Sunday, June 23, 2024
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अध्याय – 23 – प्राचीन भारत में शिक्षा का स्वरूप एवं प्रमुख शिक्षा केन्द्र (स)

प्राचीन भारत में वैदिक शिक्षा के प्रमुख केन्द्र

उत्तरवैदिक-काल के अंत में शिक्षा व्यवस्था के स्वरूप में परिवर्तन आने लगा और देश के विभिन्न क्षेत्रों में छोटे-छोटे अध्ययन केन्द्रों की स्थापना होने लगी। ये शिक्षा केन्द्र जंगलों में स्थित ऋषि-आश्रमों अथवा आचार्य-कुलों में न होकर प्रसिद्ध धार्मिक नगरियों में खुले। महाकाव्य काल आने तक इस व्यवस्था ने व्यवस्थित रूप ले लिया। रामायण और महाभारत में अनेक शिक्षा केन्द्रों का उल्लेख मिलता है। इस काल में काशी, कांची, कन्नौज, काश्मीर आदि नगर विद्या-केन्द्रों के रूप में विख्यात हुए।

काशी (वाराणसी)

काशी विश्व के प्राचीनतम बसे शहरों में से एक और भारत का प्राचीनतम बसा नगर है। यहाँ वरुणा और असि नामक नदियां गंगाजी में आकर मिलती थीं इसलिए इसे वाराणसी भी कहते थे। विद्या और शिक्षा के क्षेत्र में काशी का महत्व वैदिक-काल से होने लगा था। उपनिषद् काल में काशी प्रतिष्ठित शिक्षा-केन्द्र के रूप में विकसित होने लगा था।

काशी के राजा अजातशत्रु एवं काशी के अन्य अनेक राजा विद्वत्ता के लिए देश-देशांतर में विख्यात थे। काशीराज अजातशत्रु से शिक्षा ग्रहण करने के लिए दूर देशों से विद्यार्थी काशी पहुँचते थे। तेइसवें जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ काशी के राजा अश्वसेन के पुत्र थे। उनके समय से काशी वैदिक धर्म के साथ-साथ जैन-धर्म और दर्शन का भी प्रधान केन्द्र बन गया।

बौद्ध युग में काशी का शिक्षा-केन्द्र के रूप में महत्व पहले से भी अधिक हो गया। वैदिक दर्शन, ज्ञान, तर्क और शिक्षा में काशी अग्रणी था। इसलिए महात्मा बुद्ध ने ‘धर्मचक्र-प्रवर्तन’ काशी से ही आरम्भ किया तथा अपने ज्ञान का प्रसार यहीं से आरम्भ किया ताकि उनका प्रभाव काशी के विद्वानों पर पड़ सके।

 ‘संजीव जातक’ के अनुसार काशी-निवासी ‘बोधिसत्व’ विद्याध्ययन के लिए तक्षशिला गया तथा विद्याध्ययन के बाद पुनः काशी लौटकर ‘बटुकों’ को पढ़ाने लगा। पाँच सौ बटुक उसके शिष्य थे और वह विश्व प्रसिद्ध आचार्य हो गया। ‘कोसिय-जातक’ में भी इस आचार्य का वर्णन है।

जातक साहित्य से ज्ञात होता है कि काशी के विद्यालयों में प्रवेश पाने के लिए छात्र की न्यूनतम आयु 16 वर्ष होनी चाहिए थी। मौर्य-सम्राट अशोक ने काशी में अनेक बौद्ध-विहारों और मठों का निर्माण करवाया। सातवीं सदी ईस्वी में बौद्ध-भिक्षुक ह्वेनत्सांग ने काशी के विहारों, चैत्यों, स्तूपों और भवनों को देखा था।

ह्वेनत्सांग के अनुसार यहाँ कई मंजिला भवन थे जो अत्यन्त आकर्षक और लुभावने थे। इससे स्पष्ट है कि इस काल में काशी वैदिक, जैन और बौद्ध तीनों प्रमुख चिंतन-धाराओं का मुख्य स्थल था। मध्य-कालीन भारत में भी काशी विद्या का प्रमुख केन्द्र बना रहा। बौद्ध-धर्म का ह्रास होने के साथ-साथ काशी पुनः प्राचीन, सनातन, वैदिक और पौराणिक दर्शन का शिक्षा-केन्द्र बना गया। यहाँ वेद, वेदांग, इतिहास, पुराण, ज्योतिष, कल्प एवं शिल्प आदि की शिक्षा दी जाती थी।

