Sunday, June 16, 2024
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अध्याय – 94 : देशी राज्यों के भारत में विलय पर जिन्ना का षड़यंत्र

भारत विभाजन का निर्णय हिंदू-मुस्लिम जनसंख्या की बहुलता के क्षेत्रों के आधार पर किया गया था। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत में अधिकांश राज्य, हिंदू राज्य थे। फिर भी मुहम्मद अली जिन्ना ने प्रयत्न किया कि वह भारत की अधिकतम रियासतों को प्रस्तावित पाकिस्तान में मिलने के लिये सहमत करे ताकि एक कटे-फटे तथा छिद्रयुक्त कमजोर भारत का निर्माण हो। उसकी योजना थी कि यदि रियासतें पाकिस्तान में मिलने की घोषणा न करें तो, स्वतंत्र रहने की ही घोषणा कर दें। जिन्ना ने अपना ध्यान मुसिलम शासकों द्वारा शासित बड़ी रियासतों एवं पाकिस्तान की सीमा से सटी हुई हिन्दू रियासतों पर केन्द्रित किया। भोपाल नवाब हमीदुल्ला खां जिन्ना की इस योजना में सम्मिलित हो गया।

एक ओर कांग्रेस देशी राज्यों के प्रति कठोर नीति का प्रदर्शन कर रही थी तो दूसरी ओर मुस्लिम लीग ने देशी राज्यों के साथ बड़ा ही मुलायम रवैया अपनाया। मुस्लिम लीग के लिये ऐसा करना सुविधाजनक था क्योंकि प्रस्तावित पाकिस्तान की सीमा में देशी राज्यों की संख्या 12 थी। शेष 554 रियासतें प्रस्तावित भारत संघ की सीमा के भीतर स्थित थीं। जिन्ना, हिन्दू राजाओं के गले में यह बात उतारना चाहता था कि कांग्रेस, मुस्लिम लीग तथा देशी राजाओं की साझा शत्रु है। जिन्ना ने लुभावने प्रस्ताव देकर राजपूताना की रियासतों को पाकिस्तान में सम्मिलित करने का प्रयास किया। उसने घोषित किया कि देशी राज्यों में मुस्लिम लीग बिल्कुल हस्तक्षेप नहीं करेगी और यदि देशी राज्य स्वतंत्र रहें तो भी मुस्लिम लीग की ओर से उन्हें किसी प्रकार की तकलीफ नहीं दी जायेगी। लीग की ओर से राजस्थान के राजाओं में गुप्त प्रचार किया गया कि उन्हें पाकिस्तान में मिलना चाहिये, हिंदी संघ राज्य में नहीं।

निजाम हैदराबाद के प्रति माउण्टबेटन का रवैया अत्यंत नरम था। जिन्ना ने वायसराय के राजनीतिक सविच कोनार्ड कोरफील्ड और भोपाल नवाब हमीदुल्लाखां का उपयोग भारत को कमजोर करने में किया। त्रावणकोर के महाराजा ने 11 जून 1947 को एक व्यापारी दल अपने यहाँ से पाकिस्तान भेजना स्वीकार कर लिया। महाराजा जोधपुर और बहुत सी छोटी रियासतों के शासक बड़े ध्यान से यह देख रहे थे कि बड़ी रियासतों के विद्रोह का क्या परिणाम निकलता है, उसी के अनुसार वे आगे की कार्यवाही करना चाहते थे। महाराजा बड़ौदा ने अपने हाथ से सरदार पटेल को लिखा- ‘जब तक उनको भारत का राजा नहीं बनाया जाता और भारत सरकार उनकी समस्त मांगें नहीं मान लेती तब तक वे कोई सहयोग नहीं देंगे और न ही जूनागढ़ के नवाब की बगावत दबाने में सहयोग देंगे।’

इस पर भारत सरकार ने महाराजा प्रतापसिंह की मान्यता समाप्त करके उनके पुत्र फतहसिंह को बड़ौदा का महाराजा बना दिया। भारत सरकार का कठोर रवैया देखकर अधिकांश राजा विनम्र देश-सेवकों जैसा व्यवहार करने लगे। जो राज्य संघ उन्होंने रियासतों का विलय न होने देने के लिये बनाया था, उसे भंग कर दिया गया। उन्होंने समझ लिया कि अब भारत सरकार से मिल जाने और उसका संरक्षण प्राप्त करने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है। वे यह भी सोचने लगे कि शासक बने रह कर विद्रोही प्रजा की इच्छा पर जीने के बजाय भारत सरकार की छत्रछाया में रहना कहीं अधिक उपयुक्त होगा, फिर भी जिन्ना तथा उसके साथियों का षड़यंत्र जारी रहा

