Friday, March 27, 2026
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मिर्जा हकीम खाँ से लड़ना नहीं चाहता था अकबर (70)!

मिर्जा हकीम खाँ (Mirza Hakim Khan) काबुल का शासक था और वह अकबर का सौतेला भाई (Step Brother of Shahanshah Akbar) था। उसका पूरा नाम मिर्जा हकीम मुहम्मद खाँ था और वह अकबर के पिता हुमायूँ (Humayun) की दूसरी पत्नी चूचक बेगम का पुत्र था। चूचक बेगम (Chuchak Begum) हुमायूं के साथ भारत नहीं आई थी, वह काबुल के दुर्ग में रहा करती थी।

जब अकबर उज्बेगों और अपने सेनापति आसफ खाँ की बगावत से निबटने में लगा था, तब काबुल के शासक मिर्जा हकीम मुहम्मद खाँ एवं संभल के शासक मिर्जा मुहम्मद सुल्तान तथा उसके पुत्र उलूग मिर्जा ने भी अलग-अलग दिशाओं से अकबर के राज्य पर हमला करके अकबर के लिए नए संकट खड़े कर दिए।

हकीम खाँ के मामा फरीदून ने मिर्जा हकी को समझाया कि काबुल पर अधिकार करने की बजाय पंजाब पर अधिकार करना सरल है क्योंकि अकबर अपने ही अमीरों की बगावत में उलझा हुआ है। मिर्जा हकीम खाँ अपनी माता चूचक बेगम की तरह अस्थिर बुद्धि का इंसान था।

इसलिए वह अपने मामा की बातों में आ गया। कहाँ तो वह अकबर की शरण लेने के उद्देश्य से भारत जा रहा था और कहाँ अब वह अकबर के राज्य पर ही चढ़ बैठा। ठीक उसी समय खुशखबर खाँ नामक एक अमीर मिर्जा हकीम खाँ की सेवा में हाजिर हुआ।

खुशखबर खाँ को अकबर (Akbar) ने ही मिर्जा हकीम खाँ के पास रुपया, सामान, खिलअत और खास घोड़ा देकर रवाना किया था ताकि मिर्जा हकीम खाँ को संकट की इस घड़ी में दिलासा दी जा सके क्योंकि मिर्जा हकीम खाँ को उसके ससुर एवं सौतेले चाचा मिर्जा सुलेमान ने काबुल से बाहर निकाल दिया था।

अकबर ने हकीम खाँ से कहलवाया था कि वह चिंता न करे, पंजाब से कुछ सूबेदारों को काबुल के लिए भेजा जा रहा है ताकि मिर्जा सुलेमान का दमन किया जा सके।

जब मिर्जा हकीम खाँ ने सुना कि खुशखबर खाँ बादशाह का संदेश लेकर आ रहा है तो मिर्जा हकीम ने शाही परम्परा के अनुसार अपने शिविर से बाहर आकर बादशाह का पत्र ग्रहण किया।

 मिर्जा हकीम खाँ के मामा फरीदून ने मिर्जा हकीम को सलाह दी कि वह खुशखबर खाँ को बंदी बना ले किंतु मिर्जा हकीम खाँ ने खुशखबर खाँ से बादशाह का संदेश लेने के बाद उसे राजी-खुशी विदा कर दिया।

जब खुशखबर खाँ चला गया तब सुल्तान अली एवं हसन खाँ नामक कुछ अमीर काबुल से सेनाएं लेकर आ गए। उन्हें मिर्जा हकीम खाँ ने लाहौर पर आक्रमण करने के लिए बुलाया था। अब हकीम खाँ ने सिंधु नदी पार की तथा लाहौर की तरफ चल पड़ा। उसके आदमियों ने भेड़ा के पास लूटमार की।