दसवीं सदी के अंत में जब अरबी विद्वान अलबरूनी भारत आया तो वह हिन्दूशास्त्रों से परिचय प्राप्त करने के लिए वाराणसी गया। उसने लिखा है- ‘इस नगरी में भारत के श्रेष्ठ विद्यालय हैं। हिन्दू विद्याएँ हमारे विजित प्रदेशों से भागकर काश्मीर और वाराणसी जैसे सुदूर स्थानों में चली आई हैं।’

मध्ययुगीन अभिलेखों से ज्ञात होता है कि वाराणसी में वेदों का अध्ययन किया जाता था। गहड़वाल वंश के अनेक राजाओं ने वाराणसी को अपनी दूसरी राजधानी के रूप में स्थापित किया। उनके संरक्षण में यह नगर शिक्षा का महत्वपूर्ण केन्द्र बना रहा। प्रसिद्ध कश्मीरी कवि श्रीहर्ष, गहड़वाल शासक विजयचन्द्र का सभासद था। उसने ‘नैषध चरित्’ की रचना काशी में रहकर की। कबीर और तुलसी आदि अनेक बड़े संत-कवि काशी में रहे। आज तक भी यह नगर प्राचीन संस्कृत विद्या का प्रमुख केन्द्र समझा जाता है।

तक्षशिला विश्वविद्यालय

वेदों में ‘गांधार’ नामक स्थान का उल्लेख हुआ है किंतु ‘तक्षशिला’ नामक नगरी का सर्वप्रथम उल्लेख वाल्मीकि रामायण में हुआ है। यह नगरी सिंधु नदी के पूर्वी तट पर स्थित थी। अनेक प्राचीन ग्रंथों के अनुसार दुष्यंत एवं शकुंतला के पुत्र महाराज भरत ने तक्षशिला की स्थापना की तथा इसका शासन ‘तक्ष’ नामक व्यक्ति को सौंपा। इसी ‘तक्ष’ के नाम पर यह तक्षशिला कहलाई।

महाभारत के पश्चात् महाराज जनमेजय ने तक्षशिला में नागयज्ञ किया था। इसलिए तक्षशिला का सम्बन्ध ‘तक्षक’ नाग से भी जोड़ा जाता है। महाभारत में आए उल्लेख के अनुसार आचार्य धौम्य के शिष्य उपमन्यु, आरुषि और वेद ने तक्षशिला में ही शिक्षा ग्रहण की थी। इससे अनुमान होता है कि उत्तरवैदिक-काल में तक्षशिला शिक्षा के केन्द्र के रूप में विकसित हो चुकी थी।

7वीं शताब्दी इस्वी पूर्व के काल में तक्षशिला ज्ञान और विद्या के प्रमुख केन्द्र के रूप में विख्यात थी। जातकों के अनुसार देश-विदेश से बड़ी संख्या में छात्र तक्षशिला आकर आचार्यों से शिक्षा प्राप्त करते थे।

त्रिपिटक की टीकाओं और अठ्ठकथाओं के अनुसार पाटलिपुत्र, बनारस, राजगृह, मिथिला और उज्जयिनी अदि स्थानों से बड़ी संख्या में विद्यार्थी उच्च अध्ययन करने के लिए तक्षशिला आते थे। ‘तिलमुष्टि जातक’ के अनुसार तक्षशिला के विद्यालयों का अनुशासन अत्यंत कठोर था और राजाओं के लड़के भी यदि बार-बार दोष करते तो पीटे जा सकते थे। अनेक जातकों में उल्लेख है कि वाराणसी के अनेक राजाओं ने भी अपने पुत्रों को उच्चशिक्षा प्राप्ति के लिए तक्षशिला भोजा क्योंकि तक्षशिला राजनीति, शस्त्र-विद्या, आयुर्वेद और विधि-शास्त्र आदि की शिक्षा प्राप्ति के लिए अन्यतम केंद्र थी।