भोपाल नवाब का षड़यंत्र

भोपाल नवाब हमीदुल्ला खाँ तीसरे मोर्चे का नेता था। वह छिपे तौर पर मुस्लिम परस्त, पाकिस्तान परस्त तथा कांग्रेस विरोधी के रूप में काम कर रहा था किंतु जब देश का विभाजन होना निश्चित हो गया तो वह प्रत्यक्षतः मुस्लिम लीग के समर्थन में चला गया तथा जिन्ना का निकट सलाहकार बन गया। वह जिन्ना की उस योजना में सम्मिलित हो गया जिसके तहत राजाओं को अधिक से अधिक संख्या में या तो पाकिस्तान में मिलने के लिये प्रोत्साहित करना था या फिर उनसे यह घोषणा करवानी थी कि वे अपने राज्य को स्वतंत्र रखेंगे। भोपाल नवाब चाहता था कि भोपाल से लेकर कराची तक के मार्ग में आने वाले राज्यों का एक समूह बने जो पाकिस्तान में मिल जाये। इसलिये उसने जिन्ना की सहमति से एक योजना बनायी कि बड़ौदा, इंदौर, भोपाल, उदयपुर, जोधपुर और जैसलमेर राज्य, पाकिस्तान का अंग बन जायें। इस योजना में उदयपुर और बड़ौदा की ओर से बाधा उपस्थित हो सकती थी किंतु महाराजा जोधपुर ने उक्त रियासतों से सहमति प्राप्त करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ली।  इस प्रकार भारत के टुकड़े-टुकड़े करने का एक मानचित्र तैयार हो गया। भोपाल नवाब की गतिविधियों को देखकर रियासती मंत्रालय के तत्कालीन सचिव ए. एस. पई ने रियासती विभाग के मंत्री सरदार पटेल को एक नोटशीट भिजवायी- ‘भोपाल नवाब, जिन्ना के दलाल की तरह काम कर रहा है।’

धौलपुर के राजराणा षड़यंत्र में सम्मिलित

हमीदुल्ला खाँ ने धौलपुर महाराजराणा उदयभानसिंह को भी इस योजना में सम्मिलित कर लिया। उदयभानसिंह जाटों की प्रमुख रियासत के बहुपठित, बुद्धिमान एवं कुशल राजा माने जाते थे किंतु वे किसी भी कीमत पर धौलपुर को भारत संघ में मिलाने को तैयार नहीं थे। जिन्ना के संकेत पर नवाब तथा महाराजराणा ने जोधपुर, जैसलमेर, उदयपुर तथा जयपुर आदि रियासतों के राजाओं से बात की तथा उन्हें जिन्ना से मिलने के लिये आमंत्रित किया। नवाब का साथ देने वाले हिंदू राजाओं में अलवर महाराजा तेजसिंह भी थे।

कोरफील्ड के दुष्प्रयास

माउण्टबेटन के राजनीतिक सलाहकार कोनार्ड कोरफील्ड ने ब्रिटिश रेजीडेंटों और पॉलिटिकल एजेंटों के माध्यम से राजाओं को भारतीय संघ से पृथक रहने के लिये प्रेरित किया। वह चाहता था कि कम से कम दो-तीन राज्य जिनमें हैदराबाद प्रमुख था, कांग्रेस के चंगुल से बच जायें। बाकी रजवाड़ों का भी भारत में सम्मिलित होना जितना मुश्किल हो सके, बना दिया जाये। कोरफील्ड ने रजवाड़ों के बीच घूम-घूम कर प्रचार किया कि उनके सामने दो नहीं तीन रास्ते हैं, वे दोनों उपनिवेशों में से किसी एक में सम्मिलित हो सकते हैं अथवा स्वतंत्र भी रह सकते हैं। कोरफील्ड के प्रयासों से त्रावणकोर तथा हैदराबाद ने घोषणा कर दी कि वे किसी भी उपनिवेश में सम्मिलित नहीं होंगे अपितु स्वतंत्र देश के रूप में रहेंगे।

