Tuesday, February 20, 2024
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अट्ठारह सौ सत्तावन

डिसमिस दावा तोर है सुन उर्दू बदमास (4)

ई.1757 से हिन्दुओं के मन में अंग्रेजों के प्रति आदर का भाव जो उदित हुआ था, वह आदर भाव सौ सालों तक भी नहीं टिक पाया। इस आदर-भाव को तब गहरी चोट लगी, जब ई.1852 में पेशवा बाजीराव (द्वितीय) की मृत्यु हो जाने पर अंग्रेजी सरकार ने पेशवा के दत्तक पुत्र नाना साहब को पेंशन देने से मना कर दिया, झांसी के हिन्दू राजा गंगाधर राव की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने उसके दत्तक पुत्र को स्वीकार करने से मना करके झांसी पर अधिकार कर लिया तथा छत्रपति शिवाजी के वंशज अप्पा साहब की मृत्यु होने पर उसके दत्तक पुत्र से सतारा का छोटा सा हिन्दू राज्य भी छीन लिया।

ऐसी बहुत सी बातें हुईं जिनके कारण भारत के हिन्दुओं में अंग्रेज जाति के विरुद्ध घनघोर वातावरण बन गया।

इन सब बातों से असंतुष्ट होकर ई.1856 में नाना साहब ने अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र क्रांति की योजना बनाई। इससे पहले कि नाना साहब की योजना आरम्भ हो पाती, 29 मार्च 1857 को बैरकपुर की सैनिक छावनी में गाय की चर्बी लगे कारतूसों को मुंह से छीलने के प्रश्न पर एक सशस्त्र सैनिक क्रांति अचानक ही फूट पड़ी। अतः नाना साहब की क्रांति योजना को इस सैनिक क्रांति के साथ जोड़ दिया गया। बाद में बड़े राजाओं से असंतुष्ट छोटे-बड़े जागीरदार भी इस क्रांति के साथ जुड़ गए।

भारत के इतिहास में इसे ‘अट्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति’ कहते हैं। अंग्रेजों ने इसे ‘गदर’ एवं ‘बगावत’ कहा। इस क्रांति के पहले ही दिन बैरकपुर में मंगल पाण्डे आदि कुछ हिन्दू सैनिकों ने अंग्रेज अधिकारियों की हत्याएं कर दीं। इसके बाद मेरठ, नसीराबाद, लखनऊ, कानपुर, बिठूर, आउवा आदि अनेक स्थानों पर हिन्दू सैनिकों एवं अंग्रेज सेनाधिकारियों के बीच गोलियां चलीं तथा अनेक अंग्रेज अधिकारी एवं उनके परिवारों के कुछ सदस्य मारे गए।

अपदस्थ पेशवा के दत्तक पुत्र नाना साहब, अपदस्थ झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, मराठा सेनापति तात्यां टोपे, जगदीशपुर (बिहार में स्थित) के जागीरदार कुंवरसिंह, आउवा (राजपूताना में स्थित) के ठाकुर कुशालसिंह तथा राजपूताना के रजवाड़ों में नियुक्त अंग्रेजी सेनाओं के हजारों हिन्दू सैनिकों ने अंग्रेज अधिकारियों को मारा। अंग्रेजों ने क्रांति के सभी प्रमुख नेताओं को लगभग ढाई साल तक चले सशस्त्र संघर्ष में या तो मार डाला, या उन्हें पकड़कर रहस्यमय ढंग से गायब कर दिया या फिर उनके राज्य छीनकर उन्हें दर-दर की ठोकरें खाने के लिए छोड़ दिया।

 बड़ी कठिनाई से ब्रिटिश सरकार अट्ठारह सौ सत्तावन की सशस्त्र क्रांति को कुचल सकी। यद्यपि इस क्रांति में दिल्ली के मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर तथा अवध की बेगम हजरत महल भी सम्मिलित हुए किंतु अंग्रेजों ने उनकी शक्ति को बिना किसी परिश्रम के, पूरी तरह से तथा सदा के लिए कुचल दिया।

अंग्रेजों के मन में खटास

अट्ठारह सौ सत्तावन की सशस्त्र क्रांति तो अंग्रेजी कमाण्डरों द्वारा बड़ी बेरहमी से कुचल दी गई किंतु इसके दौरान हुई रक्तरंजित घटनाओं के कारण अंग्रेज अधिकारियों का हिन्दुओं पर से विश्वास उठ गया तथा अब वे हिन्दुओं को दबाने के लिए मुसलमानों को अपने निकट लाने का प्रयास करने लगे।

अंग्रेजों के मन में हिन्दुओं के प्रति इतनी खटास आ गई कि उन्होंने सेना तथा पुलिस की नौकरियों में हिन्दुओं की बजाय मुसलमानों को भर्ती करना आरम्भ कर दिया। यदि हिन्दू कहीं भी विद्रोह करते थे तो अंग्रेजों की सेना और पुलिस बड़ी बेरहमी से हिन्दुओं को कुचलती थी। इस प्रकार पूरा परिदृश्य बदल गया और हिन्दू फिर से संकट में आ गए।

अलीगढ़ आंदोलन

उन दिनों बिजनौर में ईस्ट इण्डिया कम्पनी में सैयद अहमद नामक एक सदर अमीन हुआ करता था। उसने 1857 की क्रांति में अनेक अंग्रेज अधिकारियों एवं उनके परिवार के सदस्यों के प्राण बचाए। जब क्रांति समाप्त हो गई तो अंग्रेजों ने सैयद अहमद खाँ को अपना विश्वसनीय साथी बना लिया तथा उसे ‘सर’ की उपाधि दी।

सर सैयद अहमद खाँ ने अंग्रेजों की बदली हुई मानसिकता का लाभ उठाया तथा उसने ‘अलीगढ़ आंदोलन’ के नाम से एक आंदोलन खड़ा किया जिसका मुख्य उद्देश्य मुसलमान बच्चों को आधुनिक शिक्षा के लिए प्रेरित करने का था ताकि वे बड़ी संख्या में सरकारी नौकरियों में प्रवेश पा सकें।

उस काल में सैयद अहमद के प्रयासों से बहुत से मुसलमान युवक अंग्रेजी राज्य में बड़ी नौकरियां पा गए। सैयद अहमद तथा उसके साथियों ने उत्तर भारत में जो आंदोलन चलाया, उसने हिन्दुओं एवं मुसलमानों के बीच दूरियां बढ़ाने का काम किया। अंग्रेजों ने मुसलमानों में पनप रही इस प्रवृत्ति को अपनी लिए लाभकारी समझा तथा इसे बढ़ावा दिया।

इस कारण भारत में साम्प्रदायिक समस्या में तेजी से वृद्धि हुई। ऐसा नहीं था कि भारत में साम्प्रदायिक समस्या का जन्म अलीगढ़ आंदोलन से हुआ, यह समस्या तो लगभग विगत साढ़े छः सौ सालों से किसी न किसी रूप में भारत में चली आ रही थी। अलीगढ़ आंदोलन से वह और बढ़ गई।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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