तक्षशिला में एक ऐसा विद्यापीठ भी था, जिसमें एक आचार्य के पास 101 राजकुमार शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। इस आचार्य के गुरुकुल को ‘राजकुमारों का गुरुकुल’ कहा जा सकता है। तक्षशिला के अन्य विद्यालय भी भारत भर में प्रसिद्ध थे। ‘धोनसाख जातक’ में लिखा है कि भारत-भर से ब्राह्मण और क्षत्रिय वर्णों के लड़के तक्षशिला में पढ़ने जाया करते थे।

समस्त द्विज-पुत्र (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) एक साथ शिक्षा प्राप्त करते थे। ब्राह्मण के साथ क्षत्रिय भी वेदाध्ययन करते थे और क्षत्रिय के साथ ब्राह्मण भी धनुर्विद्या सीखता था। जातकों से ज्ञात होता है कि एक ब्राह्मण राजपुरोहित ने अपने पुत्र को धनुर्विद्या की शिक्षा प्राप्त करने के लिए तक्षशिला भेजा। क्षत्रिय, ब्राह्मण और वैश्य के साथ-साथ दर्जी और मछली मारने वाले भी, जो निम्न जाति के समझे जाते थे, यहाँ शिक्षा प्राप्त करते थे। चाण्डालों का तक्षशिला में पढ़ना निषिद्ध था। ‘चित्तसम्भूत जातक’ में लिखा है कि चाण्डाल लोग वेश बदल कर छिपकर, तक्षशिला में शिक्षा प्राप्त किया करते थे।

मेघावी छात्रों को राजकीय सहायता पर शिक्षा प्राप्त करने के लिए तक्षशिला भेजा जाता था। वाराणसी और राजगृह के राजपुरोहित-पुत्र और युवराजों के साथ जाने वाले ऐसे छात्रों का उल्लेख जातकों में मिलता है। इस युग में प्रतिभाशाली निर्धन छात्रों को राज्य और समाज की ओर से सहयोग दिया जाता था। तक्षशिला के स्नातकों में भारतीय इतिहास के कुछ अत्यंत प्रसिद्ध व्यक्त्यिों के नाम मिलते हैं।

संस्कृत व्याकरण के ज्ञाता ‘पाणिनि’ गांधार स्थित शालातुर के निवासी थे। संभवतः उन्होंने तक्षशिला में शिक्षा प्राप्त की। गौतम बुद्ध के समकालीन कुछ प्रसिद्ध व्यक्ति भी तक्षशिला के विद्यार्थी थे जिनमें कोसलराज ‘प्रसेनजित’, मल्लराज ‘बंधुल’, लिच्छवि नरेश ‘महालि’ तथा प्रसिद्ध शल्य-चिकित्सक ‘जीवक’ प्रमुख थे। जीवक के अपार ज्ञान और कौशल का विवरण ‘विनय-पिटक’ से मिलता है।

मौर्य राज्य के संस्थापक चंद्रगुप्त ने तक्षशिला में शिक्षा प्राप्त की। उसके गुरु ‘आचार्य चाणक्य’ तक्षशिला के स्नातक थे और वहीं के विश्वविद्यालय में राजनीति एवं अर्थशास्त्र के अध्यापक थे। काशी का राजकुमार ‘ब्रह्मदत्त’, मगधराज का लड़का ‘अरिन्दम’, इन्द्रप्रस्थ का राजकुमार ‘सुतसोम’, मिथिला का राजकुमार ‘विदेह’, इन्द्रप्रस्थ का राजकुमार ‘धनन्जय’, मिथिला के राजकुमार सुरुचि तथा कम्पिल्लक देश के राजकुमार ने भी तक्षशिला में शिक्षा प्राप्त की।

कुछ विद्वानों का मत है कि तक्षशिला में आधुनिक विश्वविद्यालय जैसी कोई संगठित संस्था नहीं थी। नगर में छोटे-छोटे अनेक गुरुकुल थे जिनमें आचार्यगण व्यक्तिगत रूप से विभिन्न विषयों की शिक्षा देते थे। किसी-किसी गुरुकुल में 500 अथवा उससे भी अधिक विद्यार्थी भी पढ़ते थे। इस कारण यदि इन्हें आधुनिक विश्वविद्यालयों के समकक्ष रखा जाए तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