सरदार पटेल और देशी राज्य

5 जुलाई 1947 को भारत की अन्तरिम सरकार के गृहमन्त्री सरदार वल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व में रियासती विभाग की स्थापना की गई और उन्हें भारत की ओर से देशी नरेशों से वार्त्ता करने का उत्तरदायित्व सौंपा गया।  हमीदुल्ला खाँ, कोरफील्ड तथा रामास्वामी अय्यर की योजना से निबटने तथा स्वतंत्र हुई रियासतों को भारत संघ में घेरने के लिये पटेल अकेले ही भारी थे। वी. पी. मेनन को पटेल का सलाहकार व सचिव नियुक्त किया गया। वे एकमात्र ऐसे अधिकारी थे जो देशी राज्यों की जटिल समस्या को सुलझा सकते थे। पटेल का जोरदार व्यक्तित्व और मेनन के लचीले दिमाग का संयोग इस मौके पर और भी अधिक प्रभावी सिद्ध हुआ। नेपथ्य में मंजे हुए राजनीतिज्ञ जैसे सरदार के. एम. पन्निकर, वी. टी. कृष्णामाचारी तथा भारतीय रियासतों के प्रतिष्ठित मंत्री और भारतीय सिविल सेवा के वरिष्ठ अधिकारी जैसे सी. एस. वेंकटाचार, एम. के. वेल्लोदी, वी. शंकर, पण्डित हरी शर्मा आदि अनुभवी लोग कार्य कर रहे थे। पटेल को माउन्टबेटन, चेम्बर ऑफ प्रिन्सेज के नये चान्सलर महाराजा पटियाला तथा बीकानेर नरेश सादुलसिंह से भी महत्त्वपूर्ण सहयोग मिला।

सरदार पटेल ने मेनन से कहा कि पाकिस्तान इस विचार के साथ कार्य कर रहा है कि सीमावर्ती कुछ राज्यों को अपने साथ मिला ले। स्थिति इतनी खतरनाक संभावनाएं लिये हुए है कि जो स्वतंत्रता हमने बड़ी कठिनाईयों को झेलने के पश्चात् प्राप्त की है वह राज्यों के दरवाजे से विलुप्त हो सकती है। आजादी की तिथि में पाँच सप्ताह शेष रह गये थे। एक ओर कोरफील्ड अँग्रेजों की सत्ता समाप्ति से पहले रजवाड़ों से केंद्रीय सत्ता का विलोपन करने के काम में लगा हुआ था जिससे एक-एक करके सारी व्यवस्थायें रद्द होती जा रही थीं। दूसरी ओर सरदार इस उधेड़-बुन में थे कि 15 अगस्त से पहले राजाओं की प्रत्येक व्यवस्था, जिन्हें अँग्रेजों ने रद्द करना आरम्भ कर दिया था, जैसे सेना, डाक आदि को बनाये रखने के सम्बन्ध में कैसे बात की जाये?

5 जुलाई 1947 को पटेल ने राजाओं से अपील की कि वे 15 अगस्त 1947 से पूर्व, भारत संघ में सम्मिलित हो जायें। सरदार पटेल ने भारतीय नरेशों से अपील की कि भारत के सामूहिक हितों को ध्यान में रखते हुए वे देश की अखण्डता को बनाये रखने में सहयोग करें। उन्होंने तीन मुख्य विषयों- प्रतिरक्षा, वैदेशिक सम्बन्ध और संचार व्यवस्था के सम्बन्ध में ही राज्यों को भारतीय संघ में सम्मिलित होने का आग्रह किया जिसकी स्वीकृति उन्होंने पूर्व में कैबिनेट मिशन योजना के समय दे दी थी। उन्होंने नरेशों को विश्वास दिलाया कि कांग्रेस, राज्यों के आन्तरिक मामलों में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करेगी। राज्यों के साथ व्यवहार में रियासती विभाग की नीति अधिकार की नहीं होगी। कांग्रेस राजाओं के विरुद्ध नहीं रही है। देशी नरेशों ने सदैव देशभक्ति व लोक कल्याण के प्रति अपनी आस्था प्रकट की है। पटेल ने राजाओं को चेतावनी भी दी कि यदि कोई नरेश यह सोचता हो कि ब्रिटिश परमोच्चता उसको हस्तांतरित कर दी जायेगी तो यह उसकी भूल होगी। परमोच्चता तो जनता में निहित है। एक प्रकार से यह घोषणा, राजाओं को समान अस्तित्व के आधार पर भारत में सम्मिलित हो जाने का निमंत्रण था। सरदार के शब्दों में यह प्रस्ताव, रजवाड़ों द्वारा पूर्व में ब्रिटिश सरकार के साथ की गयी अधीनस्थ संधि से बेहतर था।

