़ी।

3 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या हुई, वह हृदयविदारक समाचार मैंने अपने घर के रेडियो पर ही सुना था। दुर्योगवश 4 अक्टूबर को मुझे बैंक अधिकारी की परीक्षा में बैठने के लिए गंगानगर जाना था। पूरे देश में सिक्खों के खिलाफ गुस्सा फूट पड़ा था, इसलिए बहुत सी जगह दंगे फूट पड़े थे और परीक्षा का स्थगित हो जाना अवश्यम्भावी था। मैं पूरे दिन इस आशा में रेडियो से चिपका रहा कि यदि परीक्षा स्थगित होगी तो उसकी सूचना रेडियो पर अवश्य आएगी।

पूरे दिन हमारा रेडियो राजीव गांधी के विदेश से भारत लौटने, प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने तथा बड़ा पेड़ गिरता है तो आसपास की धरती हिलने के बारे में बताता रहा। फिर भी मैंने धैर्य नहीं खोया। शाम सात बजे के प्रादेशिक समाचार बुलेटिन में अगले दिन की बैंक परीक्षा के स्थगित होने की सूचना था। परीक्षा आयोजन की अगली तिथि की सूचना भी कुछ दिनों बाद मुझे घर में रखे फिलिप्स के उसी पुराने रेडियो से मिली थी।

वर्ष 1984 की सर्दियां खत्म होते-होते मेरी नौकरी गंगानगर में बैंक अधिकारी के पद पर लगी। संयोगवश वहाँ मेरा परिचय भारत की आजादी के समय हुए विभाजन के कारण पाकिस्तान से आए श्री सुदेश वर्मा और उनके परिवार से हुआ। गंगानगर रेलवे स्टेशन से बाहर निकलते ही गोल मार्केट में वर्मा परिवार की फिलिप्स रेडियो की एक बड़ी सी दुकान और वर्कशॉप हुआ करती थी। पूरा वर्मा परिवार अर्थात् स्वयं सुदेश वर्माजी, उनकी धर्मपत्नी कैलाशजी (अब दोनों ही स्वर्गस्थ) और उनके पुत्र नरेशजी उस दुकान और वर्कशॉप को चलाया करते थे। दुकान पर कई कर्मचारी थे जो फिलिप्स के रेडियो की मरम्मत करने में माहिर थे।

उन दिनों यह दुकान मेरे लिए आकर्षण का बहुत बड़ा केन्द्र बन गई थी। इसका कारण यह था कि वर्माजी की वर्कशॉप में रिपेयरिंग के लिए आने वाले रेडियो सैट में कभी-कभी मुझे अपने पैतृक घर में रखे फिलिप्स के बड़े से रेडियो वाला मॉडल भी दिखाई दे जाता था। उसे देखकर ऐसा लगता था मानो आजादी के बाद के भारत का इतिहास मेरी आंखों के सामने जीवंत हो गया है। रेडियो के उस मॉडल को देखने के लालच में, मैं सप्ताह में एक-दो चक्कर तो उस वर्कशॉप के लगा ही लेता था।

वर्ष 1986 में हमारे घर में टेलीविजन का पदार्पण हुआ। तब टेलीविजन के कार्यक्रम सुबह-शाम कुछ समय के लिए ही प्रसारित होते थे। इस कारण आगे के कुछ सालों बाद तक भी रेडियो अपनी जगह पर मोर्चा जमाए बैठा रहा किंतु जैसे-जैसे टेलीविजन कार्यक्रमों के प्रसारण के घण्टे बढ़ते गए, रेडियो का बोलना कम होता गया। फिर भी रेडियो का आकर्षण मेरे मन से गया नहीं। यहाँ तक कि साढ़े चार साल तक बैंक अधिकारी की नौकरी करने के बाद ई.1989 में मैंने बैंक छोड़कर रेडियो में प्रसारण अधिकारी की नौकरी कर ली। अब रेडियो सुनना ही मेरी नौकरी हो गई। इसलिए फिलिप्स का वह रेडियो एक बार फिर पूरे जोश से बजने लगा।

वर्ष 1992 में रंगीन टेलीविजन ने घर में सेंध लगाई। मैंने भी उसी साल आकाशवाणी की नौकरी छोड़ दी। संभवतः उसी समय से हमारे घर में रखा वह रेडियो नेपथ्य में जाने लगा। अब वह बहुत कम खोला जाता था। जिन न्यूज बुलेटिनों के बल पर रेडियो, घर में कर्फ्यू जैसा वातावरण बना देता था, अब न्यूज बुलेटिनों के लिए रेडियो को याद तक नहीं किया जाता था।