तक्षशिला के उच्च शिक्षाकेन्द्रों में शिक्षा प्रारम्भ करने की आयु सोलह वर्ष थी। विद्यार्थी अपने-अपने नगर में प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करके तक्षशिला आया करते थे। राजाओं के साथ-साथ देश भर के ब्राह्मण तथा श्रेष्ठिजन अपने पुत्रों को शिक्षा प्राप्ति हेतु तक्षशिला भेजते थे। एक जातक-कथा में तक्षशिला की शिक्षा-विधि पर अच्छा प्रकाश डाला गया है।

तक्षशिला के पाठयक्रम में आयुर्वेद, धनुर्वेद, हस्तिविद्या, त्रयी, व्याकरण, दर्शनशास्त्र, गणित, ज्योतिष, गणना, संख्यानक, वाणिज्य, सर्पविद्या, तंत्रशास्त्र, संगीत, नृत्य और चित्रकला आदि का मुख्य स्थान था। जातकों में आए उल्लेखों के अनुसार तक्षशिला में कम से कम तीन वेद और 18 विद्याएं पढ़ाई जाती थीं। कर्मकांड की शिक्षा के लिये तक्षशिला की जगह वाराणसी अधिक प्रसिद्ध थी। तक्षशिला में पढ़ाये जाने वाले विषयों के सम्बन्ध में जातक साहित्य में उल्लेख आए हैं-

(1) वेदत्रयी: जातकों में सर्वत्र तीन वेदों का ही उल्लेख है। संभवतः इस काल तक अथर्ववेद को वेदों में सम्मिलित नहीं किया गया था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी ‘त्रयी’ में अथर्ववेद का समावेश नहीं किया गया है।

(2) अष्टादश विद्याएँ: बौद्ध जातकों में तक्षशिला का कई बार उल्लेख हुआ है। यहाँ अष्टादश विद्याओं में प्रवीणता प्राप्त कराई जाती थी। युद्धकला, व्याकरण, दर्शन, ज्योतिष, भविष्य-कथन, मुनीमी, व्यापार, कृषि, रथचालन, इन्द्रजाल, गुप्तनिधि अन्वेषण, संगीत, नृत्य और चित्रकला अष्टादश विद्याओं में सम्मिलत थे।

(3) सिप्प या शिल्प: तक्षशिला में अनेक प्रकार के शिल्प कार्यों की शिक्षा दी जाती थी।

(4) धनुर्विद्या: ‘असदिस जातक’ में असदृश (असदिस) कुमार का वर्णन है जिसने तक्षशिला के आचार्य से धनुर्विद्या में अपूर्व प्रवीणता प्राप्त की।

(5) हस्तविद्या: ‘सुसीम जातक’ के अनुसार वाराणसी के राजकुमार सुसीम ने तक्षशिला में आचार्य के पास वेदों के साथ-साथ हस्तविद्या भी सीखी।

(6) मन्त्र-विद्या: ‘अनभिरति जातक’ के अनुसार काशी में रहने वाले एक ब्राह्मण कुमार ने तक्षशिला में सम्पूर्ण मन्त्र-विद्या का अध्ययन किया। ‘चाम्पेयय जातक’ में लिखा है कि एक विद्यार्थी ने तक्षशिला में ऐसा मन्त्र सीखा था जिससे वह सब प्राणियों को अपने वश में कर सकता था। उस विद्यार्थी द्वारा सर्प को वश में किये जाने का विवरण भी एक जातक में दिया गया है।

(7) सब प्राणियों की आवाज समझने की विद्या: ‘परन्तप जातक’ में एक कुमार का वर्णन है जिसने तक्षशिला में जाकर उस विद्या का अध्ययन किया जिससे कि सब प्राणियों की आवाजों को समझा जा सके।

(8) चिकित्सा-शास्त्र: तक्षशिला चिकित्सा-शास्त्र की दृष्टि से बहुत प्रसिद्ध था। चिकित्सा-शास्त्र का अध्ययन करने के लिए दूर-दूर से विद्यार्थी तक्षशिला पहुँचते थे। मगध सम्राट बिम्बिसार के प्रसिद्ध राजवैद्य जीवक ने तक्षशिला में ही शिक्षा प्राप्त की थी।