इस प्रकार पटेल व मेनन द्वारा देशी राजाओं को घेर कर भारत संघ में विलय के लिये पहला पांसा फैंका गया। बीकानेर नरेश सादूलसिंह ने सरदार पटेल की इस घोषणा का तुरंत स्वागत किया और अपने बंधु राजाओं से अनुरोध किया कि वे इस प्रकार आगे बढ़ाये गये मित्रता के हाथ को थाम लें और कांग्रेस को पूरा समर्थन दें ताकि भारत अपने लक्ष्य को शीघ्रता से प्राप्त कर सके किंतु अधिकांश राजाओं का मानना था कि उन्हें पटेल की बजाय कोरफील्ड की बात सुननी चाहिये।

भारत संघ में विलय की प्रक्रिया

भारत सरकार द्वारा देशी राज्यों के भारतीय संघ में सम्मिलित होने के लिए एक प्रक्रिया निर्धारित की गई। रियासती विभाग ने देशी राज्यों के भारत अथवा पाकिस्तान में प्रवेश के लिये दो प्रकार के प्रपत्र तैयार करवाये- प्रविष्ठ संलेख (इन्स्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन) तथा यथास्थिति समझौता पत्र (स्टैण्डस्टिल एग्रीमेंट)। प्रविष्ठ संलेख एक प्रकार का मिलाप पत्र (ज्योइनिंग लैटर) था जिस पर हस्ताक्षर करके कोई भी राजा भारतीय संघ में प्रवेश कर सकता था और अपना आधिपत्य केंद्र सरकार को समर्पित कर सकता था। यह प्रविष्ठ संलेख उन बड़ी रियासतों के लिये तैयार किया गया था जिनके शासकों को पूर्ण अधिकार प्राप्त थे। इन रियासतों की संख्या 140 थी।

इन रियासतों के अतिरिक्त गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र में 300 रियासतें ऐसी थीं जिन्हें जागीर (एस्टेट) अथवा तालुका कहा जाता था। इनमें से कुछ जागीरों व तालुकों को 1943 ई. में संलग्नता योजना (एटेचमेंट स्कीम) के तहत निकटवर्ती बड़े राज्यों के साथ जोड़ दिया गया था किंतु परमोच्चता की समाप्ति के साथ ही यह योजना भी समाप्त हो जानी थी। अतः इन ठिकानों एवं तालुकों के ठिकानेदारों एवं तालुकदारों ने मांग की कि उन्हें 1943 ई. वाली स्थिति में लाया जाये तथा उनकी देखभाल भारत सरकार द्वारा की जाये जैसी कि राजनीतिक विभाग द्वारा की जाती रही थी। इन ठिकानों एवं तालुकों के लिये अलग प्रविष्ठ संलेख तैयार करवाया गया। काठियावाड़, मध्य भारत तथा शिमला हिल्स में 70 से अधिक राज्य ऐसे थे जिनका पद ठिकानेदारों और तालुकदारों से बड़ा था किंतु उन्हें पूर्ण शासक का दर्जा प्राप्त नहीं था। ऐसे राज्यों के लिये अलग से प्रविष्ठ संलेख तैयार करवाया गया।

स्टैण्डस्टिल एग्रीमेण्ट, प्रशासनिक एवं आर्थिक सम्बन्धों की यथास्थिति बनाये रखने के लिये सहमति पत्र था। भारत सरकार ने निर्णय किया कि वह उसी राज्य के साथ यथास्थिति समझौता करेगी जो राज्य, प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर करेगा। इन दोनों प्रकार के प्रपत्रों को वायसराय ने 25 जुलाई 1947 की बैठक में उन राज्यों के शासकों को दे दिया जो भारत की सीमा में पड़ने वाले थे। जिन्ना ने वायसराय से कह दिया था कि पाकिस्तान की सीमा में आने वाले राज्यों से वह स्वयं बात करेगा।