लगता था जैसे रेडियो भी अब विश्राम लेना चाहता था। पता नहीं कब वह रेडियो पूरी तरह चुप हो गया और कहा नहीं जा सकता कि वह कौनसी तिथि थी जब रेडियो पिताजी के कमरे से निकल कर कबाड़घर में पहुंच गया! यह सब इस तरह से हुआ जैसे कुछ हुआ ही नहीं था! यह संसार की सबसे बड़ी मौन क्रांति थी। एक बादशाह अपनी रियासत से रुखसत हो गया और किसी को कानोंकान खबर तक न हुई!

वर्ष 2004 में मेरे माता-पिता ने अपना आलीशान बड़ा सा घर बेचकर हम तीनों भाइयों के लिए तीन सुवधिाजनक घर खरीदने का निर्णय लिया। माँ ने तय किया कि घर का बहुत सा पुराना सामान जो भविष्य में काम आने वाला नहीं है, कबाड़ी को बेच दिया जाए। माँ ने ऐसा बहुत सा सामान निकलवाकर घर के लॉन में जमा करवाया। संयोगवश मेरी दृष्टि फिलिप्स के उस रेडियो पर पड़ी जो दूसरे कबाड़ के बीच मुंह छिपाए बैठा था। मुझे लगा जैसे रेडियो हमसे आंखें चुराने के लिए ही कबाड़ के बीच छिप सा गया था।

कबाड़ी ने उस रेडियो की कीमत प्लास्टिक के कबाड़ की दर से, साढ़े पांच रुपए लगाई। सोलह वर्षीय विजय भी वहीं पर बैठा था। उस साल उसने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। मैंने विजय को बताया- ‘जिस रेडियो की कीमत यह कबाड़ी साढ़े पांच रुपए लगा रहा है, उसे तुम्हारे बाबा ने मेरे जन्म से भी पहले, अपने साढ़े पांच महीने के वेतन से खरीदा था। यदि उन्होंने उस समय यह रेडियो न लेकर चांदी खरीदी होती तो उसकी कीमत आज 30 हजार रुपए होती, यदि सोना लिया होता तो उसकी कीमत 28 हजार रुपए होती और यदि कोई भूखण्ड लिया होता तो आज उसकी कीमत कम से कम साढ़े पांच करोड़ रुपए होती।‘ मेरी बात सुनकर विजय की हैरानी का पार न था।

मुझे पूछना नहीं चाहिए था किंतु फिर भी जाने क्यों मैंने विजय से पूछ लिया- ‘तुम्हारे बाबा ने यह रेडियो खरीद कर सही किया या गलत?’ मेरे इस प्रश्न का विजय ने कोई जवाब तो नहीं दिया किंतु उसके चेहरे पर असमंजस भरी गहरी मुस्कुराहट उभरी जिसने मुझे थोड़ी देर के लिए असहज कर दिया।

अंत में मैंने ही कुछ सोचकर उसे अपने प्रश्न का जवाब दिया- ‘यदि तुम्हारे बाबा ने यह रेडियो नहीं खरीदा होता तो हो सकता है कि आज इस कबाड़ी की जगह मैं बैठा हुआ होता।’ विजय के चेहरे की मुस्कुराहट गायब हो गई थी किंतु अब मैं असहज बिल्कुल नहीं था। इस प्रश्न का सबसे सही उत्तर घर में मेरे अतिरिक्त और कौन दे सकता था!

जब कबाड़ी ने फिलिप्स का वह बड़ा सा रेडियो अपनी बोरी में डाला तो कलेजे में एक टीस सी उठी थी। समय कितना निर्मम है, चाहे कोई कितना ही बड़ा क्यों न हो, समय किसी को उसकी जगह पर नहीं बने रहने देता! कुछ साल हुए जब गंगानगर के सुदेश वर्माजी के परिवार ने फिलिप्स रेडियो की अपनी दुकान और वर्कशॉप भी कई साल पहले ही बंद कर दी थी। फिलिप्स कम्पनी ने भी कई साल पहले रेडियो बनाना बंद कर दिया था। अब तो फिलिप्स के वे बड़े से रेडियो बूढ़ी हो चुकी पीढ़ी की स्मृतियों में ही शेष बचे हैं। 

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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