विद्यार्थीगण अपने आचार्य के निरीक्षण में रहते थे। आचार्य अपने विद्यार्थियों को शारीरिक अथवा अन्य दण्ड भी दे सकते थे। आचार्यों के साथ बार-बार विश्व प्रसिद्ध विशेषण लगाना इस बात का द्योतक है कि उस समय तक्षशिला नगरी शिक्षाध्ययन के लिये दूर तक विख्यात थी। सामान्यतः शिक्षण कार्य उन आचार्यों के पास था जिन्हें निर्वाह के लिए राज्य की ओर से भूमि मिलती थी।

ऐसी भूमि से कोई कर नहीं लिया जाता था। इस भूमि की सम्पूर्ण आय शिक्षक वर्ग के ही काम आती थी। कौटिल्य ने ऐसे अध्यापकों का भी उल्लेख किया है, जिन्हें राज्य की ओर से वेतन दिया जाता था जिसे ‘पूजा वेतन’ कहते थे। इस काल में नैष्ठिक ब्रह्मचारियों की संख्या बहुत अधिक थी जो वेद और कल्प में पारंगत होकर निर्जन स्थान में रहते थे तथा उनके साथ उनके शिष्य भी रहा करते थे।

यहाँ पाठ्यक्रम निर्धारित होता था तथा छात्र अपनी इच्छानुसार विषय पढ़ते थे। शिक्षा का प्रधान लक्ष्य समाज की कल्याण भावना था न कि भौतिक साधनों अथवा अर्थ की उपलब्धि। तक्षशिला में शिक्षा समाप्त कर चुकने पर विद्यार्थी शिल्प, व्यवसाय आदि का क्रियात्मक ज्ञान प्राप्त करने के लिए तथा देश-देशान्तर के रीति-रिवाजों का अध्ययन करने के लिए देशाटन भी किया करते थे।

चौथी सदी ई.पू. से छठी सदी तक तक्षशिला को यवन, बैक्ट्रियन, शक, पह्ल्लव, कुषाण और हूणों के आक्रमण हुए जिनके कारण तक्षशिला के गुरुकुलों को भारी क्षति पहुँची। फिर भी तक्षशिला शिक्षा-केन्द्र का महत्व चौथी सदी ईस्वी तक बना रहा। पांचवी सदी इस्वी में भारत आए चीनी यात्री फाह्यान तथा उसके बाद आए यात्रियों ने तक्षशिला का कोई विवरण नहीं दिया है जिससे अनुमान होता है कि फाह्यान के आगमन से पहले ही तक्षशिला नष्ट हो चुका था। अब तक्षशिला पाकिस्तान में हैं।

काश्मीर

प्राचीनकाल से काश्मीर धर्म और शिक्षा का प्रधान केन्द्र था। प्रारम्भ में यह शैव धर्म का प्रमुख केन्द्र था किंतु कालांतर में बौद्ध धर्म और शिक्षा का भी प्रधान केन्द्र बन गया। पहली सदी ईस्वी में शक शासक कनिष्क ने चौथी बौद्ध संगीति का आयोजन काश्मीर में ही किया था। काश्मीर में बौद्ध दर्शन, साहित्य, न्याय, ज्योतिष, इतिहास आदि के प्रतिभा सम्पन्न विद्वान् हुए जिन्होंने अनेक ग्रन्थों की रचना की।

‘हरिविजय’ का रचनाकार रत्नाकर (नौवीं सदी), ‘वृहत्कथामंजरी’, ‘रामायणमंजरी’, ‘भारतमंजरी’, ‘बोधिसत्वावदान’ का कर्ता क्षेमेन्द्र, ‘कलाविलास’, ‘चतुर्वर्गसंग्रह’, ‘नीतिकल्पतरू’, ‘चारूचर्या’ आदि ग्रन्थों का रचयिता सोमेन्द्र (क्षेमेन्द्र का पुत्र), ‘श्रीकंठचरित्’ का लेखक मंखक (बारहवीं सदी) आदि विद्वान् काश्मीर के निवासी थे। काश्मीरी लेखक कल्हण ने ‘राजतरंगिणी’ लिखी जो तत्कालीन इतिहास जानने का प्रमुख स्रोत है।