राजाओं को माउण्टबेटन की सलाह

25 जुलाई 1947 को वायसराय ने दिल्ली में नरेंद्र मण्डल का पूर्ण अधिवेशन बुलाया। माउण्टबेटन द्वारा क्राउन रिप्रजेण्टेटिव के अधिकार से बुलाया जाने वाला यह पहला और अंतिम सम्मेलन था। सम्मेलन में उपस्थित लगभग 75 बड़े राजाओं अथवा उनके प्रतिनिधियों को सम्बोधित करते हुए माउण्टबेटन ने कहा कि भारत स्वतंत्रता अधिनियम ने 15 अगस्त 1947 से भारतीय राज्यों को ब्रिटिश ताज के प्रति उनके समस्त दायित्वों से स्वतंत्र कर दिया है। राज्यों को तकनीकी एवं कानूनी रूप से पूरी सम्पूर्ण स्वतंत्रता होगी….किंतु ब्रिटिश राज के दौरान साझा हित के विषयों के सम्बन्ध में एक समन्वित प्रशासन पद्धति का विकास हुआ है जिसके कारण भारत उपमहाद्वीप ने एक आर्थिक इकाई के रूप में कार्य किया। वह सम्पर्क अब टूटने को है। यदि इसके स्थान पर कुछ भी नहीं रखा गया तो उसका परिणाम अस्त-व्यस्तता ही होगा। उसकी पहली चोट राज्यों पर होगी। उपनिवेश सरकार से आप उसी प्रकार नाता नहीं तोड़ सकते जिस प्रकार कि आप जनता से नाता नहीं तोड़ सकते, जिसके कल्याण के लिये आप उत्तरदायी हैं। राज्य तीन विषयों- रक्षा, विदेशी मामले और संचार पर भारत या पाकिस्तान, जो उनके लिये उपयुक्त हो, के साथ अपना विलय कर लें। राज्यों पर कोई वित्तीय जवाबदेही नहीं डाली जायेगी तथा उनकी सम्प्रभुता का अतिक्रमण नहीं किया जायेगा। उन्होंने हिन्दू बहुल क्षेत्रों के राजाओं को सलाह दी कि वे अपने राज्यों का विलय भारत में करें।

प्रविष्ठ संलेख प्रारूप को स्वीकृति

वायसराय ने एक वार्त्ता समिति का गठन किया जिसमें 10 राज्यों के शासक तथा 12 राज्यों के दीवान सम्मिलित किये गये। यह समिति दो उपसमितियों में विभक्त हो गयी। एक उपसमिति को प्रविष्ठ संलेख पर तथा दूसरी उपसमिति को यथास्थिति समझौता पत्र पर विचार विमर्श करना था। इन दोनों उपसमितियों ने 25 जुलाई से 31 जुलाई तक प्रतिदिन दिल्ली स्थित बीकानेर हाउस में अलग-अलग बैठकें कीं। लगातार छः दिन एवं रात्रियों तक परिश्रम करने के बाद दोनों दस्तावेजों को अंतिम रूप दिया जा सका। 31 जुलाई 1947 को दोनों प्रारूप स्वीकार कर लिये गये।

राजाओं के विशेषाधिकारों की संवैधानिक गारण्टी

अधिकांश राजाओं को डर था कि आजादी के बाद या तो उनकी जनता ही उनकी संपत्तियों को लूट लेगी अथवा कांग्रेस सरकार उसे जब्त कर लेगी। ब्रिटिश सत्ता आजादी के बाद किसी भी तरह राजाओं की रक्षा नहीं कर सकती थी। राजाओं को समझ में आने लगा था कि या तो अत्यंत असम्मानजनक तरीके से हमेशा के लिये मिट जाओ या फिर किसी तरह सम्मानजनक तरीके से अपनी कुछ सम्पत्ति तथा कुछ अधिकारों को बचा लो। 31 जुलाई 1947 को बीकानेर नरेश सादूलसिंह ने रियासती मंत्रालय के सचिव को एक पत्र लिखकर राजाओं के लिये विशेषाधिकारों की मांग की। रियासती मंत्रालय के सचिव ने महाराजा को लिखा कि नरेशगण व उनके परिवार जिन विशेषाधिकारों का उपयोग करते आये हैं, वह भविष्य में भी करते रहेंगे। बीकानेर महाराजा ने इस पत्र की प्रतियां बहुत से राजाओं को भिजवायीं। जोधपुर महाराजा इस पत्र से आश्वस्त नहीं हुए किंतु उन्होंने केन्द्र सरकार से किसी विशेष अधिकार की मांग नहीं की। उनका मानना था कि प्रजा के साथ पीढ़ियों पुराने व प्रेमपूर्ण सम्बन्ध होने तथा अपने पूर्वजों द्वारा प्रजा की भलाई के लिये किये गये असंख्य कार्यों के कारण उन्हें प्रजा का सौहार्द मिलता रहेगा और यही उनका सबसे बड़ा विशेषाधिकार होगा।

