Saturday, February 24, 2024
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हम दिल्ली की सड़कों पर सुभाष का स्वागत तलवारों से करेंगे!

ई.1942 में द्वितीय विश्वयुद्ध जोरों पर था। जब सुभाष चंद्र बोस को पूर्वी भारत में हवाई हमलों एवं जमीनी हमलों में सफलताएं मिलने लगीं तो कांग्रेसी नेता सुभाष की सफलताओं से घबरा गए। उन्हें लगा कि यदि सुभाष के विमान दिल्ली में उतर गए तो अंग्रेजों को भारत की सत्ता सुभाष बाबू को सौंपनी पड़ेगी। इस स्थिति की कल्पना भी कांग्रेसी नेताओं के रोंगटे खड़े कर देती थी।

इसलिए जवाहरलाल नेहरू ने सार्वजनिक रूप से वक्तव्य दिया- ‘हम दिल्ली की सड़कों पर सुभाष का स्वागत तलवारों से करेंगे।’

इस प्रकार कांग्रेसियों की अहिंसा का हिमालय अपनी पराजय की आशंका उत्पन्न होते ही पिघल गया। 9 अगस्त 1942 को कांग्रेस ने बम्बई में एक सम्मेलन आयोजित किया जिसमें गांधीजी ने ‘डू और डाई’ तथा ‘नाउ ऑर नेवर’ के नारे लगाए तथा अंग्रेजों से कहा कि वे आज रात ही भारत छोड़ कर चले जाएं। इसे अगस्त क्रांति एवं भारत छोड़ो आंदोलन कहा जाता है। उसी रात बहुत से कांग्रेसी नेता जेलों में डाल दिए गए। सरकार के इस कदम के विरोध में देश में व्यापक हिंसा फैल गई। बड़ी संख्या में जन-धन की हानि हुई।

मुस्लिम लीग को लाभ

जब कांग्रेस ने भारत छोड़ो आंदोलन आरंभ किया तो मुस्लिम लीग बड़ी कठिनाई में पड़ गई। वह अब तक ‘पहले पाकिस्तान फिर आजादी’ के लिए लड़ती आई थी किंतु कांग्रेस पाकिस्तान की बात किए बिना ही आजादी मांग रही थी। यदि अंग्रेज भारत का विभाजन किए बिना चले जाएंगे तो मुस्लिम लीग को नए सिरे से पाकिस्तान के लिए संघर्ष करना पड़ेगा और इस बार उनका मुकाबला मुस्लिम लीग से सहानुभूति रखने वाले अंग्रेजों से नहीं अपितु मुस्लिम लीग को समाप्त करने की मंशा रखने वाले कांग्रेसियों से होगा। इसलिए जिन्ना ने कांग्रेस के खिलाफ असभ्य भाषा में भाषण दिये।

उसने कहा- ‘कांग्रेस ने सरकार के खिलाफ लड़ाई का ऐलान किया है। ऐसा करते वक्त कांग्रेस ने सिर्फ अपना स्वार्थ देखा है, दूसरों का नहीं।’ जिन्ना ने मुसलमानों का आह्वान किया कि वे इस आंदोलन से बिल्कुल अलग रहें।’

इस आंदोलन के आरम्भ होने से पहले ही कांग्रेस के बड़े नेता जेल भेज दिए गए। इस कारण आंदोलन का नेतृत्व छोटे स्तर के कार्यकताओं के हाथों में चला गया जिन्होंने गांधीजी के अहिंसा के सिद्धांत को ताक पर रखकर पूरे देश में व्यापक हिंसा की। इस कारण मुस्लिम लीग के पक्ष वाली प्रेस ने इस पूरे आंदोलन के दौरान ब्रिटिश शासन से लड़ रहे कांग्रेसियों को ‘गुण्डे’ शब्द से संबोधित किया।

कांग्रेसी नेताओं के खिलाफ उतनी सख्त बातें ब्रिटिश प्रेस ने भी नहीं कीं जितनी मुस्लिम लीग प्रेस ने कहीं। मुस्लिम लीग वर्किंग कमेटी ने मित्र-राष्ट्रों का ध्यान हिन्दुस्तान के 10 करोड़ मुसलमानों की उन अंचलों में सार्वभौम राज्यों की स्थापना की मांग की तरफ खींचा, जो उनका निवास स्थान है और जहाँ उनका बहुमत है।

भारत-छोड़ो आंदोलन का सबसे ज्यादा लाभ मुस्लिम लीग को मिला। आंदोलन के कारण कांग्रेसी नेता तो जेल में चले गए जबकि मुस्लिम लीगी नेता स्वतंत्र रहे तथा उन्होंने अंग्रेजों के युद्ध-प्रयासों में सक्रिय सहयोग देकर अंग्रजों की सहानुभूति जीत ली ताकि मुसलमानों को अलग पाकिस्तान देने का जो इरादा अंग्रेज पहले से दिखा रहे थे, वह और पक्का हो जाए।