धारा नगरी

धारा नगरी आठवी शताब्दी ईस्वी से परमारों की राजधानी थी किंतु मालवा के परमारों की शक्ति का वास्तविक उत्कर्ष वाक्पति मुंज (ई.972-994) के समय आरंभ हुआ। उसके समय में धारा नगरी भी देश भर में हिन्दू-धर्म एवं शिक्षा के महत्वपूर्ण केन्द्र के रूप में प्रसिद्ध हुई। मुंज के अनेक उत्तराधिकारियों ने धारा नगरी को विद्या और ज्ञान के केन्द्र के रूप में संरक्षण दिया।

 ‘दशरूप’ का लेखक धनंजय और ‘यशोरूपावलोक’ का रचियता धनिक परमार राजाओं के आश्रित थे। परमार शासक भोज अपने पूर्ववर्ती शासक मुंज की भाँति विद्वान् और प्रतिभाशाली शासक हुआ। वह राजनीति, दर्शन, ज्योतिष, वास्तु, काव्य, साहित्य, व्याकरण, चिकित्सा आदि विभिन्न विषयों का प्रकाण्ड पंडित था।

उसने राजमृगांक, विद्वज्जन मण्डल, समरांगण, शृंगारमंजरी तथा कूर्मशतक आदि अनेक ग्रन्थों की रचना की। भोज की राज्यसभा में बल्लल, मेरुतुंग, वररुचि, सुबंधु, अमर, माघ, धनपाल, मानतुंग, विज्ञानेश्वर, उवट आदि अनेक प्रसिद्ध लेखक रहते थे। उसने अनेक विद्यालयों की स्थापना की। उसके द्वारा स्थापित ‘सरस्वती कण्ठाभरण मंदिर एवं भोजशाला’ विश्वविद्यालय के रूप में विख्यात हुई। भोज की मृत्यु पर किसी कवि ने कहा था-

अद्य धारा निराधारा निरालम्बा सरस्वती।

पंडित खंडिता सर्वे भोजराजे दिवंगते।।

अर्थात राजा भोज की मृत्यु से धरती, आधारविहीन हो गई, सरस्वती अवलम्बन विहीन हो गई और पण्डित खण्डित हो गए।

कन्नौज

कन्नौज नगर की स्थापना उत्तरवैदिक-काल में गंगा नदी के बायीं ओर हुई। इसका पुराना नाम कान्यकुब्ज है तथा यह ब्राह्मणों का बहुत बड़ा केन्द्र था। इस नगर का प्रथम उल्लेख रामायण में मिलता है। उस काल में यह पौराणिक धर्म का बड़ा केन्द्र था। महाभारत में इस नगर का उल्लेख कई बार हुआ है। ई.पू. दूसरी शताब्दी में पतंजलि ने भी इस नगर का उल्लेख किया है।

दूसरी शताब्दी ईस्वी के विश्वप्रसिद्ध भूगोलवेत्ता टॉलेमी ने भी कन्नौज का उल्लेख किया है। ई.405 में जब फाह्यान कन्नौज आया तो उसने यहाँ दो बौद्ध विहार देखे। पाँचवीं शताब्दी में कन्नौज गुप्त-साम्राज्य के प्रमुख नगरों में से एक था। उनके काल में कन्नौज में अनेक मंदिरों का निर्माण हुआ। गुप्तकाल में कन्नौज हिन्दू-शिक्षा का प्रमुख केन्द्र था। परवर्ती-गुप्त काल में कन्नौज में अनेक बौद्ध विहारों की स्थापना हुई। छठी शताब्दी ईस्वी में श्वेत हूणों के आक्रमण से इस नगर को बहुत क्षति पहुँची।

सातवीं शताब्दी ईस्वी में चीनी यात्री ह्वेनत्सांग ने कन्नौज का उल्लेख किया है। उस समय यहाँ सैंकड़ों हिन्दू एवं बौद्ध मंदिर थे। गंगा के पूर्वी तट पर लगभग चार मील तक विहार ही विहार थे। ‘हर्षचरित’ के रचयिता बाणभट्ट ने कन्नौज के एक आचार्य-कुल में शिक्षा प्राप्त की थी। हर्ष के शासन काल में कन्नौज में बौद्ध और हिन्दू विद्वानों के बीच दार्शनिक-शास्त्रार्थ होते थे। ह्वेनत्सांग ने लिखा है कि कन्नौज के ब्राह्मण-पण्डित विद्वत्ता में अद्वितीय थे।