शासकों द्वारा प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर

सरदार पटेल की अपील, माउण्टबेटन द्वारा नरेन्द्र मण्डल में दिये गये उद्बोधन, कोरफील्ड की रवानगी, रियासतों में चल रहे जन आंदोलन तथा बीकानेर नरेश को रियासती मंत्रालय के पत्र आदि परिस्थितियों के वशीभूत होकर अधिकांश राजाओं ने भारत में विलय के समझौते पर हस्ताक्षर कर दिये। बीकानेर नरेश सादूलसिंह हस्ताक्षर करने वाले प्रथम राजा थे। अधिकतर राज्यों, विशेषकर छोटे राज्यों, जिन्हें अपनी सीमाओं का पता था तथा वे ये भी जानते थे कि रोटी के किस तरफ मक्खन लगा हुआ है, स्वेच्छा से भारतीय संघ के अंतर्गत आ गये। न तो वे अर्थिक रूप से सक्षम थे और न ही उनमें आंतरिक अथवा बाह्य दबावों का विरोध करने की क्षमता थी। कई बुद्धिमान तथा यथार्थवादी राजाओं ने विरोध की व्यर्थता तथा शक्तिशाली भारत संघ की संविधान सभा की सदस्यता की सार्थकता को अनुभव किया तथा शालीनता पूर्वक भारत संघ में सम्मिलित हो गये। कुछ हंसोड़ एंव मजाकिया स्वभाव के थे वे भी संघ में धकेल दिये गये। कुछ राजा अपने घोटालों और कारनामों से डरे हुए थे, उन्हें भी बलपूर्वक संघ में धकेल दिया गया। राजनीतिक विभाग के मखमली दस्ताने युक्त हाथ, राजाओं की भुजाओं पर काम करते रहे।

कुछ रजवाड़ों ने अपना विलय स्वीकार तो किया किंतु बेहद रंजिश के साथ। मध्य भारत का एक राजा विलय के कागजात पर हस्ताक्षर करने के साथ लड़खड़ा कर गिरा और हृदयाघात से उसकी मृत्यु हो गयी। बड़ौदा का महाराजा दस्तखत करने के बाद मेनन के गले में हाथ डालकर बच्चों की तरह रोया। भोपाल ने सेंट्रल इण्डियन स्टेट्स का एक फेडरेशन बनाने का प्रयास किया किंतु वह असफल हो गया। राजपूत राजाओं ने भारतीय सेना के राजपूत सिपाहियों को आकर्षित करके रजवाड़ों की सेना में सम्मिलित कर लेने की आशा की थी किंतु यह आशा फलीभूत नहीं हुई। जब त्रावणकोर ने प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया तो स्टेट्स कांग्रेस कमेटी की कार्यकारिणी ने महाराजा के खिलाफ आंदोलन किया। कांग्रेस कार्यकर्त्ताओं की त्रावणकोर पुलिस के साथ सड़कों पर मुठभेड़ हुई। 29 जुलाई को एक अनजान हमलावर ने त्रावणकोर के दीवान सर सी. पी. रामास्वामी अय्यर को छुरा मारकर बुरी तरह घायल कर दिया। रामास्वामी के चेहरे पर गहरी चोट आयी। हमलावर भागने में सफल रहा। इस हमले ने निर्णय कर दिया। महाराजा ने वायसराय को तार दिया कि वह दस्तखत करने को तैयार है। सरदार पटेल ने स्थानीय कांग्रेस कमेटी को तुरंत प्रदर्शन बंद करने का आदेश दिया। इसका जादू का सा प्रभाव हुआ। राज्यों को सबक मिला। वे और अधिक संख्या में हस्ताक्षर करने लगे।

15 अगस्त 1947 को भारत स्वतन्त्र हो गया। पाकिस्तानी क्षेत्र में स्थित 12 रियासतें पाकिस्तान में सम्मिलित हो गईं  और शेष 554 रियासतें भारत में रह गईं। जूनागढ़़ (सौराष्ट्र), हैदराबाद (दक्षिण भारत) और जम्मू-कश्मीर को छोड़कर 551 रियासतों ने सरदार पटेल के प्रयत्नों से 15 अगस्त 1947 से पहले ही भारतीय संघ में मिलने पर सहमति दे दी। जूनागढ़, हैदराबाद तथा जम्मू-कश्मीर राज्य भारत में मिलने को तैयार नहीं हुए।

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