जब यह खबर पंजाब के अधिकारियों को मिली तो मीर मुहम्मद खाँ, कुतुबुद्दीन खाँ और शफी खाँ ने मिलकर लाहौर दुर्ग की मोर्चाबंदी की। हकीम खाँ ने लाहौर पर हमला किया किंतु वह कई दिनों की घेराबंदी के बाद भी लाहौर को नहीं ले सका।

उधर जब अकबर को मिर्जा हकीम खाँ की इस हरकत के बारे में पता लगा तो वह हैरान रह गया! उस समय बादशाह आगरा में ही था। उसने खानखाना मुनीम खाँ को आगरा में नियुक्त किया तथा 17 नवम्बर 1566 को स्वयं एक सेना लेकर दिल्ली होता हुआ पंजाब के लिए चल पड़ा।

अकबर को आगरा से दिल्ली पहुंचने में 10 दिन का समय लगा। इस बीच उसने बहुत सा समय शिकार खेलने में व्यय किया। दिल्ली में भी वह मुस्लिम दरवेशों की दरगाहों के दर्शन करने में व्यस्त हो गया। वह मुताल्लिकों को खैरात बांटता रहा तथा हुमायूँ की कब्र (Tomb of Humayun) पर जाकर सजदे करता रहा।

अकबर द्वारा आगरा से रवाना होकर पंजाब पहुंचने में लगाया जा रहा विलम्ब अकारण नहीं था। वस्तुतः वह अपने सौतेले भाई हकीम मुहम्मद खाँ से लड़ना नहीं चाहता था, अपितु उसे भयभीत करके भगा देना चाहता था।

उधर जब मिर्जा हकीम मुहम्मद खाँ लाहौर पर अधिकार नहीं कर सका और उसने सुना कि बादशाह अकबर स्वयं ही एक विशाल सेना लेकर आ रहा है तो मिर्जा हकीम खाँ की हिम्मत जवाब दे गई। वह लाहौर छोड़कर सिंधु नदी की तरफ भागा।

जब अकबर अपनी सेना लेकर सतलुज नदी के किनारे पहुंचा तो उसे सूचना मिली कि मिर्जा हकीम खाँ लाहौर छोड़कर भाग गया। अकबर यही चाहता था। फिर भी वह धीमी गति से लाहौर की तरफ बढ़ता रहा। फरवरी 1567 के अंत में वह लाहौर पहुंचा। इस प्रकार उसने आगरा से लाहौर पहुंचने में साढ़े तीन महीने लगा दिए।

 लाहौर पहुंचकर अकबर ने लाहौर दुर्ग की रक्षा करने वाले मुगल अधिकारियों को पुरस्कृत किया तथा लाहौर के निकटवर्ती जंगलों में जी भरकर शिकार खेला। बादशाह ने एक सेना मिर्जा हकीम खाँ के पीछे भेजी ताकि मिर्जा हकीम सिंधु नदी पार करके भारत की भूमि से चला जाए।

मिर्जा हकीम के लिए अब भारत में कोई काम नहीं था। इसलिए वह सिंधु को पार करके घोरबंद की तरफ बढ़ने लगा। वहाँ जाकर उसे ज्ञात हुआ कि उसका ससुर मिर्जा सुलेमान और सास हरम बेगम काबुल की घेराबंदी उठाकर बदख्शां भाग गए हैं। संभवतः मिर्जा सुलेमान को यह गलत सूचना दी गई थी कि मिर्जा हकीम खाँ भारत से अकबर की सेना लेकर आ रहा है। उसके भागने का एक कारण यह भी था कि उसके घोड़ों में रोग फैल जाने से वे बड़ी तेजी से मरने लगे।

मिर्जा सुलेमान (Mirza Suleman) इतनी आनन-फानन में काबुल का घेरा छोड़कर भागा कि उसकी कुछ जवान पुत्रियां काबुल के शिविर में ही छूट गईं। काबुल की सेना ने उन्हें घेर लिया किंतु काबुल की सेना ने उनके साथ आदर का व्यवहार किया क्योंकि वे काबुल के शासक मिर्जा हकीम खाँ की बेगम की सगी बहिनें थीं। वह बिना किसी विघ्न के काबुल पहुंच गया और अपने बाप-दादा की राजधानी में फिर से प्रतिष्ठित हो गया।