हर्ष के समकालीन राजशेखर ने अनेक ग्रन्थों की रचना की। प्रतिहारों के समय में भी कन्नौज शिक्षा का महत्वपूर्ण केन्द्र बना रहा। गहड़वालों के युग में भी कन्नौज की पुरानी कीर्ति बनी रही। इस प्रकार सातवीं सदी से लेकर बारहवीं सदी तक कन्नौज देश के प्रमुख शिक्षा-केन्द्रों में से एक था।

ई.1018 में महमूद गजनी ने कन्नौज पर आक्रमण किया तथा नगर एवं उसकी शिक्षण संस्थाओं को बहुत नुक्सान पहुँचाया। ई.1194 ई. में मुहम्मद गौरी ने कन्नौज पर अधिकर कर लिया। उसके बाद कन्नौज का धार्मिक एवं शैक्षणिक महत्व समाप्त हो गया।

कांचीपुरम्

कांची अथवा कांचीपुरम् दक्षिण भारत की एक प्राचीन धार्मिक नगरी है जो मेघावती नदी के किनारे स्थित है। इसे दक्षिण भारत का काशी भी कहा जाता है। कांची भारत के इतिहास की एक ऐसी नगरी है जहाँ हिन्दू-धर्म, बौद्ध धर्म तथा जैन-धर्म ने अपना प्रभाव जमाए रखने के लिए सैंकड़ों साल तक प्रतिस्पर्द्धा की।

वैदिक धर्म: महाभारत के समय भी कांची अस्त्तिव में थी। ई.पू. तीसरी शती के आचार्य पतंजलि ने अपने ग्रंथ महाभाष्य में कांची का उल्लेख किया है। तीसरी शताब्दी इस्वी में कांची पल्लव राजाओं की राजधानी बनी। पल्लवों के नेतृत्व में कांची संस्कृत भाषा और साहित्य के अध्ययन के महान् शिक्षा-केन्द्र के रूप में विख्यात हुई। चौथी शताब्दी ईस्वी में कालीदास ने भी इस नगरी का उल्लेख किया है। गुप्त सम्राट समुद्रगुप्त (ई.335-85) ने अपनी दक्षिण भारत विजय के दौरान कांची के राजा को भी परास्त किया था।

बौद्ध धर्म: पहली से पांचवीं शताब्दी तक कांची में बौद्ध धर्म खूब फला-फूला। दूसरी-तीसरी शताब्दी के बौद्ध-आचार्य आर्यदेव कांची में शिक्षित थे जो नागार्जुन के बाद नालंदा विश्वविद्यालय के प्रधान बने। पालि भाषा के विद्वान बुद्धघोष एवं धम्मपाल भी कांची के शिक्षित थे। पांचवी शताब्दी ईस्वी के प्रसिद्ध बौद्ध शास्त्रार्थी दिग्नाग ने कांची से शिक्षा प्राप्त करने के बाद नालन्दा विश्वविद्यालय के विख्यात ब्राह्मण पंडित सुदुर्गम को शास्त्रार्थ में पराजित किया था।

उसके बाद ही नालंदा विश्वविद्यालय वैदिक धर्म की शिक्षा के स्थान पर बौद्ध धर्म की शिक्षा का केन्द्र बना। पांचवी-छठी शताब्दी का बौद्ध-भिक्षु बोधिधर्मन् कांचीपुरम् का पल्लव राजकुमार था जिसने चीन में शाओलिन कुंगफू की स्थापना की। कांची की बौद्ध संस्थाओं ने बर्मा तथा थाईलैण्ड में बौद्धों की ‘थेरवाद’ शाखा का प्रसार किया।

बिहार के गया क्षेत्र में स्थित कुर्किहार (अपनाक विहार) से प्राप्त नौवीं से ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी के अभिलेखों से ज्ञात होता है कि इस विहार को सर्वाधिक दान कांची से प्राप्त होता था तथा कांची के बहुत से बौद्ध-श्रद्धालु एवं भिक्षु गया की यात्रा करते थे।