नवम्बर 1942 के मध्य में दिल्ली में जिन्ना ने भारत के मुसलमानों से पाकिस्तान हासिल करने के लिए कटिबद्ध रहने की अपील करते हुए कहा कि- ‘या तो हम पाकिस्तान लेकर रहेंगे और या फिर अपना अस्तित्व ही मिटा देंगे।’

 हिन्दू महासभा के अध्यक्ष वीर सावरकर ने दिसम्बर 1942 में कानपुर में आयोजित अधिवेशन में जिन्ना की मांग का विरोध करते हुए कहा कि– ‘पाकिस्तान की मांग किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं की जाएगी।’

सावरकर ने श्यामाप्रसाद मुखर्जी की अध्यक्षता में एक कमेटी सम्मानपूर्ण शर्तों पर भारत-ब्रिटिश समझौते के लिए अंतिम प्रयास करने के लिए बैठाई। मुखर्जी ने भी जिन्ना से बात की किंतु कोई नतीजा नहीं निकला।

वायसराय को भारत की भौगोलिक एकता का स्मरण

वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो (ई.1936-44) अपनी नियुक्ति के समय भारत संघ के निर्माण का सपना लेकर आए थे जिसे इंग्लैण्ड की सरकार के अधीन स्वायत्तता दी जा सके किंतु परिस्थितियां तेजी से लिनलिथगो के हाथों से निकलती जा रही थीं। पहले तो देशी-राज्यों के राजाओं ने प्रस्तावित संघ में मिलने से मना कर दिया और अब कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग न केवल आपस में लड़ रही थीं अपितु कांग्रेस अंग्रेजों को बिना किसी संघ के निर्माण के भारत से बाहर चले जाने के लिए संघर्ष कर रही थी।

लिनलिथगो ने स्थिति संभालने का प्रयास करने के लिए 17 दिसम्बर 1942 को एसोसिएटेड चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स की वार्षिक सभा में एक ऐसा वक्तव्य दिया जो अंग्रेज शासक मुस्लिम लीग की स्थापना के बाद से कभी नहीं देते थे।

वह वक्तव्य इस प्रकार था- ‘भारत की भौगोलिक एकता बनाए रखी जाए क्योंकि विभाजित भारत का विश्व में कोई महत्त्व नहीं रह जाएगा।’

बाँटो और भागो

लिनलिथगो के इस बयान पर मुस्लिम लीग के नेता आग-बबूला हो गए। वायसराय न केवल मुस्लिम लीग के अब तक के परिश्रम पर पानी फेर रहा था अपितु वह सीधे-सीधे उन कांग्रेसियों का पक्ष ले रहा था जो अंग्रेजों को आधी रात में ही भारत छोड़कर चले जाने को कह रहे थे। इसलिए मुस्लिम लीग के नेताओं ने पाकिस्तान की मांग के समर्थन में अपनी आवाज और अधिक मुखर की ताकि वह भारत की सरहदों को पार करके, विश्वयुद्ध लड़ रहे मित्र-राष्ट्रों के कानों तक अच्छी तरह पहुंच जाए।

मुस्लिम लीग द्वारा अपनी आवाज तीखी कर दिए जाने के बावजूद जब इंग्लैण्ड के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी और पाकिस्तान की मांग एक इंच भी आगे नहीं सरकी तो दिसम्बर 1943 में मुस्लिम लीग ने कराची अधिवेशन में ‘भारत छोड़ो’ नारे के विरुद्ध एक विचित्र नारा दिया- ‘बाँटो और भागो’ इस नारे के माध्यम से अंग्रेजों का आह्वान किया गया था कि वे भारत को हिन्दुस्तान और पाकिस्तान में बाँटकर यहाँ से भाग जाएं।

बंगाल में अकाल की विभीषिका

इसी बीच एक बड़ी मानव त्रासदी हुई। अंग्रेजों ने द्वितीय विश्वयुद्ध के मोर्चों पर लड़ रही अपनी फौज के लिए भारत से इतना चावल और गेहूं पानी के जहाजों में भरकर सैनिकों को भिजवा दिया कि ई.1943 में बंगाल में अकाल पड़ गया और बंगाल में 30 लाख आदमी मर गए।

इससे भारतीयों में अंग्रेजों के प्रति नफरत अपने चरम पर पहुंच गई। देश भर में कम्युनिस्ट आंदोलन एवं क्रांतिकारी गतिविधियां बढ़ गईं। फिर भी मुस्लिम लीग मानवता की इस भयानक त्रासदी से तथा क्रांतिकारी आंदोलन से असंपृक्त रहकर केवल पाकिस्तान-पाकिस्तान की रट लगाती रही।

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