जब संभल के शासक मुहम्मद सुल्तान मिर्जा (Muhammad Sultan Mirza) तथा उसके पुत्र उलूग मिर्जा (Ulug Mirza) को ज्ञात हुआ कि बादशाह अकबर मिर्जा हकीम खाँ से लड़ने लाहौर (Lahore) जा रहा है तो वे संभल से दिल्ली आ गए तथा दिल्ली पर अधिकार करने के उद्देश्य से लूटपाट करने लगे। बादशाह अकबर खानखाना मुनीम खाँ को आगरा की रक्षा पर नियत करके गया था किंतु मुनीम खाँ को आगरा छोड़कर दिल्ली आना पड़ा। मिर्जा लोग खानखाना से लड़ने की बजाय माण्डू (Mandu) की ओर भाग गए।

पाठकों को स्मरण होगा कि अकबर के परबाबा का नाम मिर्जा उमरशेख था जो फरगना का शासक था। संभल से आकर दिल्ली में उत्पात मचाने वाले मुहम्मद सुल्तान मिर्जा के परबाबा का पिता भी यही उमर शेख था। इस प्रकार अकबर तथा मुहम्मद सुल्तान मिर्जा आपस में चाचा-भतीजा लगते थे।

अकबर अपने इस भतीजे से बड़ा स्नेह करता था किंतु भतीजे ने अपने चाचा के स्नेह का कोई मूल्य नहीं समझा तथा राज्य के लालच में बगावत करके अपनी जागीर से भी वंचित हो गया।

अकबर की तरह उसका पिता हुमायूँ भी अपने खानदान के शहजादे मुहम्मद सुल्तान मिर्जा से बहुत प्रेम करता था। मिर्जा सुल्तान ने हुमायूँ (Humayun) से भी कई बार बगावत की थी किंतु हुमायूँ ने मिर्जा सुल्तान को हर बार क्षमा करके अपने पास ही रखा था।

मुहम्मद सुल्तान मिर्जा के कई बच्चे हुए थे। उसके बहुत से बच्चों का जन्म तो मुहम्मद सुल्तान मिर्जा की वृद्धावस्था में हुआ था। उसके पुत्रों में उलूग मिर्जा, इब्राहीम हुसैन मिर्जा (IBRAHIM HUSSAIN MIRZA), मुहम्मद हुसैन मिर्जा, मसऊद मिर्जा, आकिल मिर्जा आदि के नाम मिलते हैं।

अकबर ने उन सब मिर्जाओं के भरण-पोषण के लिए संभल की जागीर दे रखी थी। अकबर ने मिर्जा सुल्तान के पुत्र-पौत्रों को यह अधिकार दे रखा था कि युद्ध-क्षेत्र में वे अकबर के हाथी अथवा घोड़े के चारों ओर रहकर युद्ध किया करें।

जौनपुर के अभियान में भी ये सारे मिर्जा, अकबर (Badshah Akbar) के चारों ओर रहे थे किंतु उनमें से कोई भी अकबर से प्रेम नहीं करता था। वे सब राज्य और सम्मान के भूखे थे। प्रेम की भूख उन्हें शायद ही सताती थी।

वस्तुतः मुगलिया-राजनीति में प्रेम का मूल्य बहुत कम था। निकटतम व्यक्ति से लेकर अनजान व्यक्ति तक कोई भी, कभी भी, कहीं भी, राज्य तथा सम्पत्ति के लालच में किसी भी सम्बन्ध को विच्छेद कर सकता था। किसी को भी मार सकता था। किसी का भी सर्वस्व हरण कर सकता था। तैमूर लंग (TIMUR LANG) से लेकर बाबर (BABUR)  तक ने भी यही किया था और अब उनके वंशज भी यही सब कर रहे थे।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

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