जैन-धर्म: पहली शताब्दी ईस्वी में कांची में कुण्ड कुण्डाचार्य द्वारा जैन-धर्म का प्रसार किया गया। तीसरी शताब्दी ईस्वी में अकलंक द्वारा जैन-धर्म का प्रसार किया गया। पल्लवों के पूर्ववर्ती कल्भर राजाओं ने जैन-धर्म स्वीकार किया। इस प्रकार कांची में राजकीय संरक्षण मिल जाने के कारण जैन-धर्म का खूब प्रसार हुआ। पल्लव राजा सिंहविष्णु, महेन्द्र वर्मन तथा सिंहवर्मन (ई.550-560) ने भी जैन-धर्म का अनुसरण किया।

हिन्दू-धर्म का पुनरुत्थान: जब छठी-सातवीं शताब्दी ईस्वी में नयनार तथा आलवार संतों का उदय हो गया तो पल्लव राजाओं ने हिन्दू-धर्म अंगीकार कर लिया। सर्वप्रथम पल्लव राजा महेन्द्र वर्मन नयनार संतों के प्रभाव से जैन-धर्म त्यागकर हिन्दू बन गया। सातवीं-आठवीं शताब्दी के महाकवि दण्डिन् ने कांची के राज्याश्रय में रहकर अनेक ग्रन्थों की रचना की। कदम्बवंशी राजकुमार मयूरवर्मन तथा वात्स्यायन आदि विद्वानों ने कांची में रहकर शिक्षा प्राप्त की।

आठवीं शताब्दी में दक्षिण में शंकर के प्रभाव से शैव मत का तथा ग्यारहवीं शताब्दी में रामानुज के प्रभाव से वैष्णव धर्म का प्रभाव बढ़ा। दक्षिण के चोल शासकों तथा विजयनगर के शासकों ने हिन्दू-धर्म को अंगीकार किया किंतु उन्होंने जैन-धर्म को भी सम्मान दिया जो अब भी कांची में विद्यमान था। त्रिलोक्यनाथ एवं चंद्रप्रभ के जुड़वां जैन मंदिर में पल्लव एवं चोल शासकों के शिलालेख पाए गए हैं।

हिन्दू-धर्म में कांची को भारत की सात बड़ी धार्मिक नगरियों में सम्मिलित किया गया है जिन्हें सप्तपुरी कहा जाता है। हिन्दू-धर्म में मान्यता है कि कांची की पवित्र भूमि में इतनी शक्ति है कि यहाँ मृत्यु होने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है। गरुड़ पुराण के अनुसार कांची सहित सभी सप्तपुरियां मोक्ष देने वाली हैं। कांची शैव एवं वैष्णव दोनों मतों के श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत आदरणीय है। कांची में भगवान शिव के 108 तथा भगवान विष्णु के 108 मंदिर हैं।

कुछ लोगों का विश्वास है कि कांची का कामाक्षी अम्मा मंदिर आदिशंकराचार्य द्वारा स्थापित किया गया था तथा आदिशंकराचार्य ने कांची में एक मठ की भी स्थापना की किंतु एक अन्य मान्यता के अनुसार इस मठ की स्थापना शृंगेरी मठ की शाखा के रूप में 18वीं सदी में कुंभकोनम द्वारा की गई। बाद में इस मठ ने स्वयं को स्वतंत्र कर लिया। कांची में एक मठ ‘उपनिषद् ब्रह्मम् मठ’ के नाम से जाना जाता है।

मान्यता है कि इस मठ में ‘उपनिषद ब्रह्मयोगिन’ नामक संत ने महासमाधि ली थी जिन्होंने भारत के समस्त प्रमुख उपनिषदों की टीका लिखी थी। सदाशिव ब्रह्मेन्द्र ने इसी मठ में सन्यास लिया था।

पूर्व-मध्य-कालीन चोल वंश एवं पाण्ड्यवंश के शासन काल में कांची दक्षिण भारत का विख्यात शिक्षा केन्द्र बनी रही जहाँ अनेक आचार्य वैदिक साहित्य का अध्ययन-अध्यापन करते थे। दक्षिण भारत के साथ-साथ उत्तर भारत से भी विद्यार्थी कांची आते थे।

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